Tuesday, 30 April 2019

भीमाकाली मंदिर: अद्भुत वास्तुशिल्प

    भीमाकाली मंदिर के वास्तुशिल्प को विलक्षण एवं अद्भुत कहा जाना चाहिए। जी हां, भीमाकाली मंदिर का वास्तुशिल्प अति दर्शनीय एवं अद्भुत है।

   मिश्रित स्थापत्य कला की यह शानदार संरचना वैश्विक ख्याति रखती है। भारत के हिमाचल प्रदेश के सराहन स्थित माता काली का यह दिव्य-भव्य स्थान विशिष्टताओं से परिपूरित है। 
  वस्तुत: यह विशाल मंदिर माता काली को समर्पित है। इसकी मान्यता हिन्दुओं के महातीर्थ के रूप में है। 

   खास यह कि इस मंदिर की संरचना में हिन्दू एवं बौद्ध स्थापत्य कला का सम्मिश्रण दर्शनीय है। वास्तुशिल्प की नक्काशी अति दर्शनीय है। कंगूरा डिजाइन आधारित छतों की संरचना विशिष्टता को दर्शाती हैं।

   करीब 2000 वर्ष प्राचीन यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए देश दुनिया में खास तौर से जाना पहचाना जाता है। खास यह कि कर्मकांड एवं आरती को छोड़ कर यह मंदिर अधिकतर समय बंद रहता है। 

   यह प्राचीन मंदिर केवल कुछ समय के लिए ही खुलता है। भीमाकाली मंदिर के विशाल परिसर में एक अन्य मंदिर है। यह दिव्य-भव्य मंदिर भी काली जी को समर्पित है। इस मंदिर में माता काली की प्रतिमा विद्यमान है।

   इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1943 में किया गया था। मंदिर परिसर में रघुनाथ जी एवं भैंरो के नरसिंह तीर्थ को समर्पित दो अन्य मंदिर भी हैं। भीमाकाली मंदिर की मान्यता शक्तिपीठ की है। 
  मान्यता है कि माता काली वैवाहिक जीवन के सुख एवंं दीर्घायु की देवी हैं। धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव की पत्नी सती का बायां कान यहांं गिरा था।

   लिहाजा इस स्थान को शक्तिपीठ के तौर पर मान्यता है। माता काली का यह स्थान धार्मिक होने के साथ ही एक शानदार पर्यटन क्षेत्र भी है। 
  पर्वतीय क्षेत्र में बहुमंजिला मंदिर काफी कुछ विशिष्टता रखता है। मंदिर के शीर्ष तल में माता काली का विग्रह स्थापित है। 

  रामपुर बुशहर से करीब 30 किलोमीटर दूर सराहन में स्थित भीमाकाली मंदिर शांति एवं सुरम्यता का विशिष्ट क्षेत्र है। शानदार पर्वत श्रंखला के मध्य स्थित यह विशिष्ट धार्मिक स्थान अति दर्शनीय है। 

   पहाड़ों के मध्य आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा का संगमन काफी कुछ खास बना देता है। इस लिहाज यह मंदिर बेहद महत्वपूर्ण बन जाता है। खास तौर से यहां का नैसर्गिक सौन्दर्य अति दर्शनीय है। मान्यता है कि यह इलाका प्राचीन काल में राजसी परिवार की राजधानी रह चुका है। 

  सराहन का यह इलाका शिमला से करीब 175 किलोमीटर दूर स्थित है। खास यह कि इस दिव्य-भव्य मंदिर में माता काली की आरती होती है तो पूरा पर्वतीय इलाका ध्वनि विशेष से अनुगूंजित हो उठता है। 

   ऐसा प्रतीत होता है, जैसे देवलोक से देव अवतरण हो रहा हो। मान्यता है कि भीमाकाली मंदिर में दर्शन से श्रद्धालुओं की इच्छाओं की पूर्ति होती है। 

  चौतरफा शांति एवं पर्वतीय सौन्दर्य का अवलोकन मन मस्तिष्क को प्रफुल्लित करता है। बादलों एवं पहाड़ों की गोद में संरचित यह मंदिर अद्भुत एवं अद्वितीय है।

