Sunday, 30 December 2018

तिरुपति बालाजी: हिन्दुओं का श्रेष्ठ तीर्थ

   तिरुपति बालाजी को हिन्दुओं के दिलों पर राज करने वाला तीर्थ कहा जाना चाहिए। जी हां, दक्षिण भारत के राज्य आंध्र प्रदेश में स्थित तिरुपति बालाजी मंदिर हिन्दुओं की आस्था एवं विश्वास का केन्द्र है। इसे तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर भी कहा जाता है। 

   भगवान वेंकटेश्वर को समर्पित यह मंदिर भारत सहित दुनिया में विशेष ख्याति रखता है। दक्षिण भारत का यह प्रसिद्ध मंदिर आदि अनादि काल से श्रद्धा एवं आस्था का केन्द्र रहा है।
   देश के राजवंश शासक तिरुपति बालाजी के दर्शन को श्रद्धानवत हुए। इस भव्य-दिव्य मंदिर कई पर्व-त्योहार आयोजित होते हैं। 

  ब्रह्मोत्सवम खास एवं प्रसिद्ध उत्सव है। इसे सलाकतला ब्राह्मोत्सवम भी कहा जाता है। आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिला स्थित तिरुपति बालाजी हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है।
   समुद्र तल से करीब 3200 फुट ऊंचाई पर स्थित तिरुपति बालाजी मंदिर दर्शनीय एवं आकर्षक है। वास्तुकला एवं शिल्पकला का शानदार एवं अद्भुत उदाहरण तिरुपति बालाजी मंदिर देश का प्रमुख धार्मिक केन्द्र है।

   विशेषज्ञों की मानें तो इस दिव्य-भव्य मंदिर के निर्माण में चोल, होयसल एवं विजय नगर के राजवंश का विशेष आर्थिक सहयोग रहा। भगवान वेंकटेश्वर को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। 
  मान्यता है कि तिरुपति बालाजी मंदिर में भगवान के दर्शन के बाद इंसान जीवन-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।

   विशेषज्ञों की मानें तो प्राचीन साहित्य में कहा गया है कि कलियुग में भगवान वेंकटेश्वर का आशीर्वाद ही मुक्ति दिलाएगा। तिरुपति बालाजी मंदिर देश का सबसे आर्थिक सम्पन्न मंदिर है। श्रद्धालु यहां सोना एवं अन्य आभूूषण भेंट करते हैं।

  तिरुपति बालाजी मंदिर के गर्भगृह में भगवान वेंकटेश्वर की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में अनेक द्वार, मंडपम, छोटे मंदिर हैं। परिसर के अन्य दर्शनीय स्थलों में खास तौर से पड़ी कवली महाद्वार संपंग प्रदक्षिणम, कृष्ण मंडपम, रंग मंडपम, तिरुमला राय मंडपम, आईना महल, ध्वज स्तंभ मंडपम, नदिमी पड़ी कविली, विमान दक्षिणम, श्री वरदराज स्वामी श्राइन पोटु आदि हैं। 

   कहावत है कि इस दिव्य-भव्य मंदिर की उत्पत्ति वैष्णव सम्प्रदाय से हुई है। यह सम्प्रदाय समानता एवं प्रेम के सिद्धांत को मानता है।
    तिरुमला पर्वतमाला: तिरुमला पर्वतमाला देवस्थानम के लिए एक विशेष मार्ग बनाया गया है। इस मार्ग से जाने वाले श्रद्धालुओं की इच्छाओं की पूर्ति सुनिश्चित होती है। अलिपिरी से भी एक अन्य मार्ग है।

