Wednesday, 31 July 2019

स्वामी मलाई मंदिर : हिन्दुओं का महातीर्थ

   स्वामी मलाई मंदिर को हिन्दुओं का महातीर्थ कहा जाना चाहिए। कारण भगवान कार्तिकेय के श्रेष्ठ मंदिरों में से स्वामी मलाई मंदिर एक है। इसे मुरुगन मंदिर भी कहा जाता है। 

   भगवान कार्तिकेय को समर्पित यह मंदिर विलक्षण एवं अद्भुत माना जाता है। भारत के तमिलनाडु के कुम्बकोणं में स्थित यह दिव्य-भव्य मंदिर हिन्दुओं की आस्था का केन्द्र है। मान्यता है कि स्वामी मलाई मंदिर भगवान कार्तिकेय के विविध चरणों से ताल्लुक रखता है।

   स्वामी मलाई वह स्थान है, जहां बाल्यावस्था में मुरुगन ने भगवान शिव को प्रणव मंत्र का अर्थ समझाया था। कुम्बकोणं से करीब 5 किलोमीटर दूर कावेरी नदी के तट पर स्थित यह मंदिर कई मायनों में विशिष्ट है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से करीब 250 किलोमीटर दूर स्थित स्वामी मलाई मंदिर स्थापत्य कला का शानदार अलंकरण है। 

  करीब 18 मीटर ऊंचाई वाली एक पहाड़ी पर स्थित स्वामी मलाई मंदिर वस्तुत: भगवान शिव, माता पार्वती एवं कार्तिकेय का स्थान माना जाता है। माता पार्वती मीनाक्षी के रूप में एवं भगवान शिव सुन्दरेश्वर के रूप में यहां विद्यमान हैं। माता मीनाक्षी एवं सुन्दरेश्वर का मंदिर पहाड़ी के नीचे विद्यमान है। इस दिव्य-भव्य मंदिर में प्रवेश के तीन द्वार हैं। 

   खास यह कि मंदिर में नित्य वैदिक अनुष्ठान होते हैं। स्वामी मलाई मंदिर का खास उत्सव वैकासी विसंगम होता है। इसका आयोजन वर्ष में एक बार होता है। किवदंती है कि भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय पिता के प्रणव मंत्र ओम का उच्चारण करते थे। लिहाजा इस स्थान कोे स्वामीनाथ मंदिर के नाम से जाना पहचाना जाता है। 

   किवदंती है कि सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा जी का कैलाश यात्रा के दौरान कार्तिकेय ने अपमान किया था। जिससे ब्रह्मा जी शिव पुत्र कार्तिकेय अर्थात मुरुगन पर क्रोधित हो गये थे। मुरुगन ने ब्रह्मा जी सवाल किया था कि सृष्टि की रचना कैसे की है। 
  ब्रह्मा जी ने जवाब दिया कि वेदों की सहायता से की गई। ब्रह्मा जी ने पवित्र प्रणव मंत्र ओम का जाप प्रारम्भ किया। जिस पर मुरुगन ने प्रणव मंत्र का अर्थ बताने को कहा तो ब्रह्मा जी कोई जवाब नहीं दे पाये। कोई प्रतिउत्तर न मिलने पर मुरुगन ने ब्रह्मा जी को कैद कर लिया था।

   इसके बाद मुरुगन ने सृष्टि की रचना की जिम्मेदारी ले ली थी। यह पता चलने पर भगवान शिव ने मुरुगन से ब्रह्मा जी को कैद से मुक्त करने को कहा तो मुरुगन ने कहा कि ब्रह्मा जी को प्रणव मंत्र अर्थात ओम का अर्थ नहीं पता। भगवान शिव ने मुरुगन से प्रणव मंत्र का अर्थ बतानेे को कहा। भगवान शिव के सामने मुरुगन से प्रणव मंत्र का गुणगान कर दिया।

   किवदंती है कि तभी भगवान शिव ने मुरुगन को स्वामीनाथ स्वामी नाम दिया था। इसका अर्थ भगवान शिव के शिक्षक से होता है। मान्यता है कि इस अवधारणा को भगवान शिव एवं भगवान मुरुगन के मंदिर रेखांकित करते हैं। भगवान शिव का मंदिर पहाड़ी के नीचे स्थित है जबकि भगवान मुरुगन का मंदिर पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है।
   स्वामी मलाई मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट तिरुचिरापल्ली एयरपोर्ट है। तिरुचिरापल्ली एयरपोर्ट से स्वामी मलाई मंदिर की दूरी करीब 77 किलोमीटर है। पर्यटक पुडुचेरी एयरपोर्ट से भी यात्रा कर सकते हैं। पुडुचेरी एयरपोर्ट से स्वामी मलाई मंदिर की दूरी करीब 108 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन कुम्बकोणं जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी स्वामी मलाई मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
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Friday, 26 July 2019

रंगनाथ स्वामी मंदिर : अद्भुत स्थापत्य कला

   रंगनाथ स्वामी मंदिर के स्थापत्य दर्शन को अद्भुत एवं विलक्षण कहा जाना चाहिए। जी हां, रंगनाथ स्वामी मंदिर का स्थापत्य सौन्दर्य अति दर्शनीय है। 