   भीमाकाली मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट भुंतर एयरपोर्ट कुल्लू-मनाली है। निकटतम रेलवे स्टेशन शिमला जंक्शन है। हालांकि पर्यटक सड़क मार्ग से भी भीमाकाली मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
30.725130,77.184890

Wednesday, 24 April 2019

श्री अम्बा जी मंदिर: अद्भुत एवं विलक्षण

   श्री अम्बा जी मंदिर को अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। जी हां, श्री अम्बा जी मंदिर में काफी कुछ अद्भुत एवं विलक्षण है। जिससे हिन्दुओं का यह तीर्थ देश-दुनिया में विशेष ख्याति रखता है।

   भारत के गुजरात प्रांत के जिला बनासकांठा स्थित यह शक्ति स्थल विशेष धार्मिक महत्व रखता है। खास यह कि मां शक्ति के 51 शक्ति पीठों में श्री अम्बा जी मंदिर भी एक है। खास यह कि इसे प्रधान शक्ति पीठ की मान्यता है। 

   गुजरात-राजस्थान सीमा क्षेत्र के अरासुर पर्वत पर विद्यमान यह शक्ति पीठ हिन्दुओं की आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा का केन्द्र है। इस स्थान को अरासुरी अम्बा जी के नाम से भी जाना जाता है।
  खास यह कि अरासुरी अम्बा जी मंदिर में कोई देवी प्रतिमा स्थापित नहीं है। इस दिव्य-भव्य मंदिर में श्री यंत्र पूजित एवं अर्चित है। यहां पवित्र श्री यंत्र की ही पूजा एवं आराधना की जाती है। 

  मान्यता है कि कोई भी श्रद्धालु इस श्री यंत्र को सीधे आंखों से नहीं देख सकता। वस्तुत: मां श्री अम्बा जी का मूल पीठ स्थल कस्बा के गब्बर पर्वत शिखर पर विद्यमान है। 
  श्री यंत्र का विशेष दर्शन होने के कारण श्रद्धालुओं का यहां आना वर्ष पर्यंत जारी रहता है। खास तौर से पूर्णिमा पर विशेष उत्सव जैसा दृश्य होता है।

   खास तौर से दीपावली पर्व पर श्री अम्बा जी मंदिर के साथ ही कस्बा की बेहतरीन साज-सज्जा की जाती है। इस उत्सव पर मंदिर सहित शहर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा उठता है। विशेषज्ञों की मानें तो श्री अम्बा जी मंदिर क्षेत्र गुजरात-राजस्थान सीमा पर स्थित है। 

  मान्यता है कि श्री अम्बा जी का यह मंदिर 1200 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। श्री अम्बा जी मंदिर का वास्तु शिल्प भी अद्भुत एवं अद्वितीय है।
  सफेद संगमरमर सा चमकता यह मंदिर श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को खास तौर से आकर्षित करता है। मंदिर का शिखर करीब 103 फुट ऊंचा है।

  खास यह कि इस पर 358 स्वर्ण कलश स्थापित हैं। यह स्वर्ण कलश मंदिर को अति दर्शनीय बना देते हैं। यह स्थान पवित्र गुप्त नदी सरस्वती का उद््गम स्थल माना जाता है।
   समुद्र तल से करीब 490 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्री अम्बा जी मंदिर अरासुर पर्वतमाला की अरावली पर्वत के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।

  शक्ति पीठ का क्षेत्र करीब 8.33 वर्ग किलोमीटर तक माना जाता है। मान्यता है कि श्री अम्बा जी मंदिर स्थल पर सती का ह्मदय गिरा था।
  लिहाजा इसे शक्ति पीठ के तौर पर मान्यता दी जाती है। माता सती का ह्मदय इस स्थान पर गिरने का उल्लेख तंत्र चूड़ामणि में भी मिलता है। 

   गब्बर पर्वत के शिखर पर जाने के लिए श्रद्धालुओं को 999 सीढ़ियों को चढ़ना पड़ता है। इसके बाद श्री अम्बा जी मंदिर में मां भगवती अम्बा जी के दर्शन होते हैं। श्री यंत्र के निकट ही मां भगवती की दिव्य-भव्य ज्योति प्रज्जवलित है।

