Friday, 28 September 2018

चक्रतीर्थ नैमिषारण्य: सिद्ध तीर्थ स्थान

   चक्रतीर्थ नैमिषारण्य को ऋषियों-मुनियों की तप स्थली कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। विशेषज्ञों की मानें तो नैमिषारण्य 88000 ऋषियों-मुनियों की तप स्थली रहा।

लिहाजा इसे एक सिद्ध तीर्थ स्थल के तौर पर देखा जाता है। उत्तर प्रदेश के सीतापुर में गोमती नदी के तट पर स्थित नैमिषारण्य की मान्यता एक सिद्ध हिन्दू तीर्थ के रूप में है।
  नैमिषारण्य का चक्रतीर्थ वस्तुत: एक प्राकृतिक एवं सुन्दर सरोवर है। इस सरोवर का मध्य भाग गोलाकार है। इस गोलाकार मध्य सरोवर से निरन्तर जल का प्रवाह होता रहता है। 

   इस मध्य घेरा के बाहर एक आैर वृहद घेरा है। इस घेरा में श्रद्धालु स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। यही नैमिषारण्य का मुख्य तीर्थ कहलाता है। इसे ही चक्रतीर्थ कहा जाता है। 
  विशेषज्ञों की मानें तो चक्रतीर्थ की महिमा अत्यंत निराली है। एक बार 88000 ऋषियों-मुनियों ने तप कर ब्राह्मा जी से अनुरोध किया कि जगत कल्याण के लिए तपस्या हेतु विश्व में सौम्य एवं शांत भूमि का निर्देश दें।

    भगवान ब्राह्मा जी ने एक चक्र उत्पन्न किया। ब्राह्मा जी ने कहा कि ऋषियों-मुनियों इस चक्र के पीछे चल कर जाओ। चक्र का अनुकरण करो। जिस स्थान पर चक्र स्वत: गिर जाये, उस स्थान को पृथ्वी का मध्य भाग समझ लेना। 

   धरती की सबसे दिव्य भूमि वही होगी। इस परम पवित्र भूमि के दर्शन बिना जीवन कभी सफल नहीं होगा। विशेषज्ञों की मानें तो जिस स्थान पर भगवान ब्राह्मा जी का चक्र घिरा, उसी स्थान को चक्रतीर्थ कहा जाता है। 
  चक्र गिरने के स्थान से अनवरत निर्मल एवं पवित्र जल का प्रवाह होता रहता है। महर्षि दधीचि ने अस्थि दान से पहले इसी सरोवर में स्नान किया था। बताते हैं कि सभी तीर्थों से पवित्र नदियों का जल लाकर इसी सरोवर में डाला गया था।

   लिहाजा इसी स्थान को मिश्रित या मिश्रिख के नाम से भी जाना जाता है। नैमिषारण्य की परिक्रमा 84 कोस की होती है। यह परिक्रमा प्रतिवर्ष फाल्गुन अमावस्या को प्रारम्भ होकर पूर्णिमा को पूर्ण होती है। 
   चक्रतीर्थ का व्यास करीब 120 फुट है। पवित्र जल नीचे सोतों से आता रहता है। बाहरी घेरा का जल एक नाला के माध्यम मे निकलता रहता है। इस नाला को गोदावरी नाला कहा जाता है। 
  चक्रतीर्थ के अलावा इस तीर्थ स्थान में व्यास गद्दी, ललिता देवी का मंदिर, भूतनाथ का मंदिर, कुशावर्त, ब्राह्मकुण्ड, जानकी कुण्ड एवं पंचप्रयाग हैं। चक्रतीर्थ को 51 पितृ स्थानों में से एक माना गया है। मान्यता है कि चक्रतीर्थ नैमिषारण्य में हिन्दू देवी-देवताओं के 33 मंदिर हैं। इसे हिन्दुओं के सभी तीर्थ स्थलों का केन्द्र माना जाता है। 
    पंचप्रयाग: पंचप्रयाग को पवित्र सरोवर की मान्यता है। इस पक्के सरोवर की अपनी एक अलग महत्ता है। पंचप्रयाग के किनारे अक्षय वट नामक वृक्ष है। श्रद्धा एवं आस्था के इस स्थान पर श्रद्धालु मनौती मानते हैं।
   ललिता देवी का मंदिर: ललिता देवी का मंदिर चक्रतीर्थ का मुख्य मंदिर है। इसके साथ गोवर्धन महादेव, क्षेमकाया देवी, जानकी कुण्ड, हनुमान जी, अन्नपूर्णा देवी, धर्मराज मंदिर, विश्वनाथ मंदिर आदि हैं। 
   व्यास गद्दी: व्यास गद्दी वस्तुत: शुक्रदेव का स्थान है। मंदिर में शुक्रदेव जी महाराज प्रतिष्ठापित हैं। बाहर व्यास जी की गद्दी है। निकट ही शतरूपा एवं मनु के चबूतरे हैं।
   दशाश्वमेध टीला: दशाश्वमेध टीला पर मंदिर है। इस मंदिर में भगवान श्री कृष्ण एवं पाण्डव परिवार की मूर्तियां स्थापित हैं।
    चक्रतीर्थ नैमिषारण्य की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट अमौसी लखनऊ है। अमौसी एयरपोर्ट से नैमिषारण्य की दूरी करीब 100 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन सीतापुर जंक्शन है। सीतापुर से नैमिषारण्य की दूरी करीब 40 किलोमीटर है। नैमिषारण्य की यात्रा सड़क मार्ग से भी की जा सकती है।
27.352490,80.489860

