लिंगराज मंदिर: शिव एवं विष्णु के अद्भुत दर्शन
लिंगराज मंदिर की महिमा का कोई जोड़ नहीं। लिंगराज मंदिर भगवान त्रिभुवनेश्वर को समर्पित है। वस्तुत: यह शिव स्थान है।
भारत के प्रांत उडीसा की राजधानी भुवनेश्वर स्थित यह मंदिर अति प्राचीन है। विशेषज्ञों की मानें तो लिंगराज मंदिर 1400 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है।
हालांकि मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1080-1104 की अवधि में बना था। किवदंती है कि भगवान शिव को समर्पित लिंगराज मंदिर छठी शताब्दी की अवधि का है।
धार्मिक मान्यता है कि लिट्टी एवं वसा नामक राक्षसों का वध देवी पार्वती ने यहां किया था। इस युद्ध-संग्राम में देवी पार्वती को प्यास लगी थी। जिस पर भगवान शिव ने कूप बना कर सभी नदियों को जल योगदान के लिए आमंत्रित किया था।
इस स्थान को बिन्दुसागर सरोवर के नाम से जाना पहचाना जाता है। इसी स्थान पर भव्य-दिव्य लिंगराज मंदिर है।
भगवान लिंगराज की मूर्ति वस्तुत: भगवान शिव को समर्पित है। यह प्रतिमा शिव एवं विष्णु का प्रतीक है। दोनों देवताओं के इस संयुक्त स्वरूप को हरिहर कहा जाता है। इस विशालकाय लिंगराज मंदिर की भव्यता-दिव्यता का कहीं कोई जोड़ नहीं।
विशेषज्ञों की मानें तो पूर्वोत्तर भारत में लिंगराज मंदिर शैवसम्प्रदाय का मुख्य केन्द्र रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो मध्ययुगीन काल में भुवनेश्वर एवं उसके आसपास 7000 से अधिक मंदिर एवं पूजा स्थल थे।
इनमें अभी भी 500 से अधिक मंदिर या पूजा स्थल हैं। खास यह कि लिंगराज मंदिर की वास्तुकला एवं शिल्पकला अद्वितीय है।
विश्व प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर उत्तर भारत के मंदिरों की संरचना, शोभा एवं अलंकरण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
विशालकाय लिंगराज मंदिर अपनी अनुपम स्थापत्य कला के लिए खास तौर से प्रसिद्ध है। मंदिर के प्रत्येक शिलाखण्ड एवं हिस्से में मूर्ति कला एवं कारीगरी का चमत्कार दिखता है।
लिंगराज मंदिर का शिखर भारतीय मंदिरों के शिखरों के विकास क्रम में प्रारम्भ काल का माना जाता है। खास यह कि मंदिर शिखर नीचे से सीधा एवं समकोणीय हो गया है। उपर धीरे-धीरे वक्र होता चला गया।
शीर्ष पर यह वर्तुय दिखायी देता है। खास यह कि मंदिर के प्रत्येक शिलाखण्ड या पाषाण पर कोई न कोई अलंकरण अवश्य है। कहीं मानव आकृति है तो कहीं पशु-पक्षियों का रूपांकन है।
यूं कहें कि सुन्दर मूर्तिशिल्प है। लिंगराज मंदिर के चारोें ओर स्थूूल एवं लम्बी पुष्प मालाएं एवं गजरा पहने जान पड़ता है। खास यह कि लिंगराज मंदिर के शिखर की ऊंचाई 180 फुट है।
गणेश, कार्तिकेय एवं गौरी के तीन अलग छोटे मंदिर हैं। गौैरी मंदिर में पार्वती देवी की काले रंग की प्रतिमा विराजमान है।
मंदिर के चतुर्दिक गज एवं सिंहों की मूर्तियां हैं। लिंगराज मंदिर के मुख्य गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है।
