द्वारकाधीश मंदिर: हिन्दुओं का तीर्थ
द्वारकाधीश मंदिर को दुनिया का विशिष्ट एवं विलक्षण मंदिर कहा जाना चाहिए। जी हां, भारत के प्रांत गुजरात के द्वारका शहर में स्थित द्वारकाधीश मंदिर को भगवान श्री कृष्ण का पवित्र निवास माना जाता है।
खास यह कि गुजरात के इस दिव्य-भव्य मंदिर को जगत मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर में प्रवेश के लिए दो द्वार हैं। इनमें प्रवेश द्वार को स्वर्ग द्वार एवं निकास द्वार को मोक्ष द्वार कहा जाता है।
मोक्ष द्वार को मुक्ति द्वार भी कहा जाता है। द्वारका स्थित इस दिव्य-भव्य मंदिर को हिन्दुओं का तीर्थ माना जाता है।
मोक्ष द्वार को मुक्ति द्वार भी कहा जाता है। द्वारका स्थित इस दिव्य-भव्य मंदिर को हिन्दुओं का तीर्थ माना जाता है।
हिन्दुओं के चार धाम मेें एक गुजरात का यह द्वारका मंदिर भी है। इस प्रकार देखें तो द्वारकाधीश मंदिर चार धाम यात्रा का हिस्सा है।
मंदिर की पांच मंजिला संरचना अति दर्शनीय एवं आकर्षक है। यह भव्य दिव्य संरचना 72 सुन्दर एवं कलात्मक स्तंभ श्रंखला पर विद्यमान है।
मंदिर की पांच मंजिला संरचना अति दर्शनीय एवं आकर्षक है। यह भव्य दिव्य संरचना 72 सुन्दर एवं कलात्मक स्तंभ श्रंखला पर विद्यमान है।
गोमती नदी के तट पर स्थित यह धार्मिक संरचना 51.8 मीटर ऊंची है। स्वर्ग द्वार में प्रवेश के लिए श्रद्धालुओं को 56 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इस भव्य-दिव्य मंदिर में काले रंग की भगवान श्री कृष्ण प्रतिमा प्रतिष्ठापित है।
श्याम रंग की यह सुन्दर एवं आकर्षक प्रतिमा श्रद्धालुओं को श्रद्धानवत करती है। छवि की चकाचौंध से श्रद्धालु मुग्ध हुए बिना नहीं रह पाते।
करीब 2.25 फुट की यह प्रतिमा बेहद आकर्षक प्रतीत होती है। भगवान श्री कृष्ण को समर्पित यह मंदिर भारत सहित दुनिया में विशेष ख्याति रखता है।
करीब 2.25 फुट की यह प्रतिमा बेहद आकर्षक प्रतीत होती है। भगवान श्री कृष्ण को समर्पित यह मंदिर भारत सहित दुनिया में विशेष ख्याति रखता है।
द्वारका के राजा अर्थात द्वारकाधीश की पूजा-अर्चना के समय सम्पूर्ण क्षेत्र अनुगूंजित हो उठता है।
पुरातात्विक विशेषज्ञों की मानें तो द्वारकाधीश का यह मंदिर 2200 से 2500 साल प्राचीन है। हालांकि 16 वीं शताब्दी में मंदिर का भव्य विस्तार किया गया था।
पुरातात्विक विशेषज्ञों की मानें तो द्वारकाधीश का यह मंदिर 2200 से 2500 साल प्राचीन है। हालांकि 16 वीं शताब्दी में मंदिर का भव्य विस्तार किया गया था।
धार्मिक विशेषज्ञों की मानें तो द्वारकाधीश मंदिर वस्तुत: एक पुष्टिमार्ग मंदिर है। इसलिए यह मंदिर बल्लभाचार्य एवं विठलेसनाथ द्वारा बनाए गये विधि विधान से संचालित होता है।
इसी परम्परा से सभी अनुष्ठान होते हैं। परम्परा के अनुसार मूल मंदिर का निर्माण कृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने हरि-गृह स्थान पर किया था। हरि-गृह अर्थात भगवान श्री कृष्ण का निवास स्थान।
विशेषज्ञों की मानें तो 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने मंदिर का दौरा किया था। मंदिर परिसर में एक स्मारक आदि शंकराचार्य की यात्रा को समर्पित है।
द्वारकाधीश उपमहाद्वीप में भगवान विष्णु के 98 वें दिव्य देशम हैं। यह दिव्य प्रभा पवित्र ग्रंथों में महिमा मंडित है।
मान्यता है कि द्वारका का निर्माण भगवान श्री कृष्ण ने भूमि के एक टुकड़े पर किया था। भूमि का यह टुकड़ा समुद्र से प्राप्त हुआ था। कहावत है कि ऋषि दुर्वासा एक बार भगवान श्री कृष्ण एवं उनकी पत्नी रुक्मिणी से मिलने गये। ऋषि की इच्छा थी कि उन्हें महल में ले जाया जाये।
ऋषि को लेकर महल में जाने लगे। कुछ दूर जाने के बाद रुक्मिणी थक गर्इं। रुक्मिणी ने भगवान श्री कृष्ण से पानी मांगा। भगवान श्री कृष्ण ने धरती पर छेद कर जल उपलब्ध कराया।
यह जल गंगा नदी से आया था। ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गये आैर रुक्मिणी को उसी स्थान पर रहने का श्राप दे दिया।
