Wednesday, 31 October 2018

यमुनोत्री धाम: आस्था का केन्द्र

   यमुनोत्री धाम हिमालय की गोद में रचा-बसा श्रद्धा एवं आस्था का श्रेष्ठ केन्द्र है। उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी स्थित यमुनोत्री धाम हिन्दुओं का सर्वमान्य तीर्थ कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।

   समुद्र तल से करीब 3293 मीटर ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री धाम के कपाट खास तौर से सर्दियों में बंद कर दिये जाते हैं। मान्यता है कि यमुनोत्री धाम सूर्य पुत्री का स्थान है। यमुनोत्री धाम को हिन्दुओं के चार धाम में प्रमुख स्थान हासिल है। 

   यमुनोत्री धाम में पिण्डदान का विशेष महत्व है। यमुनोत्री धाम का मुख्य आकर्षण देवी यमुना के लिए समर्पित मंदिर एवं जानकीचट्टी है। जानकीचट्टी एक पवित्र तापीय झरना है। यह तापीय झरना यमुनोत्री धाम से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित है।

   विशेषज्ञों की मानें तो चार धाम की यात्रा यमुनोत्री धाम से ही प्रारम्भ होती है। यमुनोत्री धाम मुख्यत: यमुना देवी को समर्पित है। सूर्य पुत्री को सूर्यतनया कहा जाता है। सूर्यतनया का शाब्दिक अर्थ यमुना है। यमुना की महिमा का बखान पुराण में भी है। यमुनोत्री धाम का इतिहास भी अति प्राचीन है। 

   मंदिर का निर्माण टिहरी गढ़वाल के महाराजा प्रताप शाह ने वर्ष 1919 में कराया था। हालांकि यमुनोत्री धाम का पुन: निर्माण जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19 सदी में कराया। विशेषज्ञों की मानें तो यमुनोत्री का वास्तविक उद्गम स्थल हिमनद अर्थात चंपासर ग्लेशियर है। 

    यह स्थान समुद्र तल से 4421 मीटर ऊंचाई पर कालिंद पर्वत पर स्थित है। यमुनोत्री धाम मंदिर की भव्यता-दिव्यता देखते ही बनती है। मंदिर के गर्भगृह में यमुना देवी की काले संगमरमर की प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित है। प्रतिमा का पूजन-अर्चन विधि-विधान से नित्य होती है।

   विशेषज्ञों की मानें तो पुराण में सूर्य पुत्री को यमुना कहा गया है। सूर्य की छाया एवं संज्ञा नामक पत्नियों से यमुना, यम, शनिदेव, वैवस्वत मनु प्रकट हुये थे। इस प्रकार देखें तो यमुना खास तौर से यमराज एवं शनिदेव की बहन हैं।

    शायद इसी लिए भाई दूूज को यमुना दर्शन एवं यमुना स्नान का विशेष महत्व है। यमुना जल स्वरूप में सर्वप्रथम कालिंद पर्वत पर प्रकट हुर्इं हैं। मंदिर प्रांगण में एक विशाल शिलाखण्ड स्थापित है। इस शिला खण्ड को दिव्यशिला के नाम से जाना पहचाना जाता है। 

   खास यह कि मई से अक्टूबर की अवधि में यमुनोत्री धाम में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। विशेषज्ञों की मानें तो असित मुनि की पर्णकुटी भी इसी स्थान पर थी। यमुनोत्री धाम की यात्रा बेहद रोमांचक एवं मुग्ध करने वाली होती है। 

   बर्फीली पर्वत चोटियां यात्रियों-पर्यटकों को सम्मोहित करती हैं। यमुनोत्री धाम के निकट ही सूर्य कुण्ड एवं गौरी कुण्ड हैं। सूर्य कुण्ड गर्म जल का कुण्ड है जबकि गौरी कुण्ड शीतल जल का कुण्ड है। खास यह कि अति शीतलता के कारण कार्तिक माह की यम द्वितीया को यमुनोत्री धाम के पट बंद कर दिये जाते हैं।
   आशय यह कि दीपावली के पश्चात शीतलता के कारण यमुनोत्री धाम के पट बंद कर दिये जाते हैं। इसके बाद बैशाख माह के शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर यमुनोत्री धाम के कपाट खुलते हैं। कपाट खुलने पर दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है।