   श्री पद्मावती समोवर मंदिर: श्री पद्मावती समोवर मंदिर तिरुपति से करीब 5 किलोमीटर दूर है। इसे तिरुचनूर भी कहते हैं।
  कहावत है कि पद्मावती मंदिर के दर्शन बिना तिरुपति बालाजी मंदिर की यात्रा अधूरी रहती है। पद्मावती स्वयं लक्ष्मी जी का अवतार थीं। 
   श्री गोविन्द राज स्वामी मंदिर: श्री गोविन्द राज स्वामी मंदिर वस्तुत: भगवान बालाजी के बड़े भाई माने जाते हैं। यह मंदिर तिरुपति का मुख्य आकर्षण है।
   इस मंदिर के उत्सव भी बालाजी के उत्सव के भांति होते हैं। इस मंदिर के प्रांगण में संग्रहालय सहित कई मंदिर हैं। इनमें खास तौर से पार्थसारथी, गोडादेवी आंदल, पुंडरिकावल्ली आदि हैं। 
   श्री कोदंडराम स्वामी मंदिर: श्री कोदंडराम स्वामी मंदिर तिरुपति मंदिर के मध्य में स्थित है। यहां राम, लक्ष्मण एवं सीता की पूजा होती है। मंदिर के सामने अंजनेय स्वामी का मंदिर है। यहां रामनवमी उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। 
   श्री कपिलेश्वर स्वामी मंदिर: श्री कपिलेश्वर स्वामी मंदिर वस्तुत: शिव मंदिर है। यह मंदिर तिरुपति से तीन किलोमीटर दूर है।
   इसी प्रकार तिरुपति बालाजी एवं आसपास मंदिरों एवं तीर्थ स्थलों की एक लम्बी एवं सुन्दर श्रंखला है। इनमें खास तौर से श्री कल्याणम वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर, श्री देवी पद्मावती मंदिर, श्री आण्डाल मंदिर, श्री रंगानायकुलम मंदिर, श्री पराशरेश्वर स्वामी मंदिर, श्री वीरभद्र स्वामी मंदिर, श्री शक्ति विनायक स्वामी मंदिर, श्री अगस्थिश्वर स्वामी मंदिर, अवनक्षम्मा मंदिर आदि हैं। 

  टीटीडी गार्डेन: टीटीडी गार्डेन करीब 460 एकड़ में फैला एक खूबसूरत उद्यान है। इस उद्यान के फूलों से ही तिरुपति बालाजी मंदिर में भगवान का श्रंगार एवं मंदिर की सजावट की जाती है।
   केशदान: केशदान तिरुपति बालाजी मंदिर की एक श्रद्धा परम्परा है। मान्यता है कि केशदान या केश भेंट कर श्रद्धालु अपने दंभ व घमंड को ईश्वर को समर्पित कर देते हैं। 

   संस्कार का यह केन्द्रीयकरण है। मंदिर के निकट ही कल्याण कट्टा नामक स्थान है। यहां सामूहिक मुंडन संस्कार किया जाता है। केशदान के बाद श्रद्धालु पुष्करिणी में स्नान करते हैं।
   इसके बाद ही श्रद्धालु दर्शन के लिए जाते हैं। प्रसाद में भगवान को लड्डू का भोग लगाया जाता है। दर्शन के उपरांत श्रद्धालुओं को प्रसाद के तौर पर चरणामृत, मीठी पोंगल, दही-चावल दिया जाता है।
   तिरुपति बालाजी मंदिर की यात्रा करने के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट तिरुपति एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन तिरुपति जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु तिरुपति बालाजी मंदिर की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
13.628730,79.419070

Friday, 21 December 2018

पुष्कर मंदिर: ब्रह्मा जी के दिव्य दर्शन

   पुष्कर मंदिर की विशिष्टता का कोई जोड़ नहीं। जी हां, पुुष्कर मंदिर श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र होेने के साथ ही भव्यता-दिव्यता को भी रेखांकित करता है। 

   भारत के राजस्थान प्रांत के अजमेर स्थित पुष्कर मंदिर वस्तुत: देवराज ब्रह्मा जी को समर्पित है। पुष्कर मंदिर को ब्रह्मा मंदिर भी कहा जाता है। अजमेर से उत्तर-पश्चिम में करीब 11 किलोमीटर दूर स्थित पुष्कर मंदिर नाग पहाड़ के मध्य रचा-बसा है। वस्तुत: यह स्थान ब्राह्मा जी की यज्ञ स्थली है। 

  साथ ही ऋषियों मुनियों की तपस्या स्थल के तौर पर भी इसे जाना पहचाना जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो विश्व का एक मात्र ब्रह्मा जी का मंदिर यहां स्थित है। खास यह कि ब्रह्मा जी भी श्राप से नहीं बच सके थे। ब्रह्मा जी को श्राप उनकी पत्नी सावित्री ने दिया था। 

   श्राप देने का कारण ब्रह्मा जी ने यज्ञ में पत्नी को आमंत्रित नहीं किया था। जिससे कुपित होकर पत्नी सावित्री ने ब्रह्मा जी को श्रापित किया था कि ब्रह्मा जी की पूजा अर्चना केवल इसी स्थान पर ही होगी। लिहाजा विशेषज्ञों की दृष्टि में पुष्कर मंदिर ही विश्व का एकमात्र ब्रह्मा जी का मंदिर है।

