Wednesday, 28 August 2019

शंकराचार्य मंदिर : इन्द्रधनुषी स्थापत्य कला

    शंकराचार्य मंदिर को वास्तुकला का इन्द्रधनुषी आयाम कहा जाना चाहिए। खास तौर से यह मंदिर कश्मीरी वास्तुकला को बेहतरीन तौर तरीके से प्रस्तुत करता है। 

   भारत के जम्मू एवं कश्मीर के श्रीनगर स्थित शंकराचार्य मंदिर का वास्तुशिल्प अद्भुत एवं विलक्षण है। कश्मीर के दक्षिण-पूर्वी इलाके में स्थित शंकराचार्य मंदिर एक शानदार धार्मिक पर्यटन स्थल भी है।

   समुद्र तल से करीब 1100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित शंकराचार्य मंदिर एक सुरम्य एवं शांत धार्र्मिक स्थल है। भगवान शिव को समर्पित यह भव्य-दिव्य मंदिर शंकराचार्य पर्वत पर स्थित है। गोपदरी हिल स्टेशन इलाके में स्थित शंकराचार्य मंदिर के गर्भगृह में विशाल शिवलिंग प्राण प्रतिष्ठित है। 

   खास यह कि यह विशाल मंदिर एक विशाल चट्टान पर स्थित है। खास यह भी है कि इस मंदिर में 13 परतों वाला एक अष्टकोणीय तहखाना भी है। तहखाना से लेकर मंदिर के आन्तरिक एवं बाह्य परिदृश्य में कश्मीरी स्थापत्य कला का शानदार दर्शन होता है।

  पत्थरों के विशाल शिलाखण्ड पर अंकित मूर्ति शिल्प अति दर्शनीय है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिमाएं जीवंत हों। कलात्मकता देखते ही बनती है। नक्काशी में कलात्मकता के दर्शन होते है। यह कलात्मकता मुग्ध करने वाली है। रोशनी में मंदिर का सौन्दर्य आैर भी अधिक निखर आता है।
   मंदिर एक गोलाकार कक्ष की भांति दर्शित है। शंकराचार्य पर्वत पर स्थित इस दिव्य भव्य मंदिर परिसर से कश्मीर घाटी का प्राकृतिक सौन्दर्य परिलक्षित होता है। 
  कश्मीर घाटी के मनोरम दृश्य श्रृद्धालुओं-पर्यटकों को मुग्ध कर लेते हैं। इस स्थान से श्रीनगर की झीलों एवं झरनों का सौन्दर्य देखते ही बनता है। विशाल हिमालय की शान एवं शोभा हैं। 

   ऊंचाई पर स्थित होने के कारण मंदिर की दिव्यता-भव्यता का अपना एक अलग आकर्षण है। मंदिर जाने के लिए श्रृद्धालुओं को करीब 200 सीढ़ियांं चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर से श्रीनगर की खूबसूरत घाटियां-वादियां एक सम्मोहन सा पैदा करती हैं। 

   शंकराचार्य मंदिर को ज्येष्ठेश्वर मंंदिर एवं पास पहाड़ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण कश्मीर के राजा गोपादत्य ने कराया था। विशेषज्ञों की मानें तो इस मंदिर का निर्माण अति प्राचीन है। 

   चूंकि मंदिर का निर्माण राजा गोपादत्य ने कराया था। लिहाजा उस समय इस मंदिर को राजा गोपादत्य के नाम से ही जाना पहचाना गया।

   मान्यता है कि कश्मीर घाटी का यह सबसे प्राचीन मंदिर है। बाद में मंदिर का नाम बदल कर शंकराचार्य मंदिर कर दिया गया था। मान्यता है कि संत शंकराचार्य 9वीं शताब्दी में सनातन धर्म को पुर्नजीवित करने के लिए कश्मीर आये थे। 

  शायद इसी कारण इस दिव्य-भव्य मंदिर का नाम बदल कर शंकराचार्य मंदिर रखा गया था। इस मंदिर को पहले गोपादरी मंदिर भी कहा जाता था। 

   कश्मीर यात्रा के दौरान संत आदि शंकराचार्य इस स्थान पर ठहरते एवं पूजा अर्चना करते थे। बाद में श्रृद्धालुओं की सुविधा सहूलियत को ध्यान में रखते हुए डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह ने धरातल से पर्वत के ऊपर मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण कराया था। 

   शंकराचार्य मंदिर हिन्दुओं का धार्मिक स्थान होने के साथ ही पुरातात्विक महत्व भी रखता है।
शंकराचार्य मंदिर श्रीनगर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। 

