Wednesday, 27 February 2019

इस्कॉन मंदिर: आनन्द का उत्सव

   इस्कॉन मंदिर को वास्तुकला का विलक्षण एवं अद्भुत आयाम कहा जाना चाहिए। भारत के प्रांत उत्तर प्रदेश की धर्म नगरी वृंदावन-मथुरा में स्थित इस्कॉन मंदिर के सौैन्दर्य शास्त्र का कोई जोड़ नहीं।

  इस्कॉन मंदिर वस्तुत: राधा-कृष्ण एवं बलराम को समर्पित है। वर्ष 1975 में निर्मित इस भव्य-दिव्य मंदिर की ख्याति वैश्विक है।
  धर्म शास्त्र में वृंदावन को पवित्र भूमि माना गया है। वृंदावन को भगवान श्री कृष्ण का निवास माना जाता है।

  खास यह कि इस्कॉन मंदिर कृष्ण संकीर्तन से सदैव अनुगूंजित होता रहता है। खास यह कि यहां हमेशा आनन्द का उत्सव दिखता है।
   मंदिर में भगवान श्री कृष्ण-राधा एवं बलराम की पूजा अर्चना की विशिष्टता दर्शित होती है। मंदिर गौंडीय वैष्णव सम्प्रदाय की परम्पराओं का निवर्हन करता है।

  वैष्णव सम्प्रदाय की संस्थापना चैतन्य महाप्रभु ने 16 वीं शताब्दी में की थी। इस्कॉन मंदिर के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद हैं। मंदिर में चैतन्य महाप्रभु एवं स्वामी प्रभुपाद की प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित हैं।

  इस्कॉन मंदिर की एक लम्बी श्रंखला भारत के कई शहरों सहित दुनिया भर में विद्यमान है। खास यह कि इस्कॉन मंदिर स्वच्छता का आदर्श हैं।
  मान्यता है कि इस्कॉन मंदिर उस स्थान पर निर्मित है, जहां भगवान श्री कृष्ण बालपन में खेला करते थे। 

  भगवान श्री कृष्ण का यह स्थान 5000 वर्ष पुराना माना जाता है। हालांकि इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण 1975 में किया गया है। 
  मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण बालपन में यहां दूसरे बच्चों के साथ खेला करते थे। यमुना नदी एवं उसका किनारा भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं एवं उनके भाई बलराम के खेलों का साक्षी है। 

  इस्कॉन मंदिर सफेद संगमरमर का शानदार मंदिर है। इसकी नक्काशी अति दर्शनीय है। शायद इसीलिए इस्कॉन मंदिर का सौन्दर्य शास्त्र अद्भुत एवं विलक्षण माना जाता है। यहां की नक्काशी एवं पेंटिंग बेहद आकर्षक है। 

  भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा एवं उनके जीवन से जुड़ी यश-गाथाओं का सुन्दर चित्रण दीवारों पर चित्रित है। यह सुन्दर वर्णन श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। 

  इस्कॉन मंदिर की दर्शनीयता विलक्षण एवं अद्भुत है। इसे कृष्ण बलराम मंदिर के रूप में भी जाना पहचाना जाता है। इस्कॉन मंदिर विदेशी श्रद्धालुओं की आस्था के साथ ही ज्ञान का केन्द्र भी माना जाता है।

   लिहाजा ज्ञानार्जन के लिए विदेशी श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो इस्कॉन मंदिर की मूल मान्यताएं पारम्परिक हिन्दू शास्त्र भागवद् गीता पर आधारित हैं।

  मूलरूप से यह भगवान श्री कृष्ण के विचारों एवं कार्यों को समर्पित हैं। जिसमें भक्ति, योग आदि इत्यादि बहुत कुछ शामिल है।
  खास यह कि इस्कॉन मंदिर का वातावरण अत्यधिक आध्यात्मिक एवं भक्तिमय रहता है।

  इस्कॉन मंदिर में परिधान व्यवस्था भी है। यहां पारम्परिक वस्त्र दिखते हैं। इस्कॉन मंदिर श्रंखला देश के मुम्बई, दिल्ली, नोएडा, कानपुर सहित असंख्य शहरों में फैली है।

