दरगाह शरीफ: बेहतरीन इबादतगाह
दरगाह शरीफ को एक सिद्ध स्थान कहा जाना चाहिए। जी हां, दरगाह शरीफ वस्तुत: सूफी-संत मोइनुद्दीन चिश्ती का पवित्र स्थान है।
भारत के राजस्थान के शहर अजमेर में स्थित दरगाह शरीफ वस्तुत: मुस्लिम समाज का तीर्थ है।
हालांकि दरगाह शरीफ के प्रति सभी धर्म के श्रद्धालुओं में एक खास श्रद्धा एवं आस्था होती है। दरगाह शरीफ सूफी-संत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अर्थात समाधि है।
श्रद्धालु दरगाह पर चादर एवं फूल चढ़ाते हैं। मान्यता है कि दरगाह में मन्नत मांगने वालों की इच्छाओं की पूर्ति होती है। दरगाह शरीफ पर धागा बांधने की भी परम्परा है।
मान्यता है कि धागा बांधने से इच्छित मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इच्छा पूर्ण होने पर श्रद्धालु धागा खोलते हैं।
खास यह कि दरगाह शरीफ सदैव सुगंध से महकता रहता है। इतना ही नहीं सूफियाना कव्वाली का दौर भी अनवरत जारी रहता है।
दरगाह शरीफ उत्तम मुगल वास्तुकला का शानदार एवं उत्तम आयाम है। श्रद्धालुओं को यहां एक सुखद शांति का एहसास होता है।
खास यह कि दरगाह शरीफ भारत सहित दुनिया भर में अति लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध है। वैश्विक हस्तियां भी दरगाह शरीफ में माथा नवाती हैं।
दरगाह शरीफ को अजमेर शरीफ भी कहा जाता है। चूंकि दरगाह शरीफ अजमेर में स्थित है।
लिहाजा इसे दरगाह अजमेर शरीफ कहा जाता है। पर्यटक या श्रद्धालु दरगाह शरीफ की स्थापत्य कला से मुग्ध हुए बिना नहीं रह पाते हैं। सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती का यह स्थान बेहद विलक्षण है।
मान्यता है कि यहां कोई इबादत खाली नहीं जाती। दरगाह का मकबरा दर्शनीय है। दरगाह शरीफ में प्रवेश के लिए कई दरवाजे हैं।
मुख्य द्वार को निजाम द्वार कहा जाता है। निजाम द्वार का निर्माण हैदराबाद के निजाम ने 1911 में कराया था।
लिहाजा इसे निजाम द्वार के नाम से जाना पहचाना जाता है। निजाम मीर उस्मान अली खां ने इस भव्य-दिव्य द्वार का निर्माण कराया था। इसे ही निजाम गेट कहा जाता है।
इसकी ऊंचाई करीब 70 फुट है। चौड़ाई भी करीब 24 फुट है। मुगल सम्राट शाहजहां ने शाहजहानी द्वार को अस्तित्व दिया। इस द्वार को शाहजहानी कहा जाता है।
दरवाजा नक्कारखाना काफी पुराने तौर तरीके का है। खास यह कि इसके ऊपर शाही जमाने का नक्कारखाना है। इसी लिए इसे नक्कारखाना शाहजहानी गेट कहा जाता है।
अंत में सुल्तान खिलजी ने बुलंद दरवाजा का निर्माण कराया था। यह दरवाजा फतेहपुर सिकरी के किला के बुलंद दरवाजा से भिन्न है।
मान्यता है कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती वर्ष 1192 में अजमेर सुल्तान साबुद्दीन के साथ अजमेर आये थे। इसके बाद वह यहीं बस गये थे।
बताते हैैं कि सूफी-संत के पास कई चमत्कारिक शक्तियां थीं। जिससे कुछ ही समय में ख्याति फैल गयी। दरगाह शरीफ अजमेर शहर में ऊंची-ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित है।
दरगाह शरीफ शहर के मध्य में है। जिसका सबसे सुन्दर एवं बेहतरीन दरवाजा मुख्य बाजार की ओर है। चार यार की मजार जामा मस्जिद की दक्षिणी दीवार की ओर एक छोटा सा दरवाजा है।
इस दरवाजा के बाहर एक बड़ा कब्रिास्तान है। यहां सूफियों-फकीरों की मजारें हैं। मान्यता है कि यहां चार बुजुर्गों की मजारें भी हैं।
यह गरीब बुजुर्ग ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के साथ आये थे। अकबरी मस्जिद अकबर के जमाने की याद कराती है।
बादशाह अकबर ने इस मस्जिद का निर्माण कराया था। बुलंद दरवाजा के सामने एक गुंबद की तरह सुन्दर छतरी है। इसमें एक पीतल का चिराग है। इसे सेहन का चिराग कहते हैं।
दरगाह शरीफ में एक बड़ी देग है। मान्यता है कि बादशाह अकबर ने प्रतिज्ञा की थी कि चित्तौड़गढ़ युद्ध जीतने के बाद अजमेर दरगाह में एक बड़ी देग दान करेंगे। यह वही देग है।
दरगाह शरीफ की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट सांगानेर एयरपोर्ट जयपुर है।
जयपुर एयरपोर्ट से दरगाह शरीफ की दूरी करीब 135 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन अजमेर जंक्शन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी दरगाह शरीफ की यात्रा कर सकते हैं।
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