  शक्ति उपासकों के लिए यह मंदिर विशेष महत्व रखता है। श्री यंत्र का श्रंगार इस प्रकार किया जाता है, जिससे प्रतीत होता है कि मां अम्बा स्वयं विराजमान हैं। 

  मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण जी का मुण्डन संस्कार इसी स्थान पर हुआ था। भगवान श्री राम भी यहां दर्शन के लिए आये थे। मान्यता है कि यहां माता भगवती के पद चिह्न हैं।

   खास यह कि श्री यंत्र दर्शन के लिए यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। खास यह कि गब्बर पर्वत एक अति दर्शनीय स्थल है। सनसेट प्वाइंट, गुफाएं एवं माता जी के झूले आदि इत्यादि बहुत कुछ दर्शनीय हैं।

   श्री अम्बा जी मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट भावनगर एयरपोर्ट गुजरात है। रेलवे स्टेशन बनासकांठा जंक्शन है। 
  हालांकि श्री अम्बा जी मंदिर का निकटतम रेलवे स्टेशन माउंट आबू जंक्शन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी श्री अम्बा जी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
22.258652,71.192383

Wednesday, 17 April 2019

वशिष्ठ मंदिर: विलक्षण वास्तुशिल्प

   वशिष्ठ मंदिर के वास्तुशिल्प को अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। जी हां, इस विशाल मंदिर का वास्तुशिल्प विलक्षण एवं अति दर्शनीय है। 

   भारत के हिमाचल प्रदेश के मनाली जिला का यह मंदिर काफी कुछ विशिष्ट है। वस्तुत: यह मंदिर ऋषि वशिष्ठ मुनि को समर्पित है। मनाली से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित यह शानदार मंदिर विशिष्टताओं के कारण विशेष ख्याति रखता है। 

   मान्यता है कि ऋषि वशिष्ठ प्राचीन काल मे यहां साधना करते थे। खासियत यह कि मंदिर परिसर का झरना आैषधीय गुणों से परिपूरित है। यह सल्फर बसंत के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मंदिर मनाली के एक छोटे से गांव वशिष्ठ में स्थापित है।

  मान्यता है कि मंदिर 4000 साल से भी अधिक प्राचीन है। व्यास नदी के निकट स्थापित इस मंदिर की दिव्यता-भव्यता अति दर्शनीय है।
  मान्यता है कि सप्त ऋषियों में वशिष्ठ ऋषि का आशीर्वाद यहां भक्तों को मिलता है।
   किवदंती है कि ऋषि बाल हत्याओं से दुखी होकर व्यास नदी में प्राण त्यागना चाहते थे लेकिन नदी ने ऋषि वशिष्ठ के प्राण लेने से इंकार कर दिया।

  बाद में आश्रय स्थली को वशिष्ठ गांव के नाम से पहचाना जाना लगा। खास यह कि वशिष्ठ मंदिर को मनाली के प्रसिद्ध स्थानों में गिना जाता है। मान्यता है कि जिस नदी को ऋषि वशिष्ठ गांव ले गये थे, उसका नाम विपाशा था। 

   विपाशा का आशय बंधन से मुक्ति होता है। इस विपाशा नदी को ही व्यास नदी के तौर पर जाना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में महर्षि वशिष्ठ की प्रतिमा विद्यमान हैै। मंदिर का अधिसंख्य भाग लकड़ी से बना है।

   लकड़ी की नक्काशी अति दर्शनीय है। खास यह कि मंदिर का जलाशय आैषधीय गुणों से परिपूरित है। इस जल में स्नान करने से श्रद्धालुओं को त्वचा रोगों से निजात मिल जाता है। 

  मान्यता है कि इस झरना-जलाशय में स्नान करने से शरीर का आध्यात्मिक एवं शारीरिक कायाकल्प होता है। इस जल को आैषधीय एवं उपचारिक जल भी माना जाता है। 

  निकट ही एक प्राचीन मंदिर है। इसे राम मंदिर के तौर पर जाना पहचाना जाता है। मंदिर में राम, सीता, लक्ष्मण, की प्रतिमायें प्राण प्रतिष्ठित हैं। खास यह कि इस गांव को वैष्णव पंथ का गांव माना जाता है। 