   वनस्पति रंगों से अंकित चित्रकला श्रृद्धालुओं एवं पर्यटकों को मुग्ध कर लेती है। भारत के तमिलनाडु राज्य के तिरुचिरापल्ली शहर स्थित इस शानदार एवं अति सुन्दर मंदिर को वैश्विक ख्याति हासिल है। 

  मंदिर की स्थापत्य कला, सौन्दर्य एवं विशिष्टताओं के कारण यूनेस्कोे ने इसे एशिया प्रशांत मेरिट पुरस्कार से अलंकृत किया है। श्री रंगम की पवित्र भूमि पर कावेरी नदी के किनारे स्थित रंगनाथ स्वामी मंदिर वस्तुत: श्री रंगनाथ स्वामी को समर्पित है।

   श्री रंगनाथ स्वामी को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है। मंदिर में भगवान श्री रंगनाथ शेषनाग शैय्या पर विश्राम की अवस्था में विद्यमान हैं। श्री रंगम द्वीप पर स्थित यह मंदिर भू-लोक बैकुण्ठ के नाम से भी जाना पहचाना जाता हैं।

   इसके अलावा रंगनाथ स्वामी मंदिर को श्री रंगम मंदिर तिरुवरंगम, तिरुपति, पेरियाकोइल आदि इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। इसे दक्षिण भारत का प्राचीन मंदिर माना जाता है। वस्तुत: यह दिव्य-भव्य मंदिर हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो भगवान श्री रंगनाथ को समर्पित यह शानदार मंदिर 108 दिव्य देशों में से एक है। इस सांस्कृतिक विरासत की ख्याति वैश्विक स्तर पर है। करीब 631000 वर्ग मीटर में फैला यह मंदिर अति कलात्मक एवं सुन्दर है। खास यह कि इस मंदिर में 21 गोपुरम है। गोपुरम से आशय प्रवेश द्वार से है। 

   मंदिर के प्रमुख द्वार को राजगोपुरम कहा जाता है। इस शानदार द्वार की ऊंचाई करीब 72 मीटर है। द्रविण शैली के इस शानदार मंदिर को वास्तुकला की शानदार संरचना कहा जा सकता है। मंदिर का आंतरिक क्षेत्र भी बेहद आकर्षक है। ग्रेनाइट से बना विशाल सभागार यहां का विशेष आकर्षण है। इसमें 953 स्तम्भ हैं। 

   इन स्तम्भों में कलात्मक अंकन हैं। इस मूर्ति अंकन में हाथी, घोड़ा, बाघ एवं अन्य जीव-जन्तुओं का अंकन है। खास यह कि दर एवं दीवारों पर यह कलात्मक अंकन वनस्पतीय रंगों से किया गया। इसे अद्भुत चित्रकला कहा जा सकता है। प्राचीन वास्तु शैली से अलंकृत यह मंदिर एक अनूठी सांस्कृतिक धरोहर है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो इस मंदिर की प्राचीनता का सहज अनुमान लगाना मुश्किल है। इस मंदिर में देवी-देवताओं का पूजन अर्चन भगवान श्री राम ने किया था। मान्यता है कि राम-रावण युद्ध के बाद यहां के देवी देवता लंका के राजा विभीषण को सौंप दिये गये थे। 

   लंका वापस जाते समय विभीषण के सामने भगवान विष्णु प्रकट हो गये। भगवान विष्णु ने इस स्थान पर भगवान रंंगनाथ के रूप में रहने की इच्छा व्यक्त की थी। मान्यता है कि तभी से भगवान विष्णु श्री रंगनाथ के रूप में यहां विराजमान हैं। 

   मान्यता है कि वैदिक काल में गोदावरी नदी के तट पर गौतम ऋषि का आश्रम था। जल संकट को देख कर कई अन्य स्थानों के ऋषि-मुनि आश्रम में आकर गौतम ऋषि से सहायता का आग्रह किया। उर्वरक भूमि देख कर अन्य ऋषियों में भूमि का लालच आ गया। अन्तोगत्वा ऋषियों ने गौतम ऋषि पर गौहत्या का आरोप लगा कर क्षेत्र की समस्त भूमि हथिया ली। 

   गौतम ऋषि ने श्री रंगम जाकर भगवान श्री रंगनाथ की आराधना की। मान्यता है कि आराधना से प्रसन्न होकर भगवान श्री रंगनाथ ने दर्शन आैर आशीर्वाद दिया। मान्यता यह भी है कि गौतम ऋषि के आग्रह पर ब्राह्मा जी ने स्वयं इस मंदिर का निर्माण किया था।

   रंगनाथ स्वामी मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट तिरुचिरापल्ली एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट से रंगनाथ स्वामी मंदिर की दूरी करीब 9 किलोमीटर है। 
  निकटतम रेलवे स्टेशन पुडुक्कोटई जंक्शन है। रेलवे स्टेशन से रंगनाथ स्वामी मंदिर की दूरी करीब 54 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी रंगनाथ स्वामी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
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Tuesday, 2 July 2019

