Friday, 20 September 2019

नासिक : धार्मिक पर्यटन

   नासिक को सुन्दर एवं श्रेष्ठतम धार्मिक पर्यटन कहा जाना चाहिए। हालांकि यह हिन्दुओं का एक अति पवित्र महातीर्थ है। इसे भगवान शिव एवं श्री राम की स्थली भी मान सकते हैं।

   कारण नासिक में पंचवटी है तो वहीं ज्योतिर्लिंग त्रयम्बकेश्वर भी है। पवित्र गोदावरी नदी के तट पर विद्यमान नासिक भारत का गौरब भी है। भारत के महाराष्ट्र का शहर नासिक अपने धार्मिक एवं गौरवशाली इतिहास के लिए भी जाना पहचाना जाता है। महाराष्ट्र के उत्तर-पश्चिम में स्थित नासिक धर्म परायण शहर की ख्याति रखता है। 

  पवित्र गोदावरी नदी के तट पर स्थित नासिक का मुख्य आकर्षण गोदावरी नदी एवंं पंचवटी है। समुद्र तल से करीब 565 मीटर की ऊंचाई से लेकर 700 मीटर की ऊंचाई तक रचा-बसा नासिक अपने प्राकृतिक सौन्दर्य एवं स्थापत्य कला के लिए भी जाना पहचाना जाता है। आस्था एवं विश्वास का यह शहर वैश्विक ख्याति रखता है। 

   नासिक का मुख्य आकर्षण सिंहस्थ कुंभ होता है। प्रत्येक 12 वर्ष में आयोजित होने वाला सिंहस्थ कुंभ की वैश्विक ख्याति है। कुंभ पर्व का आयोजन देश के मुख्य चार शहरों में होता है।
  इनमें नासिक, इलाहाबाद, उज्जैन एवं हरिद्वार हैं। इलाहाबाद का कुंभ सबसे बड़ा उत्सव होता है। इस धर्म उत्सव में भारत के श्रद्धालुओं के साथ साथ दुनिया के श्रद्धालु एवं पर्यटक शामिल होते हैं।

   धार्मिक मान्यता है कि पवित्र गोदावरी में सिंहस्थ कुंभ में स्नान करने से आत्मा शुद्ध होती है। साथ ही पापों से मुक्ति मिलती है। महाशिवरात्रि का पर्व भी यहां अति धूमधाम से मनाया जाता है। 
  गोदावरी नदी के तट एवं घाटों का सौन्दर्य देखते ही बनता है। नासिक में धार्मिक एवं आकर्षक स्थानोें की एक लम्बी श्रंृखला विद्यमान है।
   पंचवटी: पंचवटी नासिक के उत्तर दिशा में स्थित है। मान्यता है कि भगवान श्री राम, सीता, लक्ष्मण ने कुछ समय तक पंचवटी में प्रवास किया था। इसी कारण से पंचवटी दर्शनीय एवं प्रसिद्ध है। पंचवटी के पांच बरगद के वृक्ष भी खास हैं। मान्यता है कि इसी स्थान पर रावण ने माता सीता का अपहरण किया था। 
   सीता गुम्फा: सीता गुम्फा भी पंचवटी का एक हिस्सा है। गुम्फा का शाब्दिक अर्थ गुफा है। पांच बरगद के पेड़ों के निकट स्थित इस गुफा में प्रवेश सीढ़ियों के रास्ते करना पड़ता है।
   सुन्दर नारायण मंदिर: सुन्दर नारायण मंदिर स्थापत्य कला का शानदार अलंकरण है। यह शानदार दिव्य-भव्य मंदिर नासिक में अहिल्या बाई होल्कर सेतु के किनारे स्थित है। इस मंदिर की स्थापना गंगाधर यशवंत चन्द्रचूड ने 1756 में की थी। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। भगवान विष्णु को सुन्दर नारायण के नाम से भी जाना जाता है।
  मुक्ति धाम: मुक्ति धाम भी नासिक एक खास आकर्षण है। हिन्दुओं के सभी देवी देवता इस मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित हैं। श्रद्धालु मुक्ति धाम में द्वादश ज्योतिर्लिंग के भी दर्शन कर सकते हैं। 
   मोदाकेश्वर गणेश मंदिर: मोदाकेश्वर गणेश मंदिर नासिक के मुख्य आकर्षण एवं धार्मिक स्थानों में से एक है। मान्यता है कि इस मंदिर में स्थापित मूर्ति स्वयं प्राकृट्य है। 
   इसे शम्भू के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। महाराष्ट्र का सबसे मीठा व्यंजन मोदक ही माना जाता है। यहां का नारियल एवं गुड़ के शानदार मिश्रण से बनने वाला मोदक बेहद प्रसिद्ध है।


