Sunday, 22 July 2018

वैष्णों देवी मंदिर : शक्ति स्थल

   जम्मू-कश्मीर स्थित वैष्णों देवी मंदिर को शक्ति स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। हिन्दुओं की अगाध आस्था का यह केन्द्र जम्मू-कश्मीर के त्रिकुट पर्वत शिखर पर विद्यमान है।

    समुद्र तल से करीब 1700 मीटर ऊंचाई पर स्थित वैष्णों देवी मंदिर देश के शीर्ष देव स्थलों में से एक है। वस्तुत: वैष्णों देवी का यह मंदिर एक गुफा है। करीब 30 मीटर लम्बी एवं 1.50 मीटर ऊंचाई वाली यह गुफा ही देवी स्थान है।
  कहावत है कि माता वैष्णों देवी ने इस गुफा में प्रवास किया था। मंदिर की इस दिव्य-भव्य गुफा में वैष्णों देवी के तीन पिण्ड स्थापित हैं। इन पिण्डियों के दर्शन-पूजन एवं अर्चन होते हैं। 

    शक्ति को समर्पित अगाध आस्था का यह केन्द्र माता रानी वैष्णवी देवी के रूप में जाना-पहचाना जाता है। लाखों दर्शनार्थी देवी के दर्शन के लिए आते हैं। 
   मान्यता है कि पहाड़ों वाली माता रानी भक्तों की मनोकामनाओं का पूरा करती हैं। मान्यता है कि भक्त की रक्षा के लिए भैंरोनाथ का वध किया था। प्राचीन मान्यता है कि ब्रााह्मण श्रीधर ने माता रानी का भण्डारा रखा था। इस भण्डारा में भैंरोनाथ को शिष्यों सहित आमंत्रित किया गया था।

    भण्डारा में भैंरोनाथ ने मांस मदिरा का सेवन करने की इच्छा व्यक्त की। जिस पर ब्रााह्मण ने असहमति व्यक्त की। भण्डारा में मांस मदिरा सेवन पर भैंरोनाथ अड़ गये।
    जिस पर माता रानी ने बालिका के रूप में भैंरोनाथ को समझाने की कोशिश की लेकिन भैंरोनाथ उलझ गया। भैंरोनाथ ने बालिका को पकड़ना चाहा लेकिन वह त्रिकूट पर्वत की ओर भागीं। इस अवधि में माता रानी ने अर्धक्वांरी में नौ माह तक विश्राम किया। माता रानी ने यहां मुड़कर देखा तो भैंरोनाथ दौड़ता इसी ओर आ रहा था। 

    माता रानी की रक्षा के लिए भक्त हनुमान साथ थे। हनुमान जी ने माता रानी से पानी पीने की इच्छा व्यक्त की। जिस पर माता रानी ने बाण से पहाड़ पर जलधारा निकाल दी। इस स्थान को बाणगंगा कहा जाता है। 
     कहावत है कि बाणगंगा के जल का सेवन करने एवं स्नान करने से भक्तों की सभी व्याधियां दूर होती हैं। अनन्य प्रसंगों के बाद माता रानी वैष्णों देवी ने भैंरोनाथ का संहार किया था। 

    माता रानी वैष्णों देवी की इस गुफा में पिण्डी के रूप में मां काली (दायें), मां सरस्वती (बायें) एवं मां लक्ष्मी (मध्य) में विद्यमान हैं। संहार में भैंरोनाथ का शीश करीब तीन किलोमीटर दूर जा कर गिरा था। 
    इस स्थान को भैंरोनाथ मंदिर कहा जाता है। मान्यता है कि माता वैष्णों देवी के दर्शन के बाद भैंरोनाथ के दर्शन आवश्यक है। कारण भैंरोनाथ के दर्शन के बिना माता रानी के दर्शन अपूर्ण माने जाते हैं।
    बताते हैं कि मृत्यु पूर्व भैंरोेनाथ को अपने कृत्य का पश्चाताप हुआ था। जिस पर भैंरोनाथ ने देवी से क्षमा याचना की थी। जिस पर माता वैष्णों देवी ने वरदान दिया था कि मेरे दर्शन तभी पूर्ण माने जायेंगे, जब भक्त भैंरोनाथ के भी दर्शन करेंगे।

