Wednesday, 29 August 2018

मुक्तिधाम : विशिष्ट धार्मिक स्थल

    मुक्तिधाम को प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। दूधिया संगमरमर से चमकता यह धार्मिक एवं दर्शनीय स्थल खूबियों के लिए ख्याति रखता है। 

   महाराष्ट्र के नासिक स्थित मुक्तिधाम में हिन्दुओं के करीब सभी देवी-देवता प्राण प्रतिष्ठित हैं। नासिक रोड स्थित मुक्तिधाम की सुन्दरता अति दर्शनीय है। हालांकि मुक्तिधाम कोई बहुत अधिक पुराना धार्मिक स्थल नहीं है। 
   फिर भी अल्प समय में ही मुक्तिधाम ने शिखर की ख्याति हासिल की है। खास यह कि मुक्तिधाम का वास्तुशिल्प परम्परागत नहीं है। इसका वास्तुशिल्प सुन्दर एवं खास है। जिससे इसकी सुन्दरता अलग ही दिखती है।
 
   मुक्तिधाम में भगवान श्री कृष्ण के विभिन्न स्वरूपों के साथ ही भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी, राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, दुर्गा जी, श्री गणेश जी आदि सहित अनेक देवी देवता प्राण प्रतिष्ठित हैं। खास यह मुक्तिधाम की दीवारों पर श्रीमद् भगवत गीता के 18 अध्याय अंकित हैं। मुक्तिधाम में शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग के प्रतीक प्रतिष्ठापित हैं। 

   आशय यह कि दर्शनार्थी एक ही स्थान पर शिव के सभी द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर सकते हैं। यूं कहें कि मुक्तिधाम शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग की बांकी झांकी है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। खास तौर से दर्शनार्थी चार धाम के भी दर्शन कर सकते हैं। 
   यूं कहें कि मुक्तिधाम हिन्दुओं का धार्मिक काम्पलेक्स है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। हालांकि मुक्तिधाम मुख्यत: भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। मंदिर की दर-ओ-दीवार पर भगवान श्री कृष्ण की लीला एवं महाभारत दृश्यांकित है। इसी परिप्रेक्ष्य में श्रीमद् भगवत गीता के 18 अध्याय अंकित हैं। मुक्तिधाम में कार्तिकेय का भी मंदिर है। 

   मुक्तिधाम मंदिर के निर्माण में खास तौर से मकराना का सफेद दूधिया संगमरमर उपयोग किया गया है। जिससे मंदिर की दिव्यता-भव्यता में चार चांद लग गये। खास यह कि दर्शनार्थी मुक्तिधाम परिसर में आश्रय भी ले सकते हैं। साथ ही किफायती भोजन भी कर सकते हैं। 
   खास तौर से देखें तो नासिक का यह एक विशिष्ट धार्मिक एवं पर्यटन स्थल है। मुक्तिधाम का निर्माण 1971 में जयराम भाई बाइटको ने कराया था। शनै-शनै मुक्तिधाम ने एक तीर्थ का स्थान ले लिया। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का यह केन्द्र मुक्तिधाम आकर्षक पर्यटन स्थल है। देश भर श्रद्धालुओं का आना निरन्तर जारी रहता है। खास तौर से कुंभ की अवधि में यहां की दर्शनीयता आैर भी अधिक बढ़ जाती है।
   मुक्तिधाम की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट पुणे एवं मुम्बई एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन नासिक जंक्शन है। पर्यटक एवं श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी मुक्तिधाम की यात्रा कर सकते हैं।
19.920980,73.675110

Wednesday, 22 August 2018

कामता नाथ : अद्भुत महिमा

   कामता नाथ की महिमा अद्भुत एवं निराली है। दर्शन मात्र से ही भक्तों के कष्टों का निवारण होता है। ऐसी अवधारणा एवं मान्यता है।

  कामता नाथ जी वस्तुत: कामदगिरि पर्वत की तलहटी में विराजमान हैं। खास यह कि कामदगिरि उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के सीमा क्षेत्र में स्थित है। हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थ स्थल के तौर पर कामता नाथ मंदिर की मान्यता है। मान्यता यह भी है कि कामदगिरि त्रिदेव अर्थात ब्राह्मा, विष्णु एवं महेश का स्थान है।