   रामकुण्ड: रामकुण्ड वस्तुत: गोदावरी नदी का प्रसिद्ध घाट है। मान्यता है कि भगवान राम ने पंचवटी आने पर इसी स्थान पर स्नान किया था। लिहाजा इसे रामकुण्ड के नाम से जाना जाता है।

   कालाराम मंदिर: कालाराम मंदिर नासिक में गोदावरी नदी के निकट पंचवटी में स्थित दिव्य-भव्य मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण गोपिका बाई पेशवा ने 1794 में कराया था। 
  हेमाडपंती शैली के इस मंदिर भगवान श्री राम की श्याम प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर की वास्तुकला अति दर्शनीय है। खास यह कि इस मंदिर की वास्तुकला ज्योतिर्लिंग त्रयंबकेश्वर मंदिर की भांति है। मंदिर का निर्माण काले पत्थरों से किया गया है।
   शिरडी मंदिर: शिरडी मंदिर एक पवित्र एवं धार्मिक स्थान है। शिरडी जिला अहमद नगर का एक छोटा सा गांव है। यह मंदिर वस्तुत: साई बाबा को समर्पित स्थान है। यह मंदिर अद्भुत चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। 
   सोमेश्वर महादेव मंदिर: सोमेश्वर महादेव मंदिर वस्तुत: नासिक के अति प्राचीन मंदिरों में से एक है। मंदिर में भगवान सोमेश्वर अर्र्थात शिव जी की प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। नासिक से करीब 6 किलोमीटर दूर यह मंदिर गंगापुर रोड पर स्थित है।
   नासिक की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट मुम्बई इण्टरनेशनल एयरपोर्ट है। मुम्बई एयरपोर्ट से नासिक की दूरी करीब 167 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन नासिक जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी नासिक की यात्रा कर सकते हैं।
20.000530,73.782707

Wednesday, 11 September 2019

काशी : धर्म एवं संस्कृति का अद्भुत संगम

    काशी को धर्म एवं संस्कृति का विलक्षण एवं अद्भुत संगम कहा जाना चाहिए। इस देव नगरी को तीनों लोक से न्यारी काशी कहा गया है। 

   धर्म, आध्यात्म, संस्कृति एवं कला के इस अनुपम संगम को महातीर्थ एवं धार्मिक पर्यटन कहा जा सकता है। हिन्दुओं की आस्था, विश्वास एवं श्रृद्धा के इस शहर काशी को वैश्विक पर्यटन का दर्जा हासिल है। पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर काशी को विशिष्ट स्थान हासिल है।

   शायद इसी लिए वैश्विक पर्यटकों की काशी यात्रा का सिलसिला अनवरत जारी रहता है। भारत के उत्तर प्रदेश की धर्म नगरी काशी को वाराणसी एवं बनारस भी कहा जाता है। हिन्दुओं के इस पवित्र शहर को अविमुक्त क्षेत्र भी कहा जाता है। काशी का मुख्य आकर्षण ज्योतिर्लिंग विश्वनाथ मंदिर एवं गंगा हैं। 

