बृहदेश्वर मंदिर: सुन्दर स्थापत्य कला
बृहदेश्वर मंदिर को वास्तुशिल्प की श्रेष्ठतम धार्मिक कृति कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, तमिलनाडु के तंजौर स्थित बृहदेश्वर मंदिर स्थापत्य कला, वास्तुशिल्प, भव्यता-दिव्यता एवं केन्द्रीय गुम्बद के लिए खास तौर से प्रसिद्ध है।
विशेषज्ञों की मानें तो तंजौर का यह शिव मंदिर 11वीं शताब्दी में बना था। तमिल भाषा में इस शिव मंदिर को बृहदीश्वर कहते हैं। बृहदेश्वर मंदिर पूर्ण रूप से ग्रेनाइट पत्थरों से संरचित है। लिहाजा इसकी भव्यता-दिव्यता देखते ही बनती है।
विश्व में अपनी तरह का यह इकलौता मंदिर है। इसकी खूबसूरती से यूनेस्को भी अचम्भित रह गया। लिहाजा यूनेस्को ने बृहदेश्वर मंदिर को विश्व धरोहर घोषित किया है। विशेषज्ञों की मानें तो बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण चोल शासक राजराज चोल ने कराया था।
निर्माणकाल में इसे राजराजेश्वर मंदिर का नाम दिया गया था। खास यह रहा कि बृहदेश्वर मंदिर विश्व की विशालतम संरचनाओं में गिना जाता था। करीब 13 मंजिला इस धार्मिक स्थल की ऊंचाई करीब 66 मीटर है। मंदिर मुख्य तौर भगवान शिव को समर्पित है।
वस्तुत: देखें तो बृहदेश्वर मंदिर वास्तुकला, पाषाण एवं ताम्र शिल्पांकन, प्रतिमा विज्ञान, चित्रकला, गीत-संगीत एवं नृत्य, आभूषण एवं उत्कीर्णकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
खास तौर से मंदिर में संस्कृत एवं तमिल में लेख भी उत्कीर्ण हैं। निर्माण कला की विशिष्टता भी यहां दिखती है। गुम्बद की परछाई कहीं भी धरती पर नहीं दिखती है। गुम्बद का आकार अष्टभुजा है।
शिखर पर स्वर्ण कलश स्थापित है। स्वर्ण कलश की भी अपनी एक अलग विशेषता है। विशेषज्ञों की मानें तो कलश करीब 80 टन का है। यथा नाम तथा स्थिति भी देखने को मिलती है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग की दिव्यता-भव्यता एवं विशालता देख कर प्रतीत होता है कि बृहदेश्वर नाम सर्वथा उपयुक्त है।
गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग की विहंगमता देखते ही बनती है। शिवलिंग की ऊंचाई करीब 8.7 मीटर ऊंचा है। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, भिक्षाटन, वीरभद्र कालांतर, नटेश, अर्धनारीश्वर एवं अलिंगाना को शिव स्वरूप में दर्शित किया गया है।
एक विशाल चबूतरा पर नन्दी विराजमान हैं। नन्दी की विशालतम प्रतिमा भी आकर्षण का केन्द्र है। नन्दी की प्रतिमा 6 मीटर लम्बी, 2.6 मीटर चौड़ी एवं 3.7 मीटर ऊंची है।
मंदिर में प्रवेश करते ही एक विशाल गोपुरम है। इसके आंतरिक भाग में चौकोर मण्डप है। मंदिर के गर्भगृह से लेकर परिसर तक असंख्य भित्ति चित्र हैं। यह भित्ति चित्र बेहद दर्शनीय हैं। इन भित्ति चित्रों में भगवान शिव का तांडव दिखता है। भित्ति चित्रों में भगवान शिव के विविध स्वरूप दिखते हैं।
बृहदेश्वर मंदिर वस्तुत: चोल कला का एक शानदार उदाहरण है। खास यह कि निर्माण भी पांच वर्ष की अवधि में हो गया था। खास यह कि यहां बौद्ध प्रतिमाओं का भी निर्माण है। विशेषज्ञों की मानें तो बृहदेश्वर मंदिर चोल वंश शासकों की वास्तुकला की सर्वोत्तम धार्मिक भेंट है। विशिष्ट वास्तुकला के लिए बृहदेश्वर मंदिर देश दुनिया में विशेष ख्याति रखता है।
इसके निर्माण में 130000 टन ग्रेनाइट का उपयोग किया गया था। गौरतलब है कि इस इलाके में कहीं भी ग्रेनाइट की उपलब्धता नहीं है। अब आश्चर्य यह कि आखिर ग्रेनाइट इतनी बड़ी तादाद में आया कहां से था। बताते हैं कि इस दुर्ग की ऊंचाई विश्व में सबसे अधिक है।
ग्रेनाइट की उपलब्धता के बाद नक्काशी का कार्य बेहद कठिन होता है। इन स्थितियों के बावजूद मंदिर की नक्काशी भी बेहद दर्शनीय है। बृहदेश्वर मंदिर का कृत्तिका उत्सव खास तौर से प्रसिद्ध है। इस दौरान राजा राजेश्वर के जीवन पर आधारित नाटक का मंचन किया जाता है।
बृहदेश्वर मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट तंजौर है। रेलवे स्टेशन भी तंजौर में है। पर्यटक या श्रद्धालु बृहदेश्वर मंदिर तंजौर की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
9.918460,78.118170
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