Friday, 29 June 2018

जगन्नाथ मंदिर : आस्था का केन्द्र

     हिन्दुओं की आस्था, विश्वास एवं श्रद्धा का केन्द्र जगन्नाथ मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर की ख्याति विश्व में है।

    वैष्णव सम्प्रदाय का यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण का स्थान माना जाता है। इस मंदिर की रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध है। मंदिर में मुख्यत: भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं भगिनी सुभद्रा की सुन्दर प्रतिमायें हैं। रथयात्रा में देव त्रय भव्य दिव्य रथ में निकलते हैं। मध्य काल से ही यह उत्सव भव्यता के साथ मनाया जाता है। 

    वैष्णव पंथ के संस्थापक चैतन्य प्रभु कई वर्षों तक पुरी में रहे। यह भव्य दिव्य मंदिर वैष्णव सम्प्रदाय एवं संत रामानन्द से ताल्लुक रखता है। मंदिर के शिखर पर चक्र एवं ध्वज विद्यमान है। चक्र सुदर्शन चक्र का प्रतीक है जबकि ध्वज जगन्नाथ जी का प्रतीक है।
    विशेषज्ञों की मानें तो कलिंग राजा अनन्त वर्मन चोडगंग देव ने मंदिर का निर्माण प्रारम्भ कराया था। ओडिशा के शासक अनंग भीम देव ने इस मंदिर को 1197 में अंतिम रूप दिया।

   किवदंती है कि भगवान जगन्नाथ की इन्द्रनील या नीलमणि निर्मित मूल मूर्ति एक वृक्ष के नीचे मिली थी। मालवा नरेश इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में यह मूर्ति दिखायी दी थी। नरेश के घोर तपस्या के उपरांत यह हासिल हो सकी।
     भगवान विष्णु की इच्छानुसार मूर्ति को लकड़ी से गढ़ा गया। राजा को विष्णु एवं विश्वकर्मा बढ़ई एवं मूर्तिकार के रूप में मिले। मूर्तिकार के रूप में भगवान विष्णु ने राजा को बताया कि एक माह की अवधि में मूर्ति तैयार होंगी लेकिन शर्त यह कि बंद कमरे में मूर्ति तैयार करने का कार्य होगा। इस अवधि में कोई भी कक्ष में नहीं आयेगा। अन्यथा कार्य अपूर्ण ही रह जायेगा।

     एक माह की अवधि होने पर राजा ने उत्सुकतावश कक्ष में प्रवेश किया तो वृद्ध कारीगर द्वार खोल कर बाहर आ गया। मूर्तियां उस समय अपूर्ण थीं। यह सब दैववश हुआ। लिहाजा मूर्तियां यथावत स्थापित होकर पूजित हैं। यह मूर्तियां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा की हैं। 
     इतिहासकारों का मत है कि इस स्थान पर बौद्ध स्तूप था। इस स्तूप पर गौतम बुद्ध का एक दांत था। इसे बाद में कैंडी लंका पहंुचा दिया गया था। इस काल में बौद्ध धर्म को वैष्णव सम्प्रदाय ने आत्मसात कर लिया था। इसके बाद से ही जगन्नाथ जी की पूजा अर्चना लोकप्रिय हो गयी। यह काल 10 वीं शताब्दी का था।
      ओडिशा में उस समय सोमवंशी राज चल रहा था। महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर को भारी तादाद में स्वर्ण दान किया था। करीब 400000 वर्ग फुट में फैला जगन्नाथ मंदिर परिसर सुन्दरता एवं वास्तुशिल्प का विलक्षण आयाम है। कलिंग शैली के मंदिर स्थापत्यकला एवं वास्तुशिल्प का सुन्दरतम आयाम है। इस मंदिर को देश के भव्य दिव्य स्मारकों में गिना जाता है। 
    खास यह है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा की मूर्तियां रत्न जड़ित हैं। विशेषज्ञों की मानें तो जगन्नाथ मंदिर की रसोई भारत की सबसे बड़ी रसोई है। प्रभु का प्रसाद बनाने में 500 रसोइये एवं 300 सहयोगियों की सहायता ली जाती है।
        श्री जगन्नाथ मंदिर पुरी की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट भुवनेश्वर है। भुवनेश्वर एयरपोर्ट से पुरी की दूरी करीब 55 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन पुरी है। यह रेल मार्ग कोलकाता, नई दिल्ली, गुवाहाटी आदि सभी बड़े शहरों से जुड़ा है। श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी पुरी की यात्रा कर सकते हैं।
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Monday, 18 June 2018

सिद्धिविनायक : कल्याणकारी दर्शन

     आराध्य सिद्धिविनायक श्री गणेश जी का भव्य-दिव्य मंदिर महाराष्ट्र के मुम्बई में स्थित है। श्री गणेश जी के इस स्थान की मान्यता सिद्धपीठ की है।