Wednesday, 26 September 2018

गंगोत्री धाम : भगवती गंगा के दर्शन

   गंगोत्री धाम को श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का मुख्य स्थल कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, गंगोत्री धाम हिन्दुओं की आस्था का सर्वमान्य स्थल है।

   समुद्र तल से करीब 3140 मीटर ऊंचाई पर स्थित गंगोत्री धाम हिन्दुओं के चार धाम श्रंखला में से एक है। उत्तराखण्ड में गंगोत्री में स्थित गंगोत्री धाम को गंगोत्री मंदिर एवं गंगा मंदिर के नाम से भी जाना पहचाना जाता है।
   वस्तुत: गंगोत्री को गंगा नदी के उद्गम स्थल के तौर पर जाना पहचाना जाता है। गंगोत्री उत्तरकाशी से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित है। भगवती गंगा का यह मंदिर भव्यता एवं दिव्यता को रेखांकित करता है। मंदिर में मुख्य प्रतिमा भगवती गंगा की है। 
 
   विशेषज्ञों की मानें तो इस दिव्य-भव्य गंगोत्री मंदिर का निर्माण गोरखा कमाण्डर अमर सिंह थापा ने कराया था। यह निर्माण 18 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में किया गया था। पौराणिक कथानक की मानें तो रघुकुल के राजा भगीरथ ने यहां प्रचण्ड शिलाखण्ड पर बैठ कर गंगा अवतरण के लिए भगवान शिव की आराधना की थी।
   मान्यता है कि देवी गंगा ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया है। मान्यता है कि पाण्डवों ने भी अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए यज्ञ अनुष्ठान किया था। 

   गंगोत्री धाम या गंगोत्री मंदिर श्वेत संगमरमर से बना एक शानदार एवं आकर्षक मंदिर है। मंदिर की दिव्यता-भव्यता एवं शुचिता को देख कर कोई भी मुग्ध हो सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक श्वेत चट्टान गंगोत्री में जलमग्न है।
    शीतकाल के आरम्भ में गंगा का जलस्तर नीचे आने पर इस शिव चट्टान के दर्शन होते हैं। गंगोत्री मंदिर का इतिहास अति प्राचीन है। हिन्दुओं के लिए यह आध्यात्मिक प्रेरणा का रुाोत है। प्राचीनकाल में चार धाम की यात्रा पैदल हुआ करती थी। वर्ष 1980 की अवधि में गंगोत्री की यात्रा के लिए सड़क का निर्माण किया गया था।
   विशेषज्ञों की मानें तो प्राचीनकाल में गंगोत्री में मंदिर नहीं था। इसे भगीरथी घाटी भी कहा जाता है। गंगोत्री क्षेत्र वस्तुत: भोज वृक्षों से घिरा एक सुन्दर स्थान है। भगीरथी घाटी के अंत में गंगोत्री मंदिर स्थित है। 

