Thursday, 30 May 2019

पालीताना : जैन धर्म का महातीर्थ

   पालीताना को जैन धर्म का महातीर्थ कहा जाना चाहिए। कारण पालीताना मेें जैन धर्म के मंदिरों की एक विशाल श्रंखला विद्यमान है।

   सफेद संगमरमर के इन मंदिरों की नक्काशी एवं मूर्तिकला अति दर्शनीय है। मंदिरों का सौन्दर्य एवं नक्काशी उत्तम कोटि की है। खास यह कि मंदिरों की कारीगरी सजीव प्रतीत होती है। शायद इसी लिए यहां का मूर्ति शिल्प विश्व प्रसिद्ध है। 

   भारत के गुजरात के भावनगर जिला का शहर पालीताना वस्तुत: एक शानदार पर्यटन क्षेत्र है। पालीताना खास तौर से जैन धर्म मंदिरों की श्रंखला की वैश्विक ख्याति रखता है।

   भावनगर के दक्षिण पश्चिम में करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित पालीताना को वस्तुत: धर्म नगरी कहा जाना चाहिए। पालीताना शत्रुंजय नदी के तट पर विकसित एक बेहद सुन्दर शहर है।
  खास यह कि पालीताना शहर शत्रुंजय पर्वत की तलहटी पर स्थित है। मंदिरों के इस शहर की खासियत यह है कि पालीताना पूर्ण शाकाहारी शहर है। 

   पर्वत शिखर पर भी मंदिरों की एक शानदार श्रंृखला विद्यमान है। पर्वत शिखर पर 863 से अधिक जैन मंदिरों की सुन्दर श्रंखला विद्यमान है। विशेषज्ञोें की मानें इन शानदार एवं सुन्दर मंदिरों की शानदार श्रृंखला 11 वी शताब्दी मे अस्तित्व में आई थी। 

   सूर्योदय के समय पालीताना का लालित्य एवं सौन्दर्य आैर भी अधिक निखर आता है। कारण सूर्य की किरणों से रोशनी से संगमरमर के मंदिर शिखर खास तौर से चमक उठते हैं।
  यह अद्भुत एवं निराली छटा पर्यटकों एवं श्रृद्धालुओं को मुग्ध कर लेती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे माणिक मोती चमक रहे हों।

   जैन धर्म में पालीताना शत्रुंजय महातीर्थ का विशेष महत्व है। जैन धर्म के पांच प्रमुख महातीर्थ में पालीताना शत्रुंजय तीर्थ एक है। सूर्योदय के समय पालीताना देव लोक सा प्रतीत होता है। 

   खास यह कि सूर्यास्त के पश्चात किसी को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं होती है। मान्यता है कि रात में भगवान विश्राम करते हैं। लिहाजा रात में मंदिरों में किसी श्रद्धालुओं को प्रवेश अनुमति नहीं होती है। 

   पालीताना का प्रमुख एवं सुन्दर मंदिर जैन धर्म के प्रथम तीर्थकंर भगवान ऋषभदेव का है। आदिश्वर देव के इस मंदिर में भगवान के आंगी दर्शनीय है। दैनिक पूजन अर्चन के दौरान भगवान का श्रंगार अति दर्शनीय होता है। 

   वर्ष 1618 में बना चौमुखा मंदिर पालीताना का सबसे बड़ा मंदिर है। कुमारपाल, मिलशाह, समप्रति राज मंदिर यहां के अन्य खास मंदिर हैं। खास यह कि पालीताना के मंदिरोें में बहुमूल्य प्रतिमाओं का संग्रह अति समृद्धशाली है।

   शत्रुंंजय पर्वत का यह धर्म क्षेत्र विश्व के पर्यटकों को आकर्षित करता है। शत्रुंजय का अर्थ शत्रु पर विजय प्राप्त करना है। विशेषज्ञों की मानें तो इस क्षेत्र में 3000 से अधिक मंदिर विद्यमान हैं।

