Tuesday, 27 February 2018

शनिदेव की विलक्षण छवि

     भारत भूमि को सामान्यत: देवलोक व देवभूमि के रुप में दुनिया में जाना पहचाना जाता है। देश के हर स्थान का अपना अलग व विशेष महत्व होता है। विशेषता एवं महत्वतता के कारण ही कुछ अलग दिखता है। 

   देश में देवी-देवताओं के करोड़ों मंदिर व आस्था के केन्द्र हैं लेकिन आस्था, विश्वास व श्रद्धा के कुछ देव स्थल अलग ही दिखते व जाने जाते हैं। देश में राजस्थान अपनी कुछ खास छवि के लिए तो वैसे ही जाना पहचाना जाता है। सूर्य पुत्र शनिदेव का विलक्षण मंदिर भी देश के इसी प्रांत में है। 
   राजस्थान का उदयपुर शहर खास तौर से झीलों के लिए जाना पहचाना जाता है लेकिन उदयपुर के हाथीपोल स्थित शनिदेव मंदिर अपने अनूठेपन व विलक्षणता के लिए विश्व में जाना जाता है। शनिदेव को खास तौर ने न्याय के देवता के रुप में जाना जाता है। कहते हैं कि शनिदेव की न्याय प्रक्रिया से उनके पिता सूर्यदेव भी नहीं बच सके थे। 
   उदयपुर के हाथीपोल स्थित शनिदेव  का यह विलक्षण मंदिर करीब नब्बे वर्ष या इससे भी अधिक पुराना है। अपनी विलक्षणता के कारण ही शनिदेव का यह मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था व श्रद्धा का केन्द्र बना है। शनिदेव की प्रतिमा सामान्य तौर पर काले रंग की होती है लेकिन इस मंदिर में शनिदेव सफेद रंग में दिखते हैं।
     शनिदेव की प्रतिमा सूर्यदेव को निगलने वाली छवि में भक्तों को दर्शन देती है। खास बात यह है कि शनिदेव की सीधी दृष्टि भक्तों पर न पड़े। इसलिए शनिदेव की प्रतिमा में आंख साइड में हैं जिससे शनिदेव के दर्शन करने पर भक्तों पर सीधी दृष्टि नहीं पड़ती है। हाथी पर विराजमान शनिदेव की छवि इस मंदिर में नरसिंह भगवान के रूप में दिखती है।
   भगवान शनिदेव का इस मंदिर में चांदी से श्रंगार किया जाता है। इस लिए शनिदेव की प्रतिमा काले रंग की न होकर सफेद रंग लिये हुये है। सामान्यत: शनिदेव पर सरसों का तेल चढ़ाया जाता है लेकिन यहां शनिदेव की मुख्य प्रतिमा पर तेल चढ़ाने की परम्परा नहीं है बल्कि सरसों का तेल चढ़ाने के लिए मंदिर परिसर में ही अष्टधातु की एक अन्य प्रतिमा स्थापित है।
     पौराणिक मान्यता है कि शनिदेव के दर्शन करने व कष्टों के निवारण की प्रार्थना करने से भक्तों-श्रद्धालुओं के कष्टों का निवारण हो जाता है। भक्तों-श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं आैर भक्त शनिदेव का गुणगान करते हुये जाते हैं।
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Monday, 26 February 2018

जंगमबाड़ी मठ: शिवलिंग स्थापना की परम्परा

   विधि-विधान एवं परम्पराओं का कहीं कोई अंत नहीं। देश-विदेश में सनातन धर्म की व्यवस्थाओं से लबरेज मठ-मंदिरों की एक लम्बी श्रंखला है। मठ-मंदिरों की अपनी मान्यतायें एवं परम्परायें हैं।

   देश-दुनिया की धार्मिक राजधानी में शुमार काशी भी अपने आगोश में मान्यताओं एवं परम्पराओं से ओत-प्रोत मठ-मंदिरों की लम्बी कड़ी समेटे है। काशी में दक्षिण भारतीय परम्पराओं का एक मठ-मंदिर अपनी विशिष्टताओं एवं खासियत के कारण देश में अलग ही जाना-पहचाना जाता है। इसे जंगमबाड़ी मठ के रूप में जाना जाता है।