  इस्कॉन मंदिर वृंदावन की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट आगरा एयरपोर्ट है।
  श्रद्धालु या पर्यटक इन्दिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट नई दिल्ली से भी यात्रा कर सकते हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी इस्कॉन मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
27.573030,77.693240

Tuesday, 26 February 2019

द्वारकाधीश मंदिर: हिन्दुओं का तीर्थ

   द्वारकाधीश मंदिर को दुनिया का विशिष्ट एवं विलक्षण मंदिर कहा जाना चाहिए। जी हां, भारत के प्रांत गुजरात के द्वारका शहर में स्थित द्वारकाधीश मंदिर को भगवान श्री कृष्ण का पवित्र निवास माना जाता है। 

   खास यह कि गुजरात के इस दिव्य-भव्य मंदिर को जगत मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर में प्रवेश के लिए दो द्वार हैं। इनमें प्रवेश द्वार को स्वर्ग द्वार एवं निकास द्वार को मोक्ष द्वार कहा जाता है।
   मोक्ष द्वार को मुक्ति द्वार भी कहा जाता है। द्वारका स्थित इस दिव्य-भव्य मंदिर को हिन्दुओं का तीर्थ माना जाता है। 

  हिन्दुओं के चार धाम मेें एक गुजरात का यह द्वारका मंदिर भी है। इस प्रकार देखें तो द्वारकाधीश मंदिर चार धाम यात्रा का हिस्सा है।
  मंदिर की पांच मंजिला संरचना अति दर्शनीय एवं आकर्षक है। यह भव्य दिव्य संरचना 72 सुन्दर एवं कलात्मक स्तंभ श्रंखला पर विद्यमान है। 

  गोमती नदी के तट पर स्थित यह धार्मिक संरचना 51.8 मीटर ऊंची है। स्वर्ग द्वार में प्रवेश के लिए श्रद्धालुओं को 56 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इस भव्य-दिव्य मंदिर में काले रंग की भगवान श्री कृष्ण प्रतिमा प्रतिष्ठापित है।

  श्याम रंग की यह सुन्दर एवं आकर्षक प्रतिमा श्रद्धालुओं को श्रद्धानवत करती है। छवि की चकाचौंध से श्रद्धालु मुग्ध हुए बिना नहीं रह पाते।
  करीब 2.25 फुट की यह प्रतिमा बेहद आकर्षक प्रतीत होती है। भगवान श्री कृष्ण को समर्पित यह मंदिर भारत सहित दुनिया में विशेष ख्याति रखता है। 

  द्वारका के राजा अर्थात द्वारकाधीश की पूजा-अर्चना के समय सम्पूर्ण क्षेत्र अनुगूंजित हो उठता है।
  पुरातात्विक विशेषज्ञों की मानें तो द्वारकाधीश का यह मंदिर 2200 से 2500 साल प्राचीन है। हालांकि 16 वीं शताब्दी में मंदिर का भव्य विस्तार किया गया था। 

   धार्मिक विशेषज्ञों की मानें तो द्वारकाधीश मंदिर वस्तुत: एक पुष्टिमार्ग मंदिर है। इसलिए यह मंदिर बल्लभाचार्य एवं विठलेसनाथ द्वारा बनाए गये विधि विधान से संचालित होता है।
   इसी परम्परा से सभी अनुष्ठान होते हैं। परम्परा के अनुसार मूल मंदिर का निर्माण कृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने हरि-गृह स्थान पर किया था। हरि-गृह अर्थात भगवान श्री कृष्ण का निवास स्थान।

  विशेषज्ञों की मानें तो 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने मंदिर का दौरा किया था। मंदिर परिसर में एक स्मारक आदि शंकराचार्य की यात्रा को समर्पित है।
   द्वारकाधीश उपमहाद्वीप में भगवान विष्णु के 98 वें दिव्य देशम हैं। यह दिव्य प्रभा पवित्र ग्रंथों में महिमा मंडित है।

  मान्यता है कि द्वारका का निर्माण भगवान श्री कृष्ण ने भूमि के एक टुकड़े पर किया था। भूमि का यह टुकड़ा समुद्र से प्राप्त हुआ था। कहावत है कि ऋषि दुर्वासा एक बार भगवान श्री कृष्ण एवं उनकी पत्नी रुक्मिणी से मिलने गये। ऋषि की इच्छा थी कि उन्हें महल में ले जाया जाये।

