Friday, 24 April 2020

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन

   शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, तारापीठ मंदिर की मान्यता एक शक्तिपीठ के तौर पर है। 

   भारत के पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिला का यह धार्मिक स्थल अपनी विशिष्टताओं के लिए जाना एवं पहचाना जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो तारापीठ एक तांत्रिक मंदिर है। यहां की तंत्र विद्या बेहद प्रसिद्ध है। तारापीठ मंदिर वस्तुत: देवी तारा को समर्पित है। 

   मान्यता है कि तारापीठ देवी सती का स्थल है। तारापीठ का शाब्दिक अर्थ देखें तो तारा से आशय देवी तारा से है जबकि पीठ से आशय देवी के बैठने के स्थान से है। पश्चिम बंगाल का यह धार्मिक पर्यटन भारत में बेहद प्रसिद्ध है।

   शक्तिपीठ के रूप में पहचान रखने वाले तारापीठ मंदिर का वास्तुशिल्प भी अति दर्शनीय है। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती की आंख गिरी थी लिहाजा इसे तारापीठ के नाम से जाना एवं पहचाना जाने लगा। बंगाली में आंख का शाब्दिक अर्थ तारा होता है। 

   प्राचीनकाल में इस स्थान को चंडीपुर के नाम से जाना एवं पहचाना जाता था। जिसे बाद में बदल कर तारापीठ कर दिया गया था। देवी सती को आदिशक्ति का दूसरा स्वरूप कहा जाता है। तारापीठ मंदिर में देवी के असंख्य स्वरूप के दर्शन होते हैं। 

   मुख्य दर्शन माता तारा देवी के होते हैं। मुख्य प्रतिमा में माता तारा देवी की तीन आंखें हैं। माता तारा देवी को जल, सिंदूर एवं शराब से स्नान कराया जाता है। स्नान का यही जल भक्तों-श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। 

    तारापीठ मंदिर एक मध्यम आकार-प्रकार का मंदिर है। इसका वास्तुशिल्प अति दर्शनीय एवं दुर्लभ है। संगमरमर से संरचित यह मंदिर अपनी विशिष्टताओं के लिए खास तौर से जाना एवं पहचाना जाता है। मंदिर के सभी प्रवेश द्वार नक्काशी से सुसज्जित हैं। लिहाजा प्रवेश द्वार बेहद दर्शनीय प्रतीत होते हैं।

    प्रवेश द्वार पर विभिन्न धातुओं से नक्काशी की गयी है। जिससे दर्शनीयता आैर भी अधिक बढ़ जाती है। मंदिर की ढलानदार छत भी विशिष्ट है। इसे स्थानीय भाषा में ढ़ोचला कहा जाता है। 

   मंदिर में तारादेवी के साथ ही दुर्गा जी एवंं काली जी सहित अन्य देवियां भी विराजमान हैं। भगवान शिव भी मंदिर में विराजमान हैं। मान्यता है कि देवी तारा के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं की इच्छाओं की पूर्ति होती है। लिहाजा देवी तारा के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ निरन्तर उमड़ती रहती है।

    तांत्रिक श्मशान: तांत्रिक श्मशान एक मैदान है। इस स्थान को तांत्रिक विद्या के लिए जाना जाता है। महसमंशा के नाम से विख्यात यह श्मशान भूमि विशिष्ट मानी जाती है।

    मान्यता है कि श्मशान में देवी तारा के दर्शन होते हैं। विश्वास है कि इस स्थान पर देवी तारा के दर्शन करने से इच्छाओं की पूर्ति होती है। इस इलाके में खास तौर से साधु-संतों का डेरा रहता है। 
   संत बामखेपा: संत बामखेपा वस्तुत: तारापीठ का एक मंदिर है। बामखेपा वस्तुत: एक सिद्ध संत थे। इनको तारापीठ का एक पागल संत भी कहा जाता है। यहां का गुलाबी मंदिर संत बामखेपा को समर्पित है। 
   गांव में प्रवेश करते ही गुलाबी मंदिर स्थित है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही लाल रंग की एक समाधि मिलती है। इस समाधि पर एक गुंबद भी बना हुआ है। श्रद्धालु यहां दर्शन कर इच्छाओं की पूर्ति की कामना करते हैं।

    तारापीठ मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट नेताजी सुभाष चन्द्र बोस इण्टरनेशनल एयरपोर्ट कोलकाता है। निकटतम रेलवे स्टेशन हावड़ा जंक्शन है। पर्यटक-श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी तारापीठ मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
24.109650,87.796350