   यमुनोत्री धाम के कपाट बंद होने एवं कपाट खुलने की अवधि में देवी यमुना की भव्य-दिव्य शोभायात्रा निकलती है। सूर्य कुण्ड का जल अपने उच्चतम तापमान के लिए खास तौर से प्रसिद्ध है। 
  श्रद्धालु कपड़े की पोटली में चावल एवं आलू आदि इस जल में पका लेते हैं। सूर्य कुण्ड के निकट ही दिव्य शिलाखण्ड स्थित है। इसे ज्योति शिला भी कहते हैं।

    यमुनोत्री धाम की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून से यमुनोत्री धाम की दूरी करीब 210 किलोमीटर है।
     निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून है। देहरादून रेलवे स्टेशन से यमुनोत्री धाम की दूरी करीब 185 किलोमीटर है। श्रद्धालु यमुनोत्री धाम की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
30.999214,78.462695

Thursday, 25 October 2018

सुरकंडा देवी मंदिर: आस्था का केन्द्र

   सुरकंडा देवी मंदिर को धरती पर आस्था एवं विश्वास का श्रेष्ठतम केन्द्र कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

   मान्यता है कि सुरकंडा देवी का यह मंदिर साक्षात शिव एवं सती का स्थान है। उत्तराखण्ड के जिला टिहरी गढ़वाल के यूलिसाल गांव में स्थित यह मंदिर वस्तुत: हिमालय की गोद का एक धार्मिक स्थान है। यूलिसाल गांव धनौल्टी के निकट स्थित है। 

   सुरकंडा देवी का यह मंदिर 51 शक्तिपीठ में एक है। यहां माता भगवती काली की दिव्य-भव्य प्रतिमा स्थापित है। मान्यता है कि मां काली अर्थात सुरकंडा देवी के दर्शन मात्र से इच्छाओं की पूर्ति होती है। मंदिर की यात्रा करने के लिए करीब 3 किलोमीटर पैदल यात्रा करनी पड़ती है। 

   सुरकंडा देवी मंदिर समुद्र तल से करीब 3030 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। किवदंती है कि सती के शव का एक हिस्सा यहां गिरा था। लिहाजा इस स्थान को शक्तिपीठ की मान्यता है। कथानक है कि पति अपमान से क्षुब्ध सती ने यज्ञ में कूद कर प्राण त्याग दिये थे।

   शिव को पता चला कि सती ने प्राण त्याग दिये तो शिव का आक्रोश प्रचण्ड हो उठा। शिव ने सती का जला शव लेकर तांडव करने लगे। जिससे प्रलय जैसे हालात दिखे। प्रलय के यह हालात देख कर भगवान विष्णु ने सती के शव के 51 हिस्से कर दिये थे। 

  शिव सती का शव लेकर कैलाश पर्वत जा रहे थे, तो सती शव का सिर यहां गिरा था। चूंकि सती का सिर यहां गिरा था। लिहाजा इस स्थान को सुरकंडा नाम से ख्याति मिली। वस्तुत: सुरकंडा देवी मंदिर माता भगवती दुर्गा को समर्पित है।

    सुरकंडा देवी मंदिर घने वन क्षेत्र से आच्छादित है। उत्तर दिशा में हिमालय का सुन्दर एवं इन्द्रधनुषी दृश्य यहां से दिखता है। दक्षिण दिशा में देहरादून एवं ऋषिकेश की इन्द्रधनुषी निराली छटा दिखती है। 
   समुद्र तल से शीर्ष ऊंचाई पर होने के कारण सुरकंडा देवी मंदिर अधिकांश समय कोहरे एवं धुंध की चादर से ढ़का रहता है। लिहाजा मौसम हमेशा सुहाना रहता है। विशेषज्ञों की मानें तो मंदिर की प्राचीनता का अनुमान लगा पाना कठिन है। फिर भी मंदिर हजारों वर्ष पुराना है।

    मंदिर का पुर्ननिर्माण कई बार हो चुका है। किवदंती यह भी है कि देवताओं को पराजित कर राक्षसों ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था। लिहाजा देवताओं ने दुर्गा स्वरूप सुरकंडा देवी की पूजा अर्चना कर प्रार्थना की थी।