   वनस्पतियों की प्रचुरता देखते ही बनती है। वनस्पतियों की विशाल प्रजातियां गुणवत्ता एवं स्वास्थ्य के लिए संजीवनी हैं। सर्दियों में गंगोत्री मंदिर के पट बंद कर दिये जाते हैं। गंगा जी को श्रद्धालु मंदिर से धूमधाम से मुखबा गांव ले आते हैं। 
  बसंत आने पर मुखबा गांव से वापस गंगा जी को मंदिर लाया जाता है। गंगोत्री मंदिर एवं उसके आसपास धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों की एक लम्बी श्रंखला है। इनमें खास तौर से भैरों घाटी, हर्षिल, नंदनवन तपोवन, गंगोत्री चिरबासा, गंगोत्री भोजबासा, केदारताल आदि इत्यादि हैं।
   गोमुख: गोमुख वस्तुत: ग्लेशियर का मुहाना क्षेत्र है। गंगोत्री से गोमुख की दूरी करीब 19 किलोमीटर है। ग्लेशियर की ऊंचाई समुद्र तल से करीब 3892 मीटर है। धर्माचार्यों की मानें तो गोमुख में बर्फीले जल से स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं।
   गोमुख वस्तुत: भगीरथी अर्थात गंगा का उद्गम स्थल है। गोमुख का क्षेत्र अति विहंगम माना जाता है। करीब 25 किलोमीटर लम्बा, करीब 4 किलोमीटर चौड़ा एवं करीब 40 मीटर ऊंचाई तक गोमुख का क्षेत्र माना जाता है। गोमुख वस्तुत: ग्लेशियर की एक गुफा से आकार लेता है।
   भैरों घाटी : भैरों घाटी गंगोत्री से करीब 9 किलोमीटर दूर है। भैरों घाटी जध, जाह्नवी, गंगा एवं भगीरथी का संगम स्थल है। तेज बहाव के कारण भगीरथी गहरी घाटियों में बहती हैं। बहाव गर्जना जैसा प्रतीत होता है। भैरों घाटी हिमालय का सुन्दर दर्शनीय स्थल है। यहां से हिमालय का अद्भुत दृश्य दिखता है। भैरों घाटी से पर्यटक या श्रद्धालु भृगु पर्वत श्रंखला एवं चीड़वासा पर्वत श्रंखला के भी दर्शन कर सकते हैं।
   हर्षिल: हर्षिल गंगोत्री से करीब 20 किलोमीटर दूर एक सुन्दर एवं दर्शनीय स्थल है। यह इलाका दर्शनीय एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है। यहां का मीठा सेब देश दुनिया में अपनी एक अलग पहचान रखता है। हर्षिल में ऊंचे पर्वत, कोलाहल करती गंगा, सेब के बागान, झरनों की श्रंखला एवं सुन्दर चारागाह अति दर्शनीय होते हैं।
   नन्दन तपोवन: नन्दन तपोवन गंगोत्री से करीब 25 किलोमीटर दूर है। तपोवन से शिवलिंग चोटी का अद्भुत दर्शन होते हैं। यहां के सुन्दर चारागाह देखते ही बनते हैं।
   गंगोत्री चिरबासा: गंगोत्री चिरबासा गोमुख से करीब 3600 फुट ऊंचे स्थान पर स्थित है। यह स्थान गोमुख ग्लेशियर का आश्चर्यजनक दर्शन कराता है।
   गंगा उत्सव: गंगा उत्सव वस्तुत: गंगा जी का आगमन एवं विदाई का उत्सव होता है। सर्दियों के प्रारम्भ में भगवती गंगा अपने निवास स्थान गांव मुखबा चली जाती हैं। सर्दियां समाप्त होने पर भगवती गंगा पुन: वापस गंगोत्री धाम आकर विराजमान होती हैं। भगवती गंगा की यात्रा पारम्परिक रीति-रिवाज, गीत-संगीत, नृत्य एवं पूजा पाठ के साथ हर्ष एवं उल्लास से होती है। श्रद्धालु भगवती गंगा की मूर्ति को पालकी से लाते एवं ले जाते हैं। पालकी सजाया-संवारा जाता है।
    गंगोत्री धाम मंदिर के दर्शन एवं यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। देहरादून से गंगोत्री धाम की दूरी करीब 226 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। ऋषिकेश रेलवे स्टेशन से गंगोत्री मंदिर की दूरी करीब 260 किलोमीटर है। यात्री सड़क मार्ग से भी गंगोत्री मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
30.997480,78.923400