  सुरम्य एवं शांत स्थान मंदिर की दिव्यता-भव्यता अति दर्शनीय है। इसे धार्मिक पर्यटन क्षेत्र भी कहा जा सकता है। कारण धर्म के साथ ही श्रद्धालु पर्यटन का भी आनन्द ले सकते हैं। 

   पर्वतीय क्षेत्र में होने के कारण मंदिर की सुन्दरता भी अद्भुत प्रतीत होती है। खास यह कि मंदिर में दर्शन के लिए विदेशी भी बड़ी तादाद में आते हैं। 

   मान्यता है कि ऋषि वशिष्ठ के इस मंदिर से कोई भी निराश नहीं लौटता है। श्रद्धालुओं को विश्वास है कि ऋषि दर्शन से ही समस्त इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है।

   वशिष्ठ मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट भुन्तर एयरपोर्ट कुल्लू-मनाली है। 
   पर्यटक चण्डीगढ़ एयरपोर्ट से भी मंदिर की यात्रा कर सकते है। निकटतम रेलवे स्टेशन जोगिन्दर नगर जंक्शन है। श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
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Friday, 12 April 2019

ज्योतिसार : हिन्दुओं का अद्भुत तीर्थ

   ज्योतिसार तीर्थ को अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। ज्योतिसार तीर्थ हिन्दुओं का पवित्र स्थल है। मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद् भगवत गीता का उपदेश दिया था।

   यहां स्थित विशाल वट वृक्ष गीता उपदेश का साक्षी है। भारत के हरियाणा के कुरुक्षेत्र स्थित ज्योतिसार तीर्थ को धर्म शास्त्रों में विशेष महत्व दिया गया है। खास यह कि बरगद का यह विशाल वृक्ष बेहद लोकप्रिय है। 

   कारण इसी स्थान पर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया था। इसी स्थान पर भगवान श्री कृष्ण एवं अर्जुन की प्रतिमा विद्यमान है। भगवान श्री कृष्ण रथ पर सवार सारथी के रूप मेें हैं तो उसी रथ पर अर्जुन हाथ जोड़ कर उपदेश का श्रवण कर रहे हैं। 

   मान्यता है कि इस अद्भुत मूर्ति की स्थापना 1967 में कांची काम कोेटि के पीठाधीश्वर शंकराचार्य ने की थी। खास यह कि महाभारत एवं गीता उपदेश पर आधारित लाइट एण्ड साउण्ड शो नित्य सांझ यहां होता है।

   ज्योतिसार तीर्थ ने भव्य-दिव्य महातीर्थ का स्वरूप धारण कर लिया है। खास यह कि इस स्थान का धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व है। 
  मान्यता है कि यह पवित्र स्थान गीता का उद्भव स्थल है। महाभारत युद्ध ज्योतिसार तीर्थ स्थल से ही प्रारम्भ हुआ था। 

   कहावत है कि आदि शंकराचार्य ने हिमालय में रहने के दौरान इस स्थान की पहचान की थी। लोक प्रचलित मान्यता है कि इस दिव्य स्थान पर आदि शंकराचार्य ने श्रीमद् भागवत गीता का चिंतन-मनन एवं दर्शन किये थे।

   मान्यता है कि 1895 में कश्मीर के राजा ने इस स्थान पर शिव मंदिर का निर्माण कराया था। तदोपरांत 1924 में दरभंगा के राजा ने बरगद के वृक्ष के चौतरफा पत्थर का ऊंचा मंच बनवाया था।
  वस्तुत: ज्योतिसार हरियाणा का एक छोटा सा कस्बा है लेकिन इसके धार्मिक महत्व ने ज्योतिसार तीर्थ को शिखर की ख्याति दर्ज करायी।

  कुरुक्षेत्र-पहोवा मार्ग पर थानेसर से करीब 5 किलोमीटर दूर स्थित ज्योतिसार तीर्थ श्रद्धा, आस्था एवंं विश्वास का अद्भुत स्थल है। मान्यता है कि इस स्थान पर भगवान श्री कृष्ण की सदैव कृपा रहती है। 