   उत्तर भारत के धार्मिक एवं सांस्कृतिक शहर काशी का भारत की राजनीति से लेकर कला जगत सहित असंख्य क्षेत्र में अति महत्वपूर्ण स्थान है। खास तौर से काशी के गंगा घाट अति दर्शनीय हैं। 
   सांझ होते ही काशी के इन गंगा घाटों पर एक उत्सव जैसा दृश्य दिखता है। सामान्यत: काशी में गंगा के 100 घाटों की श्रृंखला विद्यमान है लेकिन काशी को गंगा के 84 घाटों के लिए जाना पहचाना जाता है। 

   देव दीपावली पर तो गंगा तट पर देव लोक उतर आता है। करोड़ों अरबों दीपकों की रोशनी से काशी इन्द्रधनुषी दिखती है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वप्न लोक उतर आया हो। गंगा के दशाश्वमेध घाट, राजघाट, अस्सी घाट, आदिकेशव घाट, राणामहल घाट, सिंधिया घाट, पंचगंगा घाट, भोसले घाट, पेशवा घाट एवं मणिकर्णिका घाट आदि खास तौर से प्रसिद्ध हैं।

   करीब 7 किलोमीटर के दायरे मेें स्थित गंगा के यह घाट बेहद अनुपम हैं। दशाश्वमेध घाट के निकट ही ज्योतिर्लिंग विश्वनाथ मंदिर है। भगवान शिव को समर्पित बाबा विश्वनाथ मंदिर श्रद्धालुओं के आस्था एवंं विश्वास का केन्द्र है। काशी में मंदिरों की एक लम्बी श्रंृखला विद्यमान है।

   इनमें खास तौर से काल भैरव, अन्नपूर्णा मंदिर, ढ़ुंढ़िराज गणेश, दुर्गा मंदिर, केदारनाथ, संकट मोचन मंदिर, तुलसी मानस मंदिर, नया विश्वनाथ मंदिर, भारत माता मंदिर, संकठा देवी मंदिर, विशालाक्षी मंदिर आदि इत्यादि सहित मंदिरों की एक लम्बी श्रंृखला है। 

   काल भैरव को काशी का कोतवाल भी कहा जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर को स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है। विशेेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया था।

   इस दिव्य भव्य मंदिर की काशी में सर्वोच्च महिमा है। मंदिर का वास्तुशिल्प अति दर्शनीय है। दुर्गा मंदिर की भी स्थापत्य कला पर्यटक-श्रद्धालुओं को मुग्ध कर लेती है।
   खास यह कि काशी बनारस भारत के दार्शनिक, लेखक, संगीतज्ञों एवं विविध रचनाकारों की कर्म भूमि रही है। खास तौर से गोस्वामी तुलसी दास ने महाकाव्य राम चरित मानस काशी में ही रचा था।

   महर्षि अगस्त्य, महर्षि धन्वंतरि, गौतम बुद्ध, संत कबीर, स्वामी रैदास, अघोराचार्य बाबा कीनाराम, रानी लक्ष्मी बाई, पाणिनी, पाश्र्वनाथ, महर्षि पतंजलि, स्वामी रामानन्दाचार्य, बल्लभाचार्य, शंकराचार्य, महर्षि वेदव्यास आदि की तपोभूमि काशी रही। महान संगीतकार पंडित रवि शंकर, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि इत्यादि काशी की शान एवं शोभा रहे।

   मान्यता है कि भगवान शिव ने करीब 5000 वर्ष पूर्व काशी की स्थापना की थी। शिव नगरी होने के कारण काशी एक अति महत्वपूर्ण महातीर्थ स्थल है। काशी हिन्दुओं की पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। काशी वस्तुत: गंगा एवं असि नदी के संगम पर रचा बसा एक इन्द्रधनुषी शहर है। जिसमें सनातन संस्कृति के सभी रंग मिलेंगे। 