गर्भगृह के अलावा जगमोहन एवं भोग मण्डपम में सुन्दर सिंह की मूर्तियां हैं। देवी देवताओं की कलात्मक प्रतिमाएंं हैं।
लिंगराज मंदिर का प्रांगण करीब 150 मीटर वर्गाकार है। कलश की ऊंचाई करीब 40 मीटर है। प्रत्येक वर्ष अप्रैल में रथयात्रा का आयोजन खास होता है।
लिंगराज मंदिर में पूजा अर्चना से पहले बिन्दुसागर सरोवर में स्नान किया जाता है।
मान्यता है कि बिन्दुसागर सरोवर में स्नान से पाममोचन होता है। विशेषज्ञों की मानें तो बिन्दुसागर सरोवर के जल में आैषधीय शक्तियां हैं। स्नान के उपरांत क्षेत्रपति अनंत वासुदेव के दर्शन किये जाते हैं।
गणेश पूजन के बाद गोपालनी देवी के दर्शन होते हैं। इसके पश्चात शिव जी के वाहन नंदी के दर्शन की परम्परा है। इसके पश्चात लिंगराज के दर्शन के लिए मुख्य स्थान पर प्रवेश किया जाता है।
लिंगराज मंदिर के गर्भगृह में आठ फुट मोटा एवं एक फुट ऊंचा ग्रेनाइट का स्वम्भू शिवलिंग है। लिंगराज शिवलिंग के दर्शन ही मुख्य हैं।
लिंगराज मंदिर परिसर में मंदिरों की एक लम्बी श्रंखला है। पूरब दिशा की ओर ब्राह्मेश्वर एवं भास्करेश्वर सम्प्रदाय के मंदिर हैं। यहीं पर राजा रानी का सुप्रसिद्ध मंदिर है।
इस मंदिर का निर्माण संभवत: सातवीं शताब्दी का है। इसके पास ही मंदिरों का सिद्धारण्य क्षेत्र है। जिसमें मुक्तेश्वर, केदारेश्वर, सिद्धेश्वर एवं परशुरामेश्वर मंदिर हैं।
यह सभी मंदिर अति प्राचीनकाल के मानें जाते हैं। यह मंदिर कलिंग एवं द्रविड स्थापत्य कला के बेजोड उदाहरण हैं।
हालांकि इनमें बौद्ध कला का भी प्रभाव दिखता है। भुवनेश्वर के प्राचीन मंदिरों के समूह में बैताल मंदिर का विशेष महत्व है। चामुण्डा देवी, महिषासुर मर्दिनी देवी दुर्गा की प्राचीन प्रतिमाओं के दर्शन होते हैं।
इस मंदिर में तंत्र साधना से आलौकिक सिद्धियां हासिल की जाती हैं। इसके साथ ही सूर्य उपासना स्थल भी है। सूर्य रथ के साथ उषा, अरुण एवं संध्या की प्रतिमाएं हैं।
भुवनेश्वर में महाशिवरात्रि पर विशेष पर्व आयोजित होता है। लिंगराज मंदिर में सनातन विधि विधान से 24 घंटे महादेव शिव की पूजा अर्चना की जाती है। विशेषज्ञों की मानें तो इस दिव्य-भव्य लिंगराज मंदिर का निर्माण सोमवंशी राजा जजाति केशरि ने 11 वीं शताब्दी में कराया था।
राजा ने उस वक्त अपनी राजधानी भुवनेश्वर को बनाया था। इस स्थान को ब्राह्म पुराण में एकाम क्षेत्र बताया गया है। भुवनेश्वर को टेम्पल सिटी भी कहा जाता है। लिंगराज मंदिर भारत के सबसे बड़े एवं प्राचीन मंदिरों में माना जाता है। यह क्षेत्र श्रद्धालुओं के साथ साथ इतिहासकारों को भी आकर्षित करता है।
लिंगराज मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बीजू पटनायक इंटरनेशनल एयरपोर्ट भुवनेश्वर है। निकटतम रेलवे स्टेशन भुवनेश्वर जंक्शन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी लिंगराज मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
20.234050,85.832550
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