Friday, 21 September 2018

कामाख्या मंदिर : आस्था का केन्द्र

    कामाख्या मंदिर को श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का शक्तिशाली केन्द्र कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। असम की राजधानी दिसपुर के निकट गुवाहाटी में स्थित कामाख्या मंदिर की मान्यता शक्तिपीठ की है।

   गुवाहाटी से करीब 8 किलोमीटर एवं कामाख्या से करीब 10 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर कामाख्या शक्तिपीठ है। मान्यता है कि शक्ति की देवी सती को यह मंदिर समर्पित है। नीलांचल पर्वत के शिखर पर विद्यमान कामाख्या मंदिर का तांत्रिक महत्व विशेष माना जाता है।
    विशेषज्ञों की मानें तो प्राचीनकाल से ही सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल माना जाता है। पूर्वोत्तर भारत का मुख्य द्वार की मान्यता रखने वाले असम का यह तीर्थ स्थल देश दुनिया में शिखर की ख्याति रखता है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो देवी सती के 51 शक्ति स्थलों में कामाख्या शक्तिपीठ का सर्वोच्च स्थान है। कामाख्या शक्तिपीठ में ही देवी सती भगवती की महामुद्रा स्थित है। महामुद्रा को योनि कुण्ड भी कहा जाता है।
   कामाख्या शक्तिपीठ का अम्बुवाची पर्व खास महत्व रखता है। अम्बुवाची पर्व तांत्रिकों एवं सिद्ध पुरुषों के लिए योग पर्व की भांति होता है। योग पर्व एक प्रकार से वरदान माना जाता है। अम्बुवाची पर्व वस्तुत: देवी भगवती का रजस्वला पर्व माना जाता है।

   विशेषज्ञों की मानें तो अम्बुवाची पर्व के दौरान माता भगवती रजस्वला होती हैं। यह पर्व खास तौर से तीन दिन का होता है। इस अवधि में जल के स्थान पर रक्त प्रवाहित होता है। हालांकि कलिकाल में यह अद्भुत एवं आश्चर्य है।
   अम्बुवाची पर्व के दौरान मां भगवती के कपाट स्वत: बंद हो जाते हैं। दर्शन भी निषेध हो जाता है। इस क्षेत्र को कामरूप की भी मान्यता है। भगवान शिव सती का शव लेकर आकाश में भ्रमण कर रहे थे, तब सती की योनि इसी स्थान पर गिरी थी।

    कामाख्या शक्तिपीठ को सती स्वरुपिणी आद्यशक्ति महाभैरवी कामाख्या तीर्थ विश्व का सर्वोच्च कौमारी तीर्थ भी माना जाता है। शायद इसीलिए शक्तिपीठ में कौमारी पूजा एवं अनुष्ठान का विशेष महत्व है। 
   मान्यता है कि इस क्षेत्र में सभी वर्ण एवं जातियों की कौमारियां पूजनीय एवं वंदनीय हैं। विशेषज्ञों की मानें तो वर्ण-जाति का भेद करने पर साधकों की सिद्धियां नष्ट हो जाती हैं। साधक कामाख्या शक्तिपीठ में साधना का शिखर हासिल करते हैं। वाममार्ग साधना का यह कामाख्या शक्तिपीठ सर्वोच्च पीठ है।

    खास यह कि कामाख्या शक्तिपीठ मंदिर में देवी भगवती की योनि की पूजा होती है। योनि शिलाखण्ड के रूप में है। मां भगवती का यह अनूठा मंदिर है। मां भगवती का योनि स्वरूप यहां महामुद्रा कहलाता है। मान्यता है कि कामाख्या शक्तिपीठ स्थल ब्राह्माण्ड का केन्द्र बिन्दु है।
   खास यह कि माता महाविद्या के सभी दश स्वरूप यहां पूजित हैं। माता काली, तारा, षोडसी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बंगलामुखी, मातंगी एवं कमला पूजित हैं। 
 