  काशी की संरचना बेहद विलक्षण एवं अद्भुत है। संकरी गलियों वाला यह शहर काशी शांत एवं शीतल हवाओं का ह्मदय स्पर्शी अपनापन भी प्रदान करता है। काशी की इन गलियों में ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे सुमधुर संगीत प्रवाहमान हो।
    कारण गंगा के तटों के शीर्ष पर रची बसी काशी एक शीतलता प्रदान करती है। इतना ही नहीं, बनारसी साड़ियों की विशिष्टता विश्व भर में ख्याति रखती है। बनारस का पान तो मलाई की तरह होता है। निराला स्वाद दिलों को भाता है। बनारस का कलाकंद भी बेहद प्रसिद्ध है। काशी की दर्शनीयता में विशिष्टता ही पर्यटकों को लुभाती है।

   काशी की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट लाल बहादुर शास्त्री इण्टरनेशनल एयरपोर्ट बाबतपुर है। एयरपोर्ट से काशी की दूरी करीब 25 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन वाराणसी जंक्शन एवं मंडुवाडीह जंक्शन हैं। पर्यटक सड़क मार्ग से भी काशी की यात्रा कर सकते हैं।
25.309580,83.005692

Tuesday, 10 September 2019

पराशर झील : अद्भुत एवं विलक्षण

   पराशर झील का प्राकृतिक सौन्दर्य अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। पराशर झील वस्तुत: एक शानदार धार्मिक पर्यटन है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो पराशर झील के आसपास का इलाका ऋषि पराशर की तप स्थली है। लिहाजा पराशर झील का इलाका धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व रखता है। पर्यटक पराशर झील पर हिल स्टेशन का भरपूर आनन्द ले सकते हैं। 

   भारत के हिमाचल प्रदेश के जिला मण्डी स्थित पराशर झील का प्राकृतिक सौन्दर्य अति दर्शनीय है। समुद्र तल से करीब 2730 मीटर ऊंचाई पर स्थित पराशर झील का विशेष आकर्षण है। झील में तैरता भूखण्ड यहां का मुख्य आकर्षण है। झील में तैरते इस शानदार एवं सुन्दर भूखण्ड को स्थानीयता में टाहला कहते हैं। 

   झील का यह सुन्दर भूखण्ड कभी भी एक स्थान पर नहीं रहता। यह भूखण्ड झील में स्थान परिवर्तन करता रहता है। पराशर झील का यह एक आश्चर्य एवं कौतुहल है। इस शानदार झील की मछलियांं भी एक खास आकर्षण होती हैं। इस शानदार झील के किनारे पगोड़ा शैली पर आधारित एक दिव्य-भव्य मंदिर है। 

   इस शानदार मंदिर का निर्माण 14 वीं शताब्दी में मण्डी रियासत के राजा बाणसेन ने कराया था। स्थापत्य कला, कला-संस्कृति एवं प्राकृतिक सौन्दर्य प्रेमियों के लिए पराशर झील एवं आसपास का इलाका किसी स्वर्ग से कम नहीं है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो मंदिर स्थल वस्तुत: ऋषि पराशर की तप स्थली है। इस स्थान पर ऋषि पराशर ने तपस्या की थी। पराशर झील का यह शानदार मंदिर लकड़ी से बना है। तीन मंजिला इस मंदिर की दिव्यता-भव्यता अति दर्शनीय है।
   हालांकि मंदिर की निर्माण शैली परम्परागत है। फिर भी दीवारों की संरचना में पत्थरों के साथ ही लकड़ी का भी उपयोग बेहतरीन तौर तरीके से किया गया है। 
    मंदिर की कलात्मकता अनूठी एवं अमूल्य है। मंदिर के बाहरी स्तंभ नक्काशी के अद्भुत एवं विलक्षण आयाम हैं। देवी देवताओं की छवियां, पेड़-पौधों का अंकन, सांप, फूल-बेल पत्तियां, पशु-पक्षियों का चित्रांकन पर्यटकों एवं श्रृद्धालुओं को आकर्षित करता है। 

   मण्डी से उत्तर दिशा में करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित पराशर झील श्रद्धा एवं आस्था का केन्द्र है। विशेषज्ञों की मानें तो पराशर झील किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इस झील में अनोखी पत्तियां निकलती है। स्थानीयता में इसे बर्रे एवं छोटी पत्तियों को जर्रे कहते हैं। इनको देव आशीर्वाद माना जाता है। श्रृद्धालु इनको श्रद्धापूर्वक अपने पास रख लेते हैं। 

