Tuesday, 29 January 2019

पशुपतिनाथ मंदिर: आस्था का केन्द्र

   पशुपतिनाथ मंदिर को हिन्दुओं की आस्था एवं विश्वास का श्रेष्ठतम केन्द्र कहा जाना चाहिए। जी हां, नेपाल की राजधानी काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रंखला का मंदिर है।

  काठमांडू से करीब तीन किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम में देवपाटन गांव में बागमती नदी के तट पर स्थित इस देव स्थान का अपना एक अलग विशिष्ट स्थान है। वस्तुत: पशुपतिनाथ मंदिर भगवान शिव का मुख्य निवास माना जाता है।

 धर्म, आस्था एवं अन्य विशिष्टताओं के कारण पशुपतिनाथ मंदिर को यूनेस्को ने विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल श्रंखला मेें शामिल किया है।
  खास यह कि हिन्दुओं के इस पवित्र स्थान में केवल हिन्दुओं को ही प्रवेश की अनुमति है। मंदिर के गर्भगृह में विशाल शिवलिंग स्थापित है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो 15वीं शताब्दी के राजा प्रताप मल्ल से शुरु हुई पूजा परम्परा आज भी कायम है। मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के ब्रााह्मण परिवार से ही रखा जाता है।
   महाशिवरात्रि पर यहां विशेष पर्व आयोजित किया जाता है। इसका यहां विशेष महत्व होता है। विशेषज्ञों की मानें तो पशु का अर्थ जीव या प्राणी से होता है। पति का अर्थ स्वामी से होता है। नाथ का अर्थ मालिक से होता है। 
   इस प्रकार पशुपतिनाथ का अर्थ जीवन का मालिक होता है। नेपाल के इस दिव्य-भव्य मंदिर का ताल्लुक भारत के प्रांत उत्तराखण्ड के केदारनाथ मंदिर से है। 
   किवदंती है कि एक बार भगवान शिव वाराणसी में देवताओं को छोड़ कर नेपाल के बागमती नदी के किनारे स्थित मृगस्थली चले गये।

  यह स्थान बागमती नदी के किनारे जंगल में है। भगवान शिव चिंकारे का स्वरुप धर निद्रा में चले गये।
   देवताओं ने शिव को खोजा आैर वाराणसी वापस लाने का प्रयास किया लेकिन भगवान शिव ने नदी में छलांग लगा दी। इस दौैरान भगवान शिव अर्थात चिंकारा की सींग चार टुकड़ों में हो गयी। 

   इसी के बाद भगवान पशुपतिनाथ चर्तुमुख के रूप में प्रकट हुए। किवदंती यह भी है कि पाण्डव के स्वर्ग प्रयाग के समय भैंसे के रूप में शिव के दर्शन हुये थे। बाद मेंं वह धरती में समा गये।
   भीम ने भैंसे की पूंछ पकड़ ली थी। यह स्थान भारत के प्रांत उत्तराखण्ड का केदारनाथ कहलाया। भगवान शिव के भैंसा स्वरूप का मुख नेपाल के काठमांडू में बागमती नदी के किनारे निकला। 

  इस स्थान को पशुपतिनाथ कहा गया। पशुपतिनाथ मंदिर को पाशुपत सम्प्रदाय का मंदिर कहा जाता है। खास यह कि मंदिर में पांच मुख वाला शिवलिंग विद्यमान है। यह अद्भुत है। 
  पशुपतिनाथ विग्रह में चारों दिशाओं में एक-एक मुख एवं उपर की दिशा में एक मुख है। प्रत्येक मुख के दाएं एक रुद्राक्ष की माला दर्शित है। 

  मुख के बाएं कमंडल है। मान्यता है कि पशुपतिनाथ मंदिर का ज्योतिर्लिंग पारस पत्थर का है। खास यह कि सभी दिशाओं के मुख विशेष गुणकारी एवं फलकारी हैं।
   दक्षिण दिशा के मुख को अघोरा कहते हैं। ऊपर दिशा को दर्शित मुख को ईशान मुख कहते हैं। भगवान शिव के इस दिव्य-भव्य मंदिर में प्रवेश के चार द्वार हैं।
   यह सभी चारों द्वार चांदी से बने हैं। पश्चिमी द्वार के सामने शिव जी के बैल नंदी की विशाल प्रतिमा है। नंदी की यह विशाल प्रतिमा पीतल की है।