   ऋषि को लेकर महल में जाने लगे। कुछ दूर जाने के बाद रुक्मिणी थक गर्इं। रुक्मिणी ने भगवान श्री कृष्ण से पानी मांगा। भगवान श्री कृष्ण ने धरती पर छेद कर जल उपलब्ध कराया।
   यह जल गंगा नदी से आया था। ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गये आैर रुक्मिणी को उसी स्थान पर रहने का श्राप दे दिया।

  जिस स्थान पर रुक्मिणी मंदिर है। यह वही स्थान है। गुजरात के इस द्वारकाधीश मंदिर का प्राचीन एवं विलक्षण इतिहास है।
  महाभारत महाकाव्य में द्वारका साम्राज्य के तौर पर उल्लखित है। गोमती नदी के तट पर स्थित द्वारका भगवान श्री कृष्ण की राजधानी थी। विशेषज्ञों की मानें तो गोमती नदी में जल के नीचे भी संरचनाएं हैं।

   हिन्दुओं की मान्यता है कि मूल मंदिर का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के आवासीय महल के उपर किया गया था। निर्माण वज्रनाभ द्वारा कराया गया था। चालुक्य शैली में निर्मित मंदिर का निर्माण अद्भुत है। मंदिर की चोटी करीब 51.9 मीटर ऊंची है।

  द्वारकाधीश मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व है। मंदिर का ध्वज सूर्य एवं चन्द्र को दर्शाता है। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण तब तक रहेंगे, जब तक सूर्य एवं चन्द्रमा धरती पर मौजूद रहेंगे।
   खास यह कि ध्वज को नित्य पांच बार बदला जाता है। मंदिर का शिखर 78.3 मीटर ऊंचा है। 

  मंदिर का निर्माण चूना एवं पत्थर से किया गया। इसकी पौराणिकता अभी भी दर्शित है। मूर्ति शिल्प की कलात्मकता अति सुन्दर है। देश दुनिया के श्रद्धालु द्वारकाधीश के दर्शन कर धन्य हो जाते हैं।
  द्वारकाधीश मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जामनगर है। जामनगर से द्वारका की दूरी करीब 45 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन द्वारका जंक्शन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी द्वारकाधीश मंदिर दर्शन के लिए जा सकते हैं।
22.250600,68.980200

Tuesday, 19 February 2019

कुंभ पर्व: मोक्ष का विश्वास

   कुंभ को भारत का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव कहा जाना चाहिए। जी हां, कुंभ वस्तुत: भारत की सुन्दर एवं धार्मिक विरासत है। 

   यह सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत मानवता, सामाजिक उत्थान एवं संस्कार को समर्पित है। कुंभ हिन्दुओं का महापर्व है। कुंभ में आस्था एवं श्रद्धालुओं का सैलाब दिखता है।
  धार्मिक एवं समृद्धता को देखते हुए इस विलक्षण एवं अद्भुत पर्व को यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है। 
  कुंभ उत्सव का आयोजन प्रति तीन वर्ष में भारत के एक बड़े तीर्थधाम में होता है। हालांकि एक ही सांस्कृतिक शहर में पुन: 12 वर्ष बाद कुंभ का आयोजन होता है।
   भारत के मुख्य चार सांस्कृतिक शहरों में कुंभ का आयोजन होता है। इन सांस्कृतिक शहरों में उत्तर प्रदेश का इलाहाबाद (प्रयागराज), उत्तराखण्ड के हरिद्वार, मध्य प्रदेश के उज्जैन एवं महाराष्ट्र के नासिक में आयोजित होते हैं।

    कुंभ पर्व-उत्सव में करोड़ों श्रद्धालु आस्था एवं विश्वास के साथ डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि कुंभ क्षेत्र में मात्र प्रवेश करने से श्रद्धालुओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है। धार्मिक अखाड़ों की पेशवाई कुंभ की शान एवं शोभा होती है। 