   सुरकंडा देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं की मनोकामनाओं को पूर्ण किया था। देवताओं ने राक्षसों को पराजित कर स्वर्ग पर अपना आधिपत्य हासिल किया था।
   तत्पश्चात सुरकंडा देवी मंदिर के प्रति जनसामान्य की आस्था एवं विश्वास ने सर्वमान्य तीर्थ बना दिया। मंदिर का वास्तुशिल्प बेहद आकर्षक एवं लुभावना है। मंदिर की स्थापत्य कला में स्थानीयता की छवि दिखती है। 

    पर्वतीय शिल्प लुभावना है। सुरकंडा देवी मंदिर श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र होने के साथ ही यह इलाका लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है। चौतरफा सुरम्य एवं शीतल वातावरण पर्यटकों को मुग्ध कर देता है। घना वन क्षेत्र वन्य जीवन से आबाद रहता है।

    शीर्ष ऊंचाई पर होने के कारण बादलों का खिलंदड़पन रोमांच पैदा करता है। बादलों का झोका कब निकट से गुजर जायेगा, कुछ कहना मुश्किल होता है। बादल हमेशा यहां निकटता का एहसास कराते रहते हैं। भगवती सुरकंडा देवी के दर्शन के साथ ही प्रकृति का स्पर्श एक सुखद एहसास कराते हैं।
    सुरकंडा देवी मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादूून से सुरकंडा देवी मंदिर की दूरी करीब 95 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून एवं ऋषिकेश है। चम्बा से मंदिर की दूरी करीब 22 किलोमीटर है। मसूरी से सुरकंडा देवी मंदिर की दूरी करीब 38 किलोमीटर है। श्रद्धालु एवं पर्यटक सड़क मार्ग से भी सुरकंडा देवी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
30.530160,78.604590

Tuesday, 23 October 2018

तुंगनाथ मंदिर: शिखर पर विराजमान

   दुनिया के श्रेष्ठतम शिखर पर विद्यमान तुंगनाथ मंदिर को विलक्षण कहें तो कोई बड़ी बात न होगी। जी हां, विशेषज्ञों का तो यही मानना है।

   तुंगनाथ मंदिर उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग स्थित तुंगनाथ पर्वत के शिखर पर विद्यमान हैं। गढ़वाल मण्डल के रुद्रप्रयाग स्थित इस भव्य-दिव्य मंदिर की प्राचीनता की अपनी एक अलग यशोगाथा है। समुद्र तल से करीब 3680 मीटर ऊंचाई पर स्थित तुंगनाथ मंदिर पंचकेदारों में सबसे शीर्ष पर विराजमान हैं।

  तुंगनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। विशेषज्ञों की मानें तो भगवान शिव का यह स्थान 1000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। मान्यता है कि इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण पाण्डव बंधुओं ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया था। कारण कुरुक्षेत्र में नरसंहार से भगवान शिव पाण्डव बंधुओं से रुष्ट थे।

   लिहाजा पाण्डव बंधुओं ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तुंगनाथ मंदिर का निर्माण किया था। पौराणिक कथानक के अनुसार तुंगनाथ मंदिर का निर्माण अर्जुन ने किया था। तुंगनाथ पर्वत की चोटी से तीन धाराओं का रुाोत है। इनमें एक अक्षकामिनी नदी प्रवाहमान है।

   तुंगनाथ मंदिर चोपता से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। तुंगनाथ का शाब्दिक अर्थ पीक के भगवान है। खास यह कि तुंगनाथ मंदिर में भगवान शिव के ह्मदय एवं भुजाओं की पूजा की जाती है। मंदिर का वास्तुशिल्प बेहद दर्शनीय है। मंदिर उत्तर भारतीय वास्तुशिल्प का विलक्षण आयाम है।

   मंदिर के प्रवेश द्वार पर नंदी की भव्य-दिव्य मूर्ति है। मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी विद्यमान हैं। काल भैरव एवं व्यास आदि की मूर्तियां खास हैं।
  तुंगनाथ मंदिर परिक्षेत्र बर्फबारी का इलाका है। लिहाजा नवम्बर से मार्च के मध्य की अवधि में तुंगनाथ मंदिर बंद रहता है। तुंगनाथ मंदिर वस्तुत: चोपता इलाके में आता है। 