   इस परिसर में वैष्णव एवं शैव परम्परा के कई मंदिर हैं। पशुपतिनाथ मंदिर को मुख्यत: भारत के उत्तराखण्ड के केदारनाथ धाम का आधा भाग माना जाता है। 
   भगवान शिव का यह दिव्य-भव्य मंदिर हिन्दू एवं बौद्ध वास्तुकला का एक श्रेष्ठतम मिश्रण माना जाता है। मंदिर करीब 264 हेक्टेयर में फैला है। जिसमें 518 मंदिर एवं स्मारक शामिल हैं। 

   मंदिर की द्विस्तरीय छत का निर्माण तांबा धातु से किया गया है। जिस पर सोने का आवरण चढ़ाया गया है। मंदिर वर्गाकार चबूतरा पर बना है। मंदिर का शिखर सोने का है। 
   परिसर में दो गर्भगृह हैं। भीतरी गर्भगृह वह है, जहां भगवान शिव का शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। मंदिर में अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाएं प्राण प्रतिष्ठित हैं। 

   इनमें खास तौर से वासुकि नाथ मंदिर, उन्मता भैरव मंदिर, सूर्य नारायण मंदिर, कीर्ति मुख भैरव मंदिर, बूदानिल कंठ मंदिर हनुमान मंदिर, 184 शिवलिंग मंदिर आदि इत्यादि हैं। 


   राम मंदिर, विराट स्वरूप मंदिर, द्वादश ज्योतिर्लिंग, पंद्र शिवालय गुहेश्वरी मंदिर आदि भी हैं। मान्यता है कि भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन के बाद मनुष्य को किसी भी जन्म में पशु योनि प्राप्त नहीं होती। 
  पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर आर्य घाट है। पौराणिक काल में केवल इसी घाट के जल को मंदिर के भीतर ले जाने की अनुुमति होती थी।
   पशुपतिनाथ मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट काठमांडू एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट से मंदिर की दूरी करीब 5 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जनकपुरी रेलवे स्टेशन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
27.712021,85.312950

Wednesday, 23 January 2019

शनिदेव धाम शिंगणापुर: अद्भुत स्थान

   शनिदेव धाम को चमत्कारिक कहा जाना चाहिए। जी हां, महाराष्ट्र के अहमद नगर जिला स्थित शनिदेव धाम की महिमा निराली है। 

   अहमद नगर के शिंगणापुर स्थित शनिदेव की प्रतिमा विलक्षण है। विश्व प्रसिद्ध इस मंदिर की विशेषता है कि सूर्य पुत्र शनिदेव खुले आसमान के नीचे विराजमान हैं। शनिदेव की यह प्रतिमा पाषाण की है। 

  सुन्दर संगमरमर के विशाल चबूतरा पर विराजमान शनिदेव के दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं की इच्छाओं की पूर्ति होती है। ऐसी मान्यता है। 
  शनिदेव के इस स्थान पर न कोई गुम्बद है आैर न ही कोई छत है। शिंगणापुर का शनिदेव धाम विश्व में खास ख्याति रखता है। 

   शनिदेव की प्रतिमा करीब पांच फुट नौ इंच लम्बी है। प्रतिमा एक फुट छह इंच चौड़ी है। यह काली पाषाण प्रतिमा है।
   शनिदेव की इस भव्य-दिव्य प्रतिमा के निकट एक त्रिशूल स्थापित है। छवि की दक्षिण ओर नन्दी की प्रतिमा स्थापित है। सामने शिव एवं हनुमान के दर्शन होते हैं। 
  विशेष अवसर पर शनिदेव की बारात का भी आयोजन होता है। जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। 
   शनिदेव धाम की पवित्र परम्परा 400 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। भारत के प्रांत महाराष्ट्र का शिंगणापुर देश-विदेश के श्रद्धालुओं के मध्य आश्चर्यजनक बना हुआ है।
   न्याय के इस देवता के दुलर्भ दर्शन के लिए देश विदेश के श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। नेवासा तालुका स्थित शनिदेव धाम की विलक्षणता अति दर्शनीय है। 

   खास यह कि शनिदेव के लोकप्रिय मंदिर से ही गांव भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि शनिदेव धाम जागृत देव स्थान है।
  आशय यह कि जीवंत मंदिर है। हिन्दुओं का यह तीर्थ स्थान श्रद्धालुओं के मध्य बेहद लोकप्रिय है। विशेषज्ञों की मानें तो शनिदेव की यह प्रतिमा स्वंभू है। 