   विशेषज्ञों की मानें तो दार्इं ओर मुड़ी सूंड वाली प्रतिमा होने से स्थान को सिद्धपीठ की मान्यता है। लिहाजा मुम्बई के सिद्धिविनायक को सिद्धपीठ का दर्जा हासिल है।
    मुम्बई के प्रभादेवी इलाके में स्थित सिद्धिविनायक का यह स्थान देश-दुनिया में खास तौर से प्रसिद्ध है। सिद्धिविनायक की विशेषता यह है कि यह विग्रह चतुर्भुजी है। उपरी दायें हाथ में कमल, उपरी बायें हाथ में अंकुश है। नीचे दाहिने हाथ में मोतियों की माला है तो बायें हाथ में मोदक भरा कटोरा है। 
   गणपति के दोनों पत्नियां रिद्धि एवं सिद्धि भी विराजमान हैं। गणेश जी का यह स्वरुप दर्शनार्थियों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला है। सिद्धिविनायक का यह विग्रह काले शिलाखण्ड पर विद्यमान है।
     महाराष्ट्र में इस मंदिर की गणना अष्टविनायकों में होती है। विशेषज्ञों की मानें तो सिद्धिविनायक के इस मंदिर का निर्माण 1801 में हुआ था। वर्तमान में यह मंदिर 20000 वर्ग फुट में है। मंदिर की पांच मंजिला इमारत में प्रवचन सभाकक्ष, गणेश संग्रहालय, गणेश विद्यापीठ एवं अस्पताल है। इस अस्पताल में चिकित्सा निशुल्क होती है। उपर रसोई है। भोग के लिए प्रसाद इसी रसोई से आता है। 
   अष्टभुजी गर्भगृह करीब 10 फुट चौड़ा एवं 13 ऊंचा है। गर्भगृह के चबूतरा पर स्वर्ण शिखर वाला चांदी का सुन्दर मण्डप है। यहां अष्टविनायक, अष्टलक्ष्मी एवं दशावतार की आकृतियां अंकित हैं। मंदिर की वास्तुकला एवं सुन्दरता विशिष्टता को दर्शाती हैै। मंदिर का माहौल अनन्त शांति एवं विश्वास का अनुभव प्रदान करता है। 
   खास यह है कि नवनिर्मित मंदिर का गर्भगृह इस प्रकार बनाया गया है कि जिससे अधिक से अधिक श्रद्धालु सभामण्डपम से सीधे गणपति के दर्शन कर सकें। इमारत के प्रथम खण्ड में गैलरियों का निर्माण इस प्रकार है कि श्रद्धालु सीधे गणपति के दर्शन कर सकते हैं। 
   विशेषज्ञों की मानें तो नित्य हजारों श्रद्धालु गणपति के दर्शन कर पुण्य के भागीदार बनते हैं। यहां की खास फूल वाली गली है। इस फूल वाली गली में पूजा की थाली एवं पूजा का प्रसाद मिलता है।
     बुधवार को खास तौर से सिद्धिविनायक मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। कारण बुधवार का दिन सिद्धिविनायक को समर्पित है। विशेष रूप से गणपति आरती एवं प्रार्थनाओं का आयोजन होता है।   
    गणपति विग्रह को ढ़कने के लिए अष्टकोणीय आश्रय बनाया गया। यह आश्रय अति सुन्दर है। खूबसूरत डिजाइन वाला यह आश्रय स्वर्ण आवरण से आच्छादित है। मंदिर के अंदर का भाग अर्थात मण्डप भव्य-दिव्य है। लकड़ी के प्रवेश द्वार अति सुन्दर नक्काशी वाले है। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धा एवं आस्था पूर्वक कोई भी याचना यहां अवश्य पूर्ण होती है। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का यह केन्द्र देश भर में खास ख्याति रखता है। देश की ख्याति प्राप्त हस्तियां गणपति के दर्शन के लिए निरन्तर आती रहती हैं।
    सिद्धिविनायक गणपति के दर्शन यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट मुम्बई है। निकटतम रेलवे स्टेशन छत्रपति शिवाजी टर्मिनल है। इसके अलावा श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
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Wednesday, 6 June 2018

रणकपुर : मंदिरों एवं पर्वत श्रंखला का सौन्दर्य

     अरावली पर्वत की शिखर श्रंखला पर स्थित रणकपुर का सौन्दर्य भी लाजवाब है। रणकपुर श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास के स्थल के साथ ही देश का एक सुन्दर हिल स्टेशन भी है।