  खास यह कि चोपता से मंदिर का इलाका बांस एवं बुरांश आच्छादित है। लिहाजा बेहद दर्शनीय प्रतीत होता है। इसे एक अति सुन्दर दर्शनीय पर्यटन क्षेत्र कहा जा सकता है। इस प्राचीन शिव मंदिर से करीब डेढ़ किलोमीटर ऊंचाई पर चढ़ने पर चन्द्रशिला पर्वत चोटी है। चन्द्रशिला पर्वत चोटी से हिमालय के दिव्य-भव्य दर्शन होते हैं।
   प्राकृतिक सौन्दर्य का सुन्दर आयाम यहां दिखता है। चोपता-गोपेश्वर मार्ग पर कस्तूरी मृग प्रजनन फार्म भी है। यहां कस्तूरी मृगों की सुन्दरता को निकट से महसूस कर सकते हैं। पर्यटक तुंगनाथ-चन्द्रशिला इलाके में ट्रैकिंग भी कर सकते हैं। कहावत है कि रामायण महाकाव्य के मुख्य नायक श्रीराम चन्द्रशिला पर्वत पर ध्यान लगाते थे।

   कहावत यह भी है कि महाविद्वान रावण ने यहां भगवान शिव की तपस्या की थी। हिमालय की प्राकृतिक सुन्दरता के मध्य स्थित यह मंदिर तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। चारधाम की यात्रा में तुंगनाथ मंदिर बेहद महत्वपूर्ण है। 

   इस मंदिर में पूजा-अर्चना का उत्तरदायित्व मक्कामाथ गांव के एक ब्रााह्मण परिवार पर है। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का सैलाब दर्शन के लिए दिखता है। 
  हालांकि अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण सामान्य दिनों में दर्शनार्थियों की भीड़ कम होती है। मान्यता है कि श्रद्धालुओं की मनौतियां प्रभु के दर्शन मात्र से पूरी होती हैं।

   केदारनाथ एवं बद्रीनाथ के मध्य में स्थित तुंगनाथ की अपनी एक अलग महिमा है। खास यह कि जुलाई-अगस्त की अवधि इस इलाके को आैर भी सुन्दर बना देती है।
   कारण इन दिनों मखमली घास के मैदान खिल उठते हैं तो वहीं सुगंधित फूलों की बहार आ जाती है। दर्शनीयता बेहद मनभावन होती है।

   तुंगनाथ मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून से तुंगनाथ मंदिर की दूरी करीब 225 किलोमीटर है।
   निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से तुंगनाथ मंदिर की दूरी करीब 210 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी तुंगनाथ मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
30.487200,79.204370

Sunday, 14 October 2018

शांतिकुंज आश्रम: आध्यात्मिक केन्द्र

   शांतिकुंज आश्रम को वैश्विक आध्यात्मिक केन्द्र कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, उत्तराखण्ड के हरिद्वार स्थित शांतिकुंज आश्रम को वैश्विक स्तर पर एक श्रेष्ठतम आध्यात्मिक केन्द्र के तौर पर जाना पहचाना जाता है।
  वस्तुत: शांतिकुंज आश्रम गायत्री परिवार का मुख्यालय है। गायत्री परिवार वैश्विक भावनात्मक परिवार के तौर पर खास ख्याति रखता है। शांतिकुंज आश्रम हरिद्वार को चैतन्य तीर्थ प्रखर, प्रज्ञा सजल एवं श्रद्धा के रूप में भी जाना जाता है।

  शांतिकुंज आश्रम में माता भगवती गायत्री देवी की अखण्ड ज्योति 1926 से प्रज्जवलित है। वस्तुत: शांतिकुंज आश्रम सामाजिक एवं आध्यात्मिक जागृति का केन्द्र है। 
  यूं भी कह सकते हैं कि शांतिकुंज आश्रम एक सशक्त आध्यात्मिक तीर्थ है। खास यह कि शांतिकुंज आश्रम से देश दुनिया के करोड़ों परिवारों की आस्था जुड़ी है। 