  पूस के माह में कामाख्या शक्तिपीठ में भगवान कामेश्वर एवं देवी कामेश्वरी की प्रतीकात्मक शादी यहां होती है। यह एक विशेष पर्व होता है। मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जमीन से करीब 20 फुट नीचे है। यह एक गुफा की भांति है।
   कामाख्या शक्तिपीठ मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट गुवाहाटी है। गुवाहाटी एयरपोर्ट से कामाख्या मंदिर करीब 20 किलोमीटर दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन गुवाहाटी है। रेलवे स्टेशन से कामाख्या मंदिर करीब 6 किलोमीटर दूर है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
26.163790,91.709060

Monday, 17 September 2018

स्वर्ण मंदिर: अगाध श्रद्धा का केन्द्र

     श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र श्री हरिमंदिर साहिब देश विदेश में शिखर की ख्याति रखता है। पंजाब के अमृतसर स्थित श्री हरिमंदिर साहिब को स्वर्ण मंदिर, गोल्डन टेम्पल, दरबार साहिब भी कहा जाता है। 

   सिख समुदाय का यह अति पवित्र स्थल देश के सभी समुदायों के बीच खासा आस्था का स्थल है। सभी धर्मों के श्रद्धालु स्वर्ण मंदिर में श्रद्धानवत होते हैं। स्वर्ण मंदिर अमृतसर शहर का खास एवं विशेष आकर्षण है। खास यह भी कि अमृतसर शहर मंदिर के चारों ओर बसा है।

   करीब 400 वर्ष पुराने इस गुरुद्वारा की परिकल्पना एवं डिजाइन खुद गुरु अर्जुन देव जी ने तैयार की थी। इस विलक्षण एवं गुरुद्वारा का शिल्प सौन्दर्य अति शानदार एवं जानदार है। स्वर्ण मंदिर का शिल्प सौन्दर्य एवं नक्काशी देखते ही बनती है।

   खास यह कि गुरुद्वारा में किसी भी दिशा से प्रवेश किया जा सकता है। कारण गुरुद्वारा के चारों दिशाओं में प्रवेश द्वार हैं। खास यह कि अमृतसर का नाम भी सरोवर के नाम पर ही रखा गया था। इस सरोवर का निर्माण रामदास जी ने किया था। स्वर्ण मंदिर इस सरोवर के मध्य में स्थित है। यह गुरुद्वारा स्वर्ण जड़ित है। 

   लिहाजा इसे स्वर्ण मंदिर के तौर पर ख्याति हासिल है। विशेषज्ञों की मानें तो स्वर्ण मंदिर की नींव एक मुस्लिम सूफी संत ने रखी थी। सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी सूफी संत सार्इं मियां मीर से गुरुद्वारा की नींव 1588 में रखवाई थी।
   स्वर्ण मंदिर के इस सरोवर को अमृतसर, अमृत सरोवर एवं अमृत झील कहा जाता है। श्री हरिमंदिर साहिब परिसर में कई तीर्थ स्थल हैं। स्वर्ण मंदिर सफेद संगमरमर से बना है। इसकी दीवारों की नक्काशी स्वर्ण पत्तियों से की गयी है। 

   स्वर्ण मंदिर में अनवरत गुरुवाणी का अनुगूंजन होता है। इसे ईश्वर तुल्य माना जाता है। स्वर्ण मंदिर का इतिहास यहां उल्लखित है। मंदिर परिसर में पत्थर का एक स्मारक भी है। 
  यह स्मारक जाबांज सिख सैनिकों की स्मृति में है। सरोवर की अपनी एक अलग विलक्षणता है। विशेषज्ञों की मानें तो सरोवर सभी प्रकार के कष्टों से निजात दिलाता है। 

    सरोवर के जल को ईश्वरीय कृपा से रोग निवारक माना जाता है। इस सरोवर अर्थात झील में श्रद्धालु स्नान करते हैं। खास यह कि झील में मछलियों की संख्या बहुतायत में है। मंदिर से 100 मीटर दूर स्वर्ण जडि़त अकाल तख्त है। इसमें एक भूमिगत तल एवं पांच अन्य तल हैं। इसमें एक भव्य-दिव्य संग्रहालय एवं सभागार भी है।