  विशेषज्ञ ज्योतिसार तीर्थ की शाब्दिक व्याख्या भी करते हैं। ज्योति का आशय प्रकाश से है तो वहीं सार का आशय तालाब से है। 
  इसी स्थान पर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को विराट स्वरूप के दर्शन दिये थे। पौराणिक कथानक है कि कुरु ने इस क्षेत्र को बार-बार जोेता था। जिससे इस क्षेत्र का नाम कुरुक्षेत्र हो गया। 

   कुरु का परिश्रम देख कर देवराज इन्द्र ने परिश्रम का कारण जानना चाहा तो कुरु ने कहा था कि जो भी व्यक्ति यहां मारा जायेगा या मृत्यु को प्राप्त होगा, वह सीधे पुण्य लोक में जाएगा। देवराज इन्द्र हास-परिहास कर देवलोक को चले गये।

  विशेषज्ञों की मानें तो यह स्थान प्रजापति की उत्तरवेदी कहलाता है। गीता जयंती पर ज्योतिसार तीर्थ की विशिष्ट सजावट एवं श्रंगार किया जाता है। 
   दिव्यता-भव्यता के साथ धार्मिक आयोजन किये जाते हैं। पूजन-अर्चन एवं यज्ञ-हवन आदि विशेष होते हैं। आस्था एवं विश्वास का जनसैलाब दर्शनीय होता है। 

   ज्योतिसार तीर्थ परिसर में एक विशाल जलाशय है। इस जलाशय में श्रद्धालु दर्शन पूजन से पहले स्नान करते है। जलाशय में स्नान करने के उपरांत श्रद्धालु भगवान श्री कृष्ण एवं महादेव शिव के दर्शन करते हैं।
  खास यह कि विशाल वट वृक्ष पर श्रद्धालु धागा बांध कर मनौती मानते है। श्रद्धालुओं को विश्वास है कि इससे उनकी इच्छाओं की पूर्ति होती है।

   ज्योतिसार तीर्थ की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इन्दिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट नई दिल्ली है। एयरपोर्ट से ज्योतिसार तीर्थ की दूरी करीब 160 किलोमीटर है। 
   पर्यटक या श्रद्धालु चण्डीगढ़ एयरपोर्ट से भी ज्योतिसार तीर्थ की यात्रा कर सकते हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन कुरुक्षेत्र जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी ज्योतिसार तीर्थ की यात्रा कर सकते हैं।
29.963521,76.771827

Monday, 1 April 2019

हिडिम्बा मंदिर: अद्भुत वास्तुशिल्प

  हिडिम्बा मंदिर के वास्तुशिल्प को विलक्षण एवं अद्भुत कहा जाना चाहिए। जी हां, हिडिम्बा मंदिर की दर्शनीयता देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करती है। 

   हिडिम्बा मंदिर वस्तुत: पाण्डव बंधु भीम की पत्नी हिडिम्बा को समर्पित है। भारत के शानदार प्रांत हिमाचल प्रदेश के मनाली स्थित यह दिव्य-भव्य मंदिर अति प्राचीन है।
  धार्मिक स्थान होने के साथ-साथ हिडिम्बा मंदिर एक बेहतरीन पर्यटन केन्द्र के तौर पर भी जाना पहचाना जाता है।

  घने-सघन वन क्षेत्र में स्थित हिडिम्बा मंदिर एक भव्य गुफा के निकट स्थित है। सघन वन क्षेत्र में अवस्थित के कारण हिडिम्बा मंदिर क्षेत्र को साधना-ध्यान एवं कर्मकाण्ड के लिए विशिष्ट माना जाता है। 

  खास यह कि मंदिर अपनी खास वास्तुकला के लिए विशेष तौर से प्रसिद्ध है। अभयारण्य में स्थित हिडिम्बा मंदिर लकड़ी की शानदार नक्काशी के लिए वैश्विक ख्याति रखता है। 
  इसका मुख्य ऊपरी आकार विशेष तौर से पर्यटकों एवं श्रद्धालुओें को आकर्षित करता है। इसे प्राचीन गुफा मंदिर के तौर पर भी जाना पहचाना जाता है।