Tuesday, 17 March 2020

दिलवाड़ा मंदिर: जैन धर्म का महातीर्थ

   दिलवाड़ा मंदिर को जैन धर्म का महातीर्थ कहा जाना चाहिए। दिलवाड़ा केवल एक धाार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि स्थापत्यकला की एक सुन्दर एवं अति दर्शनीय संरचना है।

    लिहाजा इसे अद्भुत एवं विलक्षण संरचना कहा जाना चाहिए। भारत के प्रांत राजस्थान के जिला सिरोही के मांउट आबू शहर में स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिर अपनी विशिष्टताओं के कारण विश्व में प्रसिद्ध है। दिलवाड़ा जैन मंदिर वस्तुत: पांच सुन्दर एवं शानदार मंदिरों का समूह है। 

   खास यह कि इन सभी पांच मंदिरों की संरचना भिन्न है। इसे देलवाड़ा मंदिर भी कहा जाता है। विशेषज्ञों की मानें तो इन मंदिरों की संरचना 11वीं एवं 13वीं शताब्दी के मध्य की गयी। यह दिव्य-भव्य मंदिर जैन धर्म के तीर्थंकरों को समर्पित है। दिलवाड़ा मंदिर के विमल वासाही मंदिर प्रथम तीर्थंकर कोे समर्पित है।

   विशेषज्ञों की मानें तो यह मंदिर सर्वाधिक प्राचीन है। इसी प्रकार लूना वासाही मंदिर बेहद लोकप्रिय है। यह मंदिर बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ को समर्पित है। इस दिव्य भव्य मंदिर का निर्माण वास्तुपाल एवं तेजपाल भाईयों ने कराया था। संगमरमर से बना पांच मंदिरों का यह धार्मिक समूह अति दर्शनीय है।

   खास यह कि मंदिरों के 48 स्तंभों पर नृत्यांगनाओं की आकृतियां अंकित हैं। दिलवाड़ा मंदिर वस्तुत: कलात्मकता का अतुलनीय उदाहरण है। संगमरमर के पत्थरों पर बारीक नक्काशी एवं पच्चीकारी बेहद सुन्दर एवं अद्भुत है। इन विश्वविख्यात मंदिरों का शिल्प सौन्दर्य कलात्मकता का बेजोड़ खजाना है। 

   इन मंदिरों में जैन तीर्थंकरों के साथ ही हिन्दू देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मंदिर का एक उत्कृष्ट प्रवेश द्वार है। खास यह कि दिलवाड़ा मंदिर में वास्तुकला की सादगी दिखती है तो वहीं जैन मूल्यों की उत्कृष्टता दिखती है। दिलवाड़ा मंदिर मेें विमल वासाही मंदिर, लूना वासाही मंदिर, पितलहार मंदिर, पाश्र्वनाथ मंदिर एवं महावीर स्वामी मंदिर हैं।
  विमल वासाही मंदिर: विमल वासाही मंदिर सफेद संगमरमर पर तराशा गया एक सुन्दर मंदिर है। यह मंदिर गुजरात के चौलुक्य राजा भीम के मंत्री विमल शाह के द्वारा बनवाया गया था। यह मंदिर जैन महात्मा आदिनाथ को समर्पित है।

   यह मंदिर गलियारा से घिरा आंगन के मध्य में स्थित है। इसमें तीर्थंकरों की छोटी-छोटी मूर्तियां स्थापित हैं। पच्चीकारी की कलात्मकता देखते ही बनती है। गलियारे, खम्भे, मेहराब, मंडप आदि इत्यादि बहुत कुछ आश्चर्यजनक है।
   लूना वासाही मंदिर: लूना वासाही मंदिर भगवान नेमिनाथ को समर्पित है। मंदिर के मुख्य हाल को मंडप कहा जाता है। यह मंदिर खास तौर से मूर्तियों के लिए जाना एवं पहचाना जाता है। इस मंदिर में तीर्थंकरों की 360 प्रतिमाएं स्थापित हैं।