   श्रद्धालु अकाल तख्त की परिक्रमा के बाद स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो अकाल तख्त का निर्माण 1606 में किया गया था। स्वर्ण मंदिर गुरुद्वारा में लंगर की व्यवस्था है। लंगर अनवरत चलता है। विशेषज्ञों की मानें तो स्वर्ण मंदिर के इस लंगर में करीब 40000 श्रद्धालु नित्य प्रसाद ग्रहण करते हैं। 

    लंगर सिर्फ भोजन ही नहीं, श्री रामदास सराय में श्रद्धालुओं के ठहरने की भी व्यवस्था है। इस सराय का निर्माण 1784 में किया गया था। सराय में 228 कमरे एवं 18 बड़े हाल हैं। स्वर्ण मंदिर का प्रकाशोत्सव खास है। प्रकाशोत्सव अल सुबह 2.30 बजे प्रारम्भ होता है। गुरुग्रंथ साहिब को उनके कक्ष से गुरुद्वारा लाया जाता है।

   संगतों की टोली भजन-कीर्तन करते हुए श्री गुरुग्रंथ साहिब को पालकी में सजा कर गुरुद्वारा लाती है। रात के समय सुखासन के लिए भी इसी तरह लाया जाता है। कड़ाह प्रसाद की व्यवस्था नित्य रहती है। सुखासन एवं प्रकाशोत्सव देखने लायक होता है। मान्यता है कि श्रद्धा एवं सच्चे मन से की गयी हर इच्छा की पूर्ति होती है।

   श्री हरिमंदिर साहिब अर्थात स्वर्ण मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध है। निकटतम एयरपोर्ट अमृतसर है। अमृतसर अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा है। दिल्ली से अमृतसर की दूरी करीब 500 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन अमृतसर जंक्शन है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी स्वर्ण मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
31.627140,74.890129

Friday, 14 September 2018

कनक दुर्गा मंदिर: आस्था का केन्द्र

   श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास के केन्द्र कनक दुर्गा मंदिर को अद्भुत कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जी हां, दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा स्थित कनक दुर्गा मंदिर की ख्याति दुनिया में है।

   इन्द्रकेलाद्री पहाड़ी पर स्थित यह दिव्य-भव्य मंदिर कृष्णा नदी के तट पर है। मंदिर मुख्य तौर पर मां भगवती दुर्गा को समर्पित है। विशेषज्ञों की मानें तो सद्भावना विजयवाड़ा चौतरफा पत्थर की विशाल चट्टानों से घिरा था। जिससे कृष्णा नदी का प्रवाह नहीं हो पा रहा था। भगवान शिव की तपस्या एवं आराधना की गयी। इसके बाद कृष्णा नदी को अपेक्षित प्रवाह मार्ग मिल सका।

   पौराणिक कथाओं की मान्यता है कि अर्जुन ने इन्द्रकेलाद्री पहाड़ी पर तपस्या की थी। जिससे युद्ध में विजय हासिल कर सकें। जीत के बाद स्थान का नाम विजयवाड़ा पड़ गया। राक्षसों का प्रकोप बढ़ने पर ऋषि इन्द्रकेलाद्री ने पहाड़ी के शीर्ष पर तपस्या की थी। जिस पर देवी दुर्गा ने प्रकट होकर रक्षा का आशीर्वाद दिया था। 

    देवी दुर्गा ने उसी समय इन्द्रकेलाद्री पर्वत को अपना स्थान बना लिया था। कनक दुर्गा मंदिर में दुर्गा के सभी स्वरूप विद्यमान हैं। कनक दुर्गा मंदिर के निकट ही इन्द्रकेलाद्री पर मल्लेश्वर स्वामी का भी दिव्य-भव्य मंदिर है। इस मंदिर में कनक दुर्गा, मल्लेश्वर एवं कृष्णा नदी स्वरूप में विद्यमान हैं। कनक दुर्गा मंदिर में ओम की दिव्यता-भव्यता देखते ही बनती है। निकट ही प्रकाशम बैराज है।