   पर्वत शिखर पर विद्यमान मंदिरों की श्रंखला जैनियों की अलग-अलग पीढ़ियों द्वारा बनाये गये हैं। मान्यता है कि श्रद्धालुओं की हर इच्छा पूरी होती है। जैन धर्म मान्यता यह भी है कि पालीताना दर्शन श्रृद्धालुओं को मोक्ष प्रदान करता है। 

   पालीताना के मंदिरों की श्रंखला जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों को समर्पित है। मान्यता है कि जैन धर्म के तीर्थंकरों ने यहां महानिर्वाण प्राप्त किया था। निर्माण प्राप्त करने के बाद इसे सिद्धाक्षेत्र कहा जाता है।
   मंदिरों के शहर पालीताना की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट भावनगर एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन भी भावनगर जंक्शन है। श्रृद्धालु एवं पर्यटक पालीताना की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
21.537900,71.822900

Thursday, 23 May 2019

सालासर बालाजी धाम: हिन्दुओं का तीर्थ

   सालासर बालाजी धाम को हिन्दुओं का तीर्थ कहा जाना चाहिए। जी हां, सालासार बालाजी धाम की महिमा अत्यंत निराली है। 

   इस धार्मिक स्थल की महिमा का गुणगान देश विदेश में होता है। भारत के राजस्थान के जिला चुरु का यह धार्मिक स्थान वस्तुत: भगवान हनुमान जी को समर्पित है।

   खास यह कि इस दिव्य-भव्य दरबार में हनुमान जी दाढ़ी एवं मूंछ वाले स्वरूप में विद्यमान है। चैत्र पूर्णिमा एवं आश्विन पूर्णिमा पर यह भव्य उत्सव का आयोजन होता है। किवदंती है कि नागपुर के असोटा गांव में सालासार बालाजी का उद्भव हुआ था।

  असोटा गांव का एक किसान खेत जोत रहा था। अचानक उसके हल से कोई पथरीली वस्तु टकरायी। साथ ही उसे किसी की आवाज सुनाई दी। खोदाई की तो किसान को दो मूर्तियां मिलीं। उसी वक्त किसान की पत्नी भी खेत पर पहंुची। 

   किसान की पत्नी मूर्तियों को साड़ी में लपेट कर घर ले आयी। यह मूर्तियां बाला जी हनुमान जी की थी। श्रद्धा, समर्पण एवं विश्वास का यह अवतरण गांव भर में फैल गया। गांव को ही स्वप्न में कहा गया कि बाला जी की इन प्रतिमाओं को जिला चुरु के सालासर भेज दो। 

   इसी दौरान सालासर में हनुमान जी एक भक्त मोहन दास महाराज को स्वप्न में बालाजी ने दर्शन देकर असोटा में मूर्ति के प्रकट होने का सदेश दिया था। संंदेशों के आदान प्रदान के बाद सर्वशक्तिमान बालाजी सालासर में विराजमान हो गये। 

   इसके बाद सालासर धाम श्रद्धा एवंं आस्था का केन्द्र बन गया। खास यह कि असोटा में प्राप्त दूसरी मूर्ति भरतगढ़ जिला के पाबोलाम में प्रतिष्ठापित की गयी। 
   खास यह कि पाबोलाम में सुबह भव्य-दिव्य धार्मिक आयोजन किया गया तो शाम को सालासर धाम में धार्मिक उत्सव का आयोजन किया। 

