जगन्नाथ मंदिर : आस्था का केन्द्र
हिन्दुओं की आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा का केन्द्र जगन्नाथ मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर की ख्याति विश्व में है।
वैष्णव सम्प्रदाय का यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण का स्थान माना जाता है। इस मंदिर की रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध है। मंदिर में मुख्यत: भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं भगिनी सुभद्रा की सुन्दर प्रतिमायें हैं। रथयात्रा में देव त्रय भव्य दिव्य रथ में निकलते हैं। मध्य काल से ही यह उत्सव भव्यता के साथ मनाया जाता है।
वैष्णव पंथ के संस्थापक चैतन्य प्रभु कई वर्षों तक पुरी में रहे। यह भव्य दिव्य मंदिर वैष्णव सम्प्रदाय एवं संत रामानन्द से ताल्लुक रखता है। मंदिर के शिखर पर चक्र एवं ध्वज विद्यमान है। चक्र सुदर्शन चक्र का प्रतीक है जबकि ध्वज जगन्नाथ जी का प्रतीक है।
विशेषज्ञों की मानें तो कलिंग राजा अनन्त वर्मन चोडगंग देव ने मंदिर का निर्माण प्रारम्भ कराया था। ओडिशा के शासक अनंग भीम देव ने इस मंदिर को 1197 में अंतिम रूप दिया।
किवदंती है कि भगवान जगन्नाथ की इन्द्रनील या नीलमणि निर्मित मूल मूर्ति एक वृक्ष के नीचे मिली थी। मालवा नरेश इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में यह मूर्ति दिखायी दी थी। नरेश के घोर तपस्या के उपरांत यह हासिल हो सकी।
भगवान विष्णु की इच्छानुसार मूर्ति को लकड़ी से गढ़ा गया। राजा को विष्णु एवं विश्वकर्मा बढ़ई एवं मूर्तिकार के रूप में मिले। मूर्तिकार के रूप में भगवान विष्णु ने राजा को बताया कि एक माह की अवधि में मूर्ति तैयार होंगी लेकिन शर्त यह कि बंद कमरे में मूर्ति तैयार करने का कार्य होगा। इस अवधि में कोई भी कक्ष में नहीं आयेगा। अन्यथा कार्य अपूर्ण ही रह जायेगा।
एक माह की अवधि होने पर राजा ने उत्सुकतावश कक्ष में प्रवेश किया तो वृद्ध कारीगर द्वार खोल कर बाहर आ गया। मूर्तियां उस समय अपूर्ण थीं। यह सब दैववश हुआ। लिहाजा मूर्तियां यथावत स्थापित होकर पूजित हैं। यह मूर्तियां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा की हैं।
इतिहासकारों का मत है कि इस स्थान पर बौद्ध स्तूप था। इस स्तूप पर गौतम बुद्ध का एक दांत था। इसे बाद में कैंडी लंका पहंुचा दिया गया था। इस काल में बौद्ध धर्म को वैष्णव सम्प्रदाय ने आत्मसात कर लिया था। इसके बाद से ही जगन्नाथ जी की पूजा अर्चना लोकप्रिय हो गयी। यह काल 10 वीं शताब्दी का था।
ओडिशा में उस समय सोमवंशी राज चल रहा था। महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर को भारी तादाद में स्वर्ण दान किया था। करीब 400000 वर्ग फुट में फैला जगन्नाथ मंदिर परिसर सुन्दरता एवं वास्तुशिल्प का विलक्षण आयाम है। कलिंग शैली के मंदिर स्थापत्यकला एवं वास्तुशिल्प का सुन्दरतम आयाम है। इस मंदिर को देश के भव्य दिव्य स्मारकों में गिना जाता है।
खास यह है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा की मूर्तियां रत्न जड़ित हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जगन्नाथ मंदिर की रसोई भारत की सबसे बड़ी रसोई है। प्रभु का प्रसाद बनाने में 500 रसोइये एवं 300 सहयोगियों की सहायता ली जाती है।
श्री जगन्नाथ मंदिर पुरी की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट भुवनेश्वर है। भुवनेश्वर एयरपोर्ट से पुरी की दूरी करीब 55 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन पुरी है। यह रेल मार्ग कोलकाता, नई दिल्ली, गुवाहाटी आदि सभी बड़े शहरों से जुड़ा है। श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी पुरी की यात्रा कर सकते हैं।
19.804814,85.817650
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