   वस्तुत: पेशवाई में साधु-संत एवं महात्मा यश-कीर्ति एवं वैभव का शानदार प्रदर्शन करते हैं। कंुभ पर्व स्नान का प्रारम्भ अखाड़ों की पेशवाई से होता है। 
  कुंभ में साधु-संत एवं नागरिक कल्पवास करते हैं। कुंभ पर्व का आयोजन खगोल गणनाओं के आधार पर होता है। कुंभ पर्व की अवधि खास तौर से मकरसंक्रांति पर होती है। 

  विशेषज्ञों की मानें मकरसंक्रांति पर कुंभ का विशेष योग होता है। कुछ खास योग कुंभ स्नान योग कहलाते हैं।
  यह विशेष स्नान योग विशेष मंगलकारी होते हैं। मान्यता है कि विशेष स्नान की अवधि में पृथ्वी सहित तीनों लोकों के द्वार खुले होते हैं। 

  मान्यता है कि कुंभ पर्व स्नान साक्षात स्वर्ग दर्शन कराता है। कुंभ की भांति ही अर्धकुंभ भी आयोजित होते हैं। अर्धकुंभ 6 वर्ष के अंतराल में आयोजित होते हैं।
   पौराणिक विश्वास है कि कुंभ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश एवं सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से होता है। ग्रहों की स्थित हरिद्वार में गंगा के जल को विशेष आैषधियुक्त करती है। 

  विशेषज्ञों की मानें तो कुंभ पर्व की अवधि में गंगा जल अमृतमय हो जाता है। कुंभ स्नान अंतरात्मा को पवित्र एवं शांत करता है।
  कुंभ पर्व पर कई मान्यताएं एवं किवदंतियां हैं। पौराणिक मान्यता है कि देव-दानवों के समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूंद गिरने को लेकर हैं। 

  मान्यता है कि यह अमृत इलाहाबाद, नासिक, उज्जैन एवं हरिद्वार में गिरा था। लिहाजा अमृत के स्थान पर ही कुंभ पर्व के आयोजन होते हैं।
   कथानक के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप से इन्द्र एवं अन्य देव कमजोर होने लगे तो दानवों ने आक्रमण कर देवताओं को परास्त कर दिया। देवता भगवान विष्णु के पास गये। सारा वृतांत कह सुनाया। 

  भगवान विष्णु ने क्षीरसागर का मंथन कर अमृत निकालने का परामर्श देवताओं को दिया था। भगवान विष्णु के परामर्श पर देवताओं ने दानवों से संधि कर मंथन कर अमृत निकाला। 
  अमृत कुंभ निकलते ही इन्द्र पुत्र जयंत अमृत कलश लेकर आकाश में उड़ गया। दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेश पर दानवों ने आकाश में जयंत का पीछा किया। 


  तत्पश्चात अमृत कलश पाने के लिए देव एवं दानवों में 12 दिन तक अनवरत युद्ध होता रहा। इस भीषण युद्ध में अमृत की कुछ बूंदे इलाहाबाद (प्रयाग), उज्जैन, नासिक एवं हरिद्वार में गिरीं। 
  मान्यता है कि देवताओं के 12 दिन मनुष्यों के 12 वर्ष समान होते हैं। लिहाजा कुंभ पर्व का आयोजन 12 वर्ष में होता है। पौराणिक मान्यता है कि 12 वर्ष में 12 कुंभ होते हैं। इनमें 8 कुंभ देवलोक में होते हैं। 

   शेष चार कुंभ पृथ्वी लोक में होते हैं। देवलोक के कुंभ का प्रतिफल देवता प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी लोक के कुंभ का प्रतिफल मनुष्य प्राप्त करता है।
   जिस स्थान पर अमृत बूंद गिरीं, उसी स्थान पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है। कुंभ पर्व स्थान को मोक्ष का स्थान माना जाता है। कुंभ स्नान करने से श्रद्धालुओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

   कुंभ पर्व यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। इलाहाबाद (प्रयाग) का निकटतम एयरपोर्ट लाल बहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट वाराणसी है। वाराणसी एयरपोर्ट से इलाहाबाद की दूरी करीब 100 किलोमीटर है।
   निकटतम रेलवे स्टेशन इलाहाबाद (प्रयागराज) जंक्शन है। इसी प्रकार नासिक, उज्जैन एवं हरिद्वार के लिए हवाई जहाज की सेवा उपलब्ध है।
   नासिक, हरिद्वार एवं उज्जैन के लिए रेल सेवा का भी उपयोग कर यात्रा की जा सकती है। इसी प्रकार श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
25.435801,81.846313