 चर्तुमुख ब्रह्मा जी की दाहिनी ओर सावित्री जी का मंदिर है। बार्इं ओर गायत्री जी का मंदिर है। यहां नारद जी का भी मंदिर है। कुबेर एवं नारद जी की हाथी पर बैठे हुए मूर्तियां हैं।
  विशेषज्ञों की मानें तो इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण ग्वालियर के महाजन गोकुल ने अजमेर में ब्रह्मा जी के इस मंदिर का निर्माण कराया था। 

  पुष्कर मंदिर भारत का विख्यात तीर्थ स्थल है। यहां वर्ष में कार्तिक पूर्णिमा पर भव्य दिव्य पुष्कर मेला भी लगता है।
  यह इलाका अरावली की घाटी के तौर पर भी जाना पहचाना जाता है। पुष्कर मेला में कला पूर्ण कुटीर उद्योग की झलक देखने को मिलती है। 

  खास तौर से वस्त्र उद्योग, काष्ठ कला, चित्रकला, पशुओं का व्यापार आदि विशेषता होती है। इस मेला का धार्मिक एवं व्यापारिक महत्व होता है।
   समुद्र तल से करीब 2389 फुट ऊंचाई पर स्थित पुष्कर मंदिर की अनेक विशिष्टताएं हैं। खास यह कि पुष्कर मंदिर ब्रह्मा जी को समर्पित है। 

  मंदिर के गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा ब्रह्मा जी की स्थापित है। मंदिर में उनकी पत्नी सावित्री जी की भी प्रतिमा है। साथ ही बदरी नारायण, वाराह, शिव आत्मेश्वर मंदिर भी हैं। 
  पुष्कर का विशेष आकर्षण पुष्कर झील है। पुष्कर झील के चौतरफा पक्के स्नान के घाट हैं। जिससे श्रद्धालुओं को स्नान आदि में कोई असुविधा नहीं होती है। 
   खास इस क्षेत्र में राजपूताना संस्कृति झलकती है। विशेषज्ञों की मानें तो पुष्कर का उल्लेेख रामायण में भी मिलता है। 
  महर्षि विश्वामित्र ने भी पुष्कर में साधना की थी। किवदंती है कि अप्सरा मेनका इसी झील-सरोवर में स्नान करने आयी थी। 

  किवदंती है कि पुष्कर में बौद्ध भी निवास करते थे। कारण बौद्ध दान का उल्लेख भी मिलता है। खास यह कि पुष्कर मंदिर एवं पुष्कर मेला भारत के साथ साथ विदेशों में विशेष ख्याति रखता है। पुष्कर मेला ने विशिष्टताओं से वैश्विक ख्याति अर्जित की है। 

   इस मेला में विदेशी भी बड़ी संख्या में आते हैं। मेला की व्यवस्था राजस्थान का कला, संस्कृति एवं पर्यटन विभाग करता है।
   इस मेला में विशेष नस्ल के पशुओं को पुरस्कृत भी किया जाता है। खास यह कि पुष्कर मेला में विभिन्न संस्कृतियों का संगमन भी देखने को मिलता है।

   खास यह कि पुष्कर मेला ने ऊंटों को विशेष पहचान दी है। विविधिताओं के कारण इसे पुष्करराज भी कहा जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो पुष्कर को तीर्थों का मुख माना जाता है।
  जिस प्रकार प्रयाग को तीर्थराज कहा जाता है, उसी तरह पुष्कर को पुष्करराज कहा जाता है। पुष्कर की गणना पंचतीर्थ एवं पंच सरोवर में होती है। विशेषज्ञों की मानें तो सरोवर की भी विविधिता है।

  खास यह कि पुष्कर मंदिर, पुष्कर झील एवं पुष्कर मेला की अपनी एक अलग विशिष्टता, पवित्रता एवं सौन्दर्य है। यह इन्द्रधनुषी छवि पर्यटकों के दिलों दिमाग में हमेशा रहती है।
   पुष्कर मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट सांगानेर है। सांगानेर एयरपोर्ट जयपुर से पुष्कर की दूरी करीब 146 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन पुष्कर में है। पुष्कर रेलवे स्टेशन से पुष्कर मंदिर की दूरी करीब 11 किलोमीटर है। पर्यटक या श्रद्धालु पुष्कर मंदिर की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
26.492001,74.557297