   मंदिर में हाथी कक्ष की विशेषता खास है। इसमें 10 सुन्दर हाथियों को संगमरमर पर उभारा गया है। यहां 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ की काली संगमरमर की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के बायीं ओर एक बड़ा काला कीर्ति स्तंभ है। इसका निर्माण मेवाड़ के महाराणा कुंभ ने बनवाया था। 
   पितलहार मंदिर: पितलहार मंदिर वस्तुत: प्रथम तीर्थंकर ऋषिदेव यानी आदिनाथ को समर्पित है। यहां भगवान आदिनाथ की अष्टधातु की प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। पांच धातुओं से बनी प्रतिमा के कारण ही इसे पितलहार कहा जाता है। 
  पाश्र्वनाथ मंदिर: पाश्र्वनाथ मंदिर भगवान पाश्र्वनाथ को समर्पित है। भगवान पाश्र्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे। यह तीन मंजिला मंदिर है। दिलवाड़ा मंदिर का यह सबसे ऊंचा मंदिर है। 
   गर्भगृह के चारों मुखों के भूतल पर विशाल मंडप हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों के ग्रे बलुआ पत्थर पर सुन्दर कलाकृतियां दिखती हैं। यह सजावटी शिल्पांकन श्रद्धालुओं को मुग्ध कर लेता है। 
  महावीर स्वामी मंदिर: महावीर स्वामी मंदिर भगवान महावीर को समर्पित है। भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। इस दिव्य भव्य मंदिर की संरचना 1582 में की गयी थी। 
   दीवारों पर नक्काशी युक्त यह एक अद्भुत मंदिर खास यह कि मंदिर कारीगरी का अतुलनीय उदाहरण है। असाधारण शिल्पांकन एवं वास्तुशिल्प पर्यटकों को प्रफुल्लित कर देता है।
   दिलवाड़ा जैन मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट उदयपुर है। उदयपुर एयरपोर्ट से दिलवाड़ा जैन मंदिर की दूरी करीब 185 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन आबु रोड है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी दिलवाड़ा जैन मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
24.884800,72.853500

Wednesday, 15 January 2020

लक्ष्मी नारायण मंदिर: अद्भुत स्थापत्य कला

    लक्ष्मी नारायण मंदिर भोपाल का वास्तुशिल्प अद्भुत एवं विलक्षण है। मंदिर के वास्तुशिल्प में प्राचीनता के दर्शन होते हैं। 

   भारत के मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का लक्ष्मी नारायण मंदिर वस्तुत: स्थापत्य कला का एक नायाब नमूना है। भगवान श्रीहरि विष्णु एवं लक्ष्मी जी को समर्पित यह देव स्थान श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र है। अरेरा पर्वत पर लक्ष्मी नारायण का यह मंदिर अपनी विशिष्टता के कारण वैश्विक ख्याति रखता है।

    खास यह कि इसे बिड़ला मंदिर भी कहा जाता है। धार्मिक आस्था का यह केन्द्र अपनी विशिष्टता से पर्यटकों को बरबस आकर्षित करता है। करीब 8 एकड़ क्षेत्र में फैले इस मंदिर का वास्तुशिल्प अति दर्शनीय है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान श्रीहरि नारायण एवं लक्ष्मी जी की मनोहारी प्रतिमाएं प्राण प्रतिष्ठित हैं। 

   इस दिव्य भव्य मंदिर का शिलान्यास वर्ष 1960 में किया गया था। मंदिर को वर्ष 1964 में आम जनता के दर्शनार्थ लोकार्पित कर दिया गया। मंदिर में विभिन्न पौराणिक कथानकों को नक्काशी के माध्यम से दृश्यांकित किया गया है। संगमरमर पर दर्शित नक्काशी अति दर्शनीय एवं मनोहारी है। 

   खास यह कि इन नक्काशी में गीता एवं रामायण के उपदेश भी अंकित हैं। इस दिव्य भव्य मंदिर में भगवान श्रीहरि एवं लक्ष्मी जी के अलावा भगवान शिव एवं मां जगदम्बा आदि भी विराजमान हैं। मंदिर परिसर में भगवान हनुमान जी एवं शिवलिंग भी स्थापित हैं।

   मंदिर का मुख्य आकर्षण विशाल शंख है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने स्थित विशाल शंख अति दर्शनीय है। राधा कृष्ण की प्रतिमाएं भी बेहद लुभावनी हैं।
   श्री कृष्ण जन्माष्टमी मंदिर में मुख्य पर्व के रूप में मनाया जाता है। भोपाल स्थित बिड़ला मंदिर के अलावा भोजपुर में स्थित भगवान शिव का मंदिर भी यहां का एक धार्मिक आकर्षण है। 