    शांतिकुंज आश्रम में देवात्मा हिमालय एवं चारों धाम के दर्शन होते हैं। मान्यता है कि शांतिकुंज आश्रम में ध्यान लगाने से मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। 
  खास तौर से धर्म-सम्प्रदाय के पवित्र प्रतीक चिह्न, जड़ी बूटियों के दुर्लभ बाग-बगीचे एवं गायत्री परिवार की स्थापना से लेकर वर्तमान काल का बहुत कुछ देखने को मिलेगा। 

   शांतिकुंज आश्रम में माता गायत्री की भव्य-दिव्य प्रतिमा दर्शनीय है। यहां माता गायत्री अनेक स्वरूपों में विद्यमान हैं। हालांकि माता गायत्री का विराट स्वरूप अपनी भव्यता-दिव्यता से श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। मान्यता है कि गायत्री की यह प्रतिमा युगशक्ति का प्रतीक है। 

   गायत्री का स्वरूप वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को प्रबल करता है। साथ ही यह साधक में दूरदर्शिता, विवेकशीलता एवं शांति का भाव प्रबल करता है। शांतिकुंज आश्रम में नित्य गायत्री यज्ञ होता है। जिसमें 1000 से अधिक श्रद्धालु शामिल होते हैं। यह एक ऐसा आश्रम है जो दिव्य आध्यात्मिक सिद्धांतों पर आधारित प्रशिक्षण भी प्रदान करता है। यह वस्तुत: ऋषि परम्परा का आधुनिक आश्रम है।

   विशेषज्ञों की मानें तो इस आश्रम की स्थापना हिमालय ऋषि सट्टा के मार्ग दर्शन में की गयी थी। शांतिकुंज आश्रम में न केवल ऋषि परम्परा को देख सकते हैं बल्कि ऋषि परम्परा का अनुभव भी कर सकते हैं।
   विशेषज्ञों की मानें तो शांतिकुंज आश्रम की विधिवत स्थापना आचार्य श्रीराम शर्मा के नेतृत्व में वर्ष 1971 में हरिद्वार की भूमि के छोटे से टुकड़े से की गयी थी। धीरे-धीरे शांतिकुंज आश्रम ने भव्यता-दिव्यता हासिल कर ली।

   हालात यह हैं कि अब गायत्री नगर हरिद्वार के एक बडे़ भू-भाग में फैल गया। खास यह कि शांतिकुंज आश्रम में वृहद स्तर के आध्यात्मिक शिविर निरन्तर आयोजित किये जाते हैं। देव संस्कृत विश्वविद्यालय भी विशाल परिसर में है। 

   देव संस्कृत विश्वविद्यालय शिक्षा के श्रेष्ठतम संस्थानों में से एक है। खास यह है कि वैदिक संस्कारों की भी यहां अपनी एक अलग परम्परा है। खास यह कि शांतिकुंज आश्रम में गायत्री साधना अनवरत चलती रहती है।
   विशेषज्ञों की मानें तो शास्त्रों एवं पुराणों में उल्लेख है कि यदि कोई दीपक 24 वर्षों से अनवरत जलता रहे तो वह सिद्ध हो जाता है। ऐसे दीपक के दर्शन मात्र से ही अनेक फल मिलते हैं।

  माता गायत्री का यह दीपक वर्ष 1926 से अनवरत प्रज्जवलित है। यजुर्वेद में अग्नि की महत्ता को खास तौर से उल्लेख किया गया है। दीपक या अग्नि के समक्ष जप एवं साधना से साधक को हजार गुना फल की प्राप्ति होती है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो अखिल भारतीय गायत्री परिवार की स्थापना 1926 में सिद्ध ज्योति प्रज्जवलित कर की गयी थी। माता गायत्री जी के साथ ही इस सिद्ध ज्योति के दर्शन का भी यहां विशेष महत्व है। विशेषज्ञों की मानें तो आचार्य श्रीराम शर्मा ने इस दिव्य सिद्ध ज्योति के समक्ष साधना करके सिद्धि हासिल की थी। 