Wednesday, 12 December 2018

हाटकोटी मंदिर: शिव एवं शक्ति तीर्थ

  हाटकोटी मंदिर को वास्तुकला एवं शिल्पकला का सुन्दर आयाम कहा जाना चाहिए। हिमाचल प्रदेश में शिमला के निकट जुबबल में स्थित हाटकोटी मंदिर वस्तुत: अति प्राचीन मंदिर है। 

   शिमला-रोहडू मार्ग पर पब्बर नदी के किनारे स्थित यह मंदिर धार्मिक स्थान होने के साथ ही पौराणिक एवं ऐतिहासिक भी है। खेत-खलिहानों के मध्य स्थित हाटकोटी मंदिर अपनी दिव्यता-भव्यता के लिए खास तौर से जाना पहचाना जाता है।

  समुद्र तल से करीब 1370 मीटर ऊंचाई पर स्थित हाटकोटी माता मंदिर वस्तुत: महिषासुर मर्दिनी का पुरातन मंदिर है। मंदिर में देवी दर्शन के साथ ही वास्तुकला एवं शिल्पकला के दिव्य-भव्य साक्षात दर्शन होते हैं। 

   विशेषज्ञों की मानें तो 10 वीं शताब्दी का यह मंदिर काफी कुछ विशिष्ट है। मंदिर में महिषासुर मर्दिनी को 1.20 मीटर ऊंची कांस्य प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित है। प्रतिमा कीमती अष्ट धातुओं से निर्मित है।

  प्रतिमा हथियारों से सुसज्जित है। शेर पर सवार मां भगवती के दर्शन अद्भुत प्रतीत होते हैं। राक्षस महिषासुर का मर्दन करती देवी के दर्शन हैं। इसके साथ ही दिव्य शिव मंदिर भी है। मंदिर में प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। 

   खास यह कि द्वार को कलात्मक पत्थरों से सुसज्जित किया गया है। लकड़ी की छत बेहद आकर्षक है। इसमें देवी-देवताओं की अनुकृतियां हैं। मंदिर के गर्भगृह में लक्ष्मी-विष्णु, दुर्गा, गणेश एवं अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाएं प्राण प्रतिष्ठित हैं। 

   मंदिर को माता हतेश्वरी के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। मान्यता है कि इस स्थान पर कभी देवताओं एवं राक्षसों का युद्ध हुआ था। विशेषज्ञों की मानें तो इस भव्य दिव्य मंदिर का निर्माण पाण्डव बंधुओं ने किया था। 

  शिमला से करीब 84 किलोमीटर दूर माता हाटकोटी मंदिर हिन्दुओं का एक तीर्थ है। कुफरी से इस स्थान की दूरी करीब 84 किलोमीटर है। नदी के तट पर मंदिरों की एक लम्बी श्रंखला है।

  वस्तुत: इस स्थान अर्थात गांव को हाटकोटी के नाम से जाना पहचाना जाता है। किवदंती यह भी है कि हाटकोटी मंदिर 6 शताब्दी से लेकर 9 वीं शताब्दी के मध्य बना था। 
  मंदिर में उस युगीन वास्तुकला एवं शिल्पकला के साक्षात दर्शन होते हैं। किवदंती यह भी है कि इस मंदिर का निर्माण आदि शंकराचार्य ने कराया था।

   मंदिर की वास्तुकला एवं शिल्पकला मूल रूप से शास्त्रीय शिखर या टॉवर शैली में निर्मित हैं। शिखर शैली प्राचीन संरचनाओं का दर्शन कराती है। खास यह कि इसमें नीचे विस्तृत आधार एवं उपर शीर्ष संकीर्ण हैं। 

   मंदिर की दीवारें मूर्तियों एवं नक्काशी से अलंकृत हैं। यह युगीन स्थापत्य कला एवं सौन्दर्य को रेखांकित करता है। दो भव्य पर्वत शिखर के मध्य स्थापित यह मंदिर एवंं नदी का संगम वस्तुत: विशिष्ट तीर्थ स्थान है। 