Monday, 18 February 2019

कमल मंदिर: अद्भुत स्थापत्यकला

   कमल मंदिर को धर्म, आध्यात्म एवं सौन्दर्य शास्त्र की एक नई इबारत कहा जाना चाहिए। जी हां, कमल मंदिर को अत्याधुनिक युग का एक सम्पूर्ण आराधना स्थल कहा जा सकता है।

   कारण आस्था एवं विश्वास की पंखुड़ियां ह्मदय से अंकुरित होती हैं। कमल मंदिर में कुछ इस तरह की उपासना पद्धति दिग्दर्शित होती है। 
  आशय यह कि आराधक का अपने आराध्य के प्रति भावनाओं का समर्पण होना चाहिए।

   न कोई मूर्ति न कोई धार्मिक कर्मकाण्ड। बस आराध्य के प्रति ह्मदय का समर्पण दिखता है। भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के नेहरू प्लेस स्थित कमल मंदिर एक अद्भुत उपासना स्थल है।
   नई दिल्ली के कालका जी क्षेत्र के गांव बाहापुर में स्थित यह विशाल मंदिर अद्भुत एवं विलक्षण है।

   इसे बहाई उपासना मंदिर एवं लोटस टेम्पल भी कहा जाता है। वस्तुत: लोटस टेम्पल का आकार प्रकार कमल के फूल की भांति है। लिहाजा इसे लोटस टेम्पल की ख्याति हासिल है। 
  बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह ने दुनिया को इंसानियत का संदेश दिया। कमल मंदिर वस्तुत: बहाई उपासना मंदिर है। 

  विशेषज्ञों की मानें तो बहाई धर्म की स्थापना ईरान में हुई थी। खास यह कि कमल मंदिर अपने आप में एक अनूठा मंदिर है।
   भारत के लिए कमल का फूल शांति एवं पवित्रता का प्रतीक है। साथ ही कमल ईश्वर के अवतार का संकेत चिह्न भी माना जाता है।

  कमल का फूल कीचड़ में खिलने के बावजूद पवित्र एवं स्वच्छ रहने की सीख देता है। कमल मंदिर इस संदेश को रेखांकित करता है।
  कमल मंदिर में कोई भी आराधना, उपासना एवं इबादत कर सकता है। कमल के स्वरूप को दर्शित करने वाला यह मंदिर भारत सहित दुनिया में खास ख्याति रखता है।

  शायद इसीलिए यह उपासना मंदिर वैश्विक पर्यटकों को खास तौर से आकर्षित करता है। भारतीय संस्कृति दर्शन कमल मंदिर में अक्षरश: फलीभूत होते दिखती है। अनेकता में एकता के दर्शन यहां होते हैं।
   बहाई धर्म आधारित कमल मंदिर का उद्घाटन 24 दिसम्बर 1988 को किया गया। हालांकि 1 जनवरी 1987 में इसे खास एवं आमजन के लिए समर्पित कर दिया गया। 

  कमल की आकृति आधारित होने के कारण शीघ्र ही इसे कमल मंदिर या लोटस टेम्पल के तौर पर ख्याति हासिल होने लगी। हालांकि इसका मूल बहाई उपासना मंदिर है।
   बहाई उपासना मंदिर वस्तुत: गौरव, शांति एवं उत्कृष्ट वातावरण को ज्योतिर्मय करता है। यह स्थितियां श्रद्धालुओं एवं उपासकों को आध्यात्मिक तौर पर प्रोत्साहित करती हैं। 

  उपासना मंदिर परिसर में सौन्दर्य की एक नई इबारत दिखती है। मखमली घास के मैदान, सुगंधित फूलों की एक लम्बी श्रंखला, सफेद संगमरमर के आलीशान भवन, ऊंचे गुम्बद वाला प्रार्थना सभागार एवं निर्मल जल वाले सुन्दर जलाशय आदि इत्यादि बहुत कुछ दर्शनीय है।
   आशय यह कि आध्यात्मिक उपासना के लिए पर्याप्त सभी कुछ है। बिना प्रतिमाओं का यह मंदिर पर्यटकों एवं उपासकों का आराधना स्थल है। प्रत्येक घंटे यहां लघु अवधि की प्रार्थना होती है। हजारों उपासक इस प्रार्थना में शामिल होते हैं।