जिस स्थान पर रुक्मिणी मंदिर है। यह वही स्थान है। गुजरात के इस द्वारकाधीश मंदिर का प्राचीन एवं विलक्षण इतिहास है।
महाभारत महाकाव्य में द्वारका साम्राज्य के तौर पर उल्लखित है। गोमती नदी के तट पर स्थित द्वारका भगवान श्री कृष्ण की राजधानी थी। विशेषज्ञों की मानें तो गोमती नदी में जल के नीचे भी संरचनाएं हैं।
हिन्दुओं की मान्यता है कि मूल मंदिर का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के आवासीय महल के उपर किया गया था। निर्माण वज्रनाभ द्वारा कराया गया था। चालुक्य शैली में निर्मित मंदिर का निर्माण अद्भुत है। मंदिर की चोटी करीब 51.9 मीटर ऊंची है।
द्वारकाधीश मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व है। मंदिर का ध्वज सूर्य एवं चन्द्र को दर्शाता है। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण तब तक रहेंगे, जब तक सूर्य एवं चन्द्रमा धरती पर मौजूद रहेंगे।
खास यह कि ध्वज को नित्य पांच बार बदला जाता है। मंदिर का शिखर 78.3 मीटर ऊंचा है।
इसी परम्परा से सभी अनुष्ठान होते हैं। परम्परा के अनुसार मूल मंदिर का निर्माण कृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने हरि-गृह स्थान पर किया था। हरि-गृह अर्थात भगवान श्री कृष्ण का निवास स्थान।
विशेषज्ञों की मानें तो 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने मंदिर का दौरा किया था। मंदिर परिसर में एक स्मारक आदि शंकराचार्य की यात्रा को समर्पित है।
द्वारकाधीश उपमहाद्वीप में भगवान विष्णु के 98 वें दिव्य देशम हैं। यह दिव्य प्रभा पवित्र ग्रंथों में महिमा मंडित है।
मान्यता है कि द्वारका का निर्माण भगवान श्री कृष्ण ने भूमि के एक टुकड़े पर किया था। भूमि का यह टुकड़ा समुद्र से प्राप्त हुआ था। कहावत है कि ऋषि दुर्वासा एक बार भगवान श्री कृष्ण एवं उनकी पत्नी रुक्मिणी से मिलने गये। ऋषि की इच्छा थी कि उन्हें महल में ले जाया जाये।
ऋषि को लेकर महल में जाने लगे। कुछ दूर जाने के बाद रुक्मिणी थक गर्इं। रुक्मिणी ने भगवान श्री कृष्ण से पानी मांगा। भगवान श्री कृष्ण ने धरती पर छेद कर जल उपलब्ध कराया।
यह जल गंगा नदी से आया था। ऋषि दुर्वासा क्रोधित हो गये आैर रुक्मिणी को उसी स्थान पर रहने का श्राप दे दिया।
जिस स्थान पर रुक्मिणी मंदिर है। यह वही स्थान है। गुजरात के इस द्वारकाधीश मंदिर का प्राचीन एवं विलक्षण इतिहास है।
महाभारत महाकाव्य में द्वारका साम्राज्य के तौर पर उल्लखित है। गोमती नदी के तट पर स्थित द्वारका भगवान श्री कृष्ण की राजधानी थी। विशेषज्ञों की मानें तो गोमती नदी में जल के नीचे भी संरचनाएं हैं।
हिन्दुओं की मान्यता है कि मूल मंदिर का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के आवासीय महल के उपर किया गया था। निर्माण वज्रनाभ द्वारा कराया गया था। चालुक्य शैली में निर्मित मंदिर का निर्माण अद्भुत है। मंदिर की चोटी करीब 51.9 मीटर ऊंची है।
द्वारकाधीश मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व है। मंदिर का ध्वज सूर्य एवं चन्द्र को दर्शाता है। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण तब तक रहेंगे, जब तक सूर्य एवं चन्द्रमा धरती पर मौजूद रहेंगे।
खास यह कि ध्वज को नित्य पांच बार बदला जाता है। मंदिर का शिखर 78.3 मीटर ऊंचा है।
मंदिर का निर्माण चूना एवं पत्थर से किया गया। इसकी पौराणिकता अभी भी दर्शित है। मूर्ति शिल्प की कलात्मकता अति सुन्दर है। देश दुनिया के श्रद्धालु द्वारकाधीश के दर्शन कर धन्य हो जाते हैं।
द्वारकाधीश मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जामनगर है। जामनगर से द्वारका की दूरी करीब 45 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन द्वारका जंक्शन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी द्वारकाधीश मंदिर दर्शन के लिए जा सकते हैं।
22.250600,68.980200
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