   यहां परम्परा है कि श्रद्धालु कामदगिरि की परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा का प्रतिफल होता है कि परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कामदगिरि को गिरिराज भी कहा जाता है। लिहाजा श्रद्धालुओं का विश्वास है कि गिरिराज श्रद्धालुओं की इच्छाओं-मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, जनक नंदिनी सीता एवं लक्ष्मण के वन प्रवास का क्षेत्र चित्रकूट रहा।

   वनवास अवधि में भगवान श्री राम का प्रवास होने के कारण भी चित्रकूट की महत्ता है। रामनवमी, दीपमालिका एवं अमावस्या को खास उत्सव जैसा माहौल रहता है। चित्रकूट का सबसे महत्वपूर्ण स्थान कामदगिरि की परिक्रमा है। इसके पूर्व श्रद्धालु कामता नाथ जी के दर्शन करते हैं। मंदाकिनी के रामघाट पर स्नान करने के बाद श्रद्धालु कामदगिरि की परिक्रमा प्रारम्भ करते हैं।

   परिक्रमा यात्रा का प्रारम्भ रामघाट से ही होता है। बताते हैं कि रामघाट पर नित्य श्री राम स्नान करते थे। रामघाट पर ही भगवान श्री राम ने अपने पिता दशरथ का पिण्डदान किया था। कामदगिरि की परिक्रमा करीब 5 किलोमीटर लम्बी है। 
  इस पर्वत के तल पर ही देव कामता नाथ जी का मंदिर है। परिक्रमा मार्ग में अनेक देवालय हैं। इनमें खास तौर से राममुहल्ला, मुखारबिन्दु, सखी गोपाल, भरत मिलाप एवं पीली कोठी है। देव स्थल मुखारबिन्दु चित्रकूट की आध्यात्मिक, धार्मिक एवं आस्था का सर्वश्रेष्ठ केन्द्र है।
   मान्यता है कि ब्राह्मा, विष्णु एवं महेश का निवास स्थल है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने श्री राम के रूप में यहां वनवास काटा था। ब्राह्मा जी ने सृष्टि की सरंचना के लिए यहां यज्ञ किया था। यज्ञ से शिवलिंग का प्राक्ट्य हुआ था। यह शिवलिंग धर्मनगरी चित्रकूट के क्षेत्रपाल में विराजमान है। 
   करीब 38.20 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस तपोवन की ऊर्जा श्रद्धालुओं को एक विशेष जीवंतता प्रदान करती है। विंध्य पर्वत श्रंखलाओं से घिरे वन क्षेत्र चित्रकूूट को आश्चर्य की पहाड़ी की संज्ञा से भी अलंकृत किया जाता है। यह धरा ईश्वर की अनुपम देन है। बताते हैं कि इसी धरा पर ऋषि अत्रि एवं सती अनुसुइया ने ध्यान लगाया था। चित्रकूट में ही सती अनुसुइया ने ब्राह्मा, विष्णु एवं महेश को बालक बना दिया था। 
   सती अनुसुइया आश्रम: सती अनुसुइया आश्रम का कामता नाथ जी के मंदिर से करीब 15 किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित है। इसी आश्रम से ही मंदाकिनी का प्राक्ट्य हुआ था। इस आश्रम में ऋषि अत्रि, सती अनुसुइया, दत्तात्रेय एवं दुर्वाषा ऋषि की प्रतिमायें प्रतिष्ठापित हैं।
   जोगनी शिला: जोगनी शिला भगवान श्री राम तपोभूमि में सती अनुसुइया आश्रम में स्थित है। मान्यता है कि जोगनी शिला की पूजा अर्चना से प्रेतबाधाओं से मुक्ति मिलती है।