   भोजपुर वस्तुत: एक अति प्राचीन शहर है। भोपाल से करीब 28 किलोमीटर दूर स्थित भोजपुर धर्म के लिए बेहद प्रसिद्ध है। भोजपुर स्थित भगवान शिव का मंदिर भोजेश्वर महादेव मंदिर यहां का मुख्य आकर्षण है।
  खास यह कि इस दिव्य भव्य मंदिर को पूर्व का सोमनाथ कहा जाता है। भोजपुर की स्थापना गुर्जर परमार राजवंश के राजा भोज ने की थी। 

   शायद इसीलिए इस शहर को राजा भोज के नाम से भोजपुर चर्चित है। यह स्थान भगवान शिव के मंदिर के साथ साथ साईक्लोपियन बांध के लिए भी जाना एवं पहचाना जाता है।
   भोजेश्वर मंदिर की स्थापत्य कला अति सुन्दर है। मंदिर एक ऊंचे चबूतरा पर स्थित है। इस मंदिर के गर्भगृह में करीब साढ़े तीन मीटर लम्बा शिवलिंग स्थापित है।

  मान्यता है कि यह शिवलिंग भारत के विशाल शिवलिंगों में से एक है। भोजपुर एक ऐतिहासिक एवं पौराणिक दर्शनीय स्थल है। वस्तुत: देखें तो भोपाल धार्मिक पर्यटन के साथ साथ मन मस्तिष्क को एक प्रफुल्लता प्रदान करता है। वास्तुकला का प्रदर्शन देखना हो तो भोपाल सबसे बेहतरीन शहर है।

   भोपाल में दर्शनीय स्थलों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। खास तौर से देखें तो भारत भवन, शौर्य स्मारक, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, मोती मस्जिद, ताज उल मस्जिद, शौकत महल, सदर मंजिल, गौहर महल, पुरातात्विक संग्रहालय आदि इत्यादि बहुत कुछ दर्शनीय है।
   भारत भवन: भारत भवन खास तौर से उत्तर भारत का सर्वाधिक पसंदीदा एवं प्रसिद्ध कला केन्द्र है। इसे अनूठा संस्थान कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। वर्ष 1982 में संरचित भारत भवन अनेक रचनात्मक क्रियाकलापों के प्रदर्शन के लिए है। 
   इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भी भोपाल का एक मुख्य आकर्षण है। करीब 200 एकड़ में फैला यह अनोखा संग्रहालय श्यामला पहाड़ियों के क्षेत्र में स्थित है। इसी प्रकार पुरातात्विक संग्रहालय भी भोपाल का एक अन्य आकर्षण है। बनगंगा रोड पर स्थित यह संग्रहालय मूर्तियों के लिए जाना एवं पहचाना जाता है। 

   शौर्य स्मारक: शौर्य स्मारक शहर के अरेरा पहाड़ी इलाके में स्थित है। करीब 12 एकड़ में फैला शौर्य स्मारक शहीद सैनिकों को समर्पित है। इसमें पाकिस्तान एवं चीन से हुए युद्ध से संबंधित प्रदर्शनियां हैं। 
   मोती मस्जिद: मोती मस्जिद की स्थापत्य कला अति दर्शनीय है। इस मस्जिद को कदसिया बेगम की बेटी सिकंदर जहां बेगम ने 1860 में बनवाया था। इसी प्रकार ताज उल मस्जिद, शौकत महल, सदर मंजिल, गौहर महल आदि इत्यादि स्थापत्य कला की सुन्दर संरचना है।
   लक्ष्मी नारायण मंदिर सहित भोपाल की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट राजा भोज एयरपोर्ट भोपाल है। निकटतम रेलवे स्टेशन भोपाल रेलवे जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी लक्ष्मी नारायण मंदिर भोपाल की यात्रा कर सकते हैं।
23.252319,77.431091

Thursday, 2 January 2020

जयंती शक्तिपीठ: धार्मिक पर्यटन

   जयंती शक्तिपीठ को धार्मिक स्थान के साथ ही बेहतरीन पर्यटन कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। देवी सती का यह स्थान मुख्य रूप से माता दुर्गा को समर्पित है। 

   भारत के मेघालय की जयंतिया हिल्स पर स्थित जयंती शक्तिपीठ श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र है। विशेषज्ञों की मानें तो जयंती शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठ में से एक है। हिन्दू धर्म पुराणों की मानें तो देवी सती के शव के अंग जिन स्थानों पर गिरे, उन स्थानों को शक्तिपीठ माना गया।