   आचार्य की मानें तो दीपक के सामने साधना से मन में दिव्य भावनाएं उठती हैं। यह दीपक ही गायत्री तीर्थ को जीवंत एवं जागृत बनाता है। साथ ही तीर्थ चेतना को बलशाली बनाता है। खास यह कि शांतिकुंज आश्रम समाज के रचनात्मक बदलाव में अखण्ड भूमिका का निर्वाह करता है। 

  मसलन नशा मुक्त भारत, शैक्षणिक विकास आदि इत्यादि बहुत कुछ है।
   शांतिकुंज आश्रम हरिद्वार की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। निकटतम रेलवे स्टेशन हरिद्वार जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी शांतिकुंज आश्रम हरिद्वार की यात्रा कर सकते हैं।
29.977540,78.186430

Friday, 12 October 2018

हरिद्वार: दिव्य देवभूमि दर्शन

   हरिद्वार को गंगा द्वार कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, पवित्र पावनी गंगा हरिद्वार से ही मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती हैं। दिव्य देवभूमि हरिद्वार का कण-कण दर्शनीय है।

    उत्तराखण्ड का हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। समुद्र तल से करीब 3139 मीटर ऊंचाई पर स्थित रुाोत गोमुख से गंगा सागर तक गंगा करीब 2500 किलोमीटर की यात्रा करती हैं।
   हिम शिखर से निकल कर गंगा हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती हैं। हरिद्वार का अर्थ हरि एवं द्वार से है।
    धार्मिक किवदंती है कि हरिद्वार में ही समुद्र मंथन की अमृत बूंद गिरी थी। मान्यता है कि समुद्र मंथन की बूंदे चार स्थानों पर गिरी थीं। इनमें उज्जैन, हरिद्वार, नासिक एवं प्रयाग हैं। इन स्थानों पर हजारों तीर्थ यात्री महापर्व मनाने आते हैं। हरिद्वार में हर की पौड़ी को सबसे अधिक पवित्र घाट की मान्यता है।

   बताते हैं कि इसी स्थान पर अमृत बूंद गिरी थी। इसे यहां ब्रह्म कुण्ड भी कहा जाता है। खास यह कि हरिद्वार में मंदिर-मठ, आश्रम एवं धार्मिक स्थानों की एक लम्बी श्रंखला है। साधना स्थल एवं गुफाएं भी हैं।
   इनमें खास तौर से हर की पौड़ी, चण्डी देवी मंदिर, मनसा देवी मंदिर, माया देवी मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर, भारत माता मंदिर, सप्तऋषि आश्रम, शांति कुंज, कनखल, पारद शिवलिंग, दिव्य कल्पवृक्ष वन आदि इत्यादि हैं। हरिद्वार को मायाक्षेत्र, मायातीर्थ एवं सप्तरुाोत भी कहा जाता है।
   हर की पौड़ी: हर की पौड़ी का अपना एक अलग प्राचीन इतिहास है। पैड़ी का अर्थ सीढ़ी से होता है। कहावत है कि राजा विक्रमादित्य के भाई भर्तृहरि ने यहां तपस्या की थी।
   राजा विक्रमादित्य ने यहां सीढ़ियां एवं कुण्ड का निर्माण कराया था। शायद इसी कारण इस स्थान का नाम हर की पौड़ी पड़ा। हर की पौड़ी हरिद्वार का ह्मदय स्थल माना जाता है। गंगा स्नान का यह सर्वोत्तम घाट है। 

   चण्डी देवी मंदिर: चण्डी देवी मंदिर गंगा नदी के किनारे शिवालिक पर्वत श्रंखला पर विद्यमान है। नील पर्वत के शिखर पर स्थित चण्डी देवी मंदिर श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र है। यह मंदिर कश्मीर के राजा सुचत सिंह ने वर्ष 1929 में बनवाया था। विशेषज्ञों की मानें तो देवी दुर्गा ने चण्ड-मुण्ड का वध इसी स्थान पर किया था।