   स्फटिक शिला: स्फटिक शिला चित्रकूट के दक्षिणी इलाके में घने वन क्षेत्र में स्थित एक विशाल शिला है। इस विशाल शिला पर भगवान श्री राम के पैरों के निशान अंकित हैं। मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित यह शिला जानकी कुण्ड से कुछ दूर पर है।
   बताते हैं कि इस शिला पर बैठ कर श्री राम एवं जानकी चित्रकूट की प्राकृतिक सुन्दरता की छटा निहारा करते थे। इसी स्थान पर फूलों से बने आभूषण से श्री राम ने जानकी जी का श्रंगार किया था। मान्यता है कि माता जानकी इस शिला पर बैठी थी तो इन्द्र पुत्र जयंत ने कौआ के रूप में चोंच मारी थी।
    गुप्त गोदावरी: गुप्त गोदावरी चित्रकूट से 18 किलोमीटर दूर है। गुप्त गोदावरी में मुख्यत: दो गुफाएं हैं। इनमें एक गुफा चौड़ी एवं ऊंचे आकार की है। इसका प्रवेश द्वार अति संकरा है। हालांकि इसमें आसानी से प्रवेश किया जा सकता है। इस गुफा में गोदावरी मां के रूप में विद्यमान हैं। अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी हैं। यहां इन्द्र पुत्र जयंत खटका चोर के रूप में लटका है। 
   दूसरी गुफा संकरी एवं लम्बी है। इसमें जल का प्रवाह होता रहता है। कहावत है कि इस गुफा में श्री राम एवं लक्ष्मण ने दरबार लगाया था। मान्यता है कि माता जानकी ने इस स्थान पर स्नान किया था। इसी स्थान पर गोदावरी का प्राक्ट्य हुआ था। गुफा के अंदर होने के कारण ही इसे गुप्त गोदावरी कहा गया है। बताते हैं कि यहां पाताल तोड़ कर गोदावरी प्रवाहमान हैं।
   कामतानाथ मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट अमौसी लखनऊ है। लखनऊ से चित्रकूट की दूरी करीब 300 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन चित्रकूट धाम कर्वी है। सड़क मार्ग से भी पर्यटक यात्रा कर सकते हैं।
25.213220,80.915140

Sunday, 19 August 2018

कांगड़ा देवी : कल्याणकारी दर्शन

   कांगड़ा देवी का महात्म अद्भुत है। शक्तिपीठ के तौर पर मान्यता रखने वाले इस देव स्थल की ख्याति विश्व में है।

   श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का सैलाब यहां दिखता है। मान्यता है कि कांगड़़ा देवी के दर्शन कल्याणकारी हैं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित इस देव स्थान का ताल्लुक पौराणिक काल से है। कांगड़ा देवी को ब्रजेश्वरी देवी एवं नगर कोट धाम भी कहा जाता है। दुर्गा स्तुति में कांगड़ा देवी का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि नगर कोट में तुम्हीं विराजत, तिहूं लोक में डंका बाजत।

   मान्यता है कि कांगड़ा देवी मंदिर का निर्माण पाण्डव काल में किया गया था। कांगड़ा का प्राचीन नाम राज कोट था। माता ब्राजेश्वरी देवी के इस दिव्य-भव्य मंदिर के गर्भ गृह में रजत छत्र के नीचे माता की पिण्डी विराजमान है। 
   माता के रूप में इस पिण्डी के दर्शन एवं पूजन-अर्चन होते हैं। इस मंदिर में लाल भैरव नाथ की प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। भैरव नाथ को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। माता कांगड़ा देवी का यह स्थान 51 शक्तिपीठ में से एक है। नवरात्र में कांगड़ा में उत्सव जैैसा दृश्य होता है।

  पौराणिक कथाओं में कांगड़ा का खास महत्व है। मान्यता है कि देवी सती के अंग अंश का यह स्थान है। पिता राजा दक्ष के यज्ञ में सती ने प्राण त्याग दिये थे। क्रोधित भगवान शिव सती के शव को कंधे पर रख कर ब्राह्मांड के चक्कर लगा रहे थे। 
   इसी दौरान भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती देह के 51 अंश कर दिये थे। सती का वक्ष अंश यहां गिरा था। लिहाजा इस स्थान को शक्तिपीठ के तौर पर मान्यता है। मान्यता है कि माता ब्राजेश्वरी देवी का यह मंदिर 10 वीं सदी का अति समृद्धशाली मंदिर रहा है। लिहाजा ब्राजेश्वरी देवी का यह मंदिर हिमाचल प्रदेश का सर्वाधिक भव्य दिव्य मंदिर माना जाता है। मंदिर के सुनहरे कलश के दर्शन अति सुन्दर एवं आकर्षक है। 

