Sunday, 12 May 2019

देवीधुरा मंदिर: फल एवं फूलों का उत्सव

   देवीधुरा मंदिर को हिन्दुओं का तीर्थ कहा जाना चाहिए। वस्तुत: यह मंदिर मां वाराही देेवी को समर्पित है। उत्तराखण्ड के चंपावत जिला का यह धार्मिक स्थान पौराणिक एवं ऐतिहासिक मान्यता रखता है।

   चंपावत जिला के देवीधुरा कस्बा स्थित देवीधुरा मंदिर मां वाराही के 52 शक्तिपीठ में से एक है। समुद्र तल से करीब 1850 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर धर्म, आस्था एवं विश्वास का प्रतीक होने के साथ ही एक शानदार सुरम्य क्षेत्र है। 

  खास यह कि मंदिर के चौतरफा देवदार के सुन्दर वृक्ष यहां की शोभा एवं शान हैं। देवीधुरा मंदिर शक्तिपीठ पर्वत श्रंखला के मध्य स्थित है। लिहाजा देवीधुरा देवी मंदिर का प्राकृतिक सौन्दर्य अति दर्शनीय है।
  खास यह कि इस धार्मिक स्थान को मां वाराही धाम भी कहते हैं। शीतलता एवं शांत परिवेश वाले इस धार्मिक धाम का अपना एक अति प्राचीन इतिहास है। 

   खास तौर से देवीधुरा का धार्मिक उत्सव बग्वाल अति प्रसिद्ध है। वस्तुत: बग्वाल फूलों एवं पत्थरमार युद्ध के लिए प्रसिद्ध है। यह विचित्र उत्सव रक्षा बंधन के दिन आयोजित होता है। मंदिर के गर्भगृह में मां बाराही देवी की प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित है। 

  मंदिर के गुफा प्रवेश द्वार पर दो विशाल संकरी पाषाण चट्टानें हैं। इन चट्टानों के मध्य ही मां वाराही देवी की प्रतिमा ताम्र पेटिका में है। 
  मान्यता है कि मां वाराही देवी की प्रतिमा के सीधे दर्शन नहीं होते हैं। लिहाजा मां वाराही देवी की प्रतिमा ताम्र पेटिका में स्थापित है।

   मान्यता है कि मां बाराही देवी का तेज अत्यधिक है। जिससे सीधे दर्शन करने से श्रद्धालुओं के आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है। 
  विशेषज्ञों की मानें तो इस सिद्धपीठ की स्थापना राजाओं के शासनकाल में हुयी थी। इस सिद्धपीठ में चंपा देवी एवं लाल जीभ वाली महाकाली की प्रतिमा स्थापित की गयी थी। 

   मान्यता है कि इस क्षेत्र में महाभारत काल में पाण्डव ने प्रवास किया था। पहाडी पर खेल-खेल में भीम ने दो पाषाण शिलायें फेंक दी थीं। इनमें से एक शिला को राम शिला कहा जाता है। इस स्थान पर पचीसी का चिह्न विद्यमान है। इसे जुयें का चिह्न माना जाता है। शिला पर हाथों का निशान भी विद्यमान है।

   विशेषज्ञों की मानें तो प्राचीन काल में इस मंदिर में बलि की प्रथा थी। इस प्रथा ने बाद में पत्थरमार युद्ध के रूप में एक उत्सव का स्वरूप ले लिया। इस उत्सव को बग्वाल कहा जाता है। इस उत्सव पर देवी आराधना के लिए श्रद्धालु पत्थर बरसाते हैं। श्रद्धालु योद्धा मां बाराही का जयघोष करते हैं।

   मंदिर के पुजारी शंखनाद कर श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हैं। पत्थर की चोट से बचने के लिए श्रद्धालु योद्धा लकड़ी की ढ़ाल रखते हैं। हालांकि बदलते हालात में अब पत्थर मार उत्सव पर अंकुश लगने लगा। हालांकि अब फूलों एवं फलों का उत्सव होता है।

   इसमें श्रद्धालु फल एवं फूलों को बरसाते हैं। बग्वाल उत्सव इस इलाके में बेहद प्रसिद्ध है। मान्यता है कि देवी दर्शन से श्रद्धालुओं की इच्छाओं की पूर्ति होती है। 
  पर्वतीय क्षेत्र में होने के कारण देवीधुरा मंदिर एवं आसपास का वातावरण हमेशा सुहावना रहता है। लोहाघाट नगर से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित हिन्दुओं का यह तीर्थ खास तौर से जाना पहचाना जाता है।

   देवीधुरा मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट पंडित गोविन्द बल्लभ पंत एयरपोर्ट पंत नगर है। 
  निकटतम रेलवे स्टेशन टनकपुर जंक्शन है। टनकपुर जंक्शन से देवीधुरा मंदिर की दूरी करीब 60 किलोमीटर है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी देवीधुरा मंदिर दर्शन के लिए जा सकते हैं।
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