   जंगमबाड़ी मठ काशी के प्राचीन मठों में से एक है। जंगम का अर्थ शिव को जानने वाला आैर बाडी का अर्थ रहने के स्थान से होता है। करीब पचास हजार वर्ग फुट में फैले जंगमबाड़ी मठ में विचित्र एवं अलग परम्परा है। मान्यताओं व परम्पराओं के अनुसार धर्मावलम्बी-श्रद्धालु जंगमबाड़ी मठ में शिवलिंगों की स्थापना करते हैं।

     धर्मावलम्बी एवं श्रद्धालु अपने पूर्वजों व निकट संबंधी की मृत्यु पश्चात उनकी आत्मा शांति के लिए जंगमबाड़ी मठ में शिवलिंग की स्थापना करते हैं। आत्मा की शांति के लिए यहां पिण्डदान नहीं बल्कि शिवलिंग का दान होता है। दान स्वरुप शिवलिंग की यहां स्थापना की जाती है। यह जानकर विश्वास नहीं होगा कि इस मठ-मंदिर में हजार-पांच सौ नहीं बल्कि कई लाख शिवलिंग एक साथ विराजमान-स्थापित हैं।

      बताते हैं कि मृत व्यक्तियों की आत्मशांति एवं अकाल मृत्यु की आत्मशांति के लिए इस मठ-मंदिर में शिवलिंग स्थापित किये जाते हैं। सैकड़ो वर्षों से अनवरत प्रचलित इस परम्परा में अब तक दस से पन्द्रह लाख शिवलिंग एक ही स्थल पर स्थापित हो चुके हैं। शिवलिंग की स्थापना में हिन्दू रीति-रिवाज एवं परम्पराओं का पालन पूरी तरह से किया जाता है।

    शिवलिंग की स्थापना में पिण्डदान के सभी विधि-विधान अपनाये जाते हैं। शिवलिंग की स्थापना पर वैदिक मंत्रोचारण से मठ-मंदिर क्षेत्र अनुगूंजित हो उठता है। प्रति वर्ष हजारों की तादाद में शिवलिंग की स्थापना होती है। वर्षों पहले स्थापित शिवलिंग क्षतिग्रस्त व जीर्ण-शीर्ण भी होते हैं। इन क्षतिग्रस्त एवं जीर्ण-शीर्ण शिवलिंग को मठ-मंदिर में ही अन्य स्थान पर सम्मानजनक तौर-तरीके से सुरक्षित रख दिया जाता है।

     जंगमबाड़ी मठ खास तौर से दक्षिण भारतीय परम्पराओं-मान्यताओं से ओत-प्रोत दिखता है। धर्म-परम्पराओं-मान्यताओं के जानकार बताते हैं कि जिस प्रकार पूर्वजों की आत्मशांति एवं मुक्ति के लिए पिण्डदान किया जाता है, उसी प्रकार वीरशैव सम्प्रदाय में पूर्वजों की आत्मशांति एवं मुक्ति के लिए शिवलिंग दान की परम्परा है। इसी परम्परा के अनुसार काशी के जंगमबाड़ी मठ में शिवलिंग की स्थापना की परम्परा है।
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Sunday, 25 February 2018

कैंची धाम: करोड़ों दिलों की आस्था व विश्वास

     देव भूमि भारत अपने आध्यात्मिक एवं धार्मिक परम्पराओं-मान्यताओं से हमेशा विश्व के शिखर पर रहा। शायद यही कारण है कि दुनिया के असंख्य ख्याति प्राप्त एवं लब्ध प्रतिष्ठ व्यक्तित्व भारत भूमि को श्रद्धा से नमन करते हैं... नतमस्तक होते हैं।