   मंदिर का स्थापत्य परिवेश वास्तुकार फरीबर्ज ने तैयार किया है। परिसर में एक सूचना केन्द्र भी है। इस सूचना केन्द्र में बहाई धर्म के बारे में बताया गया है।
  इस केन्द्र में दो लघु सभागार भी है। विशेषज्ञों की मानें तो दुनिया में इस तरह के सात बहाई उपासना मंदिर हैं।

  यह मंदिर भारत के अलावा पश्चिम एशिया समोआ, सिडनी-आस्ट्रेलिया, कंपाला-यूगांडा, पनाना सिटी-पनामा, फ्रैंकफर्ट-जर्मनी, विलमॉट-संयुक्त राज्य अमेरिका में हैं। प्रत्येक उपासना मंदिर की बुनियादी रूपरेखा काफी कुछ मिलती जुलती हैं। इन मंदिरों को सांस्कृतिक दर्शन के तौर पर भी देखा जा सकता है।

  इन सभी कमल मंदिरों की सार्वलौकिक विलक्षणता है। नौ कोनों पर आधारित यह कमल मंदिर बेहद आकर्षक एवं दर्शनीय हैं। मान्यता है कि 9 का अंक सबसे बड़ा होता है। 
  लिहाजा इसे आधार बनाया गया है। यह विस्तार, एकता एवं अखंडता को प्रदर्शित करता है। उपासना मंदिर नौ बड़े जलाशयों से घिरा है। 

   यह जलाशय मंदिर की सुन्दरता को बढ़ाते हैं। साथ ही यह जलाशय उपासना मंदिर को प्राकृतिक रूप से शीतल रखते हैं। सांझ की लालिमा में सफेद संगमरमर की यह इमारत बेहद सुन्दर एवं अद्भुत प्रतीत होती है। 
  कमल की पंखुड़ियों की तरह खड़ी यह इमारत बेहद दर्शनीय है। चौतरफा दूब एवं हरियाली का आच्छादन परिवेश को अति सुन्दर बना देते हैं। इसकी विहंगमता का सहज अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि प्रार्थनागार में एक साथ 2300 से अधिक उपासक बैठ सकते हैं।
   कमल मंदिर का निर्माण 10 वर्ष की अवधि में पूर्ण हो सका। कमल मंदिर करीब 25 एकड़ क्षेत्रफल में फैला हुआ है। कमल की 27 पंखुड़ियां इमारत को अति शोभायमान बना देती हैं। चौतरफा बाग-बगीचों से घिरा यह कमल मंदिर दिल्ली की शान है। पर्यटकों एवं उपासकों की भारी भीड़ यहां उमड़ती रहती है।
   लोटस टेम्पल की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इन्दिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट नई दिल्ली है। निकटतम रेलवे स्टेशन नई दिल्ली जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी कमल मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
28.550210,77.258580

Sunday, 17 February 2019

गोमतेश्वर मंदिर : जैन धर्म का महातीर्थ

   गोमतेश्वर मंदिर को श्रद्धा एवं सौन्दर्य शास्त्र का एक शानदार स्मारक कहा जाना चाहिए। धर्म एवं वास्तुशिल्प का यह सुन्दर स्मारक बहुत कुछ विशिष्टता रखता है। 

  भारत के कर्नाटक राज्य के श्रवणबेलगोला शहर में स्थित गोमतेश्वर मंदिर वस्तुत: भगवान बाहुबली को समर्पित है।
   भगवान बाहुबली को समर्पित यह मंदिर गोमतेश्वर मंदिर के तौर पर खास ख्याति रखता है। विशेषज्ञों की मानें तोे इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में किया गया था। 

  खास यह कि जैन धर्म का यह सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ धाम है। गोमतेश्वर मंदिर में भगवान बाहुबली की दिव्य-भव्य प्रतिमा विलक्षण एवं अद्भुत है।
  प्रतिमा की विशिष्टता वैश्विक ख्याति रखती है। करीब 58.8 फुट ऊंची यह विशाल प्रतिमा विश्व के विशेष आकर्षण का केन्द्र है।