  खास यह कि अप्रैल में यहां एक भव्य मेला आयोजित किया जाता है। मेले के दौरान श्रद्धालु एवं इलाकाई बाशिंदे माता दुर्गा को चावल एवं अखरोट भेंट करते हैं। चूंकि यह अवधि चावल एवं अखरोट की फसल की होेती है। 
  मान्यता है कि भेंट माता दुर्गा को प्रसाद अर्पित किया जाता है। खास यह कि हाटकोटी माता का मंदिर धार्मिक स्थल है तो वहीं आसपास का इलाका पर्यटन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। मंदिर परिसर में एक कीर्तन घर भी है। विश्रामालय भी है। जिससे दूरस्थ पर्यटकों को असुविधा नहीं होती है।


    विशेषज्ञों की मानें तो यह विलक्षण स्थान है। कारण शिव एवं शक्ति एक ही स्थान पर विराजमान हैं। मंदिर एवं उसके आसपास घूमने या सैर सपाटा का बेहतरीन समय अक्टूबर से मार्च की अवधि होता है।
   हालांकि बर्फबारी का आनन्द लेना हो तो नवम्बर से फरवरी का समय बेहतरीन रहता है।
   हाटकोटी मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। मंदिर शिमला से करीब 84 किलोेमीटर दूर है। निकटतम एयरपोर्ट शिमला है। शिमला एयरपोर्ट जुब्बरहट्टी में स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन शिमला जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी हाटकोटी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
31.106900,77.667500

Friday, 7 December 2018

अमरनाथ गुफा: शिवलिंग के अद्भुत दर्शन

    अमरनाथ धाम को हिन्दुओं का श्रेष्ठतम तीर्थ कहना चाहिए। जी हां, अमरनाथ धाम की यात्रा के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। 

   इसलिए अमरनाथ धाम को हिन्दुओं का श्रेष्ठतम तीर्थ कहना गलत न होगा। अमरनाथ धाम की यात्रा भारत ही नहीं, विदेशों में खासी ख्याति रखता है। अमरनाथ धाम को अमरनाथ गुफा एवं अमरनाथ गुफा मंदिर भी कहते हैं।
   खास यह कि इस पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग निर्मित होता है। इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंग भी कहते हैं।

   अमरनाथ गुफा की परिधि करीब 150 फुट होती है। हिम बूंदों से लगभग 10 फुट लम्बा शिवलिंग निर्मित होता है। विशेषज्ञों की मानें तो चन्द्रमा के घटने-बढ़ने से शिवलिंग का आकार भी घटता-बढ़ता है। यहां गणेेश, पार्वती एवं भैरव के अलग हिमखण्ड हैं।
   अमरनाथ की यह पवित्र गुफा भारत के जम्मू-कश्मीर प्रांत के श्रीनगर शहर से उत्तर-पूर्व दिशा में है। समुद्र तल से करीब 3888 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह अमरनाथ गुफा बेहद बर्फीला इलाका है। 

   शीर्ष ऊंचाई पर होने के कारण अमरनाथ गुफा अधिसंख्य समय बर्फ से आच्छादित रहती है। 
   गर्मियों की अवधि खास तौर से जून से अगस्त की दौरान ही श्रद्धालुओं को गुफा में अमरनाथ के दर्शन हो पाते हैं। अमरनाथ गुफा या अमरनाथ धाम इसी अवधि में तीर्थयात्रियों के लिए खुलती है। 


   अमरनाथ गुफा में शिवलिंग के दर्शन होते हैं। यह शिवलिंग बर्फ से आकार लेता है। इसीलिए श्रद्धालु बाबा बर्फानी भी कहते हैं। मान्यता है कि अमरनाथ गुफा करीब 5000 वर्ष प्राचीन है।
   किवदंती है कि एक पवित्र व्यक्ति ने स्थानीय चरवाहा को कोयले से भरा थैला दिया था। चरवाहा ने घर जाकर देखा कि कोयला स्वत: स्वर्ण में परिवर्तित हो गया था। 

    चरवाहा ने पवित्र व्यक्ति की तलाश की तो इस पवित्र अमरनाथ गुफा के दर्शन हुये थे। अमरनाथ गुफा की लम्बाई करीब 19 मीटर, चौड़ाई करीब 16 मीटर है। ऊंचाई करीब 11 मीटर है। 
  खास यह कि अमरनाथ गुफा भगवान शिव के मुख्य धार्मिक स्थलों में से एक है।

