सूर्य मंदिर: विलक्षण एवं अद्भुत वास्तुशिल्प
सूर्य मंदिर रांची का वास्तुशिल्प विलक्षण एवं अद्भुत कहा जाना चाहिए। जी हां, सूर्य मंदिर का सौन्दर्य अतुलनीय है। शायद इसी लिए इस मंदिर को अद्भुत माना जाता है।
खास यह कि 18 शानदार पहियों पर विद्यमान मंदिर का वास्तुशिल्प अनूठा है। इस मंदिर को रथ पर विद्यमान किया गया है। जिससे इसकी दर्शनीयता अति सुन्दर हो जाती है। भारत के झारखण्ड की राजधानी रांची में स्थित यह सूर्य मंदिर अपनी विशिष्टता के कारण खास ख्याति रखता है।
उल्लेखनीय है कि भारत में सूर्य मंदिरों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है लेकिन रांची का सूर्य मंदिर काफी कुछ विशिष्ट है। जिससे इसकी विलक्षणता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
इस मंदिर को 18 पहियों एवं सात घोड़ों के रथ पर विद्यमान किया गया है। दौड़ते घोड़ों के इस रथ को देखना बेहद सुन्दर प्रतीत होता है।
ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे स्वर्ग से धरातल की ओर रथ दौड़ता चला आ रहा हो। दौड़ते रथ पर सूर्य मंदिर का विद्यमान होना काफी कुछ विलक्षण प्रतीत होता है। इस सूर्य मंदिर को रांची का मुख्य आकर्षण माना जाता है। खास यह है कि रांची का यह सूर्य मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए बेहद प्रसिद्ध है।
रांची से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित यह सूर्य मंदिर धार्मिक स्थान होने के साथ ही एक शानदार पर्यटन क्षेत्र भी है। इसे एक सुन्दर पिकनिक स्पॉट भी कहा जा सकता है। मंदिर परिसर में एक विशाल जलाशय भी है। इस जलाशय की अपनी एक विशिष्ट पवित्रता है।
मान्यता है कि इस जलाशय में स्नान करने से पापों का नाश होता है। लिहाजा श्रद्धालु इस जलाशय में स्नान करने के उपरांत मंदिर में सूर्य देव के दर्शन करतेे हैं। यहां का मुख्य पर्व छठ पूजा है। छठ पूजा का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है।
इस अवसर पर श्रद्धालु इस पवित्र जलाशय में डुबकी लगाते हैं। तत्पश्चात सूर्य उपासना एवं दर्शन करते हैं। इसे हिन्दुओं का तीर्थधाम कहा जाना चाहिए।
रांची के इस महातीर्थ के साथ ही रांची का देवरी मंंदिर भी खास प्रसिद्ध है। देवरी मंदिर रांची से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित है। देवरी मंदिर मुख्य रूप से मां दुर्गा को समर्पित है। मंदिर अति प्राचीन माना जाता है। खास यह कि मंदिर समृद्ध धार्मिक विरासत के गर्व का अनुभव कराता है।
विशेषज्ञों की मानें तो मंदिर 10वीं से 11वीं शताब्दी के काल का है। मंदिर की दिव्यता-भव्यता श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। मंदिर की वास्तुकला अद्भुत एवं अति सुन्दर है। लिहाजा श्रद्धालुओं का मन मस्तिष्क प्रफुल्लित हो उठता है। बलुआ पत्थरों से संरचित मंदिर का वास्तुशिल्प अनूठा है।
मंदिर की दीवारों पर देवी देवताओं का अंकन श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास को रेखांकित करता है। इसे सोलहभुजी मंदिर भी कहा जाता है। कारण यह कि मंदिर में प्रतिष्ठापित माता दुर्गा की भव्य दिव्य प्रतिमा सोलह अस्त्र-शस्त्र धारण किये है। लिहाजा इसे सोलहभुजी मंदिर कहा जाता है।
मान्यता है कि प्रतिमा 700 वर्ष प्राचीन है। रांची का टैगोर हिल भी काफी कुछ खास है। रांची में अल्बर्ट एक्का चौक से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित टैगोर हिल वस्तुत: एक आध्यात्मिक क्षेत्र है। समुद्र तल से करीब 300 फुट की ऊंचाई पर स्थित टैगोर हिल रांची का मुख्य आकर्षण है।
खास यह कि इसे मोहराबादी हिल के नाम से भी जाना एवं पहचाना जाता है। इस हिल पर वस्तुत: एक शानदार परिसर है। मान्यता है कि इस परिसर का ताल्लुक रविन्द्र नाथ टैगोर से है। ऐसा माना जाता है कि इस स्थान पर बैठ कर रविन्द्र नाथ टैगोर पुस्तकें लिखा करते थे। यहां से चौतरफा नैसर्गिक सौन्दर्य के शानदार दर्शन होते थे।
टैगोर हिल सेे सूर्योदय एवं सूर्यास्त के अद्भुत दर्शन होते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो रविन्द्र नाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिन्द्र नाथ टैगोर इस पर्वत के प्राकृतिक सौन्दर्य पर मुग्ध थे।
लिहाजा उन्होंने इस पर्वत को अपना शिविर बनाया था। जिसे बाद में टैगोर हिल के नाम से जाना एवं पहचाना जाने लगा। इस पर्वत की यात्रा करने के लिए पर्यटकों को 200 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। इसे एक शानदार पर्यटन माना जाता है।
सूर्य मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बिरसा मुंडा इण्टरनेशनल एयरपोर्ट रांची है। निकटतम रेलवे स्टेशन रांची जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी सूर्य मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
23.369900,85.325279
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