   बात चाहे अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की हो या बॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया राबर्टस या फिर फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग की हो... देव भूमि भारत के कण-तृण पर नतमस्तक हुए।
    हिमालय की गोद में रचा-बसा उत्तराखण्ड अपनी आब-ओ-हवा के साथ-साथ सौन्दर्य से देश-विदेश के लाखों-करोड़ों सैलानियों-पर्यटकों को अभिभूत करता है तो उत्तराखण्ड का देवत्व देश विदेश के लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं-धर्मभीरुओं को नतमस्तक करता है।
     उत्तराखण्ड का नैनीताल एक बार फिर राष्ट्रीय-अन्र्तराष्ट्रीय क्षितिज पर अपनी विशिष्ट खूबियों के साथ अवलोकित हो रहा है। नैनीताल स्थित शक्ति देव हनुमान जी के मंदिर 'कैंची धाम" ने देश-विदेश के हजारों-लाखों श्रद्धालुओं को 'आम से खास" बना दिया। 'नीम करौली बाबा" व 'नीब करौरी बाबा" के नाम से जाना-पहचाने जाने वाला 'कैंची धाम" देश विदेश के आम व खास की श्रद्धा, आस्था व विश्वास का केन्द्र है।
    उत्तराखण्ड के नैनीताल-अलमोड़ा मुख्य मार्ग पर करीब चौदह सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित 'कैंची धाम" अपनी विशिष्टता के कारण विश्व क्षितिज पर खास तौर से पहचान रखता है। देव व संतों की भूमि उत्तराखण्ड में नैनीताल-अल्मोड़ा रोड़ पर इस भव्य-दिव्य 'कैंची धाम" का निर्माण-स्थापना लक्ष्मी नारायण शर्मा ने वर्ष 1962-1964 के आसपास कराया था। 
   शिप्रा नदी के किनारे स्थित 'कैंची धाम" की दिव्यता-भव्यता पर विश्व के श्रद्धाालु-पर्यटक नतमस्तक हुये। कैंची धाम नैनीताल-अल्मोड़ा रोड के दो बड़े घुमावदार मोड़ पर स्थित है। इस मोड़ की बनावट कैंची के आकार की है। शायद इसी कारण इस दिव्य-भव्य स्थान का नाम 'कैंची धाम" पड़ा। नीब करौरी बाबा का यह 'कैंची धाम" सिलीकॉन वैली से लेकर दुनिया की सुर्खियों में है।
    मनहि मन कीन्ह प्रणाम.... अमेरिका के राष्ट्रपति बराक  ओबामा भले ही उत्तराखण्ड न आये हों लेकिन उनकी मनोभावना शायद यही रहती हैं क्योंकि बताते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी जेब में हमेशा हनुमान जी की एक छोटी प्रतिमा रखते हैं। नीब करौली बाबा के इस 'कैंची धाम" में नतमस्तक होने वालों में देश-दुनिया की हस्तियों की एक लम्बी व बड़ी श्रंखला है।
     बात चाहे दुनिया को बेहतरीन आई फोन देने वाली एप्पल कम्पनी के सर्वेसर्वा एवं संस्थापक स्टीव जॅाब्स हों या फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग हों या फिर हॉलीबुड अभिनेत्री जूलिया राबर्टस हों.... सभी 'कैंची धाम" में श्रद्धानवत हुये। नैनीताल से करीब अड़तीस किलोमीटर फासले पर स्थित 'कैंची धाम" के नीब करोरी बाबा के आशीर्वाद ने लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की तकदीर बदल दी।
