Tuesday, 26 March 2019

मनसा देवी मंदिर: अद्भुत महिमा

   मनसा देवी की महिमा अद्भुत एवं निराली कही जानी चाहिए। जी हां, मनसा देवी की महिमा अद्भुत है। भारत के उत्तराखण्ड के हरिद्वार शहर में स्थित मनसा देवी के दर्शन मात्र से ही मानव जीवन का कल्याण हो जाता है।

  मनसा देवी का यह स्थान हरिद्वार से करीब 3 किलोमीटर दूर स्थित है। मनसा देवी माता का यह मंदिर शक्तिपीठ की मान्यता रखता है।
  मान्यता है कि मनसा देवी के दर्शन मात्र से मानव जीवन के कष्टों का निवारण होता है। वस्तुत: मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के तौर पर पूजा जाता है। 

  मान्यता है कि मनसा देवी का प्रादुर्भाव भगवान शिव के मस्तक से हुआ था। लिहाजा देवी का नामकरण मनसा हुआ।
  महाभारत में मनसा देवी को जरत्कारु से उल्लेख किया गया है। विशेषज्ञों की मानें तो मनसा देवी को नागराज वासुकी की बहन माना जाता है।

   नागराज वासुकी की इच्छा थी कि उनको बहन की प्राप्ति हो लिहाजा भगवान शिव ने नागराज को बहन के रूप मेंं मनसा देवी को दिया था। इस कन्या का तेज इतना अधिक प्रबल था कि नागराज वासुकी नागलोक को पलायन कर गया था।

  किवदंती यह भी है कि मनसा देवी का जन्म कश्यप ऋषि के मस्तक से हुआ था। मनसा देवी को वस्तुत: आदिवासियों की देवी के तौर पर माना जाता है। सभी की अपनी-अपनी मान्यताएं हैं।
  पर्वतीय क्षेत्र में मनसा देवी को शिव पुत्री एवं नागमाता के रूप में माना जाता है। इनको विष के देवी के रूप में भी देखा जाता है। 

   कहावत यह भी है कि मनसा देवी का प्रादुर्भाव समुद्र मंथन से हुआ था। मनसा देवी को विष के देवी के तौर पर पश्चिम बंगाल में पूजा जाता है। 
  मनसा देवी को शैव परम्परा की देवी के तौर पर भी मान्यता है। मनसा देवी मुख्य रूप से सर्प आच्छादित एवं कमल पर विराजमान हैं।

   कमल पर 7 नागराज देवी की रक्षा के लिए सदैव विद्यमान दिखते हैं। कई बार मनसा देवी को एक बालक के साथ दिखाया जाता है। यह बालक मनसा देवी का पुत्र आस्तिक है। जिसे वह गोद में लिए दिखती हैं। 

   मान्यता है कि महाराज युधिष्ठिर ने भी माता मनसा देवी की पूजा अर्चना की थी। माता मनसा देवी के आशीर्वाद से ही पाण्डव महाभारत युद्ध जीत सके थे।
  महाभारत युद्ध विजयी होने के पश्चात युधिष्ठिर ने मनसा देवी की स्थापना की थी। इसके बाद दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण किया गया था। 

  मान्यता है कि मनसा देवी मंदिर में नागराज के विभिन्न स्वरूपों का जाप करने से सर्प का भय नहीं रहता है। जाप में जरत्कारु, जगद्रोरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तिक माता एवं विषहरी है। 

   मान्यता है कि विष्णु पुराण में मनसा देवी का विषकन्या केे तौर पर उल्लेख है। मनसा देवी में विष किसी भी विष से अधिक शक्तिशाली था। 
  लिहाजा ब्राह्मा जी ने मनसा देवी को विषहरी भी कहा था। हरिद्वार स्थित मनसा देवी का यह स्थान अति दर्शनीय एवं सिद्ध है।

   नित्य प्रात: माता मनसा देवी का श्रंगार किया जाता है। इसके बाद भोग लगाया जाता है। मनसा देवी मंदिर परिसर में विशाल वृक्ष है। इस वृक्ष में श्रद्धालु धागा बांधते हैं।
   शिवालिक की पहाड़ियों पर स्थित मनसा देवी का यह मंंदिर श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र है। यह स्थान हिमालय पर्वतमाला के दक्षिणी भाग में आता है। शक्ति स्वरूपा मनसा देवी के दर्शन बेहद कल्याणकारी माने जाते  हैं।