   सालासर धाम में देश विदेश के लाखों श्रद्धालु सालासर बालाजी के दर्शन के लिए उमड़ते हैं। मान्यता है कि दाढ़ी मूंछ वालेे बालाजी का यह भारत में एकमात्र मंदिर है। 
  मान्यता है कि इस शानदार मंदिर का निर्माण मुस्लिम कारीगरों ने किया था। मुस्लिम कारीगर नूर मोहम्मद एवं दाऊ ने इस भव्य-दिव्य मंदिर को स्वरूप दिया था। सालासर बालाजी धाम में श्रद्धालुओं को दर्शन से लेकर ठहरने आदि की सभी आवश्यक व्यवस्थायें हैं।
   सालासर बालाजी धाम की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोेर्ट जयपुर है। जयपुर एयरपोर्ट से सालासर बालाजी धाम की दूरी करीब 185 किलोमीटर है।
   निकटतम रेलवे स्टेशन सुजानगढ़ जंक्शन है। सुजानगढ़ से सालासर बालाजी धाम की दूरी करीब 25 किलोमीटर है। श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी सालासर बालाजी धाम की यात्रा कर सकते हैं।
27.705090,74.732200

Monday, 20 May 2019

सारनाथ: बौद्ध धर्म का महातीर्थ

    सारनाथ को बौद्ध धर्म का महातीर्थ कहा जाना चाहिए। भगवान बुद्ध का मंदिर सारनाथ का मुख्य आकर्षण है। खास यह कि सारनाथ बौद्ध महातीर्थ देश दुनिया में खास ख्याति रखता है। 

   दुनिया के बौद्ध धर्मावलंबियों का यह महातीर्थ आस्था एवं ज्ञान का केन्द्र है। भारत के उत्तर प्रदेश के जनपद वाराणसी स्थित सारनाथ बौद्ध धर्म अनुयायियों का वैश्विक केन्द्र है। विशेषज्ञों की मानें तो बोध गया में ज्ञान प्राप्त होने के बाद भगवान गौतम बुद्ध ने सारनाथ में पहला उपदेश दिया था। 

  इस स्थान को धर्म चक्र प्रवर्तन नाम से जाना पहचाना जाता है। धर्म चक्र प्रर्वतन का आशय है कि धर्म चक्र की गति। इसी स्थान से बौद्ध मत के प्रचार-प्रसार हुआ था। इस स्थान को बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थ में से एक माना जाता है। 

   खास यह कि जैन ग्रंथों में इसे सिंहपुर के नाम से जाना पहचाना जाता है। मान्यता है कि जैन धर्म के 11 वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ का जन्म इसी क्षेत्र में हुआ था। सारनाथ एवं आसपास आकर्षक स्थानों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान हैं।

  सारनाथ का मुख्य आकर्षण सारनाथ भगवान बुद्ध मंदिर, अशोक का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, धामेख स्तूप, चौखण्डी स्तूप, राजकीय संग्रहालय, जैन मंदिर, चीनी मंदिर, मूलगंध कुटी एवं नवीन विहार आदि इत्यादि हैं। 

   खास यह कि संसार के विभिन्न देशों के बौद्ध तथा पर्यटक इस विशिष्ट पर्यटन स्थल सारनाथ की दर्शनीयता के लिए आते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो 1905 में पुरातत्व विभाग ने खुदाई की। इसके बाद सारनाथ का जीर्णोद्धार किया गया। 
  भगवान बुद्ध मंदिर: भगवान बुद्ध मंदिर वस्तुत: भगवान बुद्ध को समर्पित है। मंदिर के मुख्य आसन पर भगवान बुद्ध की अद्भुत प्रतिमा विद्यमान है। भगवान गौतम बुद्ध की यह प्रतिमा सोने की है। लिहाजा प्रतिमा का विशेष आकर्षण है।


   भगवान गौतम बुद्ध के दर्शन करने विदेशी पर्यटक एवं श्रद्धालु बड़ी तादाद में आते हैं। इस मंदिर को मूलगंध कुटी विहार के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। मूलगंंध कुटी विहार वस्तुत: धर्मराजिका स्तूप से उत्तर दिशा में स्थित है।