   महर्षि पराशर को समर्पित इस मंदिर ऋषि पराशर की पिण्डी, भगवान शिव एवं विष्णु, महिषासुर मर्दिनी आदि देवी-देवताओं की पाषाण प्रतिमाएं प्राण प्रतिष्ठित हैं। खास यह कि मंदिर में प्रसाद के रूप में भक्तों को पराशर झील से निकली पत्तियां दी जाती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो पराशर ऋषि वशिष्ठ मुनि के पौत्र एवं मुनि शक्ति के पुत्र थे। 

   पराशर ऋषि की प्रतिमा में गजब का आकर्षण है। इस प्राचीन प्रतिमा का स्पर्श करा कर श्रृद्धालुओं को चावल के दाने प्रसाद स्वरूप दिये जाते हैं। श्रद्धालु विश्वास के साथ इन चावल के दानोें को ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि पराशर झील इलाके में बारिश के लिए भगवान श्री गणेश को आमंत्रित किया जाता है। 

   निकट के गांव भटवाड़ी में श्री गणेश मंदिर है। भगवान श्री गणेश जी की आमंत्रण पर विशेष यात्रा निकलती है। खास यह कि ऋषि पराशर के जन्मोत्सव पर पराशर झील पर एक विशाल मेला का आयोजन होता है। झील का प्राकृतिक सौन्दर्य देख कर पर्यटक अभिभूत हो उठते हैं। 

   पराशर झील के प्राकृतिक सौन्दर्य को वॉलीवुड के कैमरों में भी कैद किया जा चुका है। विशेषज्ञों की मानें पराशर झील पर असंख्य फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। 
   मण्डी से पराशर झील मार्ग पर प्राकृतिक सौन्दर्य की चौतरफा निराली छटा दिखती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे धरती पर स्वर्ग उतर आया हो। निकट ही ब्रिदांवन में एक शानदार संग्रहालय है। इसका मुख्य आकर्षण फोेटो गैलरी है। यह संंग्रहालय हिमाचल दर्शन कराता है।

    पराशर झील की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट भुंटर एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट से पराशर झील की दूरी करीब 90 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कीरतपुर जंक्शन एवं चण्डीगढ़ जंक्शन हैं। पर्यटक सड़क मार्ग से भी पराशर झील की यात्रा कर सकते हैं।
31.754477,77.101641

Tuesday, 3 September 2019

मणिकर्ण : धर्म, आध्यात्म एवं प्रकृति का अद्भुत संगम

   मणिकर्ण को प्राकृतिक सौन्दर्य एवं धर्म-आध्यात्म का अद्भुत एवं विलक्षण संगम कहा जाना चाहिए। मणिकर्ण को हिन्दुओं एवं सिखों का महातीर्थ भी कहा जाता है। 

   इसे धार्मिक पर्यटन कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। भारत के हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला स्थित मणिकर्ण का प्राकृतिक सौन्दर्य भी दर्शनीय एवंं निराला है। समुद्र तल से करीब 1760 मीटर ऊंचाई पर स्थित मणिकर्ण प्राकृतिक सम्पदाओं से अति समृद्ध है। 

   हॉट वाटर स्प्रिंग की बहुलता वाला मणिकर्ण जलीय विशिष्टताओं के कारण वैश्विक ख्याति रखता है। मणिकर्ण में जल प्रवाह को खौलते हुयेे देखना अति रोमांचक प्रतीत होता है।
   सर्पीले अर्थात घुमावदार रास्ते वाला मणिकर्ण का विशिष्ट आकर्षण विदेशी पर्यटकों को खास तौर से आकर्षित करता है। विशेषज्ञों की मानें तो मणिकर्ण के वाटर स्प्रिंग का विशेष महत्व है। 