    विशेषज्ञों की मानें तो प्रकाशम बैराज अर्जुन का तपस्या स्थल है। इसी स्थान पर अर्जुन को अस्त्र-शस्त्र प्राप्त हुये थे। खास तौर से यहां शिव लीला एवं शक्ति महिमा का वर्णन है। शक्ति महिमा एवं शिव लीला का प्रसंग वर्णन क्षेत्र को आध्यात्मिक बना देता है। सामान्यत: देखें तो कनक दुर्गा मंदिर विजयवाड़ा का पर्याय बन गया है।

   कनक दुर्गा मंदिर एवं विजयवाड़ा का आध्यात्मिकता प्राचीनकाल से ही तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केन्द्र रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो वेदों एवं शास्त्रों में यहां की धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता उल्लेखनीय रही। कनक दुर्गा एवं अन्य देेवी देवताओं का यहां स्वयंभू प्राक्ट्य माना गया। आत्म प्राक्ट्य होने के कारण विजयवाड़ा को अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। 

    दशहरा पर्व कनक दुर्गा मंदिर में खास तौर से उल्लास पूर्व मनाया जाता है। कनक दुर्गा महोत्सव का दस दिवसीय आयोजन होता है। यह आयोजन चन्द्र तिथि के आधार पर होता है। स्थानीयता में इसे अलंकाराम कहा जाता है। 
   दशहरा पर कनक दुर्गा की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। सरस्वती पूजा एवं थेपोत्सवम विशेष महत्वपूर्ण मानें जाते हैं। इसके अलावा कनक दुर्गा मंदिर में शकंभारी उत्सव भी प्रमुखता से आयोजित होता है। यह उत्सव कनक दुर्गा से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए है कि कृषि उपज, सब्जियां, भोजन आदि का आशीर्वाद दें। जिससे जीवन यापन एवं भरण-पोषण हो सके। यह इन्द्रधनुुषी उत्सव विशेष ख्याति रखता है। कनक दुर्गा मंदिर को विजयवाड़ा का दिल कहें तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी।
   कनक दुर्गा मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट विजयवाड़ा है। विजयवाड़ा एयरपोर्ट से कनक दुर्गा मंदिर की दूरी करीब 20 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन विजयवाड़ा है। विजयवाड़ा से हैदराबाद की दूरी करीब 275 किलोमीटर है। यात्री-पर्यटक सड़क मार्ग से भी कनक दुर्गा मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
17.674220,83.214170

Monday, 3 September 2018

बद्रीनाथ धाम : भगवान विष्णु के दिव्य दर्शन

    भगवान विष्णु को समर्पित बद्रीनाथ धाम को श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का शीर्ष कहें तो शायद कोई बड़ी बात न होगी।

उत्तराखण्ड के चमोली जिला स्थित बद्रीनाथ धाम हिन्दुअों के चार धाम में से एक है। अलकनंदा नदी के निकट स्थित बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु को समर्पित 108 मंदिरों में से एक है। बद्रीनाथ धाम की मान्यता है कि भगवान विष्णु का निवास स्थान है।
   गढ़वाल की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित बद्रीनाथ धाम समुद्र तल से करीब 3133 मीटर ऊंचाई पर है। प्राचीन शैली का बद्रीनाथ धाम धर्म की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। करीब 15 मीटर ऊंचाई वाले इस मंदिर की दिव्यता-भव्यता देखते ही बनती है।

  विशेषज्ञों की मानें तो भगवान शंकर ने शालिग्राम के रूप में अलकनंदा नदी से एक काले पत्थर की तौर पर खोजी थी। बद्रीनाथ धाम में मुख्य तौर से दो पर्व होते हैं। इनमें माता मूर्ति का मेला एवं बद्री-केदार महोत्सव हैं।
   बद्रीनाथ के रूप में यहां भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। शालिग्राम की यहां करीब एक मीटर ऊंची मूर्ति है। मान्यता यह भी है कि आदि शंकराचार्य आठवीं शताब्दी में नारद कुण्ड से मूर्ति को निकाल कर लाये थे। इसे स्वयं प्रकट प्रतिमाओं में माना जाता है।