   माता के मंदिर के यह कलश कांगड़ा की पहचान भी मानें जाते हैं। खास यह कि माता की पांच बार आरती होती है। सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही माता को शयन से जगाया जाता है। रात्रि में शयन आरती होती है। शयन आरती के दौरान श्रंगार उतार दिया जाता है। 
   मंगला आरती में माता की तीनों पिण्डियों का जल, दूध, दही, घी एवं शहद के मिश्रित पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। उसके बाद पीले चंदन से मां का श्रंगार कर नए वस्त्र-परिधान एवं स्वर्ण आभूषण पहनाये जाते हैं। फिर चना, पूरी, फल एवं मेवा आदि का भोग लगा कर मां की आरती पूर्ण होती है। 
   प्राचीन कथानक है कि कांगड़ा में दैत्य जालंधर का किला हुआ करता था। वध होने पर दैत्य का वक्ष एवं कान का कांगड़ा की धरती पर गिरा था। वक्ष एवं कान का धरती पर गिरने के साथ ही वज्र का हो गया था। उसी स्थान पर वज्रहस्ता देवी का प्राकट¬ हुआ। माता ब्रजेश्वरी देवी का महात्म अद्भुत है। खास यह हैं कि मंदिर में तीन गुम्बद है। इन तीनों गुम्बदों की अपनी एक अलग मान्यता है।
   माता कांगड़ा देवी की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। कांगड़ा एयरपोर्ट कांगड़ा  देवी मंदिर से करीब 8 किलोमीटर दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट है। पठानकोट से कांगड़ा देवी मंदिर की दूरी करीब 90 किलोमीटर है। मुकरियन रेलवे स्टेशन की दूरी यहां से करीब 30 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
32.101934,76.269907

Sunday, 12 August 2018

शक्तिपीठ नैनादेवी : आस्था का केन्द्र

    शक्ति स्वरुपा आराध्य नैना देवी की मान्यता शक्ति पीठ की है। उत्तराखण्ड के नैनीताल स्थित नैना देवी मंदिर धर्म, आध्यात्म, आस्था एवं पर्यटन का मुख्य केन्द्र है। 

   नैनीझील की उत्तर दिशा में स्थित नैना देवी का यह मंदिर अति प्राचीन है। नवनिर्माण ने इसका स्वरूप कई बार बदला। वर्ष 1880 में भूस्खलन में मंदिर की दिव्यता-भव्यता नष्ट हो गयी थी। लिहाजा उसे एकबारगी नया स्वरूप दिया गया।
   विशेषज्ञों की मानें तो यहां सती के शक्ति स्वरूप की पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर में मुख्य दर्शन दो नेत्रों के होते हैं। यह नेत्र द्वय ही पूजित हैं। यह नेत्र ही नैना देवी को दर्शाते हैं।


   नैनी झील के बारे में मान्यता है कि इस स्थान पर सती की देह के अंश गिरे थे। कहावत है कि शिव सती की मृत देह लेकर कैलाश पर्वत की ओर जा रहे थे। जिन स्थानों पर सती के अंग गिरे, उन स्थानों पर शक्ति पीठ की स्थापना की गयी। 
   नैनीझील में सती के नेत्र गिरे थे। लिहाजा इस स्थान को शक्ति पीठ की मान्यता है। पौराणिक कथानक के अनुसार राजा दक्ष की पुत्री उमा का विवाह शिव से हुआ था। शिव को दक्ष प्रजापति पसंद नहीं करते थे। इसके बावजूद दक्ष देवताओं के आग्रह को टाल नहीं सकते थे।

    लिहाजा न चाहते हुये भी दक्ष ने पुत्री का विवाह शिव से कर दिया था। यज्ञ आयोजन के अवसर पर राजा दक्ष ने सभी को आमंत्रित किया लेकिन पुत्री एवं दामाद शिव को आमंत्रित नहीं किया। पुत्री उमा हठ कर यज्ञ में शामिल होने पहुंची लेकिन पति शिव का अनादर देख उमा ने उसी यज्ञ में कूद कर अपनी आहुति दे कि अगले जन्म में भी शिव को ही अपना पति बनाऊंगी। पुत्री उमा ने पिता दक्ष को चेताया कि मेरा एवं पति शिव का अनादर है। 

