गुप्तकाशी : दर्शनीय एवं धार्मिक पर्यटन
गुप्तकाशी हिल स्टेशन को दर्शनीय एवं धार्मिक पर्यटन कहा जाना चाहिए। धर्म एवं आध्यात्म की इस शानदार नगरी को प्रकृति का शानदार उपहार कहा जा सकता है।
चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य की निराली छटा पर्यटकों को रोमांचित कर देती है। भारत के उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग का यह सुन्दर पर्यटन स्थल धर्म, आस्था एवं विश्वास का भी केन्द्र है। गुप्तकाशी वस्तुत: रुद्रप्रयाग-गौरीकुण्ड मार्ग स्थित एक छोटा शहर है।
खास यह कि इस क्षेत्र को प्रकृति ने सुन्दरता का शानदार उपहार सौंपा है। सामान्यत: देखा जाये तो गुप्तकाशी चार धाम यात्रा केदारनाथ का मुख्य पड़ाव है। देखा जाये तो उत्तराखण्ड में मुख्य पांच प्रयाग हैं। इनमें देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग एवं विष्णुप्रयाग हैं। रुद्रप्रयाग से मंदाकिनी नदी के किनारे गुप्तकाशी मार्ग है।
गुप्तकाशी का यह मार्ग करीब 25 किलोमीटर लम्बा है। इसी मार्ग पर ऋषि अगस्त्य मुनि का स्थान है। इस स्थान पर अगस्त्य मुनि का भव्य-दिव्य मंदिर है।
गुप्तकाशी का मार्ग अति सुन्दर एवं रमणीक है। एक लम्बी चढ़ाई के बाद गुप्तकाशी के दर्शन होते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो धर्म एवं आध्यात्म की मान्यताओं में खास तौर से तीन काशी प्रचलित हैं। इनमें उत्तराखण्ड में भागीरथी के किनारे उत्तरकाशी एवं गुप्तकाशी एवं उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर की काशी है।
गुप्तकाशी को वस्तुत: भगवान शिव का स्थान माना जाता है। भगवान शिव ने इस स्थान का उपयोग पाण्डव को दर्शन देने से बचने को छिपने के लिए किया था। गुप्तकाशी में एक दिव्य-भव्य कुण्ड है। इस कुण्ड को मणिकर्णिका कुण्ड कहा जाता है। इस कुण्ड में जल की दो धारायें गिरती हैं। मान्यता है कि यह जलधारायें गंगा एवं यमुना की हैं।
इस कुण्ड के सामने भगवान विश्वनाथ का भव्य-दिव्य मंदिर है। यह भगवान के अर्धनारीश्वर स्वरुप को दर्शित करता है। इस मंदिर में भगवान शिव एवं पार्वती के मिश्रित स्वरूप में दर्शन देते हैं। इस स्थान के नामकरण गुप्तकाशी को लेेकर किवदंती है कि भगवान शिव ने इस स्थान का उपयोग छिपने के लिए किया था।
लिहाजा इसे गुप्तकाशी कहा जाता है। पौराणिक काल में पाण्डव ने भगवान शिव के दर्शन के लिए तपस्या की थी लेकिन भगवान शिव दर्शन देने से बचना चाहते थे। लिहाजा भगवान शिव इस स्थान पर छिप गये थे। मान्यता है कि भगवान शिव काशी को छोड़ कर छिपने के लिए इस स्थान पर आये थे। किवदंती है कि पाण्डव भगवान का पीछा करते हुए गौरीकुण्ड तक जाते हैं।
भगवान शिव एक सांड का स्वरूप धारण कर छिपने का प्रयास करते हैं। पाण्डव बंधु भीम सांड़ का पीछा करते हैं लेकिन सांड़ पकड़ में नहीं आता अपितु सांड़ बर्फ में सिर घुसा कर छिपने की कोशिश करते हैं। भीम सांड़ की पूंछ पकड़ कर खींचते हैं।
सांड़ अपने सिर को विस्तार देता है आैर सिर नेपाल के पशुपतिनाथ में निकलता है। पशुपतिनाथ की भी द्वादश ज्योतिर्लिंग की मान्यता है। अन्तोगत्वा, भगवान शिव सांड़ का स्वरूप त्याग कर पाण्डवों को साक्षात दर्शन देते हैं।
जिससे पाण्डवों को पापों से मुक्ति मिलती है। लिहाजा गुप्तकाशी को भगवान शिव का स्थान माना जाता है। हिन्दुओ का यह अति पवित्र एवं आस्था का स्थान माना जाता है।
गुप्तकाशी अति दर्शनीय स्थल है। चौखम्बा की बर्फ से आच्छादित पर्वत चोटियों की सुन्दरता गुप्तकाशी के प्राकृतिक सौन्दर्य में चार चांद लगाती हैं। चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों को खास तौर से रोमांचित करता है। कथानक की मानें तो इसे पंचकेदार भी माना जाता है।
गुप्तकाशी हिल स्टेशन की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट से गुप्तकाशी की दूरी करीब 190 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश जंक्शन है। पर्यटक गुप्तकाशी की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
30.284500,78.979200
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