  हिडिम्बा मंदिर का इतिहास यहां एक अभिलेख में रेखांकित है। विशेेषज्ञों की मानें तो हिडिम्बा मंदिर का निर्माण राजा बहादुर सिंह ने कराया था। 
  पैगोड़ा शैली में निर्मित यह दिव्य-भव्य मंदिर अति सुन्दर है। खास यह कि हिन्दुओं का यह मंदिर मनाली शहर से बाहर एक दिव्य पहाड़ी पर स्थित है।

  मनाली सैर करने आने वाले पर्यटक देवी हिडिम्बा के दर्शन करने हिडिम्बा मंदिर जरूर जाते हैं। देवदार के शानदार एवं सुन्दर वृक्षों से घिरे इस भव्य मंदिर की खूबसूरती बर्फबारी में आैर भी अधिक निखर आती है। मान्यता है कि देवी हिडिम्बा हिमाचल के कुल्लु राजवंश की कुल देवी भी हैं। 

  खास यह कि मनाली का यह धार्मिक स्थान मनाली हिल स्टेशन से मात्र एक किलोमीटर दूर स्थित है। लकड़ी से निर्मित इस मंदिर में वस्तुत: चार छतें हैं। 
  नीचे की तीन छतों का निर्माण देवदार की लकड़ी से किया गया है। खास यह कि मंदिर की चौथी एवं शीर्ष छत तांबा एवं पीतल धातु से बनी है।

   खास यह कि इन छतों का आकार-प्रकार भिन्न है। नीचे की छत सबसे बड़ी एवं सबसे उपर की छत सबसे छोटी है।
  खास यह कि सबसे उपर की सबसे छोटी छत वस्तुत: एक कलश की भांति नजर आती है। करीब चालीस मीटर ऊंचे शंकु आकार मेंं निर्मित इस मंदिर की दीवार खास तौर से पत्थर की हैं। 

  प्रवेश द्वार पर सुन्दर नक्काशी दर्शनीय है। गर्भगृह में एक विशाल शिला पर देवी का विग्रह स्वरूप है। यह विग्रह स्वरूप ही पूजित है। यहां पर भीम पुत्र घटोत्कच का भी मंदिर है। वस्तुत: हिडिम्बा एक राक्षसी थी लेकिन इस मंदिर में हिडिम्बा को देवी के रूप में पूजा जाता है। 


  मान्यता है कि हिडिम्बा अपने भाई से बदला लेना चाहती थी। हिडिम्बा ने जब भीम को देखा तो हिडिम्बा मोहित हो गयी। भीम से हिडिम्बा को एक पुत्र घटोत्कच हुआ। 
  मान्यता है कि भीम ने हिडिम्बा के भाई हिडिम्ब को इसी स्थान पर मारा था। महाभारत की हडिंबा ही हिमाचल की कुल देवी हैं। 

  मान्यता है कि इस सघन वन क्षेत्र में हिडिम्ब का राज था। महाभारत काल की कथानक की मानें तो पाण्डव इस वन क्षेत्र में प्रवास कर रहे थे।
   कई प्रसंग के बाद इसी वन क्षेत्र में भीम का राक्षसी हिडिम्बा के साथ विवाह हुआ था। विवाह के पश्चात हिडिम्बा मानवी बन गयी थी। 

   इसे दैवीय चमत्कार माना जाता है। जिस स्थान पर देवीकरण हुआ, उसे मनाली माना गया। इसी परिप्रेक्ष्य में हिडिम्बा देवी को ग्राम देवी भी कहा जाता है। पहाड़ी शैली का यह मंदिर विशेष ख्याति रखता है।
  भगवान श्री कृष्ण ने हिडिम्बा को जन कल्याण के लिए प्रेरित किया था। जिसके परिणाम स्वरूप हिडिम्बा को देवी का स्थान प्राप्त हुआ। मान्यता है कि देवी हिडिम्बा के दर्शन मात्र से मनौती पूर्ण होती है। यहां धार्मिक उत्सव खास तौर से दर्शनीय होते हैं।

  हिडिम्बा मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट कुल्लू-मनाली एयरपोर्ट भुन्टर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जोगिन्दर नगर जंक्शन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी हिडिम्बा मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
32.247330,77.183620

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...