     खास यह कि कटरा से भवन अर्थात माता रानी की गुफा तक त्रिकुट पर्वत की करीब 14 किलोमीटर ऊंची खड़ी चढ़ाई करनी होती है। यात्रा प्रारम्भ करने से पहले कटरा में दर्शन पर्ची (टोकन) लेना होता है।   
    वैष्णों देवी मंदिर की व्यवस्थायें मां वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड के अधीन हैं। कटरा एवं दर्शन स्थल पर श्राइन बोर्ड की कई धर्मशालायें एवं होटल भी हैं।
    वैष्णों देवी मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जम्मू है। हालांकि जम्मू एयरपोर्ट को सतवारी एयरपोर्ट के नाम से जाना-पहचाना जाता है। जम्मू से कटरा की दूरी करीब 50 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जम्मू तवी है। जम्मू तवी से पर्यटक बस या टैक्सी से भी कटरा पहंुच सकते हैं। पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
33.030830,74.949042

Tuesday, 10 July 2018

लक्ष्मी नारायण मंदिर: विलक्षण सुन्दरता

     लक्ष्मी नारायण मंदिर की सुन्दरता का कोई जोड़ नहीं। जी हां, नई दिल्ली स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर का वास्तु शास्त्र एवं शिल्प शास्त्र निश्चित तौर पर विलक्षण है।

   उड़ियन एवं मुगल शैली की मिश्रित यह संरचना निश्चय ही अति लुभावनी है। इसके निर्माण में नागारा शैली का भी उपयोग किया गया है। आचार्य विश्वनाथ शास्त्री की अध्यक्षता में काशी के सौ से अधिक शिल्पियों ने मंदिर एवं मूर्तियों को सुन्दर ढ़ंग से गढ़ा था।
    लक्ष्मी नारायण के इस मंदिर को बिड़ला मंदिर भी कहा जाता है। खास तो यह है कि लक्ष्मी नारायण के इस मंदिर को बिड़ला मंदिर के नाम से ही जाना पहचाना जाता है। मंदिर मुख्यत: देवी लक्ष्मी एवं भगवान विष्णु को समर्पित है। 

    बिड़ला मंदिर की जन्माष्टमी खास तौर से देश दुनिया में प्रसिद्ध है। इस भव्य दिव्य मंदिर का निर्माण 1939 में किया गया था। इस मंदिर का विधिवत उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था। 
    उद्घाटन भी सशर्त था कि मंदिर में सभी जातियों को प्रवेश दिया जायेगा। प्रवेश में जातिगत आधार पर कोई रोक नहीं होगी। मूलत: इस मंदिर का निर्माण 1622 में वीर सिंह देव ने कराया था। इसके बाद पृथ्वी सिंह ने 1793 में जीर्णोद्धार कराया था। वर्ष 1939 में देश के बड़े आैद्योगिक परिवार बिड़ला समूह ने विस्तार एवं पुर्नरुद्धार कराया था। 

   देश दुनिया में ख्याति रखने वाले इस भव्य दिव्य मंदिर का निर्माण खास तौर से संगमरमर एवं लाल बलुआ पत्थरों से किया गया। मंदिर का विहंगम दृश्य श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। 
     इस मंदिर में दो मंजिला एवं तीन मंजिला बरामदे हैं। बाग बगीचा एवं फव्वारा श्रंखला से सुसज्जित यह स्थान धर्म-आध्यात्म के साथ ही शीतलता एवं शांति प्रदान करता है। मंदिर में मुख्य देव दर्शन भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी, शिव-पार्वती, राधा-कृष्ण, देवी दुर्गा जी, हनुमान जी व अन्य देवी देवताओं की प्रतिमायें हैं। 

    नई दिल्ली के कनॉट प्लेस के निकट स्थित यह मंदिर देश भर के श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। मंदिर एक प्रमुख पर्यटन स्थल भी है। मंदिर का भाव यह है कि सरंक्षण एवं समृद्धि हो। देवी लक्ष्मी का स्थान समृद्धि की देवी के तौर पर है। भगवान विष्णु जी का स्थान सरंक्षक के रूप में है।
    विशेषज्ञों की मानें तो बिड़ला मंदिर का निर्माण उद्योगपति बलदेव दास बिड़ला ने कराया था। वर्ष 1933 में निर्माण प्रारम्भ होकर 1939 में पूर्ण हो सका था। करीब 7.50 एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस मंदिर परिसर में कई अन्य मंदिरों के साथ ही गीता भवन भी है। मंदिर के निर्माण में मकराना, आगरा, कोटा, जैसलमेर आदि का पत्थर इस्तेमाल किया गया।
    खास यह है कि लक्ष्मी नारायण के इस मंदिर में हिन्दू धर्म की सभी शाखाओं के दर्शन किये जा सकते है। इस परिसर में भगवान गौतम बुद्ध भी प्रतिष्ठापित हैं। भगवान गौतम बुद्ध के जीवन दर्शन की यात्रा भी दर्शनीय है। मंदिर के पिछले भाग में वृहद यज्ञशाला भी विद्यमान है। परिसर में कृतिम पर्वत श्रंखला, गुफायें एवं झरना आदि हैं। दीवारों में महाभारत का सचित्र उल्लेख किया गया है। खास यह कि लक्ष्मी नारायण का यह मंदिर देश के प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है।
       लक्ष्मी नारायण मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट नई दिल्ली है। निकटतम रेलवे स्टेशन नई दिल्ली एवं दिल्ली है। सड़क मार्ग से भी यात्रा की जा सकती है।
28.632667,77.198996