    लिहाजा यज्ञ का प्रतिफल असफल होगा। उमा सती हो गयी। शिव को यह ज्ञात हुआ कि उमा ने यज्ञ में कूद कर अपना अंत कर लिया तो शिव के क्रोध का कोई पारावार न रहा। शिव एवं उनके गणों ने यज्ञ एवं यज्ञ स्थल को तहस नहस कर डाला। देवता शिव के रौद्र स्वरुप को देख कर सशंकित हो गये कि कहीं अब प्रलय न हो जाये। देवताओं ने शिव से प्रार्थना की कि क्रोध को शांत करें। राजा दक्ष ने शिव से क्षमा याचना की। शिव ने उनको आशीर्वाद दिया।
    शिव ने सती का शव देखा तो वैराग्य उमड़ आया। शिव ने सती के जले मृत देह को कंधे पर डाल कर आकाश भ्रमण करना प्रारम्भ कर दिया। इस आकाश भ्रमण के दौरान सती के अंग जिन स्थानों पर गिरे, उन स्थानों को शक्ति पीठ की मान्यता मिली। सती के नयन गिरे, उस स्थान को नैना देवी कहा गया। नैनीताल के इस स्थान को नन्दा देवी भी कहा जाता है।
    विशेषज्ञों की मानें तो नयनों की अश्रुधार ने ताल का स्वरूप ले लिया। बाद में इस स्थान को नैनीझील के तौर पर ख्याति मिली। तदन्तर यहां शिव पत्नी नन्दा (पार्वती) की पूजा अर्चना नैना देवी के रूप में होती है। शक्ति पीठ नैना देवी मंदिर नैनीझील पर स्थित है। निकट ही मल्लीताल भी है। चौतरफा प्राकृतिक परिवेश दर्शनीय है। पर्वत श्रंखला की चोटियां आनन्दित करती हैं तो सुन्दर पर्यावरण मुग्ध करता है।
   शक्ति पीठ नैना देवी नैनीताल की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट पंत नगर एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
29.389120,79.459837

Monday, 6 August 2018

अक्षरधाम मंदिर : अद्भुत सुन्दरता

     श्री स्वामिनारायण अक्षरधाम मंदिर को अनोखा धार्मिक एवं सांस्कृतिक महातीर्थ कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। 

  जी हां, नई दिल्ली स्थित अक्षरधाम मंदिर धर्म, आध्यात्म, सौन्दर्य शास्त्र, वास्तुकला एवं भारतीय संस्कृति से परिपूर्ण है। लिहाजा इसे सांस्कृतिक महातीर्थ कहना कोई बड़ी बात न होगी। शायद इन प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष विशेषताओं के कारण ही अक्षरधाम को गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकाड्र्स में शामिल किया गया है।

    खास यह कि अक्षरधाम शिल्पकला का सुन्दर एवं अद्भुत आयाम है। अक्षरधाम देश के शीर्ष आराधना स्थलों में से एक है। अक्षरधाम मंदिर की दिव्यता एवं भव्यता देखते ही बनती है। करीब 100 एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस दिव्य-भव्य मंदिर परिसर में धर्म एवं संस्कृति के विविध आयाम दिखते हैं। खास यह कि अक्षरधाम मंदिर में प्रवेश के दस द्वार है। यह सभी द्वार दसों दिशाओं के प्रतीक हैं। 

   इस भव्यतम मंदिर का निर्माण ज्योतिर्धर भगवान स्वामिनारायण की स्मृति में कराया गया है। करीब 356 फुट लम्बा, 316 फुट चौड़ा एवं 141 फुट ऊंचा यह धार्मिक स्थल देश दुनिया का आकर्षण है। विशेषज्ञों की मानें तो अक्षरधाम मंदिर 10000 वर्ष प्राचीन भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। यह संस्कृति का अत्यंत विस्मयकारी, सुन्दर एवं बुद्धिमता पूर्ण प्रस्तुत करता है। यूं कहें कि अक्षरधाम मंदिर भारत की प्राचीन कला, संस्कृति एवं शिल्पकला को सुन्दर एवं आध्यात्मिक तौर तरीके से प्रस्तुत करता है।

