Sunday, 11 February 2018

मानसून की सूचना देता जगन्नाथ जी का मंदिर

   विलक्षणता की कहीं कोई कमी नहीं। जी हां, अब इसे दैवीय अनुुकम्पा कहें या वास्तु शास्त्र की विशेषताओं का भण्डारण कहा जाये।

   उत्तर प्रदेश के भीतरगांव में भगवान जगन्नाथ जी भव्य-दिव्य मंदिर है। कानपुर के ग्रामीण इलाके के भीतरगांव में स्थित इस दिव्य-भव्य मंदिर में भगवान जगन्नाथ जी की विशाल प्रतिमा है।
  विलक्षणता यह है कि बेहटा बुजुर्ग भीतरगांव का यह विशिष्ट मंदिर बारिश-मानसून आने की सूचना सात दिन पहले ही दे देता है। बारिश-मानसून आने के सात दिन पहले ही इस भव्य-दिव्य मंदिर की छत से पानी की बूंदें टपकने लगती हैं। बारिश होने पर छत से पानी की बूंदों का टपकना बंद हो जाता है।
    कानपुर में राष्ट्रीय राजमार्ग से करीब पन्द्रह किलोमीटर के फासले पर स्थित यह मंदिर अपनी विलक्षणता के लिए देश-विदेश में खास तौर से जाना-पहचाना जाता है। इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ जी, सुभद्रा व बलराम जी सहित कई देवी-देवताओं की प्रतिमायें प्राण प्रतिष्ठत हैं। भीतरगांव का यह मंदिर देश के प्राचीन मंदिरों में से एक है।
   विशेषज्ञों की मानें तो इस प्राचीन मंदिर का निर्माण पांचवीं-छठवीं शताब्दी की अवधि में किया गया है। भगवान श्री जगन्नाथ जी का यह मंदिर गुप्तकाल का माना जाता है क्योंकि मंदिर की वास्तुकला स्वर्णीम गुप्तकाल को रेखांकित करती है। मंदिर निर्माण की वास्तुकला में खास तौर से टेराकोटा को विशिष्ट स्थान दिया गया है।
   मंदिर के प्रवेश द्वार को छोड़कर दर ओ दीवार सभी स्थानों पर वास्तुकला की विशिष्टता झलकती है। मंदिर के गर्भगृह सहित आंतरिक क्षेत्र में देवी-देवताओं की छवि अंकित हैं। देवी-देवताओं की छवियां विभिन्न भाव भंगिमाओं मेंं दिखती हैं। मंदिर की ऊंचाई करीब 68.25 फुट आंकलित है। इस मंदिर में कहीं कोई खिड़की या हवा की आवाजाही के लिए खुला स्थान नहीं है। इसके बावजूद मंदिर का आंतरिक क्षेत्र शीतलता से परिपूर्ण रहता है। 
    खास बात यह है कि इस भव्य-दिव्य मंदिर को गांव के नाम अर्थात भीतरगांव के नाम से ही ख्याति हासिल है। किवदंतियों के अनुसार कभी इस क्षेत्र को पुष्पपुर या फूलपुर कहा जाता था। भीतरगांव के इस मंदिर को सबसे प्राचीन व हिन्दुुओं के पवित्र स्थान के रुप में माना जाता है। इस मंदिर के निर्माण में गुप्तकालीन भारी भरकम र्इंटों का उपयोग किया गया है।
   आधार को अत्यधिक मजबूत बनाया गया है। र्इंट का आकार प्रकार कुछ यूं 18 इंच लम्बी, नौ इंच चौड़ी व तीन इंच मोटाई है। इन भारी भरकम र्इंट श्रंखला से 36 फुट लम्बा व 47 फुट चौड़ा मंच बना है। मंदिर की दीवारों की मोटाई भी करीब आठ फुट है। मंदिर में एक गुम्बदाकार मेहराब है। यह वास्तुकला का अनूठा शिल्प है।
  इस मंदिर में श्री गणेश, वाराह, महिषासुरमर्दिनी, नंदी आदि कई देवी देवताओं की छवियां प्राण प्रतिष्ठित हैं। शिव व विष्णु के साथ ही राक्षस भी दिखते हैं। सूर्य देव के भी दर्शन इस मंदिर में होते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1894 में मंदिर का एक पिरामिड़ क्षतिग्रस्त हो गया था। 
    इस मंदिर को 18 वीं सदी में काफी कुुछ नुकसान पहंुचा। इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ जी सहित अन्य देवी-देवताओं के दर्शन के लिए देश-विदेश के श्रद्धालुओं व पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है। विशिष्टता को ध्यान में रखते हुये पुरातत्व विभाग इस मंदिर की देखरेख करता है।
26.407913,80.391940

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