कुंभ पर्व: मोक्ष का विश्वास
कुंभ को भारत का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव कहा जाना चाहिए। जी हां, कुंभ वस्तुत: भारत की सुन्दर एवं धार्मिक विरासत है।
यह सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत मानवता, सामाजिक उत्थान एवं संस्कार को समर्पित है। कुंभ हिन्दुओं का महापर्व है। कुंभ में आस्था एवं श्रद्धालुओं का सैलाब दिखता है।
धार्मिक एवं समृद्धता को देखते हुए इस विलक्षण एवं अद्भुत पर्व को यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है।
कुंभ उत्सव का आयोजन प्रति तीन वर्ष में भारत के एक बड़े तीर्थधाम में होता है। हालांकि एक ही सांस्कृतिक शहर में पुन: 12 वर्ष बाद कुंभ का आयोजन होता है।
भारत के मुख्य चार सांस्कृतिक शहरों में कुंभ का आयोजन होता है। इन सांस्कृतिक शहरों में उत्तर प्रदेश का इलाहाबाद (प्रयागराज), उत्तराखण्ड के हरिद्वार, मध्य प्रदेश के उज्जैन एवं महाराष्ट्र के नासिक में आयोजित होते हैं।
कुंभ पर्व-उत्सव में करोड़ों श्रद्धालु आस्था एवं विश्वास के साथ डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि कुंभ क्षेत्र में मात्र प्रवेश करने से श्रद्धालुओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है। धार्मिक अखाड़ों की पेशवाई कुंभ की शान एवं शोभा होती है।
वस्तुत: पेशवाई में साधु-संत एवं महात्मा यश-कीर्ति एवं वैभव का शानदार प्रदर्शन करते हैं। कंुभ पर्व स्नान का प्रारम्भ अखाड़ों की पेशवाई से होता है।
कुंभ में साधु-संत एवं नागरिक कल्पवास करते हैं। कुंभ पर्व का आयोजन खगोल गणनाओं के आधार पर होता है। कुंभ पर्व की अवधि खास तौर से मकरसंक्रांति पर होती है।
विशेषज्ञों की मानें मकरसंक्रांति पर कुंभ का विशेष योग होता है। कुछ खास योग कुंभ स्नान योग कहलाते हैं।
यह विशेष स्नान योग विशेष मंगलकारी होते हैं। मान्यता है कि विशेष स्नान की अवधि में पृथ्वी सहित तीनों लोकों के द्वार खुले होते हैं।
मान्यता है कि कुंभ पर्व स्नान साक्षात स्वर्ग दर्शन कराता है। कुंभ की भांति ही अर्धकुंभ भी आयोजित होते हैं। अर्धकुंभ 6 वर्ष के अंतराल में आयोजित होते हैं।
पौराणिक विश्वास है कि कुंभ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश एवं सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से होता है। ग्रहों की स्थित हरिद्वार में गंगा के जल को विशेष आैषधियुक्त करती है।
विशेषज्ञों की मानें तो कुंभ पर्व की अवधि में गंगा जल अमृतमय हो जाता है। कुंभ स्नान अंतरात्मा को पवित्र एवं शांत करता है।
कुंभ पर्व पर कई मान्यताएं एवं किवदंतियां हैं। पौराणिक मान्यता है कि देव-दानवों के समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूंद गिरने को लेकर हैं।
मान्यता है कि यह अमृत इलाहाबाद, नासिक, उज्जैन एवं हरिद्वार में गिरा था। लिहाजा अमृत के स्थान पर ही कुंभ पर्व के आयोजन होते हैं।
कथानक के अनुसार महर्षि दुर्वासा के श्राप से इन्द्र एवं अन्य देव कमजोर होने लगे तो दानवों ने आक्रमण कर देवताओं को परास्त कर दिया। देवता भगवान विष्णु के पास गये। सारा वृतांत कह सुनाया।
भगवान विष्णु ने क्षीरसागर का मंथन कर अमृत निकालने का परामर्श देवताओं को दिया था। भगवान विष्णु के परामर्श पर देवताओं ने दानवों से संधि कर मंथन कर अमृत निकाला।
अमृत कुंभ निकलते ही इन्द्र पुत्र जयंत अमृत कलश लेकर आकाश में उड़ गया। दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेश पर दानवों ने आकाश में जयंत का पीछा किया।
तत्पश्चात अमृत कलश पाने के लिए देव एवं दानवों में 12 दिन तक अनवरत युद्ध होता रहा। इस भीषण युद्ध में अमृत की कुछ बूंदे इलाहाबाद (प्रयाग), उज्जैन, नासिक एवं हरिद्वार में गिरीं।
मान्यता है कि देवताओं के 12 दिन मनुष्यों के 12 वर्ष समान होते हैं। लिहाजा कुंभ पर्व का आयोजन 12 वर्ष में होता है। पौराणिक मान्यता है कि 12 वर्ष में 12 कुंभ होते हैं। इनमें 8 कुंभ देवलोक में होते हैं।
शेष चार कुंभ पृथ्वी लोक में होते हैं। देवलोक के कुंभ का प्रतिफल देवता प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी लोक के कुंभ का प्रतिफल मनुष्य प्राप्त करता है।
जिस स्थान पर अमृत बूंद गिरीं, उसी स्थान पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है। कुंभ पर्व स्थान को मोक्ष का स्थान माना जाता है। कुंभ स्नान करने से श्रद्धालुओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
कुंभ पर्व यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। इलाहाबाद (प्रयाग) का निकटतम एयरपोर्ट लाल बहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट वाराणसी है। वाराणसी एयरपोर्ट से इलाहाबाद की दूरी करीब 100 किलोमीटर है।
निकटतम रेलवे स्टेशन इलाहाबाद (प्रयागराज) जंक्शन है। इसी प्रकार नासिक, उज्जैन एवं हरिद्वार के लिए हवाई जहाज की सेवा उपलब्ध है।
नासिक, हरिद्वार एवं उज्जैन के लिए रेल सेवा का भी उपयोग कर यात्रा की जा सकती है। इसी प्रकार श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
25.435801,81.846313
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