   इस जल में स्नान करने से चर्म रोग एवं गठिया रोग का निवारण हो जाता है। लिहाजा इस जलाशय में स्नान करना बेहद स्वास्थ्यवर्धक होता है। विशेषज्ञों की मानें तो गंधकयुक्त इस जल से असंख्य बीमारियों का स्वत: निदान हो जाता है। खौलते जल का यह वाटर स्प्रिंग बीमारियों के लिए किसी आैषधि से कम नहीं है। मणिकर्ण का शाब्दिक अर्थ कान की बाली होता है। 

   कुल्लू के ऊत्तर पश्चिम दिशा में स्थित मणिकर्ण वस्तुत: एक शानदार एवं दुर्लभ घाटी है। पार्वती घाटी में व्यास नदी एवं पार्वती नदी के मध्य रचा बसा मणिकर्ण एक खास सम्मोहन रखता है। 
   मणिकर्ण में गुरुद्वारा एवं मंदिरों की एक शानदार श्रंृखला विद्यमान है। पार्वती नदी का प्रवाह वेग पर्यटकों को खास तौर से रोमांचित कर देता है। जल के प्रवाह से उत्पन्न स्वर लहरियां एक विशेष सम्मोहन पैदा करती हैं।

   पार्वती नदी का जल बर्फ की भांति ठंड़ा होता है। इसी नदी के दाहिने किनारे पर गर्म उबलते जल का रुाोत दिखता है। यह वाटर स्प्रिंग एक आश्चर्य है। इस वाटर स्प्रिंग ने वैज्ञानिकों को भी चकित कर रखा है। वैज्ञानिकों की मानें तो इस जल में रेडियम भी है। सर्दियों में मणिकर्ण का मौसम बेहद रोमांचक होता है। 

   खास तौर से चौतरफा बर्फ दिखती है। इस शीतलहरी में भी गुरुद्वारा परिसर के इस वाटर स्प्रिंग में स्नान किया जा सकता है। मणिकर्ण तिब्बती कला एवं संस्कृति का भी अद्भुत एवं विलक्षण दर्शन कराता है।
  पर्यटक गुरुद्वारा में लंगर लेकर बाजार में तिब्बती लोक संस्कृति का दर्शनीय आनन्द ले सकते हैं। खास यह कि मणिकर्ण पर तिब्बती बस्तियों की अपनी एक विशिष्ट दर्शनीयता है।

   गुरुद्वारा हो या मंदिर या फिर तिब्बती बस्तियां सभी की अपनी एक अलग संस्कृति एवं सभ्यता दिखती है। मणिकर्ण मेहमाननवाजी का भी खास आनन्द प्रदान करता है।
   वाटर स्प्रिंग में पर्यटक एवं श्रद्धालु पोटली में चावल बांध कर पकाते हैंं। इन चावल का स्वाद भी काफी कुछ विशिष्ट होता है। इस पानी की चाय का स्वाद भी निराला होता है। इस पानी की चाय पर्यटक अति स्वाद से पीतेे हैं। 

   वस्तुत: देखें तो वाटर स्प्रिंग दुनिया का खुला किचन है। विशेषज्ञों की मानें तो इस वाटर स्प्रिंग का जल हर मौसम में एक समान 94 डिग्री सेल्सियस रहता है। गुरुद्वारा के किला नुमा भवन में पर्यटक आश्रय भी ले सकते हैं। 
   मणिकर्ण गुरुद्वारा: मणिकर्ण गुरुद्वारा सिख समुदाय का विशेष धार्मिक स्थल है। इस गुरुद्वारा की संरचना गुरु नानकदेव जी की यात्रा की स्मृति में की गयी थी। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास के इस केन्द्र में बड़ी तादाद में श्रद्धालु आते हैं। 
  पार्वती घाटी: पार्वती घाटी वस्तुत: एक शानदार पर्यटन है। पार्वती घाटी में भगवान राम, श्री कृष्ण, भगवान विष्णु, भगवान शिव सहित अन्य देवी देवताओं के असंख्य मंदिर इस घाटी की शान एवं शोभा हैं।