   निकटतम एयरपोर्ट श्रीनगर एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन नौगाम जंक्शन है। पर्यटक उधमपुर रेलवे स्टेशन से भी शंकराचार्य मंदिर की यात्रा कर सकते हैं। श्रृद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी शंकराचार्य मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
34.071750,74.804320

Monday, 5 August 2019

चिलकुर बाला जी : अद्भुत एवंं विलक्षण

   चिलकुर बाला जी का मंदिर अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। जी हां, वास्तुकला की यह शानदार संरचना अनुपम है।

   मान्यता है कि विदेश यात्रा में कोई व्यवधान आ रहा हो तो श्रद्धालुओं कोे चिलकुर बाला जी के दर्शन करने चाहिए। शायद इसी लिए चिलकुर बाला जी को वीसा बाला जी भी कहा जाता है।

   भारत के प्रांत तेलंगाना के शहर हैदराबाद स्थित चिलकुर बाला जी मंदिर वस्तुत: भगवान वेंकटेश्वर को समर्पित है। मान्यता है कि भगवान वेंकटेश्वर का यह मंदिर अति प्राचीन एवं जागृत है। 

  विशेषज्ञों की मानें तो इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण आक्कान्ना एवं मदन्ना ने संयुक्त रूप से कराया था। मान्यता है कि एक भक्त हमेशा तिरुपति बाला जी के दर्शन के लिए जाता था लेकिन एक वर्ष बीमार होने के कारण भक्त दर्शन के लिए तिरुपति बाला जी नहीं जा सके।

  लिहाजा भगवान वेंकटेश्वर ने दर्शन दिये कि मैं यहीं हैदराबाद के जंगलों में विद्यमान हूं। चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। भक्त ने स्वप्न में देखेे स्थान पर जाकर देखा कि उक्त पहाड़ी के स्थान पर छछूंदर ने छेद किया है।

   खोदाई पर भगवान बाला जी की प्रतिमा का प्राक्ट्य हुआ। इस प्रतिमा में भगवान वेंकटेश्वर के साथ भूदेवी एवं श्रीदेवी भी विराजमान हैं। वैदिक पराम्परा एवं विधि विधान से मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गयी। मंदिर में स्थापित भगवान वेंकटेश्वर की प्रतिमा स्वयंभू हैं।

  भगवान वेंकटेश्वर के साथ भूदेवी एवं श्रीदेवी का पूजन अर्चन भी विधि विधान से होता है। विशेषज्ञों की मानें तो यह बेहद दुर्लभ संयोग है। खास यह है कि चिलकुर बाला जी मंदिर की संरचना एवंं वास्तुशिल्प इसकी प्राचीनता को स्वत: बयां करता है। 

   खास यह कि चिलकुर बाला जी मंदिर में स्थापित मूर्तियां भी काफी खास दिखती हैं। मूर्ति के तीन हाथों में कमल है जबकि चौथा हाथ शरणागति का प्रतीक है। इस मंदिर में जीर की भी प्रतिमा स्थापित है। 

   मान्यता है कि भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं की इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है।  इस दिव्य-भव्य मंदिर की संरचना करीब 500 वर्ष प्राचीन है। 

   खास यह कि शानदार मंदिर में दान एवं दक्षिणा की परम्परा नहीं है। वीआईपी या वीवीआईपी कल्चर भी यहां की व्यवस्थाओं में शामिल नहीं है। 

   मंदिर में अनाकोटा, ब्राह्महोत्सवमस एवं पोलांग आदि उत्सव खास हैं। श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को चिलकुर बाला जी मंदिर की यात्रा अक्टूबर से जनवरी की अवधि में करनी चाहिए।

  चिलकुर बाला जी की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट हैदराबाद एयरपोर्ट है। 

   हैदराबाद एयरपोर्ट से मंदिर की दूरी करीब 22 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन हिमायत नगर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी चिलकुर बाला जी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
17.342991,78.307999

Friday, 2 August 2019

चामुंडेश्वरी मंदिर : बेहतरीन स्थापत्य कला

   चामुंडेश्वरी मंदिर की स्थापत्य कला का कोई जोड़ नहीं। जी हां, द्रविड़ शैली पर आधारित चामुंडेश्वरी मंदिर की स्थापत्य कला विलक्षण एवं अद्भुत है।