   यह पाषाण प्रतिमा चरवाहों को वन क्षेत्र में प्राप्त हुई थी। चारवाहों ने इस पाषाण प्रतिमा को लोहे की छड़ से स्पर्श किया तो खून बह निकला। यह देख कर चरवाहे आश्चर्य चकित रह गये।
   यह चमत्कार गांव में चर्चा का विषय बन गया। रात में चरवाहा के स्वप्न में प्रभु शनिदेव आये। इसी के साथ ही शनिदेव धाम पवित्र स्थान बन गया। चरवाहा ने कहा कि शनैश्वर हैं।

   विशेषज्ञों की मानें तो शनिदेव नहीं चाहते थे कि मंदिर में छत हो। लिहाजा शनिदेव धाम के मुख्य स्थान पर कोई छत नहीं है। शनिदेव की पूजा अर्चना नित्य होती है। 
   शनिवार को विशेष पूजन अर्चन होता है। शनिवार को विशेष तिलाभिषेक होता है। मान्यता है कि शिंगणापुर में कभी कोई चोरी नहीं होती है। कारण यहां शनिदेव स्वयं विराजित हैं। 

   यह भगवान शनिदेव की प्रतीक प्रतिमा है। न्याय के देवता शनिदेव चोरी करने वाले को खुद दण्डित करते हैं।
   खास यह कि शिंगणापुर में एेसी संरचना है कि किसी भी मकान-दुकान या कहीं भी ताला नहीं लगता है। मौसम कोई भी हो या समय भी कोई हो। 
  शनिदेव के दर्शन की अपनी एक व्यवस्था एवं परम्परा है। कोई भी श्रद्धालु बिना स्नान किये शनिदेव के दर्शन नहीं कर सकता है।

   श्रद्धालु स्नान कर गीला वस्त्र (गमछा) धारण करके ही दर्शन के लिए प्रवेश करते हैं। यह वस्त्र पीताम्बर होता है। ऐसा न करने पर श्रद्धालुओं को शनिदेव धाम परिसर में प्रवेश नहीं मिलेगा।
  खास यह कि शनिदेव धाम शिंगणापुर में स्नान एवं वस्त्र आदि की बेहतर व्यवस्थाएं हैं।

   खुले मैदान में स्नान के लिए नल लगे हैं। श्रद्धालु यहां स्नान कर शनिदेव के दर्शन कर सकते हैं। खास यह कि शनिदेव धाम में दर्शन के लिए जाने वाला हर श्रद्धालु पीताम्बरधारी नजर आता है। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का यह केन्द्र अद्भुत है। 

  शनिदेव धाम एक विशाल प्रांगण है। शनिदेव के दर्शन, उनकी कृपा पाने एवं उनका आशीर्वाद पाने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
  शनिदेव धाम शिंगणापुर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट आैरंगाबाद एयरपोर्ट है।

  आैरंगाबाद एयरपोर्ट से शनिदेव धाम की दूरी करीब 90 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन अहमद नगर जंक्शन है।
  अहमद नगर से शनिदेव धाम की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी शनिदेव धाम की यात्रा कर सकते हैं।
19.381330,74.857830

Tuesday, 15 January 2019

कांचीपुरम: मोक्ष की धरती, अद्भुत स्थापत्य कला

   कांचीपुरम को भारत का तीर्थ धाम कहा जाना चाहिए। जी हां, कांचीपुरम में धार्मिकता का श्रेष्ठतम एहसास होता है। 

   वस्तुत: भारत के तमिलनाडु प्रांत के कांचीपुरम को मंदिरों का शहर कहा जाना चाहिए। कारण कांचीपुरम में सैकड़ों अद्भुत एवं अद्वितीय मंदिर विद्यमान हैं। 
  विशेषज्ञों की मानें तो कांचीपुरम भारत के सात श्रेष्ठ धार्मिक स्थानों में एक है। मान्यता है कि कांचीपुरम मोक्ष का स्थान है।

  खास यह ब्राह्म मुहूर्त से मंदिरों में पूजन-अर्चन एवं शंखनाद की प्रतिध्वनि अनुगूंजित होने लगती है। इस शहर को विलक्षण कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।
  इसका एक बड़ा कारण है कि कांचीपुरम के प्रत्येक मंदिर का वास्तुशिल्प एवं स्थापत्य कला अतुलनीय है। प्रत्येक मंदिर की वास्तुकला का एक विशेष आकर्षण है।