  मान्यता है कि भगवान शिव पत्नी पार्वती के साथ इस इलाके में जल विहार कर रहे थे, उसी दौरान पार्वती जी की कान की बाली जल में गिर गयी थी। जिससे इस घाटी को पार्वती घाटी के नाम से जाना पहचाना जाने लगा। साथ ही इस जल विहार के दौरान पार्वती जी की कान की बाली खो गयी थी। लिहाजा इसे मणिकर्ण कहा जाने लगा।
   मान्यता यह भी महाप्रलय के बाद मनु ने मणिकर्ण में मानव रचना की थी। मणिकर्ण में एक भव्य दिव्य रघुनाथ मंदिर भी है। इस मंदिर की संरचना कुल्लू के राजा ने कर भगवान श्री राम की प्रतिमा स्थापित की थी। शिव जी का प्राचीन मंदिर भी मणिकर्ण का एक मुख्य आकर्षण है। 
   पर्वतारोहियों का स्वर्ग: मणिकर्ण को पर्वतारोहियों का स्वर्ग भी कहा जाता है। चौतरफा प्रकृति का निराला सौन्दर्य पर्यटकों को प्रफुल्लित कर देता है। मणिकर्ण से करीब आधा किलोमीटर दूर ब्रह्म गंगा भी हैं।
   पार्वती नदी एवं ब्रह्म गंगा का संगम स्थल भी मणिकर्ण का मुख्य आकर्षण है। मणिकर्ण से करीब 115 किलोमीटर दूर एक बेहद रोमांचक स्थल मानतलाई है। खास यह कि मणिकर्ण के चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्छादित परिदृश्य की एक लम्बी श्रंृखला विद्यमान है। समूची पार्वती घाटी पर्वतारोहियों के लिए स्वर्ग है। मणिकर्ण की सुन्दर चट्टानें पर्यटकोें को मुग्ध कर लेती हैं।
   मणिकर्ण की यात्रा के सभी आवश्यक संंसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट भुंटर एयरपोर्ट कुल्लू है। भुंटर एयरपोर्ट से मणिकर्ण की दूरी करीब 45 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट रेलवे जंक्शन है। पठानकोट जंक्शन से मणिकर्ण की दूरी करीब 285 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी मणिकर्ण की यात्रा कर सकते हैं।
31.912800,77.174301

Monday, 2 September 2019

धर्म नगरी मथुरा: मंदिरों का शहर

   मथुरा को भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का गौरवशाली केन्द्र कहा जाना चाहिए। हालांकि मथुरा की प्रसिद्धि धार्मिक पर्यटन की है। 

   मथुरा वस्तुत: भगवान श्री कृष्ण की जन्म एवं लीला स्थली के तौर पर प्रतिष्ठित है। भारत के उत्तर प्रदेश के धार्मिक शहर मथुरा में चौतरफा मंदिरों की एक शानदार श्रंृखला विद्यमान है।

   धर्म, दर्शन, कला-संस्कृति एवं साहित्य से मथुरा अति समृद्ध है। महाकवि सूरदास, संगीत के आचार्य स्वामी हरिदास, स्वामी दयानन्द के गुरु स्वामी विरजानन्द, कवि रसखान आदि महान आत्माओं का इस धर्म नगरी मथुरा से आत्मिक लगाव रहा। 

   धर्म एवं आध्यात्म के क्षेत्र में मथुरा को मुख्यत: भगवान श्री कृष्ण की जन्म स्थली के तौर पर माना जाता है। भगवान श्री कृष्ण जन्म स्थली मथुरा का मुख्य धार्मिक स्थान है।
  श्री कृष्ण जन्म स्थली पर भव्य दिव्य मंदिर विद्यमान है। परिसर में ही एक अन्य मंदिर में भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं की स्वचलित झांकियों की एक लम्बी श्रंृखला विद्यमान है। 

