यमुनोत्री धाम: आस्था का केन्द्र
यमुनोत्री धाम हिमालय की गोद में रचा-बसा श्रद्धा एवं आस्था का श्रेष्ठ केन्द्र है। उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी स्थित यमुनोत्री धाम हिन्दुओं का सर्वमान्य तीर्थ कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।
समुद्र तल से करीब 3293 मीटर ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री धाम के कपाट खास तौर से सर्दियों में बंद कर दिये जाते हैं। मान्यता है कि यमुनोत्री धाम सूर्य पुत्री का स्थान है। यमुनोत्री धाम को हिन्दुओं के चार धाम में प्रमुख स्थान हासिल है।
यमुनोत्री धाम में पिण्डदान का विशेष महत्व है। यमुनोत्री धाम का मुख्य आकर्षण देवी यमुना के लिए समर्पित मंदिर एवं जानकीचट्टी है। जानकीचट्टी एक पवित्र तापीय झरना है। यह तापीय झरना यमुनोत्री धाम से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित है।
विशेषज्ञों की मानें तो चार धाम की यात्रा यमुनोत्री धाम से ही प्रारम्भ होती है। यमुनोत्री धाम मुख्यत: यमुना देवी को समर्पित है। सूर्य पुत्री को सूर्यतनया कहा जाता है। सूर्यतनया का शाब्दिक अर्थ यमुना है। यमुना की महिमा का बखान पुराण में भी है। यमुनोत्री धाम का इतिहास भी अति प्राचीन है।
मंदिर का निर्माण टिहरी गढ़वाल के महाराजा प्रताप शाह ने वर्ष 1919 में कराया था। हालांकि यमुनोत्री धाम का पुन: निर्माण जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19 सदी में कराया। विशेषज्ञों की मानें तो यमुनोत्री का वास्तविक उद्गम स्थल हिमनद अर्थात चंपासर ग्लेशियर है।
यह स्थान समुद्र तल से 4421 मीटर ऊंचाई पर कालिंद पर्वत पर स्थित है। यमुनोत्री धाम मंदिर की भव्यता-दिव्यता देखते ही बनती है। मंदिर के गर्भगृह में यमुना देवी की काले संगमरमर की प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित है। प्रतिमा का पूजन-अर्चन विधि-विधान से नित्य होती है।
विशेषज्ञों की मानें तो पुराण में सूर्य पुत्री को यमुना कहा गया है। सूर्य की छाया एवं संज्ञा नामक पत्नियों से यमुना, यम, शनिदेव, वैवस्वत मनु प्रकट हुये थे। इस प्रकार देखें तो यमुना खास तौर से यमराज एवं शनिदेव की बहन हैं।
शायद इसी लिए भाई दूूज को यमुना दर्शन एवं यमुना स्नान का विशेष महत्व है। यमुना जल स्वरूप में सर्वप्रथम कालिंद पर्वत पर प्रकट हुर्इं हैं। मंदिर प्रांगण में एक विशाल शिलाखण्ड स्थापित है। इस शिला खण्ड को दिव्यशिला के नाम से जाना पहचाना जाता है।
खास यह कि मई से अक्टूबर की अवधि में यमुनोत्री धाम में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। विशेषज्ञों की मानें तो असित मुनि की पर्णकुटी भी इसी स्थान पर थी। यमुनोत्री धाम की यात्रा बेहद रोमांचक एवं मुग्ध करने वाली होती है।
बर्फीली पर्वत चोटियां यात्रियों-पर्यटकों को सम्मोहित करती हैं। यमुनोत्री धाम के निकट ही सूर्य कुण्ड एवं गौरी कुण्ड हैं। सूर्य कुण्ड गर्म जल का कुण्ड है जबकि गौरी कुण्ड शीतल जल का कुण्ड है। खास यह कि अति शीतलता के कारण कार्तिक माह की यम द्वितीया को यमुनोत्री धाम के पट बंद कर दिये जाते हैं।
आशय यह कि दीपावली के पश्चात शीतलता के कारण यमुनोत्री धाम के पट बंद कर दिये जाते हैं। इसके बाद बैशाख माह के शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर यमुनोत्री धाम के कपाट खुलते हैं। कपाट खुलने पर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है।
यमुनोत्री धाम के कपाट बंद होने एवं कपाट खुलने की अवधि में देवी यमुना की भव्य-दिव्य शोभायात्रा निकलती है। सूर्य कुण्ड का जल अपने उच्चतम तापमान के लिए खास तौर से प्रसिद्ध है।
श्रद्धालु कपड़े की पोटली में चावल एवं आलू आदि इस जल में पका लेते हैं। सूर्य कुण्ड के निकट ही दिव्य शिलाखण्ड स्थित है। इसे ज्योति शिला भी कहते हैं।
यमुनोत्री धाम की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून से यमुनोत्री धाम की दूरी करीब 210 किलोमीटर है।
निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून है। देहरादून रेलवे स्टेशन से यमुनोत्री धाम की दूरी करीब 185 किलोमीटर है। श्रद्धालु यमुनोत्री धाम की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
30.999214,78.462695
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