   ऋषिकेश से 294 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में स्थित बद्रीनाथ धाम को बद्री विशाल भी कहा जाता है। मान्यता है कि नर एवं नारायण ने बद्रीनाथ धाम स्थल पर लम्बे समय तक तपस्या की थी। बाद में नर एवं नारायण ने अगले जन्म में अर्जुन एवं कृष्ण के रूप में जन्म लिया था। बद्रीनाथ धाम के पश्चिम में करीब 27 किलोमीटर दूर बद्रीनाथ शिखर है। इस स्थान की ऊंचाई समुद्र तल से करीब 7138 मीटर है। 

   पाण्डव ने बद्रीनाथ धाम में ही पितरों का पिण्डदान किया था। तीर्थ यात्री पितरों की आत्म शांति के लिए पिण्डदान करते हैं। मंदिर के निकट तप्त कुण्ड है। सल्फर युक्त पानी वाले इस कुण्ड का जल आैषधीय माना जाता है।
    तीर्थ यात्री दर्शन से पहले इस कुण्ड में स्नान करते हैं। अलकनंदा नदी से करीब 50 मीटर ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ धाम में मुख्य तौर से तीन संरचनाएं हैं। इनमें गर्भगृह, दर्शन मण्डप एवं सभा मण्डप हैं। इसका प्रवेश द्वार नदी की ओर से है।

   मुख्य प्रवेश द्वार को सिंह द्वार कहा जाता है। द्वार के शीर्ष पर तीन स्वर्ण कलश स्थापित हैं। सभा मण्डप में एक बड़ा स्तम्भ है। दीवार एवं स्तम्भ की शानदार नक्काशी देखते ही बनती है। इस मण्डप में बैठ कर श्रद्धालु विशेष पूजन एवं आरती करते हैं।
   गर्भगृह में भगवान बद्रीनाथ अर्थात शालिग्राम की प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। प्रतिमा का अधिसंख्य हिस्सा स्वर्ण आवरण से आच्छादित है। बद्रीनारायण की मूर्ति के चार हाथ हैं। मूर्ति के ललाट पर हीरा जड़ित है। बद्रीनाथ धाम में 15 देवी देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है। इनमें लक्ष्मी जी, गरुण, नवदुर्गा की मूर्तियां शामिल हैं। गर्भगृह में लक्ष्मी-नृसिंह भी प्राण प्रतिष्ठित हैं। माता मूर्ति मेला गंगा नदी के आगमन की प्रसन्नता में आयोजित होता है। इस दौरान बद्रीनाथ की माता जी की भी पूजा होती है।

   मान्यता है कि प्राणियों के कल्याण के लिए नदी को बारह धाराओं में यहां विभाजित किया गया था। बद्रीनाथ धाम में शाम को गीत गोविन्द एवं आरती होती है।
  वैदिक ग्रंंथों का उच्चारण किया जाता है। बद्रीनाथ का श्रंगार किया जाता है। चंदन का लेप लगाया जाता है। मूर्ति पर लगा चंदन अगले दिन भक्तों को निर्मल्य दर्शन के दौरान प्रसाद के रूप में दिया जाता है। मंदिर में सभी धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं।
   बद्रीनाथ धाम में वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला एवं मिश्री प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है। अक्टूबर-नवम्बर में सर्दियों में मंदिर के पट बंद कर दिये जाते हैं। इस दौरान दीपक में पर्याप्त घी भर दिया जाता है। जिससे दीपक छह माह तक जलता रहे। इस दिन बद्रीनाथ की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। करीब छह माह बाद कपाट खुलने पर दिव्य ज्योति के दर्शन मिलते हैं।
     बद्रीनाथ धाम की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट देहरादून है। देहरादून से बद्रीनाथ धाम की दूरी करीब 148 किलोमीटर है। पर्यटक बद्रीनाथ धाम की यात्रा के लिए जौली ग्रांट एयरपोर्ट का भी उपयोग कर सकते हैं। जौली ग्रांट एयरपोर्ट से बद्रीनाथ धाम की दूरी करीब 314 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश जंक्शन है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ धाम की दूरी करीब 295 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी बद्रीनाथ धाम की यात्रा कर सकते हैं।
30.744230,79.492440

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