    विशेषज्ञों की मानें तो प्राचीनकाल में अमरनाथ गुफा को अमरेश्वर महादेव कहा जाता था। खास यह कि अमरनाथ गुफा से विदेशी भी प्रभावित हुये बिना न रह सके।
  अंग्रेज लेखक लॉरेंस अपनी पुस्तक 'वैली ऑफ कश्मीर" में लिखते है कि कभी कश्मीरी ब्रााह्मण तीर्थयात्रियों को अमरनाथ गुफा की यात्रा कराते थे।

    विशेषज्ञों की मानें तो इस हिल स्टेशन पर कभी हिन्दुओं एवं बौद्धों के कई प्रसिद्ध मठ थे। विशेषज्ञों की मानें तो ईसा एवं मूसा ने पहलगांव में अपने जीवन के कुछ दिन व्यतीत किये थे। पहलगाम का अर्थ होता है कि गड़रिये का गांव।

   पौराणिक मान्यता है कि एक बार कश्मीर घाटी जलमग्न हो गयी थी। घाटी ने एक बड़ी झील का स्वरूप धारण कर लिया था।
   प्राणियों की रक्षा के लिए ऋषि कश्यप ने इस जल को अनेक नदियों एवं अन्य सोतों से बहा दिया था। इसी दौरान ऋषि भृगु पवित्र हिमालय के दर्शन के लिए निकले थे। 

   ऋषि भृगु ने हिमालय दर्शन के दौरान अमरनाथ गुफा के दर्शन किये थे। यहां ऋषि को बर्फानी शिवलिंग के दर्शन हुए थे।
   विशेषज्ञों की मानें तो तभी से यह स्थान शिव आराधना का मुख्य स्थल बन गया। हालात यह कि शिव के अद्भुत दर्शन के लिए श्रद्धालु अनेक संकट एवं कठिनाई को पार कर अमरनाथ गुफा आते हैं। 

   श्रीनगर से अमरनाथ गुफा की दूरी करीब 141 किलोमीटर है। विशेषज्ञों की मानें तो अमरनाथ गुफा का कोई प्राचीन इतिहास नहीं है। गुफा शायद हिमयुग को रेखांकित करती है।
   विशेषज्ञों की मानें तो अमरनाथ गुफा में ही केवल बर्फ का शिवलिंग है। बर्फ का शिवलिंग कश्मीर को छोड़कर विश्व में कहीं भी नहीं है।

  विशेषज्ञों की मानें तो पहले साधु-संत या घर परिवार छोड़ कर तीर्थयात्रा पर निकलने वाले ही अमरनाथ गुफा की यात्रा पर जाते थे। कारण यह यात्रा अति दुर्गम होती है। 
  बदलते हालात में अब बड़ी तादाद में श्रद्धालु दर्शन के लिए जाते हैं। हालांकि अमरनाथ गुफा की यात्रा बेहद कठिन है। फिर भी ऐसा नहीं कि दर्शन के लिए श्रद्धालु न जा सकें। 


   अमरनाथ गुफा की यात्रा के लिए श्रीनगर तक संसाधन उपलब्ध हैं। जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर तक पर्यटक या श्रद्धालु हवाई जहाज या रेल की यात्रा कर पहंुच सकते हैं। निकटतम एयरपोर्ट श्रीनगर है।
   श्रीनगर से पहलगाम की यात्रा बस या सड़क माध्यम से की जा सकती है। पहलगाम का निकटतम रेलवे स्टेशन उधमपुर जंक्शन है। जम्मू रेलवे स्टेशन से भी पर्यटक यहां पहुंच सकते हैं।  
   पहलगाम से अमरनाथ गुफा की दूरी करीब 48 किलोमीटर है। बालटाल से गुफा की दूरी करीब 14 किलोमीटर है। पहलगाम से यात्रा करने पर कई पड़ाव पर विश्राम लेना होता है। पहलगाम से पहला पड़ाव 16 किलोमीटर दूर चंदनवाड़ी में होता है। दूसरा पड़ाव करीब 3 किलोमीटर दूूर पिस्सू टॉप है। तीसरा पड़ाव करीब 9 किलोमीटर दूर शेषनाग है। आखिरी पड़ाव करीब 14 किलोमीटर दूर पंचतरणी है। पंचतरणी से पवित्र अमरनाथ गुफा की दूरी करीब 6 किलोमीटर है।
34.038891,75.322863

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...