  लिहाजा इस स्थान को चण्डी देवी के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि चण्डी देवी की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। मनसा देवी की तुलना में यहां की चढ़ाई कम है। पर्यटक यहां रोपवे का आनन्द ले सकते हैं। चण्डी देवी मंदिर के निकट ही संतोषी माता का मंदिर है।
  मनसा देवी मंदिर: मनसा देवी मंदिर हर की पौड़ी की पश्चिम दिशा में स्थित है। मनसा का शाब्दिक अर्थ मन की इच्छा है। मुख्य मंदिर में देवी की दो प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित हैं।

   माया देवी मंदिर: माया देवी मंदिर की मुख्य देवी माया देवी को हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। संभवत: यह 11 वीं शताब्दी का प्राचीन मंदिर है। इसकी मान्यता सिद्धपीठ की है। मान्यता है कि इस स्थान पर सती के शव के अंग गिरे थे। यहां सती की नाभि एवं ह्मदय गिरा था। यहां नारायणी शिला एवं भैरव मंदिर भी हैं।

   वैष्णो देवी मंदिर: वैष्णो देवी मंदिर हर की पौड़ी से करीब एक किलोमीटर दूर भीमगौड़ा पर स्थित है। यहां वैष्णो देवी की गुफा की अनुकृति है। पवित्र गुफा का प्राकृतिक स्वरूप देने की कोशिश की गयी है। वैष्णो देवी की तीन पिण्डियों के दर्शन होते हैं।
   भारत माता मंदिर: भारत माता मंदिर वैष्णो देवी मंदिर के निकट स्थित है। इस बहुमंजिला मंदिर का निर्माण स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि के सानिध्य में कराया गया। अपने रंग-ढंग का यह निराला मंदिर खास ख्याति रखता है। भारत माता मंदिर में खास तौर से शूर मंदिर, मातृ सदन, संत मंदिर, शक्ति मंदिर एवं भारत दर्शन हैं। विष्णु मंदिर एवं सबसे उपर शिव मंदिर है। भारत माता मंदिर बेहद दर्शनीय है। यहां देश भक्ति की प्रेरणा भी मिलती है। 
   सप्तऋषि आश्रम: सप्तऋषि आश्रम सप्तधाराओं को रेखांकित करने वाली गंगा की निराली एवं प्राकृतिक छवि दर्शनीय है। कहावत है कि सप्तऋषियों ने यहां तप किया था। तप में बाधा न हो, इस लिए गंगा सात धाराओं में विभक्त होकर आगे बढ़ गयीं थीं। सप्तऋषि आश्रम अति दर्शनीय है। आश्रम में मुख्य मंदिर शिव जी का है। सप्तऋषि परिक्रमा में ऋषियों के छोटे-छोटे मंदिर हैं।

   शांतिकुंज: शांतिकुंज आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा स्थापित गायत्री परिवार का मुख्य केन्द्र है। हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर स्थित शांतिकुंज एक आध्यात्मिक केन्द्र है। विशाल परिक्षेत्र में विकसित यह केन्द्र आस्था एवं विश्वास का स्थल है।
   कनखल: कनखल वस्तुत: हरिद्वार का उपनगर है। हरिद्वार से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित कनखल प्राचीन तीर्थ है। कनखल में गंगा विशेष पुण्य दायिनी मानी जाती हैं। बताते हैं कि राजा दक्ष ने कनखल में यज्ञ किया था। इस स्थान पर दक्षेश्वर महादेव का मंदिर है।
    पारद शिवलिंग: पारद शिवलिंग कनखल में श्रीहरिहर मंदिर के निकट दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। मंदिर में 151 किलो पारद का शिवलिंग स्थापित है। मंदिर परिसर में रुद्राक्ष का दिव्य-भव्य वृक्ष है।
    दिव्य कल्पवृक्ष वन: दिव्य कल्पवृक्ष वन वस्तुत: देव भूमि हरिद्वार की नक्षत्र वाटिका के निकट स्थित है। यह कल्प वृक्ष है। हरितऋषि विजय पाल सिंह बघेल ने यह वन क्षेत्र विकसित किया था। इसे देवलोक का वृक्ष भी कहा जाता है। श्रद्धालु यहां दर्शन कर मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
   हरिद्वार की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। निकटतम रेलवे स्टेशन हरिद्वार जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी हरिद्वार की यात्रा कर सकते हैं।
29.947530,78.156330

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...