गुप्तकाशी : दर्शनीय एवं धार्मिक पर्यटन

   गुप्तकाशी हिल स्टेशन को दर्शनीय एवं धार्मिक पर्यटन कहा जाना चाहिए। धर्म एवं आध्यात्म की इस शानदार नगरी को प्रकृति का शानदार उपहार कहा जा सकता है। 

   चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य की निराली छटा पर्यटकों को रोमांचित कर देती है। भारत के उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग का यह सुन्दर पर्यटन स्थल धर्म, आस्था एवं विश्वास का भी केन्द्र है। गुप्तकाशी वस्तुत: रुद्रप्रयाग-गौरीकुण्ड मार्ग स्थित एक छोटा शहर है। 

  खास यह कि इस क्षेत्र को प्रकृति ने सुन्दरता का शानदार उपहार सौंपा है। सामान्यत: देखा जाये तो गुप्तकाशी चार धाम यात्रा केदारनाथ का मुख्य पड़ाव है। देखा जाये तो उत्तराखण्ड में मुख्य पांच प्रयाग हैं। इनमें देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग एवं विष्णुप्रयाग हैं। रुद्रप्रयाग से मंदाकिनी नदी के किनारे गुप्तकाशी मार्ग है। 

  गुप्तकाशी का यह मार्ग करीब 25 किलोमीटर लम्बा है। इसी मार्ग पर ऋषि अगस्त्य मुनि का स्थान है। इस स्थान पर अगस्त्य मुनि का भव्य-दिव्य मंदिर है।

   गुप्तकाशी का मार्ग अति सुन्दर एवं रमणीक है। एक लम्बी चढ़ाई के बाद गुप्तकाशी के दर्शन होते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो धर्म एवं आध्यात्म की मान्यताओं में खास तौर से तीन काशी प्रचलित हैं। इनमें उत्तराखण्ड में भागीरथी के किनारे उत्तरकाशी एवं गुप्तकाशी एवं उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर की काशी है।

   गुप्तकाशी को वस्तुत: भगवान शिव का स्थान माना जाता है। भगवान शिव ने इस स्थान का उपयोग पाण्डव को दर्शन देने से बचने को छिपने के लिए किया था। गुप्तकाशी में एक दिव्य-भव्य कुण्ड है। इस कुण्ड को मणिकर्णिका कुण्ड कहा जाता है। इस कुण्ड में जल की दो धारायें गिरती हैं। मान्यता है कि यह जलधारायें गंगा एवं यमुना की हैं। 

  इस कुण्ड के सामने भगवान विश्वनाथ का भव्य-दिव्य मंदिर है। यह भगवान के अर्धनारीश्वर स्वरुप को दर्शित करता है। इस मंदिर में भगवान शिव एवं पार्वती के मिश्रित स्वरूप में दर्शन देते हैं। इस स्थान के नामकरण गुप्तकाशी को लेेकर किवदंती है कि भगवान शिव ने इस स्थान का उपयोग छिपने के लिए किया था। 

   लिहाजा इसे गुप्तकाशी कहा जाता है। पौराणिक काल में पाण्डव ने भगवान शिव के दर्शन के लिए तपस्या की थी लेकिन भगवान शिव दर्शन देने से बचना चाहते थे। लिहाजा भगवान शिव इस स्थान पर छिप गये थे। मान्यता है कि भगवान शिव काशी को छोड़ कर छिपने के लिए इस स्थान पर आये थे। किवदंती है कि पाण्डव भगवान का पीछा करते हुए गौरीकुण्ड तक जाते हैं।

   भगवान शिव एक सांड का स्वरूप धारण कर छिपने का प्रयास करते हैं। पाण्डव बंधु भीम सांड़ का पीछा करते हैं लेकिन सांड़ पकड़ में नहीं आता अपितु सांड़ बर्फ में सिर घुसा कर छिपने की कोशिश करते हैं। भीम सांड़ की पूंछ पकड़ कर खींचते हैं।


   सांड़ अपने सिर को विस्तार देता है आैर सिर नेपाल के पशुपतिनाथ में निकलता है। पशुपतिनाथ की भी द्वादश ज्योतिर्लिंग की मान्यता है। अन्तोगत्वा, भगवान शिव सांड़ का स्वरूप त्याग कर पाण्डवों को साक्षात दर्शन देते हैं।

   जिससे पाण्डवों को पापों से मुक्ति मिलती है। लिहाजा गुप्तकाशी को भगवान शिव का स्थान माना जाता है। हिन्दुओ का यह अति पवित्र एवं आस्था का स्थान माना जाता है। 

   गुप्तकाशी अति दर्शनीय स्थल है। चौखम्बा की बर्फ से आच्छादित पर्वत चोटियों की सुन्दरता गुप्तकाशी के प्राकृतिक सौन्दर्य में चार चांद लगाती हैं। चौतरफा प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों को खास तौर से रोमांचित करता है। कथानक की मानें तो इसे पंचकेदार भी माना जाता है।


   गुप्तकाशी हिल स्टेशन की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट से गुप्तकाशी की दूरी करीब 190 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश जंक्शन है। पर्यटक गुप्तकाशी की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
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तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...