   शायद इसी लिए कांचीपुरम के मंदिर देश दुनिया में खास तौर से प्रसिद्ध हैं। सामान्य तौर पर इसे मंदिरों का शहर या धार्मिक शहर माना जाता है। यहां प्रत्येक मंदिर की कुछ खासियत है। 
   कैलाश नाथ मंदिर: कैलाश नाथ मंदिर शहर की पश्चिम दिशा में स्थित है। कैलाश नाथ मंदिर को दक्षिण भारत का सर्वाधिक शानदार मंदिर माना जाता है। इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में किया गया था। 

   पल्लव राजवंश के राजा राजसिम्हा ने अपनी पत्नी की प्रार्थना पर इस विशाल मंदिर का निर्माण कराया था। मंंदिर के अग्र भाग का निर्माण राजा के पुत्र महेन्द्र वर्मन तृतीय ने कराया था।
   मंदिर में देवी पार्वती एवं भगवान शिव की नृत्य प्रतिस्पर्धा का दर्शन है। आस्था एवं विश्वास के इस केन्द्र में मुख्य भगवान शिव एवं देवी पार्वती के दर्शन होते हैं।
  बैकुंठ पेरुमल मंदिर: बैकुंठ पेरुमल मंदिर वस्तुत: भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में पल्लव राजा नंदीवर्मन पल्लवमल्ला ने कराया था। मंदिर में भगवान विष्णु की विभिन्न मुद्राओं में प्रतिमाएं हैं। 

   भगवान विष्णु की विभिन्न मुद्राओं में खास तौर से बैठी प्रतिमा, खड़ी प्रतिमा एवं विश्राम करती प्रतिमा विद्यमान हैं। 
  खास तौर से मंदिर की दीवारों पर पल्लव एवं चालुक्यों के युद्ध दृश्यों का सजीव चित्रण है। मंदिर में 1000 स्तम्भ वाला विशाल हाल है।

  यह विशाल हाल पर्यटकों एवं श्रद्धालुओं को विशेष तौर पर आकर्षित करता है। प्रत्येक स्तम्भ पर शानदार एवं सजीव नक्काशी दर्शनीय है। यह शानदार कारीगरी की श्रेष्ठतम संरचना है। 
   कामाक्षी अम्मन मंदिर: कामाक्षी अम्मन मंदिर वस्तुत: शक्ति स्थल है। देवी पार्वती को समर्पित यह मंदिर 1.6 एकड़ में फैला है। देवी कामाक्षी अम्मन को देवी पार्वती का स्वरूप माना जाता है।
   यह पार्वती की अभिव्यक्तियों में से एक माना जाता है। यहां देवी पार्वती की विभिन्न मुद्राओं में प्रतिमाएं हैं। कामाक्षी अम्मन मंदिर में पार्वती जी की पद्मासन में प्रतिमा है।
  यह एक योगिक प्रतिमा है। खास यह कि यह दिव्य-भव्य मंदिर शहर के मध्य में स्थित है। इस विशाल मंदिर का निर्माण पल्लव राजवंश ने कराया था। इसका पुर्नरुद्धार 14वीं एवं 17 वीं शताब्दी में कराया गया था।
   एकमबारानाथर मंदिर: एकमबारानाथर मंदिर वस्तुत: भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण पल्लव राजवंश के राजाओं ने कराया था। 
  बाद में इसका पुर्ननिर्माण चोल एवं विजय नगर के राजाओं ने कराया था। करीब 11 खण्ड वाला यह मंदिर दक्षिण भारत के सबसे ऊंचे मंदिरों में से एक है।
 मंदिर में आकर्षक एवं दर्शनीय प्रतिमाएं हैं। एकमबारानाथर मंदिर का विशेष आकर्षण 1000 से अधिक स्तम्भ वाला विशाल मण्डपम है।

