हरिद्वार: दिव्य देवभूमि दर्शन
हरिद्वार को गंगा द्वार कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, पवित्र पावनी गंगा हरिद्वार से ही मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती हैं। दिव्य देवभूमि हरिद्वार का कण-कण दर्शनीय है।
उत्तराखण्ड का हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। समुद्र तल से करीब 3139 मीटर ऊंचाई पर स्थित रुाोत गोमुख से गंगा सागर तक गंगा करीब 2500 किलोमीटर की यात्रा करती हैं।
हिम शिखर से निकल कर गंगा हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती हैं। हरिद्वार का अर्थ हरि एवं द्वार से है।
धार्मिक किवदंती है कि हरिद्वार में ही समुद्र मंथन की अमृत बूंद गिरी थी। मान्यता है कि समुद्र मंथन की बूंदे चार स्थानों पर गिरी थीं। इनमें उज्जैन, हरिद्वार, नासिक एवं प्रयाग हैं। इन स्थानों पर हजारों तीर्थ यात्री महापर्व मनाने आते हैं। हरिद्वार में हर की पौड़ी को सबसे अधिक पवित्र घाट की मान्यता है।
बताते हैं कि इसी स्थान पर अमृत बूंद गिरी थी। इसे यहां ब्रह्म कुण्ड भी कहा जाता है। खास यह कि हरिद्वार में मंदिर-मठ, आश्रम एवं धार्मिक स्थानों की एक लम्बी श्रंखला है। साधना स्थल एवं गुफाएं भी हैं।
इनमें खास तौर से हर की पौड़ी, चण्डी देवी मंदिर, मनसा देवी मंदिर, माया देवी मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर, भारत माता मंदिर, सप्तऋषि आश्रम, शांति कुंज, कनखल, पारद शिवलिंग, दिव्य कल्पवृक्ष वन आदि इत्यादि हैं। हरिद्वार को मायाक्षेत्र, मायातीर्थ एवं सप्तरुाोत भी कहा जाता है।
हर की पौड़ी: हर की पौड़ी का अपना एक अलग प्राचीन इतिहास है। पैड़ी का अर्थ सीढ़ी से होता है। कहावत है कि राजा विक्रमादित्य के भाई भर्तृहरि ने यहां तपस्या की थी।
राजा विक्रमादित्य ने यहां सीढ़ियां एवं कुण्ड का निर्माण कराया था। शायद इसी कारण इस स्थान का नाम हर की पौड़ी पड़ा। हर की पौड़ी हरिद्वार का ह्मदय स्थल माना जाता है। गंगा स्नान का यह सर्वोत्तम घाट है।
चण्डी देवी मंदिर: चण्डी देवी मंदिर गंगा नदी के किनारे शिवालिक पर्वत श्रंखला पर विद्यमान है। नील पर्वत के शिखर पर स्थित चण्डी देवी मंदिर श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र है। यह मंदिर कश्मीर के राजा सुचत सिंह ने वर्ष 1929 में बनवाया था। विशेषज्ञों की मानें तो देवी दुर्गा ने चण्ड-मुण्ड का वध इसी स्थान पर किया था।
लिहाजा इस स्थान को चण्डी देवी के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि चण्डी देवी की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। मनसा देवी की तुलना में यहां की चढ़ाई कम है। पर्यटक यहां रोपवे का आनन्द ले सकते हैं। चण्डी देवी मंदिर के निकट ही संतोषी माता का मंदिर है।
मनसा देवी मंदिर: मनसा देवी मंदिर हर की पौड़ी की पश्चिम दिशा में स्थित है। मनसा का शाब्दिक अर्थ मन की इच्छा है। मुख्य मंदिर में देवी की दो प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित हैं।
मनसा देवी मंदिर: मनसा देवी मंदिर हर की पौड़ी की पश्चिम दिशा में स्थित है। मनसा का शाब्दिक अर्थ मन की इच्छा है। मुख्य मंदिर में देवी की दो प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित हैं।
माया देवी मंदिर: माया देवी मंदिर की मुख्य देवी माया देवी को हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। संभवत: यह 11 वीं शताब्दी का प्राचीन मंदिर है। इसकी मान्यता सिद्धपीठ की है। मान्यता है कि इस स्थान पर सती के शव के अंग गिरे थे। यहां सती की नाभि एवं ह्मदय गिरा था। यहां नारायणी शिला एवं भैरव मंदिर भी हैं।
वैष्णो देवी मंदिर: वैष्णो देवी मंदिर हर की पौड़ी से करीब एक किलोमीटर दूर भीमगौड़ा पर स्थित है। यहां वैष्णो देवी की गुफा की अनुकृति है। पवित्र गुफा का प्राकृतिक स्वरूप देने की कोशिश की गयी है। वैष्णो देवी की तीन पिण्डियों के दर्शन होते हैं।