    हालांकि देव भूमि उत्तराखण्ड दिव्य-भव्य मंदिरों व आश्रम की श्रंखला से लबरेज है। इसे विशिष्टता ही कहा जायेगा कि 'कैंची धाम" देश-दुनिया में अलग ही जाना जाने लगा। अगाध श्रद्धा, पूर्ण विश्वास व आस्था से लबरेज श्रद्धालुओं के आने जाने का सिलसिला अनवरत बना रहता है। फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग संकट के दौर से गुजर रहे थे तो उनको एप्पल कम्पनी के सीईओ स्टीव जॉब्स ने कैंची धाम दर्शन का सुझाव दिया था।
  फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग भारत यात्रा पर आये आैर किसी तरह तलाशते हुये उत्तराखण्ड के 'कैंची धाम" दर्शन के लिए आये। इसके बाद तो फेसबुक व संस्थापक मार्क जुकरबर्ग की दुनिया व किस्मत ही बदल गयी। अमेरिका से करीब साढ़े आठ हजार किलोमीटर का सफर तय कर फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग 'कैंची धाम" आये तो फेसबुक बेहद आर्थिक संकट में था।
    मार्क जुकरबर्ग 'कैंची धाम" आये तो एक दिन के लिए थे लेकिन वह यहां दो दिन रुके। बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव के निवासी लक्ष्मी नारायण शर्मा वर्ष 1942 के आसपास नैनीताल आये थे। बताते हैं कि बाबा यहां आने पर नीब  करौरी गांव में ठहरे थे। शायद इसी कारण बाबा नीब करौरी बाबा के नाम से विख्यात हुये। बाबा नीब करौरी को शक्तिदेव हनुमान जी का अवतार माना जाता है।
    बताते हैं कि 17 वर्ष की अल्प आयु में ही बाबा को ज्ञान की प्राप्त हो गया था।  संत ह्मदय-संत पुरुष लक्ष्मी नारायण शर्मा बाद में नीम करौली बाबा या नीब करौरी बाबा के रुप में ख्याति प्राप्त हुये। शंकर दयाल शर्मा भी बाबा के आशीर्वाद से देश के राष्ट्रपति हुए। बताते हैं कि बाबा नीब करौरी को दिव्य शक्तियां हासिल थीं। बाबा ने आशीर्वाद में जिसे जो कुछ दिया या कहा वह ब्राह्म वाक्य हो जाता था।
     बाबा का यह आशीर्वाद भक्त को निश्चित रुप से फलीभूत हुआ। हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया राबर्टस तो इतना अधिक प्रभावित हुयीं कि उन्होंने हिन्दू धर्म को अंगीकार कर लिया। बताते हैं कि हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया राबर्टस न तो 'कैंची धाम" आश्रम आयीं आैेर न बाबा से मुलाकात हुयी लेकिन बाबा की छवि दर्शन से ही राबर्टस उनकी अनन्य भक्त हो गयीं। 
    फेसबुक के संस्थापक को सुझाव देने वाले एप्पल के सीईओ स्टीव जॉब्स वर्ष 1974 में कैंची धाम आये थे लेकिन नीब करौरी बाबा के दर्शन नहीं हो सके। कारण सितम्बर 1973 में बाबा नीब करोरी ने शरीर त्याग दिया था लेकिन बाबा के आशीर्वाद व 'कैंची धाम" के दर्शन ने स्टीव जॉब्स की दशा-दिशा बदल दी। स्टीव जाब्स एलाइनमेंट की खोज में भारत आये थे लेकिन उनको एलाइनमेंट तो नहीं मिला लेकिन एप्पल का खाका अवश्य मिल गया।