  विशेष यह कि एकमबारानाथर मंदिर कांचीपुरम का सबसे बड़ा मंदिर है। खास यह कि एकमबारानाथर मंदिर का शिवलिंग रेत से बना है।
  मान्यता है कि इस शिवलिंग को भगवती पार्वती ने बनाया था। एकमबारानाथर मंदिर में श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा है। 
   वरदराज मंदिर: वरदराज मंदिर वस्तुत: भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु को देवराजस्वामी के रूप में पूजा जाता है।
  खास यह कि इस दिव्य-भव्य मंदिर में 100 स्तम्भ वाला विशाल हाल है। इसे विजय नगर के राजाओं ने बनवाया था।
  वास्तुशिल्प एवं स्थापत्य कला की यह अद्भुत संरचना पर्यटकों को विशेष तौर से आकर्षित करती है। विशेषज्ञों की मानें तो वरदराज मंदिर भगवान विष्णु के 108 मंदिरों में से एक है।
   कांचीपुरम की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट चेन्नई एयरपोर्ट है। चेन्नई से कांचीपुरम की दूरी करीब 75 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन चेन्नई जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी कांचीपुरम की यात्रा कर सकते हैं। कांचीपुरम देश के सभी मुख्य सड़क मार्गों से जुड़ा है।
12.836140,79.706650

Wednesday, 9 January 2019

कालका मंदिर: प्राचीन इतिहास

   कालका मंदिर की विलक्षता का कोई जोड़ नहीं। जी हां, दक्षिणी दिल्ली स्थित कालका मंदिर वस्तुत: काली जी को समर्पित है। 

   भारत की राजधानी दिल्ली के दक्षिणी इलाके में स्थित इस दिव्य-भव्य मंदिर की स्थापत्य कला, शिल्प कला एवं वास्तु शास्त्र अद्भुत है।
  मां भगवती देवी काली को समर्पित यह मंदिर अति प्राचीन एवं सिद्ध स्थान है। विशेषज्ञों की मानें तो कालका मंदिर का निर्माण महाभारत काल से पूूर्व अवधि का है। 

   किवदंती है कि देवता क्षेत्र के आतताईयों से परेशान थे। देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से अाग्रह कि आतताईयों के आंतक से मुक्त करायें। 
  ब्रह्मा जी ने देवताओं को परामर्श दिया कि देवी पार्वती से सहायता मांगें। मान्यता है कि देवी कालका जी भगवान ब्रह्मा जी के परामर्श से देवताओं ने देवी भगवती की आराधना की थी। 

   अनुष्ठान, आराधना एवं प्रार्थना से प्रसन्न देवी काली जी ने मंदिर स्थल पर देवताओं को साक्षात दर्शन दिये थे। आशीर्वाद दिया था। 
  इसके पश्चात देवी काली ने इसी स्थान को आश्रय बना लिया था। किवदंती है कि काली जी ने यहां आतताईयों का वध कर उनके रक्त का पान किया था।

  विशेषज्ञों की मानें तो महाभारत काल में भगवान श्री कृष्ण ने काली जी के इस स्थान का उल्लेख किया था। पाण्डव ने यहां काली जी के दर्शन कर युद्ध किया था।
  जिसमें पाण्डव को विजय हासिल हुई थी। युधिष्ठिर के शासनकाल से ही इस दिव्य-भव्य मंदिर में पूजा अर्चना की जाती है।
   मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण काली ब्राह्मणों एवं ठोक जोगियों ने संयुक्त तौर पर किया था। खास यह कि कालका मंदिर को जयंती पीठ एवं मनोकामना सिद्ध पीठ भी कहा जाता है। 

  मनोकामना का शाब्दिक अर्थ इच्छा होता है। सिद्ध का आशय तृप्ति से होता है। पीठ का अर्थ तीर्थ होता है। काली जी का यह मंदिर पवित्र माना जाता है। 
  विशेषज्ञों की मानें तो काली जी का यह स्थान ऐसा है, जहां श्रद्धालुओं को मां कालिका देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 

  इस दिव्य-भव्य मंदिर का वास्तुशिल्प एवं स्थापत्य कला अति दर्शनीय है। र्इंट की चिनाई से बना यह मंदिर अति दर्शनीय है। यहां संगमरमर की खूबसूरती अलग ही दिखती है।

  खास यह कि मंदिर में मेहराबदार शानदार द्वार हैं। बाघ की छवियां भी दर्शनीय हैं। काली जी प्रतिमा पत्थर की है। सामने ही एक त्रिशूल खड़ा है। नवरात्र में काली जी का भव्य-दिव्य उत्सव होता है। जिसमें श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है। 