   विशेषज्ञों की मानें तो मन की इच्छाओं को पूरा करने वाली मनसा देवी साक्षात शिव पुत्री का स्थान है। इस दिव्य-भव्य मंदिर में मनसा देवी की दो प्रतिमायें हैं। एक प्रतिमा आठ भुजाओं वाली है। दूसरी प्रतिमा तीन सिर एवं पांच भुजाओं वाली है। 

  हरिद्वार में गंगा किनारे पर्वत शिखर पर विद्यमान मनसा देवी का मंदिर आस्था का केन्द्र है। यह देव स्थान लुभावना पर्यटन स्थल भी है। मनसा देवी के दर्शन-पूजन के उपरांत यहां नाग देवता की पूजा होती है।
   मनसा देवी मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून है। एयरपोर्ट की दूरी करीब 41 किलोमीटर है। निकटतम रेेलवे स्टेशन हरिद्वार जंक्शन है। श्रद्धालु मनसा देवी मंदिर की यात्रा सड़क मार्ग से भी कर सकते हैं।
29.947531,78.156326

Monday, 25 March 2019

रघुनाथ मंदिर: विलक्षण स्थापत्य कला

   श्री रघुनाथ मंदिर की दिव्यता-भव्यता को विलक्षण कहा जाना चाहिए। जी हां, श्री रघुनाथ मंदिर का शिल्प सौन्दर्य देश विदेश के श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को बरबस आकर्षित करता है। 

   मंदिर की स्थापत्य कला अति दर्शनीय है। भारत के जम्मू-कश्मीर प्रांत के जम्मू शहर में स्थित श्री रघुनाथ मंदिर का पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व है।
  खास यह कि जम्मू स्थित इस दिव्य-भव्य मंदिर के आंतरिक क्षेत्र में सात ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल मौजूद हैं।

   विशेषज्ञों की मानें श्री रघुनाथ मंदिर का निर्माण वर्ष 1835 में प्रारम्भ हुआ। वर्ष 1857 में मंदिर निर्माण पूर्ण हो सका। मंदिर का निर्माण महाराजा रणवीर सिंह एवं उनके पिता महाराजा गुलाब सिंह ने कराया था।
  खास यह कि मंदिर के आंतरिक क्षेत्र में स्वर्ण आवरण लगा है। जिससे मंदिर का स्वरूप आैर भी अधिक निखर आता है। इस दिव्य-भव्य मंदिर में कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं प्राण प्रतिष्ठापित हैं। 

   मान्यता है कि इस विशाल मंदिर में हिन्दू धर्म के 33 करोड़ देवी देवताओं के लिंगम स्थापित हैं। यह इस मंदिर का विशिष्ट इतिहास है। यह बेहद दर्शनीय है। श्रद्धालुओं को आश्चर्य भी होता है। 
  खास यह कि श्री रघुनाथ मंदिर आकर्षक कलात्मकता का विशिष्ट उदाहरण है। श्री रघुनाथ मंदिर प्रभु श्री राम को समर्पित है। 

   खास यह कि श्री रघुनाथ मंदिर उत्तर भारत के प्रमुख एवं अनोखे मंदिरों में से एक है। खास यह कि मंदिर के आंतरिक क्षेत्र में चौतरफा मंदिरों की एक खास श्रंखला विद्यमान है। इनमें रामायण काल की यश-गाथा का खास उल्लेख है। यहां का सौन्दर्य शिल्प अति दर्शनीय है।

   मंदिर का सौन्दर्य शिल्प देख कर श्रद्धालु एवं पर्ययक मुग्ध हो उठते हैं। यह विशाल मंंदिर जम्मू शहर के मध्य स्थित है।
  कलात्मकता का यह विशिष्ट उदाहरण वैश्विक ख्याति रखता है। इस मंदिर में बाहर से पांच कलश दर्शनीय होते हैं। यह सभी कलश लम्बाई में फैले हुये हैं। 