   भारत भ्रमण पर आये चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इसका उल्लेख किया था। इसकी ऊंचाई 200 फुट है। मूलगंध कुटी विहार नाम से विख्यात इस मंदिर की नक्काशी अति दर्शनीय है। विशेषज्ञों की मानें तो इसका निर्माण गुप्तकाल में किया गया था। चारो ओर मिट्टी एवं चूने से बना पक्का फर्श शानदार है। 
  चौखण्डी स्तूप: चौखण्डी स्तूप वस्तुत: सारनाथ के अवशिष्ट स्मारकों से अलग है। इस स्थान पर गौतम बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को सर्वप्रथम उपदेश दिया था। 
  स्मारक स्वरूप इस स्तूप का निर्माण किया गया था। यह स्तूप 91.44 मीटर ऊंचा है। इसकी पहचान चौखण्डी स्तूप की है।
  अशोक स्तम्भ: अशोक स्तम्भ मुख्य मंदिर से पश्चिम दिशा में स्थित है। यह अशोक कालीन प्रस्तर स्तम्भ है। इसकी ऊंचाई करीब 17.55 मीटर है। वर्तमान समय में इसकी ऊंचाई 2.03 मीटर है। स्तम्भ का उपरी हिस्सा सारनाथ संग्रहालय में शोभायमान है। 
  सारनाथ संग्रहालय: सारनाथ संग्रहालय गुप्तकालीन सम्पदाओं एवं भगवान गौतम बुद्ध के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित संग्रहालय है। संग्रहालय में गुप्तकालीन कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। 
   भगवान बुद्ध की विभिन्न प्रतिमाएं यहां दर्शित हैं। सारनाथ की मूर्तिकला की विशेष शैली यहां खास तौर से दिखती है। मूर्तियों का आत्मिक सौन्दर्य विशेष तौर से दिखता है।

  सारनाथ महातीर्थ की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट लाल बहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट बाबतपुर वाराणसी है। 
  बाबतपुर से सारनाथ की दूरी 30 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन वाराणसी जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
25.377627,83.027600

Sunday, 12 May 2019

देवीधुरा मंदिर: फल एवं फूलों का उत्सव

   देवीधुरा मंदिर को हिन्दुओं का तीर्थ कहा जाना चाहिए। वस्तुत: यह मंदिर मां वाराही देेवी को समर्पित है। उत्तराखण्ड के चंपावत जिला का यह धार्मिक स्थान पौराणिक एवं ऐतिहासिक मान्यता रखता है।

   चंपावत जिला के देवीधुरा कस्बा स्थित देवीधुरा मंदिर मां वाराही के 52 शक्तिपीठ में से एक है। समुद्र तल से करीब 1850 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर धर्म, आस्था एवं विश्वास का प्रतीक होने के साथ ही एक शानदार सुरम्य क्षेत्र है। 

  खास यह कि मंदिर के चौतरफा देवदार के सुन्दर वृक्ष यहां की शोभा एवं शान हैं। देवीधुरा मंदिर शक्तिपीठ पर्वत श्रंखला के मध्य स्थित है। लिहाजा देवीधुरा देवी मंदिर का प्राकृतिक सौन्दर्य अति दर्शनीय है।
  खास यह कि इस धार्मिक स्थान को मां वाराही धाम भी कहते हैं। शीतलता एवं शांत परिवेश वाले इस धार्मिक धाम का अपना एक अति प्राचीन इतिहास है। 

   खास तौर से देवीधुरा का धार्मिक उत्सव बग्वाल अति प्रसिद्ध है। वस्तुत: बग्वाल फूलों एवं पत्थरमार युद्ध के लिए प्रसिद्ध है। यह विचित्र उत्सव रक्षा बंधन के दिन आयोजित होता है। मंदिर के गर्भगृह में मां बाराही देवी की प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित है। 

  मंदिर के गुफा प्रवेश द्वार पर दो विशाल संकरी पाषाण चट्टानें हैं। इन चट्टानों के मध्य ही मां वाराही देवी की प्रतिमा ताम्र पेटिका में है। 
  मान्यता है कि मां वाराही देवी की प्रतिमा के सीधे दर्शन नहीं होते हैं। लिहाजा मां वाराही देवी की प्रतिमा ताम्र पेटिका में स्थापित है।