      यहीं से लौट कर स्टीव जॉब्स ने एप्पल को मूर्तरुप दिया। अमेरिका के जैफ्री कैगेल ड्रग्स का शिकार हो चुके थे। अवसाद-डिप्रेशन के दौर से गुजर रहे दुनिया के मशहूर रॉक बैंड मास्टर जैफ्री कैगेल आखिरकार वर्ष 1970 न्यूयार्क से भारत आ गये।यहां उनकी मुलाकात नीब करौली बाबा से हुयी। इसके बाद तो उनकी दुनिया ही बदल गयी।
    जैफ्री कैगेल रॉक बैंड छोड़ कर भजन-कीर्तन गाने लगे। बाद में जैफ्री ग्रैमी एवार्ड्स के लिए भी नामित हुए। उत्तर भारत में नीब करौरी बाबा चमत्कारी बाबा के रुप में भी जाने जाते रहे। बताते हैं कि बाबा नीब करौरी ने भले ही वर्ष 1973 में शरीर त्याग दिया हो लेकिन बाबा अभी भी अपने भक्तों-दीन-दुखियों को दर्शन देते रहते हैं। इसे चमत्कार ही कहा जायेगा कि बाबा एक साथ दो स्थानों पर अवतरित हो जाते हैं। बाबा के चमत्कारों का कहीं कोई अंत नहीं रहा।
     बताते हैं कि एक बार बाबा ने पानी के पहाड़ पर घी के दीपक जलवा दिये। एक बार भण्डारा में घी कमी महसूस की गयी तो श्रद्धालुओं ने बाबा को अवगत कराया तो उन्होंने नदी का जल कनस्तर (पीपा) में लाने को कहा। नदी का यह जल कड़ाही में जाते ही घी में तब्दील हो गया।  नैनीताल में 'कैंची धाम आश्रम" के अलावा बाबा ने देश में एक सौ आठ से अधिक मंदिर बनवाये या उनकी प्रेरणा से मंदिरों-आश्रमों का निर्माण हुआ। नैनीताल, ऋषिकेष, गुजरात, वृन्दावन, लखनऊ, शिमला व दिल्ली सहित देश के विभिन्न प्रांतों व शहरों में बाबा नीब करौरी के मंदिर व आश्रम स्थित हैं।
    यहां तक कि विदेशों में अमेरिका व जर्मनी सहित दुनिया के तमाम देशों में बाबा के मंदिर व आश्रम की एक लम्बी श्रंखला है। नैनीताल स्थित बाबा नीब करौरी के कैंची धाम आश्रम में अमेरिका, फ्रांस, लंदन सहित दुनिया के तमाम देशों के भक्तों के आने-जाने का सिलसिला अनवरत बना रहता है। 'कैंची धाम" में हनुमाान जी अलावा कई अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमायें प्राण प्रतिष्ठित हैं।
     'कैंची धाम" में बाबा नीब करौरी की प्रतिमा स्थापित है। प्रत्येक वर्ष 15 जून को 'कैंची धाम" स्थापना दिवस पर विशेष आयोजन होता है। जिसमें देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं का आना जाना होता है। बाबा अधिसंख्य छवियों-चित्रों में कम्बल में दिखते हैं। शायद इसी से श्रद्धालु-भक्त 'कैंची धाम" में बाबा को कम्बल चढ़ाते हैं। विध्ंयपर्वत श्रंखला में विंध्यांचल के अष्टभुजा पहाड़ी पर भी इस आध्यात्मिक गुरु का आश्रम है।
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लालित्य सौन्दर्य का अद्भुत संगम : राधा कृष्ण मंदिर