   नित्य यहां अनुष्ठान का विधान है। प्रात:काल की आरती के बाद दूध से माता भगवती काली जी का अभिषेक किया जाता है।
  सांझ को पुन: एक बार भव्य दिव्य आरती होती है। मंदिर में पुजारियों की परम्परा जोगियों एवं महंत के एक वंश की है।

  मान्यता है कि माता काली के दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं की इच्छाओं की पूर्ति होती है। लिहाजा काली जी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
  यात्रा कर श्रद्धालु काली जी के दर्शन कर पुण्य के भागी बन सकते हैं। खास यह कि काली जी का यह मंदिर सांझ होते ही रंग बिरंगी रोशनी से जगमगा उठता है।

    कालका मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इन्दिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट नई दिल्ली है। निकटतम रेलवे स्टेशन नई दिल्ली जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी कालका मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
28.550210,77.258580

Thursday, 3 January 2019

लिंगराज मंदिर: शिव एवं विष्णु के अद्भुत दर्शन

   लिंगराज मंदिर की महिमा का कोई जोड़ नहीं। लिंगराज मंदिर भगवान त्रिभुवनेश्वर को समर्पित है। वस्तुत: यह शिव स्थान है। 

   भारत के प्रांत उडीसा की राजधानी भुवनेश्वर स्थित यह मंदिर अति प्राचीन है। विशेषज्ञों की मानें तो लिंगराज मंदिर 1400 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। 
  हालांकि मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1080-1104 की अवधि में बना था। किवदंती है कि भगवान शिव को समर्पित लिंगराज मंदिर छठी शताब्दी की अवधि का है। 

   धार्मिक मान्यता है कि लिट्टी एवं वसा नामक राक्षसों का वध देवी पार्वती ने यहां किया था। इस युद्ध-संग्राम में देवी पार्वती को प्यास लगी थी। जिस पर भगवान शिव ने कूप बना कर सभी नदियों को जल योगदान के लिए आमंत्रित किया था। 
  इस स्थान को बिन्दुसागर सरोवर के नाम से जाना पहचाना जाता है। इसी स्थान पर भव्य-दिव्य लिंगराज मंदिर है।

   भगवान लिंगराज की मूर्ति वस्तुत: भगवान शिव को समर्पित है। यह प्रतिमा शिव एवं विष्णु का प्रतीक है। दोनों देवताओं के इस संयुक्त स्वरूप को हरिहर कहा जाता है। इस विशालकाय लिंगराज मंदिर की भव्यता-दिव्यता का कहीं कोई जोड़ नहीं। 

   विशेषज्ञों की मानें तो पूर्वोत्तर भारत में लिंगराज मंदिर शैवसम्प्रदाय का मुख्य केन्द्र रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो मध्ययुगीन काल में भुवनेश्वर एवं उसके आसपास 7000 से अधिक मंदिर एवं पूजा स्थल थे। 
  इनमें अभी भी 500 से अधिक मंदिर या पूजा स्थल हैं। खास यह कि लिंगराज मंदिर की वास्तुकला एवं शिल्पकला अद्वितीय है। 
  विश्व प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर उत्तर भारत के मंदिरों की संरचना, शोभा एवं अलंकरण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

  विशालकाय लिंगराज मंदिर अपनी अनुपम स्थापत्य कला के लिए खास तौर से प्रसिद्ध है। मंदिर के प्रत्येक शिलाखण्ड एवं हिस्से में मूर्ति कला एवं कारीगरी का चमत्कार दिखता है।
  लिंगराज मंदिर का शिखर भारतीय मंदिरों के शिखरों के विकास क्रम में प्रारम्भ काल का माना जाता है। खास यह कि मंदिर शिखर नीचे से सीधा एवं समकोणीय हो गया है। उपर धीरे-धीरे वक्र होता चला गया।

  शीर्ष पर यह वर्तुय दिखायी देता है। खास यह कि मंदिर के प्रत्येक शिलाखण्ड या पाषाण पर कोई न कोई अलंकरण अवश्य है। कहीं मानव आकृति है तो कहीं पशु-पक्षियों का रूपांकन है।
  यूं कहें कि सुन्दर मूर्तिशिल्प है। लिंगराज मंदिर के चारोें ओर स्थूूल एवं लम्बी पुष्प मालाएं एवं गजरा पहने जान पड़ता है। खास यह कि लिंगराज मंदिर के शिखर की ऊंचाई 180 फुट है। 