   मान्यता है कि मां बाराही देवी का तेज अत्यधिक है। जिससे सीधे दर्शन करने से श्रद्धालुओं के आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है। 
  विशेषज्ञों की मानें तो इस सिद्धपीठ की स्थापना राजाओं के शासनकाल में हुयी थी। इस सिद्धपीठ में चंपा देवी एवं लाल जीभ वाली महाकाली की प्रतिमा स्थापित की गयी थी। 

   मान्यता है कि इस क्षेत्र में महाभारत काल में पाण्डव ने प्रवास किया था। पहाडी पर खेल-खेल में भीम ने दो पाषाण शिलायें फेंक दी थीं। इनमें से एक शिला को राम शिला कहा जाता है। इस स्थान पर पचीसी का चिह्न विद्यमान है। इसे जुयें का चिह्न माना जाता है। शिला पर हाथों का निशान भी विद्यमान है।

   विशेषज्ञों की मानें तो प्राचीन काल में इस मंदिर में बलि की प्रथा थी। इस प्रथा ने बाद में पत्थरमार युद्ध के रूप में एक उत्सव का स्वरूप ले लिया। इस उत्सव को बग्वाल कहा जाता है। इस उत्सव पर देवी आराधना के लिए श्रद्धालु पत्थर बरसाते हैं। श्रद्धालु योद्धा मां बाराही का जयघोष करते हैं।

   मंदिर के पुजारी शंखनाद कर श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हैं। पत्थर की चोट से बचने के लिए श्रद्धालु योद्धा लकड़ी की ढ़ाल रखते हैं। हालांकि बदलते हालात में अब पत्थर मार उत्सव पर अंकुश लगने लगा। हालांकि अब फूलों एवं फलों का उत्सव होता है।

   इसमें श्रद्धालु फल एवं फूलों को बरसाते हैं। बग्वाल उत्सव इस इलाके में बेहद प्रसिद्ध है। मान्यता है कि देवी दर्शन से श्रद्धालुओं की इच्छाओं की पूर्ति होती है। 
  पर्वतीय क्षेत्र में होने के कारण देवीधुरा मंदिर एवं आसपास का वातावरण हमेशा सुहावना रहता है। लोहाघाट नगर से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित हिन्दुओं का यह तीर्थ खास तौर से जाना पहचाना जाता है।

   देवीधुरा मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट पंडित गोविन्द बल्लभ पंत एयरपोर्ट पंत नगर है। 
  निकटतम रेलवे स्टेशन टनकपुर जंक्शन है। टनकपुर जंक्शन से देवीधुरा मंदिर की दूरी करीब 60 किलोमीटर है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी देवीधुरा मंदिर दर्शन के लिए जा सकते हैं।
29.312316,80.074707

Friday, 3 May 2019

सांई मंदिर शिरडी:अद्भुत एवं विलक्षण

   सांई मंदिर शिरडी को विलक्षण एवं अद्भुत दरबार कहा जाना चाहिए। सांई बाबा के इस दरबार से कोई श्रद्धालु निराश नहीं होता है। मान्यता तो यही है। 

   वस्तुत: शिरडी स्थित सांई मंदिर संत सांई बाबा का समाधि स्थल है। जिसे मंदिर की मान्यता है। भारत के महाराष्ट्र के जिला अहमद नगर का यह आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा का केन्द्र देश दुनिया में खास तौर से प्रसिद्ध है। विशेषज्ञों की मानें तो वस्तुत: यह समर्पण एवं नैतिक शिक्षा का स्थल है।

  संत सांई बाबा का संदेश इंसानियत यहां सदैव जीवंत प्रतीत होता है। संत सांई बाबा का आदर्श उपदेश था कि सबका मालिक एक है। शायद यही कारण है कि संत सांई बाबा के अनुयायियों में सभी धर्मों के आस्थावान व्यक्ति शामिल हैं। 