Thursday, 5 July 2018

पद्मनाभ स्वामी मंदिर : अतुलनीय श्रद्धा

    पद्मनाभ स्वामी मंदिर के वास्तुशिल्प का कहीं कोई जोड़ नहीं। भगवान विष्णु के इस मंदिर को श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र माना जाता है। द्रविड़ शैली पर अाधारित इस मंदिर में अपार सम्पदा नीहित है। 

   केरल के तिरुवअनन्तपुरम स्थित इस भव्य-दिव्य मंदिर में मुख्य आसन भगवान विष्णु जी का है। भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं।
      मान्यता है कि शहर का तिरुवनंतपुरम नाम भगवान के अनंत नाम के नाग पर रखा गया है। भगवान विष्णु की विश्राम अवस्था को पद्मनाभ कहा गया है। इस स्वरूप में विराजित विष्णु जी यहां पद्मनाभ स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हैं।

   पद्मनाभ स्वामी का यह मंदिर दक्षिण भारत के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। मंदिर केरल की संस्कृति एवं साहित्य का अनूठा संगम है। मंदिर की एक ओर खूबसूरत समुद्र तट है तो वहीं पश्चिम दिशा में पहाड़ियों का अद्भुत सौन्दर्य विद्यमान है।
     खास यह कि प्रकृति की अमूल्य निधियों के मध्य यह भव्य-दिव्य मंदिर विद्यमान है। कालांतर में निर्मित इस मंदिर का पुर्ननिर्माण 1733 में त्रावणकोर के महाराजा मार्तंड वर्मा ने कराया था। त्रावणकोर के शाही परिवार के हाथों में अभी भी मंदिर का रखरखाव नीहित है। 

   मंदिर की स्थापत्य कला देखते ही बनती है। मंदिर के दर-ओ-दीवार से लेकर शिखर तक सुन्दर नक्काशी मुग्ध कर देती है। वैष्णव मंदिर श्रंखला का यह मंदिर श्रद्धा एवं आस्था के साथ ही पर्यटन स्थल भी है।
     विशेषज्ञों की मानें तो इस स्थान पर भगवान विष्णु जी की प्रतिमा प्राप्त हुयी थी, इसके बाद इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया था। खास यह है कि इस भव्य-दिव्य मंदिर के निर्माण में द्रविड़ एवं केरल शैली का मिश्रित स्वरूप विद्यमान है।
     मंदिर का गोपुरम द्रविड़ शैली में निर्मित है। यंू कहेें कि पद्मनाभ स्वामी मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला एवं स्थापत्यकला का अद्भुत उदाहरण है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। भव्यता पूर्ण मंदिर परिसर में कलाकृतियों का आकर्षण परिवेश को आैर भी अधिक सुन्दर बना देता है। 

    खास तौर से गोपुरम को सुन्दरतम कलाकृतियों से सुसज्जित किया गया है। शिल्प सौन्दर्य का यह निराला आयाम है। मंदिर के पास ही सुन्दर सरोवर भी है। इस सरोवर को पद्मतीर्थ कुलम के नाम से जाना जाता है।
    इस सरोवर में श्रद्धालु स्नान करते हैं। इस मंदिर को देश का सबसे धनाढ़्य मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर को विष्णु भगवान के भक्तों की आराधना स्थली भी कहा जाता है। श्रद्धालु प्रभु से सुख समृद्धि की कामना करते हैं।
     पद्मनाभ स्वामी मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट तिरुवनंतपुरम में है। निकटतम रेलवे स्टेशन भी तिरुवनंतपुरम में ही है। इसके अलावा पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
8.482778,76.943591

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...