भारत माता मंदिर: भारत माता मंदिर वैष्णो देवी मंदिर के निकट स्थित है। इस बहुमंजिला मंदिर का निर्माण स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि के सानिध्य में कराया गया। अपने रंग-ढंग का यह निराला मंदिर खास ख्याति रखता है। भारत माता मंदिर में खास तौर से शूर मंदिर, मातृ सदन, संत मंदिर, शक्ति मंदिर एवं भारत दर्शन हैं। विष्णु मंदिर एवं सबसे उपर शिव मंदिर है। भारत माता मंदिर बेहद दर्शनीय है। यहां देश भक्ति की प्रेरणा भी मिलती है।
भारत माता मंदिर: भारत माता मंदिर वैष्णो देवी मंदिर के निकट स्थित है। इस बहुमंजिला मंदिर का निर्माण स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि के सानिध्य में कराया गया। अपने रंग-ढंग का यह निराला मंदिर खास ख्याति रखता है। भारत माता मंदिर में खास तौर से शूर मंदिर, मातृ सदन, संत मंदिर, शक्ति मंदिर एवं भारत दर्शन हैं। विष्णु मंदिर एवं सबसे उपर शिव मंदिर है। भारत माता मंदिर बेहद दर्शनीय है। यहां देश भक्ति की प्रेरणा भी मिलती है।
सप्तऋषि आश्रम: सप्तऋषि आश्रम सप्तधाराओं को रेखांकित करने वाली गंगा की निराली एवं प्राकृतिक छवि दर्शनीय है। कहावत है कि सप्तऋषियों ने यहां तप किया था। तप में बाधा न हो, इस लिए गंगा सात धाराओं में विभक्त होकर आगे बढ़ गयीं थीं। सप्तऋषि आश्रम अति दर्शनीय है। आश्रम में मुख्य मंदिर शिव जी का है। सप्तऋषि परिक्रमा में ऋषियों के छोटे-छोटे मंदिर हैं।
शांतिकुंज: शांतिकुंज आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा स्थापित गायत्री परिवार का मुख्य केन्द्र है। हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर स्थित शांतिकुंज एक आध्यात्मिक केन्द्र है। विशाल परिक्षेत्र में विकसित यह केन्द्र आस्था एवं विश्वास का स्थल है।
कनखल: कनखल वस्तुत: हरिद्वार का उपनगर है। हरिद्वार से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित कनखल प्राचीन तीर्थ है। कनखल में गंगा विशेष पुण्य दायिनी मानी जाती हैं। बताते हैं कि राजा दक्ष ने कनखल में यज्ञ किया था। इस स्थान पर दक्षेश्वर महादेव का मंदिर है।
पारद शिवलिंग: पारद शिवलिंग कनखल में श्रीहरिहर मंदिर के निकट दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। मंदिर में 151 किलो पारद का शिवलिंग स्थापित है। मंदिर परिसर में रुद्राक्ष का दिव्य-भव्य वृक्ष है।
दिव्य कल्पवृक्ष वन: दिव्य कल्पवृक्ष वन वस्तुत: देव भूमि हरिद्वार की नक्षत्र वाटिका के निकट स्थित है। यह कल्प वृक्ष है। हरितऋषि विजय पाल सिंह बघेल ने यह वन क्षेत्र विकसित किया था। इसे देवलोक का वृक्ष भी कहा जाता है। श्रद्धालु यहां दर्शन कर मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
कनखल: कनखल वस्तुत: हरिद्वार का उपनगर है। हरिद्वार से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित कनखल प्राचीन तीर्थ है। कनखल में गंगा विशेष पुण्य दायिनी मानी जाती हैं। बताते हैं कि राजा दक्ष ने कनखल में यज्ञ किया था। इस स्थान पर दक्षेश्वर महादेव का मंदिर है।
पारद शिवलिंग: पारद शिवलिंग कनखल में श्रीहरिहर मंदिर के निकट दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। मंदिर में 151 किलो पारद का शिवलिंग स्थापित है। मंदिर परिसर में रुद्राक्ष का दिव्य-भव्य वृक्ष है।
दिव्य कल्पवृक्ष वन: दिव्य कल्पवृक्ष वन वस्तुत: देव भूमि हरिद्वार की नक्षत्र वाटिका के निकट स्थित है। यह कल्प वृक्ष है। हरितऋषि विजय पाल सिंह बघेल ने यह वन क्षेत्र विकसित किया था। इसे देवलोक का वृक्ष भी कहा जाता है। श्रद्धालु यहां दर्शन कर मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
हरिद्वार की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। निकटतम रेलवे स्टेशन हरिद्वार जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी हरिद्वार की यात्रा कर सकते हैं।
29.947530,78.156330
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