  ग्रेनाइट पत्थर पर संरचित यह प्रतिमा भगवान बाहुबली की आदमकद छवि को दर्शित करती है। यह अखंड संरचना अद्भुत एवं शानदार है।
   विशेषज्ञों की मानें तो 12 वर्ष की अवधि में एक बार यहां विशेष आयोजन होता है। इसे महामस्तकाभिषेक कहा जाता है। 

   जैन धर्म का यह विशेष पर्व-त्योहार होता है। इसमें भगवान बाहुबली का विशेष अभिषेक किया जाता है। 
   भगवान बाहुबली का यह विशेष अभिषेक केसर, गन्ना, हल्दी, दूध, सिंदूर आदि से किया जाता है। इसमें कीमती पत्थरों, स्वर्ण-रजत धातुओं सहित बहुत कुछ उपयोग किया जाता है। 

  कर्नाटक के शहर मैसूर से करीब 84 किलोमीटर दूर श्रवणबेलगोला में स्थित यह मंदिर जैन धर्म के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। यहां बाहुबली स्तंभ भी है।
   विशेषज्ञों की मानें तो भगवान बाहुबली मोक्ष प्राप्त करने वाले प्रथम तीर्थंकर थे। कुंड पहाड़ी की तलहटी में स्थित गोमतेश्वर मंदिर के मार्ग में जैन मंदिरों की एक श्रंखला है। 
 
  खास यह कि वैश्विक पर्यटकों का यह विशेष आकर्षण का केन्द्र है। विशेषज्ञों की मानें तो एक विशाल पत्थर पर संरचित यह प्रतिमा दुनिया की इकलौती प्रतिमा है।
   गोमतेश्वर मंदिर श्रवणबेलगोला शहर का मुख्य आकर्षण है। विशेषज्ञों की मानें तो गंग वंश के राजा राजमल्ल एवं उनके सेनापति चामुंडराय ने इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। इस विशालकाय मूर्ति के मूर्तिकार जाकनचारी को माना जाता है। 

   गोमतेश्वर मंदिर में भगवान बाहुबली की विशाल प्रतिमा शहर एवं शहर के बाहर से दिखती है। 
  विशेषज्ञों की मानें तो इस विशाल प्रतिमा को 30 किलोमीटर दूर से भी आसानी से देखा जा सकता है। फाल्गुनी नदी के तट पर स्थित यह मंदिर अपने खास वास्तुशिल्प के लिए भी जाना पहचाना जाता है। 

   गोमतेश्वर मंदिर कर्नाटक के विशेष तीर्थ स्थल एवं मुख्य पर्यटन स्थल के तौर पर विशेष ख्याति रखता है। इसे बाहुबली मंदिर भी कहा जाता है।
   विशेषज्ञों की मानें तो भगवान बाहुबली तीर्थंकर आदिनाथ के दूसरे पुत्र थे। आदिनाथ के 100 बेटियां थीं। आदिनाथ ने जब राज्य छोड़ा तो उनके पुत्रों भरत एवं बाहुबली के बीच झगड़ा हुआ। 

  इस झगड़े में बाहुबली को विजय मिली। यह देख आदिनाथ एवं भगवान बाहुबली स्वयं विचलित हुए। आदिनाथ एवं भगवान बाहुबली ने भरत को राज्य का प्रभार सौंप दिया। 

   इस प्रकार भगवान बाहुबली को सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ। किवदंती यह भी है कि मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपने राज्य का परित्याग कर मैसूर के श्रवणबेलगोला में समय व्यतीत किया था। इसी काल में गोमतेश्वर मंदिर का निर्माण हुआ।

  बाहुबली अर्थात गोमतेश्वर को जैनधर्म में विशिष्ट स्थान हासिल है। पहाड़ी के नीचे कल्याणी नामक विशाल झील है। इसे धवल सरोवर कहा जाता है। 
  मान्यता है कि गोमतेश्वर या भगवान बाहुबली की प्रतिमा में शक्ति, साधुत्व, बल एवं उदारवादी भावनाओं का अद्भुत प्रदर्शन है।

   गोमतेश्वर मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बेंगलुरू इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन श्रवणबेलगोला जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी गोमतेश्वर मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
12.308440,76.653930

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...