   श्री रघुनाथ मंदिर के गर्भगृह में राम, लक्ष्मण एवं सीता की विशाल मूर्तियां प्राण प्रतिष्ठापित हैं। मंदिर की विशेषता यह है कि मंदिर में रामायण एवं महाभारत काल के चरित्रों को प्रदर्शित किया गया है। 
   गर्भगृह के चारों ओर विशाल अहाते बने हैं। जिनमें मूर्तियां स्थापित हैं। खास यह है कि एक ही कक्ष में चारों धाम के दर्शन किये जा सकते हैं। चारों ओर एक-एक धाम को प्रतिष्ठापित किया गया है। 

   रघुनाथ मंदिर में इस प्रकार रामेश्वरम धाम, द्वारकाधीश, बद्रीनाथ एवं केदारनाथ के दर्शन किये जा सकते हैं। एक कक्ष के मध्य में भगवान सत्यनारायण के दर्शन किये जा सकते हैं।
   कक्ष के मध्य में उकेरी सूर्य देव की छवि अति सुन्दर है। दीवारों पर बारहमासा दर्शनीय हैं। इसमें माह के अनुसार देवताओं का चित्रण है।


  रघुनाथ मंदिर के निर्माण का कथानक भी अति रोचक है। महाराजा गुलाब सिंह को इस मंदिर के निर्माण की प्रेरणा राम दास वैरागी से मिली थी। मान्यता है कि महाराजा गुलाब सिंह को राम दास वैरागी ने राजा बनने की भविष्यवाणी की थी। 

   राजा-महाराजा बनने पर राम दास वैरागी की भविष्यवाणी सत्य निकली थी। राम दास वैरागी भगवान श्री राम के भक्त थे। बताते हैं कि राम दास वैरागी भगवान श्री राम का प्रचार करने अयोध्या से जम्मू आये थे। 
  सुई सिम्बली में वह कुटिया बना कर रहते थे। राम दास वैरागी ने पहला राम मंंदिर का निर्माण सुई सिम्बली में कराया था।

   इसके पश्चात जम्मू में रघुनाथ मंदिर का दिव्यता-भव्यता के साथ निर्माण कराया गया था। खास यह कि इस दिव्य-भव्य मंदिर में सिख स्थापत्य कला के भी शानदार दर्शन होते हैं। 
  रघुनाथ मंदिर में रामनवमी का त्योहार-पर्व अति दर्शनीय होता है। खास यह कि मंदिर की सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूमिका भी होती है। यहां एक शानदार पुस्तकालय एवं विद्यालय भी है। 

   मंदिर में सारदा लिपि में दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपियां भी हैं। पुस्तकालय में करीब 6000 पांडुलिपियां हैं। कश्मीर परम्परा के हिन्दुओं एवं बौद्ध ग्रंथों का यहां बड़ा संग्रह है। 
  विशेषज्ञों की मानें तो रघुनाथ मंदिर पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण की पहल का प्रारंभिक प्रवर्तक रहा है।


   रघुनाथ मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जम्मू एयरपोर्ट है। मंदिर से एयरपोर्ट की दूरी करीब 8 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जम्मू तवी जंक्शन है। श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी रघुनाथ मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
32.726601,74.857025

Tuesday, 19 March 2019

निष्कलंक महादेव मंदिर: अद्भुत तीर्थ

   निष्कलंक महादेव मंदिर को विलक्षण एवं अद्भुत कहा जाना चाहिए। जी हां, भारत के गुजरात के भावनगर में स्थित निष्कलंक महादेव का मंदिर विलक्षण ही नहीं अद्भुत भी है। 

   भावनगर के कोलियाक तट पर स्थित महादेव का यह मंदिर समुद्र में करीब तीन किलोमीटर दूर आंतरिक क्षेत्र में है। यह आश्चर्यजनक है कि समुद्र की शानदार लहरों के मध्य स्थित निष्कलंक महादेव प्रतिष्ठापित हैं। 

   खास यह कि अरब सागर की शानदार एवं विशाल लहरें निष्कलंक महादेव का निरन्तर जलाभिषेक करती हैं। इस दिव्य-भव्य मंदिर में पांच स्वयंंभू शिवलिंग हैं। 
  खास यह कि हर शिवलिंग के सामने एक नंदी विद्यमान है। एक वर्गाकार दिव्य-भव्य चबूतरा के हर कोना पर एक शिवलिंग विद्यमान है। इसी चबूतरा पर एक छोटा सा तालाब है। 