   इसकी कलात्मक संरचना श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को मुग्ध कर लेती है। भारत के प्रांत कर्नाटक के शहर मैसूर में स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर वस्तुत: देवी पार्वती को समर्पित है। चामुंडेश्वरी मंदिर मैसूर की चामुंडी पहाड़ी पर स्थित है। खास यह कि यह धार्मिक स्थान के साथ ही सुरम्यता के लिए भी जाना पहचाना जाता है।

   समुद्र तल से करीब 1065 मीटर ऊंचाई पर स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर की स्थापत्य कला पर्यटकों कोे खुद-ब-खुद आकर्षित करती है। मान्यता है कि चामुंडेश्वरी देवी पार्वती का स्वरूप हैं। देवी पार्वती का अवतार माने जाने वाली चामुंडेश्वरी को यह मंदिर समर्पित है।

   विशेषज्ञों की मानें तो इस दिव्य-भव्य मंदिर की संरचना 11 वीं शताब्दी में की गयी थी। वर्ष 1827 के आसपास मैसूर के राजाओं ने इसका जीर्णोद्धार एवंं सुधार कराया था। खास यह कि इस शानदार एवं सुन्दर मंदिर के सामने राक्षस राजा महिषासुर की विशाल प्रतिमा विद्यमान है। 

   चामुंडी पहाड़ी की एक खासियत यह है कि इस पर्वत चोटी पर 5 मीटर ऊंची नंदी की विशाल प्रतिमा स्थापित है। मान्यता है कि नंदी की यह प्रतिमा दक्षिण भारत में दूसरी सबसे बड़ी प्रतिमा है। विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1659 में इसे काले ग्रेनाइट पत्थर को तराश कर बनाया गया था। 

    देवी चामुंडेश्वरी मंदिर के निकट ही हनुमान जी को समर्पित एक मंदिर है। चामुंडेश्वरी मंदिर शहर मैसूर से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित है। मान्यता है कि इस दिव्य-भव्य स्थान का नाम चामुंडेश्वरी या पार्वती के नाम पर इस लिए रखा गया क्योंकि यह शक्ति स्वरूपा हैं। चामुंडेश्वरी मंदिर की मान्यता शक्तिपीठ की है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो 18 महा शक्ति पीठों में चामुंडेश्वरी मंदिर एक शक्ति पीठ है। खास यह कि इसे क्रौैंच पीठ के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। प्राचीनकाल में इसे क्रौंच पुरी के नाम से जाना पहचाना जाता था। शक्ति पीठों की उत्पत्ति राजा दक्ष एवं सती के आत्मदाह से ताल्लुुक रखते हैं। देवी सती के शव के अंगों के गिरने वाले स्थानों को शक्ति पीठ का महत्व दिया गया। 

   देवी सती के 51 शक्ति पीठ की मान्यता है। इन सभी शक्ति पीठ में शक्ति एवं कालभैरव के मंदिर हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती के शव के बाल यहां गिरे थे। यहां शक्ति को चामुंडेश्वरी के रूप में माना जाता है।

   मंदिर के मुख्य गर्भगृह में चामुंडेश्वरी देवी की सोने की प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित है। प्रतिमा की दर्शनीयता अति मुग्ध करने वाली है। चामुंडेश्वरी मंदिर की चढ़ाई के मार्ग में ही नंदी के दर्शन होते हैं। चामुंडेश्वरी मंदिर द्रविड़ कला की शानदार संरचना है। सात मंजिला यह मंदिर कलात्मकता का दर्शन कराता है। इस मंदिर की ऊंचाई करीब 40 मीटर है।

   खास यह कि मुख्य मंदिर के पीछे महाबलेश्वर को समर्पित एक छोटा मंदिर है। मान्यता है कि यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना है। खास यह कि चामुंडेश्वरी मंदिर अर्थात चामुंडी पहाड़ी से पर्यटक मैसूर की खूबसूरती देख सकते हैं। मैसूर शहर का अद्भुत नजारा यहां से दिखता है। खास तौर से तारों भरी चांदनी रात पर्यटकों को रोमांच से भर देती है।

   चामुंडेश्वरी मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट मैसूर एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट से चामुंडेश्वरी मंदिर की दूरी करीब 7 किलोमीटर है।
  इसके अलावा पर्यटक बेंगलुरु एयरपोर्ट से भी चामुंडेश्वरी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं। बेंगलुरु एयरपोर्ट से चामुंडेश्वरी मंदिर की दूरी करीब 139 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन मैसूर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी चामुंडेश्वरी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
12.295810,76.639381

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...