  गणेश, कार्तिकेय एवं गौरी के तीन अलग छोटे मंदिर हैं। गौैरी मंदिर में पार्वती देवी की काले रंग की प्रतिमा विराजमान है। 
  मंदिर के चतुर्दिक गज एवं सिंहों की मूर्तियां हैं। लिंगराज मंदिर के मुख्य गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। 

   गर्भगृह के अलावा जगमोहन एवं भोग मण्डपम में सुन्दर सिंह की मूर्तियां हैं। देवी देवताओं की कलात्मक प्रतिमाएंं हैं।
  लिंगराज मंदिर का प्रांगण करीब 150 मीटर वर्गाकार है। कलश की ऊंचाई करीब 40 मीटर है। प्रत्येक वर्ष अप्रैल में रथयात्रा का आयोजन खास होता है।
  लिंगराज मंदिर में पूजा अर्चना से पहले बिन्दुसागर सरोवर में स्नान किया जाता है। 

   मान्यता है कि बिन्दुसागर सरोवर में स्नान से पाममोचन होता है। विशेषज्ञों की मानें तो बिन्दुसागर सरोवर के जल में आैषधीय शक्तियां हैं। स्नान के उपरांत क्षेत्रपति अनंत वासुदेव के दर्शन किये जाते हैं।
   गणेश पूजन के बाद गोपालनी देवी के दर्शन होते हैं। इसके पश्चात शिव जी के वाहन नंदी के दर्शन की परम्परा है। इसके पश्चात लिंगराज के दर्शन के लिए मुख्य स्थान पर प्रवेश किया जाता है।


   लिंगराज मंदिर के गर्भगृह में आठ फुट मोटा एवं एक फुट ऊंचा ग्रेनाइट का स्वम्भू शिवलिंग है। लिंगराज शिवलिंग के दर्शन ही मुख्य हैं। 
 लिंगराज मंदिर परिसर में मंदिरों की एक लम्बी श्रंखला है। पूरब दिशा की ओर ब्राह्मेश्वर एवं भास्करेश्वर सम्प्रदाय के मंदिर हैं। यहीं पर राजा रानी का सुप्रसिद्ध मंदिर है। 

  इस मंदिर का निर्माण संभवत: सातवीं शताब्दी का है। इसके पास ही मंदिरों का सिद्धारण्य क्षेत्र है। जिसमें मुक्तेश्वर, केदारेश्वर, सिद्धेश्वर एवं परशुरामेश्वर मंदिर हैं।
  यह सभी मंदिर अति प्राचीनकाल के मानें जाते हैं। यह मंदिर कलिंग एवं द्रविड स्थापत्य कला के बेजोड उदाहरण हैं। 

   हालांकि इनमें बौद्ध कला का भी प्रभाव दिखता है। भुवनेश्वर के प्राचीन मंदिरों के समूह में बैताल मंदिर का विशेष महत्व है। चामुण्डा देवी, महिषासुर मर्दिनी देवी दुर्गा की प्राचीन प्रतिमाओं के दर्शन होते हैं।
  इस मंदिर में तंत्र साधना से आलौकिक सिद्धियां हासिल की जाती हैं। इसके साथ ही सूर्य उपासना स्थल भी है। सूर्य रथ के साथ उषा, अरुण एवं संध्या की प्रतिमाएं हैं। 
  भुवनेश्वर में महाशिवरात्रि पर विशेष पर्व आयोजित होता है। लिंगराज मंदिर में सनातन विधि विधान से 24 घंटे महादेव शिव की पूजा अर्चना की जाती है। विशेषज्ञों की मानें तो इस दिव्य-भव्य लिंगराज मंदिर का निर्माण सोमवंशी राजा जजाति केशरि ने 11 वीं शताब्दी में कराया था।
   राजा ने उस वक्त अपनी राजधानी भुवनेश्वर को बनाया था। इस स्थान को ब्राह्म पुराण में एकाम क्षेत्र बताया गया है। भुवनेश्वर को टेम्पल सिटी भी कहा जाता है। लिंगराज मंदिर भारत के सबसे बड़े एवं प्राचीन मंदिरों में माना जाता है। यह क्षेत्र श्रद्धालुओं के साथ साथ इतिहासकारों को भी आकर्षित करता है।
   लिंगराज मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बीजू पटनायक इंटरनेशनल एयरपोर्ट भुवनेश्वर है। निकटतम रेलवे स्टेशन भुवनेश्वर जंक्शन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी लिंगराज मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
20.234050,85.832550

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...