     खास यह कि यहां नियमित शांति प्रार्थनाएं होती हैं। शांति प्रार्थना में देश की 151 पवित्र नदियों, झीलों एवं जलाशयों का जल उपयोग में लाया जाता है। अक्षरधाम मंदिर परिसर में भारतीय रीति रिवाज, संस्कृति, आध्यात्मिकता के माध्यम से जीवन दर्शन को रेखांकित किया जाता है। फिल्मों के जरिये भारत की शानदार विरासत का सफर भी अवलोकित होता है।
   इसमें ऋषियों-मुनियों, वैज्ञानिकों की खोज, अविष्कार आदि इत्यादि बहुत कुछ है। जीवन चक्र एक संगीतमय फव्वारा है। यह एक दर्शनीय संगीतमय फव्वारा है। इसमें भारतीय दर्शन के अनुरूप जन्म, जीवन काल, मृत्यु चक्र का उल्लेख किया जाता है। इसे सर्किल ऑफ लाइफ भी कहा जाता है।
   खास यह कि 11000 कारीगरों एवं हजारों कारसेवकों की सहायता से पांच वर्ष की अवधि में यह दिव्य-भव्य मंदिर तैयार हो सका। विशेषज्ञों की मानें तो अक्षरधाम मंदिर की संरचना एवं डिजाइन ऐसी है कि मंदिर का जीवन 1000 साल तक रह सकता है। अक्षरधाम मंदिर में हिन्दुओं के सभी देवगण सहित दिव्य अवतारों की 200 से अधिक मूर्तियां विद्यमान हैं। मंदिर में 234 नक्काशीदार स्तम्भ, 9 अलंकृत गुम्बद, गजेन्द्र पीठ एवं देश के दिव्य महापुरुषों की 20000 से अधिक प्रतिमायें प्रतिष्ठापित हैं। 

   खास यह कि अक्षरधाम मंदिर नारायण सरोवर से घिरा है। यह सरोवर एक झील की तरह है। इस झील में देश की 151 पवित्र नदियों, झीलों एवं जलाशयों का जल है। झील के निकट 108 गोमुख बने हैं। यह गोमुख 108 देवी देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। राजस्थान के लाल बलुआ पत्थरों से संरचित करीब 3000 फुट लम्बा परिक्रमा क्षेत्र है। यह परिक्रमा क्षेत्र मंदिर के चारों ओर एक सुन्दर माला की भांति दिखता है। मंदिर की परिक्रमा करते समय 108 गोमुख से प्रवाहित जलधारा सुखद एहसास कराती है। 
 
   अक्षरधाम मंदिर में विशेषताओं एवं आकर्षण की एक लम्बी श्रंखला है। अक्षरधाम मंदिर में यज्ञपुरुष कुण्ड है। यह दुनिया के सबसे बड़ा यज्ञ कुण्ड माना जाता है। इसमें 108 छोटे-छोटे तीर्थ हैं। मुख्य अर्थात केन्द्रीय गुम्बद के नीचे 11 फुट ऊंची स्वामी नारायण की भव्य-दिव्य प्रतिमा है। इसके चारों ओर हिन्दू गुरुओं की प्रतिमायें स्थापित हैं। यह प्रतिमायें पंच धातुओं से निर्मित हैं। लक्ष्मी नारायण, शिव पार्वती, राधा कृष्ण, सीता राम सहित अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। 
  परिसर में एक विशाल थियेटर भी है। थियेटर में नीलकण्ठ के माध्यम से स्वामी नारायण के जीवन को रेखांकित करने वाली घटनाओं को प्रदर्शित किया जाता है। अक्षरधाम मंदिर रात में अति सुन्दर प्रतीत होता है। लाइटिंग सिस्टम से रात होते ही अक्षरधाम मंदिर जगमगा उठता है। खास तौर से अकल्पनीय दृश्य अवलोकित होता है। यह एक अद्भुत नजारा होता है।
   लोटस गार्डेन : लोटस गार्डेन अक्षरधाम मंदिर के मुख्य आकर्षण में है। कमल के आकार प्रकार का यह बगीचा एक खास आध्यात्मिकता का आभास कराता है। यह एक जल उद्यान है। इस उद्यान में शेक्सपीयर, मार्टिन लूथर, स्वामी विवेकानन्द एवं स्वामी नारायण व्यक्तित्व एवं कृतित्व को रेखांकित किया गया है।
   सांस्कृतिक विहार : सांस्कृतिक विहार मुख्यत: नौकायन का आनन्द देने वाला क्षेत्र है। पर्यटक या श्रद्धालु यहां नौकायन कर प्राचीन भारत का दिग्दर्शन कर सकते हैं। खास तौर से भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का विहंगमता संग अवलोकन होता है।
    अक्षरधाम मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इन्दिरा गांधी इण्टरनेशनल एयरपोर्ट नई दिल्ली है। निकटतम रेलवे स्टेशन नई दिल्ली है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी अक्षरधाम मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
28.612673,77.277262

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...