    राजस्थान का रणकपुर वस्तुत: जैन मंदिर के लिए खास तौर से जाना पहचाना जाता है लेकिन यहां की रमणीयता का कहीं कोई जोड़ नहीं। 
   समुद्र तल से करीब 1100 मीटर ऊंचाई पर स्थित रणकपुर की सुन्दरता देखते ही बनती है। पर्वत श्रंखलाओं के आच्छादन के बीच रणकपुर जैन मंदिर स्थित है। पर्वत श्रंखलाओं के शिखर एवं वादियों-घाटियों में घना सुन्दर वन क्षेत्र पर्यावरण की सुन्दरता का बखान खुद-ब-खुद करता है। प्राकृतिक परिवेश की सुन्दरता मानों पर्यटकों के ह्मदय में जीवंतता के पंख लगा देती हो।
    राजस्थान वैसे तो मंदिरों एवं स्मारकों के लिए खास तौर से जाना ही जाता है लेकिन रणकपुर की सुन्दरता की बात ही निराली है। देश के शीर्ष जैन मंदिरों की दिव्यता-भव्यता को देखें तो रणकपुर जैन मंदिर की दिव्यता-भव्यता विशाल है। रणकपुर जैन मंदिर करीब 40000 वर्ग फुट में फैला है। करीब 600 वर्ष प्राचीन इस मंदिर के निर्माण में 50 वर्ष से भी अधिक का समय लगा। 
     अरावली हिल स्टेशन के मध्य में स्थित रणकपुर जैन मंदिर में चार कलात्मक प्रवेश द्वार हैं। मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में तीर्थंकर आदिनाथ की संगमरमर की चार विशाल प्रतिमायें स्थापित हैं। लिहाजा इसे चौमुख मंदिर के तौर पर भी जाना जाता है। इसके अलावा मंदिर क्षेत्र में 76 छोटे-छोटे गुम्बदनुमा पवित्र स्थान हैं। 
    मान्यता है कि यह स्थान मनुष्य को जीवन मृत्यु की 84 योनियों से मुक्ति प्राप्त करने एवं मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं। रणकपुर जैन मंदिर की विशेषता खम्भों की श्रंखला है। मंदिर में करीब 1444 खम्भों की लम्बी श्रंखला है।
   खास यह है कि छोटे-बड़े खम्भों की यह श्रंखला इस प्रकार है कि कहीं से भी देखने पर मुख्य पवित्र स्थल के दर्शन में कहीं कोई बाधा नहीं होती। इन खम्भों पर सुन्दर नक्काशी अंकित है। भगवान ऋषभदेव के पदचिह्न भी यहां अंकित हैं। मंदिर के मुख्य गलियारा में सभी जैन तीर्थंकरों की तस्वीरें अति सुन्दरता से अंकित है। 
    रणकपुर जैन मंदिर परिसर में नेमीनाथ एवं पारसनाथ को समर्पित दो अन्य मंदिर हैं। इन मंदिरों की नक्काशी खजुराहों को याद कराती है। रणकपुर जैन मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर अम्बा माता का मंदिर है। खास यह कि मंदिरों के शिखर पर घंटियां बंधी हैं।हवा के झोंकों से घंटियां बजती रहती हैं। लिहाजा इलाका घंटियों की टंकार से रणकपुर अनवरत अनुगूंजित होता रहता है।
     अरावली हिल स्टेशन के शिखर से रेगिस्तानी इलाका दिखता है। यह सुन्दर दृश्य अति मोहक होता है। खास यह है कि रणकपुर एरिया में बारिश कम होने के बावजूद तापमान कम ही रहता है। जिससे मौसम बेहद खुशनुमा महसूस किया जाता है।
     रणकपुर हिल स्टेशन एरिया एवं उसके आसपास अन्य रमणीक एवं दर्शनीय स्थलों की एक लम्बी श्रंखला है। सूर्य मंदिर, देसुरी, मुच्छल महावीर आदि स्थान हैं।
      रणकपुर सूर्य मंदिर: रणकपुर सूर्य मंदिर करीब 8 किलोमीटर दूर है। इलाके का यह एक अति खूबसूरत मंदिर माना जाता है। यह स्थान खुदाबक्स बाबा की पुरानी दरगाह के लिए जाना जाता है। यहां बाराहअवतार मंदिर भी है।
    देसुरी: देसुरी रणकपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर है। यह स्थान तीन मंदिरों की श्रंखला को समर्पित है। यहां भगवान शिव, हनुमान जी एवं नवी माता का मंदिर है। निकट ही परसुराम महादेव का मंदिर है।
     मुच्छल महावीर: मुच्छल महावीर मंदिर मुख्य तौर से कुंभलगढ़ अभ्यारण में स्थित है। इस मंदिर की विशेषता है कि भगवान महावीर की प्रतिमा मूंछों वाली है। यह स्थान वास्तुशिल्प का शानदार उदाहरण है। यह क्षेत्र गरासिया जनजाति का है। जनजाति की परिधान शैली बेहद आकर्षक है। यह परिधान शैली पर्यटकों को बेहद आकर्षित करती है।
      रणकपुर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। रणकपुर का निकटतम एयरपोर्ट महाराणा प्रताप एयरपोर्ट उदयपुर है। उदयपुर से रणकपुर की दूरी करीब 98 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन फालना है। फालना से रणकपुर की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। इसके अलावा पर्यटक सड़क मार्ग से भी रणकपुर की यात्रा कर सकते हैं।
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तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...