   इसे पाण्डव तालाब के नाम से जाना पहचाना जाता है। श्रद्धालु शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने से पहले इसी तालाब में हाथ-मुंह धोते हैं। इसके बाद निष्कलंक महादेव की पूजा अर्चना की जाती है। 
   मान्यता है कि निष्कलंक महादेव का यह मंदिर महाभारत काल से भी पूर्व का है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध समाप्त होने के उपरांत पाण्डव बंधु अत्यधिक दुखी थे। पाण्डव बंधुओं को अपने सगे-संबंधियों का वध करने का अपराध बोध था। 

   पाण्डव बंधुओं ने गुजरात के कोलियाक तट पर आकर अपराध बोध से मुक्ति के लिए तप किया था। पाण्डव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने प्रकट होकर साक्षात दर्शन दिये थे। 
  मान्यता है कि तभी से निष्कलंक महादेव प्राण प्रतिष्ठापित हैं। पाण्डव की संख्या के आधार पर ही निष्कलंक महादेव यहां पांच स्थानों पर विद्यमान हैं। 

   चूंकि निष्कलंक महादेव का यह स्थान कोलियाक तट से समुद्र के आंतरिक क्षेत्र में करीब तीन किलोमीटर दूर है।
   लिहाजा श्रद्धालुओं को निष्कलंक महादेव के दर्शन के लिए पैदल ही जाना पड़ता है। समुद्र के मध्य महादेव के इस स्थान के दर्शन कर श्रद्धालु रोमांचित हो उठते हैं। 

   भारी ज्वार आने की दशा में दूर से मंदिर की सिर्फ पताका ही दर्शन देती है।  ज्वार का दायरा कम होने के साथ ही निष्कलंक महादेव के दर्शन होने लगते हैं। मानों समुद्र महादेव की आराधना कर रहे हों। दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को जलमार्ग से ही जाना होता है। 

   निष्कलंक महादेव खास तौर से गुजरात के सांस्कृतिक शहर भावनगर का एक विशिष्ठ धार्मिक स्थान है। भावनगर के इस धार्मिक स्थान कोे हिन्दुओं का तीर्थ भी कहा जा सकता है। हालांकि भावनगर स्वयं भी एक सांस्कृतिक शहर है। 

   श्रद्धालु भावनगर में निष्कलंक महादेव के दर्शन कर शहर के अन्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व के स्थानों का भी भ्रमण कर सकते हैं। पर्यटन की दृष्टि से भी भावनगर काफी कुछ विशेष है।
   पर्यटक शत्रुंजय हिल्स शानदार हिल स्टेशन का आनन्द ले सकते हैं। शत्रुंजय हिल्स पर जैन मंदिर पलिताना एवं वेलवदर अभयारण्य भी दर्शनीय है। 

  शाही निवास दरबारगढ़ की भी पर्यटक सैर कर सकते हैं। भावनगर के शासकों ने मोतीबाग एवं नीलमबाग महल को अपना निवास बनाया था।
   शाही निवास शहर के मध्य में स्थित है। गुजरात के इस सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं धार्मिक शहर में आकर्षक एवं पसंदीदा स्थानों की एक लम्बी श्रंखला है।

   भावनगर का ब्राह्मकुण्ड, नीलांबोंफ पैलेस, तख्तेश्वर मंदिर, पलिताना जैन मंदिर, गोपीनाथ महादेव मंदिर, खोदियार मंदिर, गंगा देवी मंदिर, अलंग ब्रोकिंग साइट, विक्टोरिया पार्क आदि इत्यादि बहुत कुछ है। विक्टोरिया पार्क पक्षी प्रेमियों एवं प्रकृति प्रेमियों का स्वर्ग है।
   निष्कलंक महादेव मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध है। निकटतम एयरपोर्ट भावनगर एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन भावनगर जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी निष्कलंक महादेव मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
23.014509,72.591759

Saturday, 16 March 2019

श्री कृष्ण जन्म भूमि मंदिर: श्रेष्ठतम तीर्थ

   श्री कृष्ण जन्म भूमि को हिन्दुओं का श्रेष्ठतम तीर्थ कहा जाना चाहिए। जी हां, भारत के उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर में स्थित श्री कृष्ण जन्म भूमि हिन्दुओं की आस्था एवं विश्वास का केन्द्र है।