   संत सांई की यह धरती शिरडी अद्भुत एवं चमत्कारों से आच्छादित है। अहमद नगर का यह विशेष स्थल बेेहद लोकप्रिय है। 
  मान्यता है कि सांई बाबा के जीवन का एक बड़ा हिस्सा शिरडी में ही व्यतीत हुआ। संत सांई बाबा ने यहां असंख्य कल्याणकारी कार्य किये हैं। 

   खास तौर ने उन्होंने धर्म एवं भक्ति की शिक्षा दी है। संत सांई बाबा के समाधि स्थल पर ही सांई जी की भव्य-दिव्य प्रतिमा स्थापित है। समाधि पर ही मंदिर स्थित है।
   सांई बाबा की भव्य-दिव्य प्रतिमा अति दर्शनीय है। सफेद संगमरमर की प्रतिमा श्रद्धालुओं को बरबस आकर्षित करती है। विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1922 में इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण किया गया था। 

   बताते हैं कि सांई बाबा 16 वर्ष की अल्प आयु में शिरडी आये थे। वह चिरसमाधि में लीन होने तक शिरडी में ही रहे। लिहाजा शिरडी की इस धरती को चमत्कारिक धरती माना जाता है। समाज में सांई बाबा को आध्यात्मिक गुरु एवं फकीर के तौर पर मान्यता है। 

   खास यह कि यह स्थान साम्प्रदायिक सद्भाव का भी संदेश देता है। कारण सांई बाबा जीवन पर्यंत यहां एक मस्जिद में प्रवास करते रहे लेकिन समाधि स्थल पर मंदिर का निर्माण है। शायद यह विलक्षण एवं अद्भुत है। समाधि स्थल स्थित इस विशाल मंदिर में सांई बाबा की दिव्य-भव्य प्रतिमा स्थापित है। 

   ब्रह्म मुहूर्त में 4 बजे आरती के साथ ही दर्शन के लिए बाबा का दरबार खुल जाता है। रात्रि 10.30 बजे शयन आरती तक श्रद्धालु सांई बाबा के दर्शन कर सकते हैं। 
   शयन आरती के बाद विशाल प्रतिमा को शॉल ओढ़ाया जाता है। रुद्राक्ष की माला पहनाई जाती है। निकट ही एक गिलास जल रख दिया जाता है। इसके बाद मंदिर के पट बंंद कर दिये जाते हैं। 
   खास यह कि बाबा का दरबार सोने एवं चांदी से सुसज्जित है। स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान सांई बाबा की छवि अति दर्शनीय है। बाबा के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ नित्य उमड़ती है। 

   मान्यता है कि सांई बाबा के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं की इच्छाओं की पूर्ति होती है। मंदिर के विशाल परिसर में सांई बाबा के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर आधारित सांई प्रदर्शनी भी है। इसे सांई म्युजियम के नाम से जाना पहचाना जाता है। 

   सांई बाबा से ताल्लुक रखने वाली वस्तुओं का यहां विशाल संग्रह है। सांई पादुका, खानदोबा के पुजारी, सांई को दिये गये सिक्के, समूह में खिलाने के लिए उपयोग किये गये बर्तन, पीसने के उपयोग में लाई गयी चक्की आदि इत्यादि यहां दर्शनीय है।

   खास यह कि शिरडी के इस मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के हितार्थ स्वास्थ्य सेवाएं भी निशुल्क संचालित होती हैं। 
  धर्म आध्यात्म के साथ ही यह स्थान इंसानियत की शिक्षा भी देता है। खास यह कि सांई बाबा के इस परिसर में उनके माता-पिता की भी समाधि है।

   सांई मदिर शिरडी की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट मुम्बई एवं पुणे इंटरनेशनल एयरपोर्ट लोहेगांव पुणे है। 
  निकटतम रेलवे स्टेशन मनमाड जंक्शन एवं नासिक जंक्शन हैं। नासिक जंक्शन से शिरडी की दूरी करीब 122 किलोमीटर है। श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी सांई मंदिर शिरडी की यात्रा कर सकते हैं।
19.766670,74.475850

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...