    लालित्य-सौन्दर्य एवं माधुर्य का अद्भुत संगमन। जी हां, राधा कृष्ण मंदिर में सौन्दर्य के अद्भुत दिग्दर्शन होंगे तो वहीं उसका लालित्य मन को लुभायेगा। 

   कर्णप्रिय संगीत की स्वरलहरियां मन-मस्तिष्क को पुलकित कर देंगी। राधा कृष्ण मंदिर को जे के मंदिर के रुप में जाना-पहचाना जाता है। उत्तर प्रदेश के गौरव के तौर पर अपना खास स्थान रखने वाले इस दिव्य-भव्य मंदिर में जहां एक ओर वास्तुकला की प्राचीनतम शैली दिखती है तो वहीं आधुनिक कला भी अपने अलग ही रंग जमाते दिखती है।
     कभी एशिया के मैनचेस्टर के तौर पर ख्याति रखने वाले कानपुर स्थित इस राधा कृष्ण मंदिर की एक झलक पाने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में आस्थावान श्रद्धालुओं के अलावा पर्यटक भी भारी तादाद में आते हैं।

    राधा कृष्ण मंदिर में मुख्यत: आराध्य राधा कृष्ण के दर्शन होते हैं तो वहीं प्रभु लक्ष्मी नारायण, प्रभु अर्धनारीश्वर, प्रभु नरमदेश्वर व भगवान हनुमान के दर्शन होते हैं। प्राचीन एवं आधुनिक वास्तुकला के इस अनूठे व विलक्षण मिश्रण को देखते ही बनता है। मंदिर का आकार-प्रकार ऐसा है कि पर्याप्त हवा व पर्याप्त रोशनी की उपलब्धता रहती है।


    वेंटीलेशन को ध्यान में रख कर मंदिर की छत की ऊंचाई अपेक्षाकृत कहीं अधिक है जिससे श्रद्धालु एवं पर्यटक भारी भीड़ होने के बावजूद असहज महसूस नहीं करते। वास्तु एवं प्राचीन स्थापत्य कला का यह विशिष्ट एवं अनूठा मिश्रण है। देश के आैद्योगिक घराना जे के समूह के जे के ट्रस्ट ने इस दिव्य एवं भव्य मंदिर का निर्माण कराया।
    मंदिर की सभी व्यवस्थाओं व रखरखाव का खर्च न्यास से ही किया जाता है। सिंघानिया परिवार इस न्यास के माध्यम से राधा कृष्ण मंदिर (जे. के. मंदिर) को कुछ खास रखने-बनाने में कोई कोर-कसर नहीं रखता। धर्म, आस्था, विश्वास एवं पर्यटन केन्द्र के साथ ही राधा कृष्ण मंदिर को यदि उत्तर प्रदेश का गौरव स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।

    दिल्ली-हावड़ा मुख्य रेल मार्ग पर स्थित कानपुर में राधा कृष्ण मंदिर का दिग्दर्शन करने आने-जाने के लिए हवाई सेवा से लेकर रेल व सड़क परिवहन उपलब्ध हैं। शहर के ह्मदय स्थल पर जी. टी. रोड (ग्राण्ड  ट्रंक रोड) के निकट स्थित राधा कृष्ण मंदिर परिसर सांझ होते ही अपनी विशिष्ट अलौकिक छटा से निखर उठता है। कहा जाये कि राधा कृष्ण मंदिर की खूबसूरती श्रद्धालुओं-भक्तों व पर्यटकों के लिए प्रकृति का विशेष उपहार है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।
     खास बात यह है कि राधा कृष्ण मंदिर परिसर का हर कोना पर्यावरण से आच्छादित है। कहीं सुगंधित फूलों की श्रंखला वाले पौधे हैं तो कहीं पर्यावरणीय हेज की बनावट पशु-पक्षियों का एहसास कराती है। परिसर में भव्य-दिव्य फव्वारों की श्रंखला भी अपनी अलग छटा बिखेरते हैं। फव्वारों की रंग-बिरंगी जल तरंगों की श्रंखला सर्दी हो या ग्रीष्मकाल अपनी विशिष्टता से लुभाते हैं।

    ग्रीष्मकाल में मन-तन की शीतलता से लबरेज कर देते हैं। मंद-मंद प्रवाहित संगीत की सुर लहरियां मन-मस्तिष्क को प्रफुल्लित कर देती हैं। राधा कृष्ण मंदिर के विशाल परिसर में छोटे-बड़े पार्कों की एक लम्बी श्रंखला है।
   बताते हैं कि सिंघानिया परिवार की देख-रेख में विकसित राधा कृष्ण मंदिर का निर्माण कार्य वर्ष 1960 में पूर्ण हुआ लेकिन अभी भी विकास कार्य पर विराम नहीं लगा। मंदिर के सौन्दर्य में चार-चांद लगते रहें, इसको लेकर राधा कृष्ण मंदिर को रचने-गढ़ने का कार्य आज भी अनवरत जारी रहता है।
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Sunday, 11 February 2018

मानसून की सूचना देता जगन्नाथ जी का मंदिर

   विलक्षणता की कहीं कोई कमी नहीं। जी हां, अब इसे दैवीय अनुुकम्पा कहें या वास्तु शास्त्र की विशेषताओं का भण्डारण कहा जाये।