   श्री कृष्ण जन्म भूमि मथुरा वस्तुत: धर्म, आध्यात्म एवं साधना की धरती है। भगवान श्री कृष्ण का जन्म मथुरा की इस धरती पर हुआ था।
  इसीलिए मथुरा का राष्ट्रीय महत्व है। भगवान श्री कृष्ण का भव्य-दिव्य मंदिर मथुरा का मुख्य आकर्षण है।

  मंदिर में मुख्य रूप से राधा-कृष्ण की प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठित है। आराध्य भगवान श्री कृष्ण के दर्शन के लिए विश्व के श्रद्धालु एवं पर्यटक उमड़ते हैं।
  भगवान श्री कृष्ण के इस दिव्य-भव्य मंदिर को कटरा केशव देव मंदिर के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। 

   भगवान श्री कृष्ण का यह वास्तविक जन्म स्थान है। सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल में मंदिर को दिव्य-भव्य स्वरूप दिया गया था। भगवान श्री कृष्ण का यह मंदिर भारत के दिव्य-भव्य मंदिरों मेें से एक है। 

  एक बार फिर देश के शीर्षस्थ उद्योगपतियों के सहयोग से मंदिर के स्वरूप को विस्तार दिया गया। मंदिर का रखरखाव एवं देखरेख एक ट्रस्ट के अधीन है।
   किवदंती है कि राजा वासुदेव एवंं उनकी पत्नी देवकी को मथुरा के राजा कंस ने इस स्थान पर कैद कर रखा था।

  राजा वासुदेव को एक आकाशवाणी-भविष्यवाणी के तहत कैद किया गया था। भविष्यवाणी थी कि देवकी का पुत्र राजा कंस के वध का कारण होगा।
  लिहाजा राजा कंस ने राजा वासुदेव एवं देवकी को कैद में रखा था। इस कारागार के उपर ही भगवान श्री कृष्ण का यह मंदिर विद्यमान है। 

   खास यह कि मंदिर को तीन भागों में विभक्त किया गया है। गर्भगृह अर्थात भगवान श्री कृष्ण का वास्तविक जन्म स्थान है। खास यह कि मंदिर में प्रवेश करते ही एक सुखद शांति का एहसास श्रद्धालुओं को होता है। 
  श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर में गर्भगृह, दर्शन मण्डपम, केशवदेव मंदिर, भागवत भवन, श्री कृष्ण कठपुतली लीला एवं वैष्णो देवी गुफा आदि बहुत कुछ दर्शनीय है। एक अन्य मंदिर अष्टभुजा मा योगमाया को समर्पित है।

   कारागार की कोठरी को धीरे-धीरे सुन्दर मंदिर में परिवर्तित कर दिया गया। गर्भगृह के उपर एक शानदार बरामदा बना है। जिस पर संगमरमर के शानदार पत्थर लगे हैं।
  इसे चमत्कार ही कहा जायेगा कि संगमरमर के इन पत्थरों पर भगवान श्री कृष्ण की छवियां स्वत: उभर आयी हैं। 

   भगवान श्री कृष्ण के जन्म स्थान पर केवल केशवदेव मंदिर ही प्राचीनकालीन है। केशवदेव मंदिर में भगवान श्री कृष्ण के अति सुन्दर बाल विग्रह हैं। 
   भागवत भवन का निर्माण वर्ष 1982 में किया गया था। इस दिव्य-भव्य भवन में राधा-कृष्ण की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा है। इसमें अन्य कई मंदिर हैं। 

  इनमें खास तौर से जगन्नाथ जी, सुभद्रा एवं बलराम, सीता-राम-लक्ष्मण, महादेव शिव का मंदिर आदि हैं। इनके अलावा हनुमान जी का मंदिर, शेरावाली माता का मंदिर है।
   विशेषज्ञों की मानें तो इस स्थल के खनन से प्राचीन बर्तन, प्राचीन मूर्तियों, रॉक आधारित स्लैब सहित काफी कुछ कलाकृतियां मिली थीं।

   कलाकृतियों सहित अन्य सभी सामग्री मंदिर परिसर के संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। खास यह कि मंदिर परिसर मेें कई अन्य देवी देवताओं को समर्पित मंदिर हैं। श्री कृष्ण जन्म भूमि अर्थात मथुरा को तीनों लोक मेें न्यारी नगरी कहा जाता है। 

  मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण अभी भी मथुरा में वास करते हैं। मंदिर में भगवान श्री कृष्ण की जन्माष्टमी बड़ी धूमधाम से मनायी जाती है। मथुरा का यह उत्सव भारत सहित दुनिया में खास ख्याति रखता है।

  भगवान श्री कृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में हुआ था। लिहाजा जन्माष्टमी पर मध्य रात्रि यहां उत्सव दर्शनीय होता है।
   श्री कृष्ण जन्म भूमि मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट नई दिल्ली स्थित इन्दिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। निकटतम रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन है। श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी श्री कृष्ण जन्म भूमि मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
27.573030,77.693240

Thursday, 14 March 2019

शारदा सिद्धपीठ: हिन्दुओं का तीर्थधाम

    शारदा मंदिर को सिद्धपीठ कहा जाना चाहिए। शारदा मंदिर हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थधाम भी है। भारत के मध्य प्रदेश के सतना जिला का यह प्रसिद्ध देवी स्थान बेहद लोकप्रिय है।

   खास यह कि श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का केन्द्र शारदा मंदिर को मैहर मंदिर के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। मैहर वस्तुत: सतना जिला का एक छोटा शहर है। मंदिर मुख्यत: माता शारदा को समर्पित है।

  नैसर्गिक रूप से समृद्ध कैमूर तथा विंध्य पर्वत श्रंखला के मध्य स्थित माता शारदा देवी का यह मंदिर समुद्र तल से करीब 367 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। तमसा नदी के तट पर त्रिकूट पर्वत पर विद्यमान शारदा पीठ को सिद्धपीठ माना जाता है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो यह ऐतिहासिक मंदिरों की श्रंखला में 108 सिद्धपीठ में से एक है। इसे भगवान नरसिंह पीठ के नाम से भी जाना पहचाना जाता है। बताते हैं कि आल्हा एवं ऊदल दोनों भाई मां शारदा के अनन्य उपासक थे। 

   पर्वत की तलहटी में आल्हा-ऊदल का तालाब एवं अखाड़ा आज भी विद्यमान है। खास यह कि मां शारदा के साथ ही नरसिंह देव की प्रतिमा भी प्राण प्रतिष्ठित है। यह प्रतिमा अति प्राचीन है। मां शारदा का यह स्थान सती के अवशेष से ताल्लुक रखता है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो मैहर के इस त्रिकूट पर्वत पर सती के आभूषण अर्थात गले का हार गिरा था। माई का हार गिरने की कथा प्रचलित होने से इस स्थान को मैहर कहा जाने लगा। 

  बताते हैं, जिन स्थानों पर सती के शव अवशेष गिरे, वहां शक्तिपीठ की स्थापना की गयी। मैहर वस्तुत: मैहर रियासत की राजधानी रहा।
   शारदा देवी का यह मंदिर शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर त्रिकूट पर्वत पर स्थित है। मंदिर के निकट ही प्राचीन शिलालेख हैं। जिसमें मंदिर की प्राचीनता का उल्लेख है। 

   विशेषज्ञोें की मानें तो मंदिर का ताल्लुक शैव संत से समाज से है। बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म का भी उल्लेख यहां मिलता है। 
  बिशेषज्ञों की मानें तो शारदा देवी के इस स्थान को प्राचीनकाल में जंगल की देवी भी कहा जाता था। कारण त्रिकूट पर्वत का यह इलाका प्राचीनकाल में अति घना जंगल ही था। 

   शारदीय एवं चैत्र नवरात्र में शारदा देवी शक्तिपीठ पर भारी मेला का आयोजन होता है। इस दिव्य-भव्य मेला में भारी संख्या में श्रद्धालुओं का आना होता है। मान्यता है कि मां शारदा के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं का कल्याण होता है।

  मनौती के लिए यहां धागा बांधने की परम्परा है। इच्छित मनोकामनाएं पूर्ण होने पर श्रद्धालु मां के दरबार में मत्था टेकने आते हैं।

   मां शारदा मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। मैहर का निकटतम एयरपोर्ट जबलपुर एवं रीवा हैं। जबलपुर एयरपोर्ट से शारदा पीठ की दूरी करीब 145 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेेशन मैहर जंक्शन है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
24.256900,80.763800

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...