Thursday, 25 October 2018

सुरकंडा देवी मंदिर: आस्था का केन्द्र

   सुरकंडा देवी मंदिर को धरती पर आस्था एवं विश्वास का श्रेष्ठतम केन्द्र कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

   मान्यता है कि सुरकंडा देवी का यह मंदिर साक्षात शिव एवं सती का स्थान है। उत्तराखण्ड के जिला टिहरी गढ़वाल के यूलिसाल गांव में स्थित यह मंदिर वस्तुत: हिमालय की गोद का एक धार्मिक स्थान है। यूलिसाल गांव धनौल्टी के निकट स्थित है। 

   सुरकंडा देवी का यह मंदिर 51 शक्तिपीठ में एक है। यहां माता भगवती काली की दिव्य-भव्य प्रतिमा स्थापित है। मान्यता है कि मां काली अर्थात सुरकंडा देवी के दर्शन मात्र से इच्छाओं की पूर्ति होती है। मंदिर की यात्रा करने के लिए करीब 3 किलोमीटर पैदल यात्रा करनी पड़ती है। 

   सुरकंडा देवी मंदिर समुद्र तल से करीब 3030 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। किवदंती है कि सती के शव का एक हिस्सा यहां गिरा था। लिहाजा इस स्थान को शक्तिपीठ की मान्यता है। कथानक है कि पति अपमान से क्षुब्ध सती ने यज्ञ में कूद कर प्राण त्याग दिये थे।

   शिव को पता चला कि सती ने प्राण त्याग दिये तो शिव का आक्रोश प्रचण्ड हो उठा। शिव ने सती का जला शव लेकर तांडव करने लगे। जिससे प्रलय जैसे हालात दिखे। प्रलय के यह हालात देख कर भगवान विष्णु ने सती के शव के 51 हिस्से कर दिये थे। 

  शिव सती का शव लेकर कैलाश पर्वत जा रहे थे, तो सती शव का सिर यहां गिरा था। चूंकि सती का सिर यहां गिरा था। लिहाजा इस स्थान को सुरकंडा नाम से ख्याति मिली। वस्तुत: सुरकंडा देवी मंदिर माता भगवती दुर्गा को समर्पित है।

    सुरकंडा देवी मंदिर घने वन क्षेत्र से आच्छादित है। उत्तर दिशा में हिमालय का सुन्दर एवं इन्द्रधनुषी दृश्य यहां से दिखता है। दक्षिण दिशा में देहरादून एवं ऋषिकेश की इन्द्रधनुषी निराली छटा दिखती है। 
   समुद्र तल से शीर्ष ऊंचाई पर होने के कारण सुरकंडा देवी मंदिर अधिकांश समय कोहरे एवं धुंध की चादर से ढ़का रहता है। लिहाजा मौसम हमेशा सुहाना रहता है। विशेषज्ञों की मानें तो मंदिर की प्राचीनता का अनुमान लगा पाना कठिन है। फिर भी मंदिर हजारों वर्ष पुराना है।

    मंदिर का पुर्ननिर्माण कई बार हो चुका है। किवदंती यह भी है कि देवताओं को पराजित कर राक्षसों ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था। लिहाजा देवताओं ने दुर्गा स्वरूप सुरकंडा देवी की पूजा अर्चना कर प्रार्थना की थी।

   सुरकंडा देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं की मनोकामनाओं को पूर्ण किया था। देवताओं ने राक्षसों को पराजित कर स्वर्ग पर अपना आधिपत्य हासिल किया था।
   तत्पश्चात सुरकंडा देवी मंदिर के प्रति जनसामान्य की आस्था एवं विश्वास ने सर्वमान्य तीर्थ बना दिया। मंदिर का वास्तुशिल्प बेहद आकर्षक एवं लुभावना है। मंदिर की स्थापत्य कला में स्थानीयता की छवि दिखती है। 

    पर्वतीय शिल्प लुभावना है। सुरकंडा देवी मंदिर श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र होने के साथ ही यह इलाका लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है। चौतरफा सुरम्य एवं शीतल वातावरण पर्यटकों को मुग्ध कर देता है। घना वन क्षेत्र वन्य जीवन से आबाद रहता है।

    शीर्ष ऊंचाई पर होने के कारण बादलों का खिलंदड़पन रोमांच पैदा करता है। बादलों का झोका कब निकट से गुजर जायेगा, कुछ कहना मुश्किल होता है। बादल हमेशा यहां निकटता का एहसास कराते रहते हैं। भगवती सुरकंडा देवी के दर्शन के साथ ही प्रकृति का स्पर्श एक सुखद एहसास कराते हैं।
    सुरकंडा देवी मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादूून से सुरकंडा देवी मंदिर की दूरी करीब 95 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून एवं ऋषिकेश है। चम्बा से मंदिर की दूरी करीब 22 किलोमीटर है। मसूरी से सुरकंडा देवी मंदिर की दूरी करीब 38 किलोमीटर है। श्रद्धालु एवं पर्यटक सड़क मार्ग से भी सुरकंडा देवी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
30.530160,78.604590

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