   उत्तर प्रदेश के भीतरगांव में भगवान जगन्नाथ जी भव्य-दिव्य मंदिर है। कानपुर के ग्रामीण इलाके के भीतरगांव में स्थित इस दिव्य-भव्य मंदिर में भगवान जगन्नाथ जी की विशाल प्रतिमा है।
  विलक्षणता यह है कि बेहटा बुजुर्ग भीतरगांव का यह विशिष्ट मंदिर बारिश-मानसून आने की सूचना सात दिन पहले ही दे देता है। बारिश-मानसून आने के सात दिन पहले ही इस भव्य-दिव्य मंदिर की छत से पानी की बूंदें टपकने लगती हैं। बारिश होने पर छत से पानी की बूंदों का टपकना बंद हो जाता है।
    कानपुर में राष्ट्रीय राजमार्ग से करीब पन्द्रह किलोमीटर के फासले पर स्थित यह मंदिर अपनी विलक्षणता के लिए देश-विदेश में खास तौर से जाना-पहचाना जाता है। इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ जी, सुभद्रा व बलराम जी सहित कई देवी-देवताओं की प्रतिमायें प्राण प्रतिष्ठत हैं। भीतरगांव का यह मंदिर देश के प्राचीन मंदिरों में से एक है।
   विशेषज्ञों की मानें तो इस प्राचीन मंदिर का निर्माण पांचवीं-छठवीं शताब्दी की अवधि में किया गया है। भगवान श्री जगन्नाथ जी का यह मंदिर गुप्तकाल का माना जाता है क्योंकि मंदिर की वास्तुकला स्वर्णीम गुप्तकाल को रेखांकित करती है। मंदिर निर्माण की वास्तुकला में खास तौर से टेराकोटा को विशिष्ट स्थान दिया गया है।
   मंदिर के प्रवेश द्वार को छोड़कर दर ओ दीवार सभी स्थानों पर वास्तुकला की विशिष्टता झलकती है। मंदिर के गर्भगृह सहित आंतरिक क्षेत्र में देवी-देवताओं की छवि अंकित हैं। देवी-देवताओं की छवियां विभिन्न भाव भंगिमाओं मेंं दिखती हैं। मंदिर की ऊंचाई करीब 68.25 फुट आंकलित है। इस मंदिर में कहीं कोई खिड़की या हवा की आवाजाही के लिए खुला स्थान नहीं है। इसके बावजूद मंदिर का आंतरिक क्षेत्र शीतलता से परिपूर्ण रहता है। 
    खास बात यह है कि इस भव्य-दिव्य मंदिर को गांव के नाम अर्थात भीतरगांव के नाम से ही ख्याति हासिल है। किवदंतियों के अनुसार कभी इस क्षेत्र को पुष्पपुर या फूलपुर कहा जाता था। भीतरगांव के इस मंदिर को सबसे प्राचीन व हिन्दुुओं के पवित्र स्थान के रुप में माना जाता है। इस मंदिर के निर्माण में गुप्तकालीन भारी भरकम र्इंटों का उपयोग किया गया है।
   आधार को अत्यधिक मजबूत बनाया गया है। र्इंट का आकार प्रकार कुछ यूं 18 इंच लम्बी, नौ इंच चौड़ी व तीन इंच मोटाई है। इन भारी भरकम र्इंट श्रंखला से 36 फुट लम्बा व 47 फुट चौड़ा मंच बना है। मंदिर की दीवारों की मोटाई भी करीब आठ फुट है। मंदिर में एक गुम्बदाकार मेहराब है। यह वास्तुकला का अनूठा शिल्प है।
  इस मंदिर में श्री गणेश, वाराह, महिषासुरमर्दिनी, नंदी आदि कई देवी देवताओं की छवियां प्राण प्रतिष्ठित हैं। शिव व विष्णु के साथ ही राक्षस भी दिखते हैं। सूर्य देव के भी दर्शन इस मंदिर में होते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1894 में मंदिर का एक पिरामिड़ क्षतिग्रस्त हो गया था। 
    इस मंदिर को 18 वीं सदी में काफी कुुछ नुकसान पहंुचा। इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ जी सहित अन्य देवी-देवताओं के दर्शन के लिए देश-विदेश के श्रद्धालुओं व पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है। विशिष्टता को ध्यान में रखते हुये पुरातत्व विभाग इस मंदिर की देखरेख करता है।
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मनौती के लिए मां काली के दरबार में लगायें ताला