   सती के अंग के हिस्से, आभूषण एवं वस्त्र आदि इत्यादि गिरने वाले स्थान ही शक्तिपीठ के रूप में पूजित हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक यह शक्तिपीठ अत्यंत पवित्र महातीर्थ कहलाते हैं। खास यह है कि शक्तिपीठ के रूप में यह महातीर्थ भारतीय उपमहाद्वीप में चहुंओर फैले हुए हैं।

   मान्यता है कि इन शक्तिपीठ की संख्या 51 है। देवी पुराण में भी 51 शक्तिपीठ माने गये हैं। इन 51 शक्तिपीठ में जयंती शक्तिपीठ भी एक है। शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा को समर्पित जयंती शक्तिपीठ मेघालय के शीर्ष धार्मिक स्थलों में से एक है।

    शारदीय एवं चैत्र नवरात्र में जयंती शक्तिपीठ में मां भगवती के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। मान्यता है कि मां भगवती के दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भारत के पूर्वोत्तर का मेघालय वस्तुत: पर्वतीय राज्य है।

   लिहाजा मेघालय अधिसंख्य पहाड़ों पर रचा बसा है। जाहिर सी बात है कि ऐसे में पर्वतीय सौन्दर्य से श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों का मन प्रफुल्लित होगा।
   वस्तुत: मेघालय का यह इलाका जनजातीय बाहुल्य इलाका है। जयंतिया, गारी एवं खासी मेघालय की मुख्य पहाड़ियां हैं। इनमें जयंतिया पहाड़ी बेहद प्रसिद्ध है।

   खास तौर से जयंतिया अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है। इस जयंतिया पहाड़ी के गांव नारतियांग में जयंती शक्तिपीठ स्थित है। नारतियांग खास तौर से जयंती शक्तिपीठ के लिए जाना एवं पहचाना जाता है।

   यह भी कहा जा सकता है कि जयंती शक्तिपीठ जयंतिया हिल्स का मुख्य आकर्षण है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जयंतिया पहाड़ी पर स्थित जयंती शक्तिपीठ के चौतरफा एक खास सुरम्यता दिखती है।

 यह शांत सुरम्यता श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के दिल एवं दिमाग को एक ताजगी एवं प्रफुल्लता प्रदान करती है। मान्यता है कि जयंतिया पहाड़ी के इस स्थान पर सती शव के वाम जंघ का निपात हुआ था। लिहाजा इस स्थान को शक्तिपीठ की मान्यता मिली।

   शिलांग से करीब 53 किलोमीटर दूर स्थित जयंती शक्तिपीठ पवित्र धाम के साथ ही महातीर्थ भी कहा जाता है।

   विशेषज्ञों की मानें तो जयंती शक्तिपीठ में भगवान शिव एवं देवी सती मुख्य रूप से पूजित हैं। खास यह है कि शक्तिपीठ में सती को जयंती एवं भगवान शिव को क्रमदीश्वर महादेव के रूप में पूजित हैं।

   जयंती शक्तिपीठ की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट गुवाहाटी एयरपोर्ट है। गुवाहाटी एयरपोर्ट से जयंती शक्तिपीठ की दूरी करीब 181 किलोमीटर है।

   श्रद्धालु शिलांग एयरपोर्ट से भी जयंती शक्तिपीठ की यात्रा कर सकते हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन गोलपारा टाउन जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी जयंती शक्तिपीठ की यात्रा कर सकते हैं।
25.443501,92.196701

Monday, 30 December 2019

सूर्य मंदिर: विलक्षण एवं अद्भुत वास्तुशिल्प

   सूर्य मंदिर रांची का वास्तुशिल्प विलक्षण एवं अद्भुत कहा जाना चाहिए। जी हां, सूर्य मंदिर का सौन्दर्य अतुलनीय है। शायद इसी लिए इस मंदिर को अद्भुत माना जाता है। 

   खास यह कि 18 शानदार पहियों पर विद्यमान मंदिर का वास्तुशिल्प अनूठा है। इस मंदिर को रथ पर विद्यमान किया गया है। जिससे इसकी दर्शनीयता अति सुन्दर हो जाती है। भारत के झारखण्ड की राजधानी रांची में स्थित यह सूर्य मंदिर अपनी विशिष्टता के कारण खास ख्याति रखता है। 

   उल्लेखनीय है कि भारत में सूर्य मंदिरों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है लेकिन रांची का सूर्य मंदिर काफी कुछ विशिष्ट है। जिससे इसकी विलक्षणता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
   इस मंदिर को 18 पहियों एवं सात घोड़ों के रथ पर विद्यमान किया गया है। दौड़ते घोड़ों के इस रथ को देखना बेहद सुन्दर प्रतीत होता है।

   ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे स्वर्ग से धरातल की ओर रथ दौड़ता चला आ रहा हो। दौड़ते रथ पर सूर्य मंदिर का विद्यमान होना काफी कुछ विलक्षण प्रतीत होता है। इस सूर्य मंदिर को रांची का मुख्य आकर्षण माना जाता है। खास यह है कि रांची का यह सूर्य मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए बेहद प्रसिद्ध है। 

   रांची से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित यह सूर्य मंदिर धार्मिक स्थान होने के साथ ही एक शानदार पर्यटन क्षेत्र भी है। इसे एक सुन्दर पिकनिक स्पॉट भी कहा जा सकता है। मंदिर परिसर में एक विशाल जलाशय भी है। इस जलाशय की अपनी एक विशिष्ट पवित्रता है। 

    मान्यता है कि इस जलाशय में स्नान करने से पापों का नाश होता है। लिहाजा श्रद्धालु इस जलाशय में स्नान करने के उपरांत मंदिर में सूर्य देव के दर्शन करतेे हैं। यहां का मुख्य पर्व छठ पूजा है। छठ पूजा का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है।
   इस अवसर पर श्रद्धालु इस पवित्र जलाशय में डुबकी लगाते हैं। तत्पश्चात सूर्य उपासना एवं दर्शन करते हैं। इसे हिन्दुओं का तीर्थधाम कहा जाना चाहिए। 

   रांची के इस महातीर्थ के साथ ही रांची का देवरी मंंदिर भी खास प्रसिद्ध है। देवरी मंदिर रांची से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित है। देवरी मंदिर मुख्य रूप से मां दुर्गा को समर्पित है। मंदिर अति प्राचीन माना जाता है। खास यह कि मंदिर समृद्ध धार्मिक विरासत के गर्व का अनुभव कराता है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो मंदिर 10वीं से 11वीं शताब्दी के काल का है। मंदिर की दिव्यता-भव्यता श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। मंदिर की वास्तुकला अद्भुत एवं अति सुन्दर है। लिहाजा श्रद्धालुओं का मन मस्तिष्क प्रफुल्लित हो उठता है। बलुआ पत्थरों से संरचित मंदिर का वास्तुशिल्प अनूठा है। 

   मंदिर की दीवारों पर देवी देवताओं का अंकन श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास को रेखांकित करता है। इसे सोलहभुजी मंदिर भी कहा जाता है। कारण यह कि मंदिर में प्रतिष्ठापित माता दुर्गा की भव्य दिव्य प्रतिमा सोलह अस्त्र-शस्त्र धारण किये है। लिहाजा इसे सोलहभुजी मंदिर कहा जाता है। 

   मान्यता है कि प्रतिमा 700 वर्ष प्राचीन है। रांची का टैगोर हिल भी काफी कुछ खास है। रांची में अल्बर्ट एक्का चौक से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित टैगोर हिल वस्तुत: एक आध्यात्मिक क्षेत्र है। समुद्र तल से करीब 300 फुट की ऊंचाई पर स्थित टैगोर हिल रांची का मुख्य आकर्षण है।

   खास यह कि इसे मोहराबादी हिल के नाम से भी जाना एवं पहचाना जाता है। इस हिल पर वस्तुत: एक शानदार परिसर है। मान्यता है कि इस परिसर का ताल्लुक रविन्द्र नाथ टैगोर से है। ऐसा माना जाता है कि इस स्थान पर बैठ कर रविन्द्र नाथ टैगोर पुस्तकें लिखा करते थे। यहां से चौतरफा नैसर्गिक सौन्दर्य के शानदार दर्शन होते थे।

    टैगोर हिल सेे सूर्योदय एवं सूर्यास्त के अद्भुत दर्शन होते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो रविन्द्र नाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिन्द्र नाथ टैगोर इस पर्वत के प्राकृतिक सौन्दर्य पर मुग्ध थे।
   लिहाजा उन्होंने इस पर्वत को अपना शिविर बनाया था। जिसे बाद में टैगोर हिल के नाम से जाना एवं पहचाना जाने लगा। इस पर्वत की यात्रा करने के लिए पर्यटकों को 200 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। इसे एक शानदार पर्यटन माना जाता है।

   सूर्य मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बिरसा मुंडा इण्टरनेशनल एयरपोर्ट रांची है। निकटतम रेलवे स्टेशन रांची जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी सूर्य मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
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तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...