   परिसर के ही एक अन्य मंदिर में भगवान श्री कृष्ण विशाल स्वरूप में विराजमान हैं। परिसर में ही पर्यटकों एवं श्रृद्धालुओं को संस्कृति दर्शन भी होते हैंं। भगवान श्री कृष्ण जन्म भूमि मंदिर की भव्यता-दिव्यता अति दर्शनीय है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर मंदिर चौतरफा इन्द्रधनुषी रोशनी से जगमगा उठता है। खास तौर से मंदिर की प्राचीनता भी दर्शित होती है।

   मथुरा शहर के मध्य स्थित श्री कृष्ण जन्म भूमि मंदिर में सौन्दर्य की एक अनोखी आभा दर्शित है। देखें तो कंस के कारागार ने एक दिव्य भव्य मंदिर का स्वरूप ग्रहण कर लिया है।
  इसका सौन्दर्य पर्यटको को आकर्षित करता है। मथुरा का एक अन्य आकर्षण द्वारकाधीश मंदिर है। द्वारकाधीश मंदिर यमुना नदी के तट पर स्थित है। द्वारकाधीश मंदिर का मुख्य आकर्षण आरती होती है। 

   मंदिर के गर्भगृह में मुरली मनोहर की सुन्दर प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित है। मंदिर से तट पर आते ही यमुना के दिव्य दर्शन होते हैं। यमुना नदी की भी नित्य आरती होती है। यह आरती भी अति दर्शनीय होती है। पर्यटक दर्शन पूजन के बाद यमुना नदी में नौका विहार का आनन्द ले सकते हैं। 

   नौका विहार करते हुये पर्यटक मथुरा के यमुना घाट सहित मथुरा का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। नौका विहार के दौरान पर्यटक कंस का किला भी देख सकते हैं। मथुरा एवं निकट ही वृंदावन में दिव्य-भव्य मंंदिरों की एक शानदार दर्शनीय श्रंृखला विद्यमान है। 

   मंदिरों की इस शानदार श्रंृखला में गोेविन्द जी मंदिर, किशोरी रमण मंदिर, वासुदेव घाट, गोवर्धन नाथ जी मंदिर, मदन मोहन मंदिर, राधेश्याम मंदिर एवं गणेश मंदिर, बिरला मंदिर-गीता मंदिर, गायत्री तपो भूमि आदि इत्यादि हैं। खास यह है कि मथुरा के चारो दिशाओं में चार शिव मंदिर हैं।

  पूर्व दिशा में पिपलेेश्वर महादेव, दक्षिण दिशा में रंगेश्वर महादेव, उत्तर दिशा में गोकर्णेश्वर महादेव एवं पश्चिम दिशा में भूतेश्वर महादेव हैं। चारो दिशाओं में शिव मंदिर होने से भगवान शिव को मथुरा का कोतवाल कहा जाता है। 
  मथुरा में कंकाली टीला भी एक आकर्षण है। इस टीला पर कंकाली देवी का मंदिर है। मान्यता है कि देवकी की कन्या समझ कर कंस ने जिसे मारना चाहा था, वह कन्या हाथ से छूट कर आकाश में चली गयी थी। यह कंकाली मंदिर उस कन्या को समर्पित है। 
  मथुरा का संगीत भी बेहद लोकप्रिय है। इसे बृज संगीत की ख्याति हासिल है। बृज का मुख्य संगीत वाद्य यंत्र बांसुरी है। भगवान श्री कृष्ण का बांसुरी वादन मुग्ध कर लेता था।

   इसी कारण भगवान श्री कृष्ण को मुरलीधर एवं वंशीधर कहा गया है। बृज के लोक संगीत में गायन की अनेक शैलियां प्रचलित हैं। इनमें रसिया बृज की प्राचीन गायन शैली है। पर्यटक मथुरा में धर्म, आध्यात्म के साथ ही संगीत का भी आनन्द ले सकते हैं।

   धर्म नगरी मथुरा की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट खेरिया एयरपोर्ट आगरा है। खेरिया एयरपोर्ट आगरा से मथुरा की दूरी करीब 62 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी धर्म नगरी मथुरा की यात्रा कर सकते हैं।
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