   आस्था, श्रद्धा व विश्वास हो तो निश्चय ही मनोकामनायें पूर्ण होंगी। आस्था, श्रद्धा व विश्वास के कारण ही मां काली के दरबार में नित्य भारी संख्या में श्रद्धालुओं-भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

  जी हां, उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के ह्मदय स्थल शिवाला बंगाली मोहाल में मां काली का दिव्य-भव्य मंदिर है। बंगाली मोहाल का मां काली का यह विशाल मंदिर पांच सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। शहर की घनी आबादी वाले इलाके बंगाली मोहाल स्थित इस मंदिर में मां काली अपने पूर्ण स्वरुप में प्रतिष्ठापित हैं। 
    नवरात्र में मां काली का विशाल नवरात्र उत्सव का आयोजन होता है। मां काली के इस दिव्य-भव्य स्थान पर मनौती मानने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु, भक्त व जरुरतमंद आते हैं। मां काली के दर्शन-पूजन-अर्चन के साथ ही मान्यता व परम्परा है कि मनौती के लिए ताला (लॉक) अवश्य लगायें।
    मान्यता है कि मंदिर में ताला लगाने-बंद करने से श्रद्धालुओं-भक्तों की मनौती निश्चय ही पूर्ण होती है। मनौती पूर्ण होने पर श्रद्धालुओं को ताला खोलने के लिए मंदिर आना पड़ता है। मां काली के इस विशाल मंदिर में चौतरफा छोटे-बड़े बंद ताले लगे-लटकते दिख जायेंगे। बताते हैं कि ताला के रुप में श्रद्धालु-भक्त की इच्छा या मनौती उस स्थान पर बंद हो जाती है।
   इस इच्छा या मनौती को मां काली अवश्य पूर्ण करती हैं। यह ताले श्रद्धालुओं ने अपनी मनौती के लिए लगाये हैं। बताते हैं कि वर्षों से यह मान्यता-परम्परा अनवरत चली आ रही है। मनौती के ताला लाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मंदिर परिसर के बाहर पूजन-अर्चन की सामग्री बेचने वाले दुकानदारों के पास ताला उपलब्ध हो जाता है।
   बताते हैं कि बंगाली मोहाल के इस मंदिर की स्थापना एक बंगाली परिवार ने की थी लेकिन अब इस मंदिर की देखरेख-देखभाल द्विवेदी परिवार करता है। बंगाली मोहाल में आज भी बड़ी संख्या में बंगाली परिवार रहते हैं। मां काली जी का नित्य निर्धारित परम्परा के अनुसार पूजन-अर्चन किया जाता है। परिधान पहनाने से लेकर श्रंगार तक सभी आवश्यक पूजन व्यवस्थायें व आरती सभी कुछ समय से सुनिश्चित किया जाता है। 
  बंगाली संस्कृति व परम्पराओं का पालन किया जाता है। नवरात्र में सप्तमी, अष्टमी व नवमी को मां काली जी का विशेष पूजन अर्चन  होता है। 
  दीपावली पर काली जी की महापूजा आयोजित होती है।बंगाली परिवारों के अलावा अन्य हिन्दू परिवार मां काली के इस दिव्य-भव्य स्थल पर बच्चों के मुण्डन संस्कार एवं कर्ण छेदन संस्कार सहित अन्य संस्कार भी कराते हैं। विशेष उत्सव पर मां काली के दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं-भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
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तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...