Wednesday, 15 January 2020

लक्ष्मी नारायण मंदिर: अद्भुत स्थापत्य कला

    लक्ष्मी नारायण मंदिर भोपाल का वास्तुशिल्प अद्भुत एवं विलक्षण है। मंदिर के वास्तुशिल्प में प्राचीनता के दर्शन होते हैं। 

   भारत के मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का लक्ष्मी नारायण मंदिर वस्तुत: स्थापत्य कला का एक नायाब नमूना है। भगवान श्रीहरि विष्णु एवं लक्ष्मी जी को समर्पित यह देव स्थान श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र है। अरेरा पर्वत पर लक्ष्मी नारायण का यह मंदिर अपनी विशिष्टता के कारण वैश्विक ख्याति रखता है।

    खास यह कि इसे बिड़ला मंदिर भी कहा जाता है। धार्मिक आस्था का यह केन्द्र अपनी विशिष्टता से पर्यटकों को बरबस आकर्षित करता है। करीब 8 एकड़ क्षेत्र में फैले इस मंदिर का वास्तुशिल्प अति दर्शनीय है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान श्रीहरि नारायण एवं लक्ष्मी जी की मनोहारी प्रतिमाएं प्राण प्रतिष्ठित हैं। 

   इस दिव्य भव्य मंदिर का शिलान्यास वर्ष 1960 में किया गया था। मंदिर को वर्ष 1964 में आम जनता के दर्शनार्थ लोकार्पित कर दिया गया। मंदिर में विभिन्न पौराणिक कथानकों को नक्काशी के माध्यम से दृश्यांकित किया गया है। संगमरमर पर दर्शित नक्काशी अति दर्शनीय एवं मनोहारी है। 

   खास यह कि इन नक्काशी में गीता एवं रामायण के उपदेश भी अंकित हैं। इस दिव्य भव्य मंदिर में भगवान श्रीहरि एवं लक्ष्मी जी के अलावा भगवान शिव एवं मां जगदम्बा आदि भी विराजमान हैं। मंदिर परिसर में भगवान हनुमान जी एवं शिवलिंग भी स्थापित हैं।

   मंदिर का मुख्य आकर्षण विशाल शंख है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने स्थित विशाल शंख अति दर्शनीय है। राधा कृष्ण की प्रतिमाएं भी बेहद लुभावनी हैं।
   श्री कृष्ण जन्माष्टमी मंदिर में मुख्य पर्व के रूप में मनाया जाता है। भोपाल स्थित बिड़ला मंदिर के अलावा भोजपुर में स्थित भगवान शिव का मंदिर भी यहां का एक धार्मिक आकर्षण है। 

   भोजपुर वस्तुत: एक अति प्राचीन शहर है। भोपाल से करीब 28 किलोमीटर दूर स्थित भोजपुर धर्म के लिए बेहद प्रसिद्ध है। भोजपुर स्थित भगवान शिव का मंदिर भोजेश्वर महादेव मंदिर यहां का मुख्य आकर्षण है।
  खास यह कि इस दिव्य भव्य मंदिर को पूर्व का सोमनाथ कहा जाता है। भोजपुर की स्थापना गुर्जर परमार राजवंश के राजा भोज ने की थी। 

   शायद इसीलिए इस शहर को राजा भोज के नाम से भोजपुर चर्चित है। यह स्थान भगवान शिव के मंदिर के साथ साथ साईक्लोपियन बांध के लिए भी जाना एवं पहचाना जाता है।
   भोजेश्वर मंदिर की स्थापत्य कला अति सुन्दर है। मंदिर एक ऊंचे चबूतरा पर स्थित है। इस मंदिर के गर्भगृह में करीब साढ़े तीन मीटर लम्बा शिवलिंग स्थापित है।

  मान्यता है कि यह शिवलिंग भारत के विशाल शिवलिंगों में से एक है। भोजपुर एक ऐतिहासिक एवं पौराणिक दर्शनीय स्थल है। वस्तुत: देखें तो भोपाल धार्मिक पर्यटन के साथ साथ मन मस्तिष्क को एक प्रफुल्लता प्रदान करता है। वास्तुकला का प्रदर्शन देखना हो तो भोपाल सबसे बेहतरीन शहर है।

   भोपाल में दर्शनीय स्थलों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है। खास तौर से देखें तो भारत भवन, शौर्य स्मारक, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, मोती मस्जिद, ताज उल मस्जिद, शौकत महल, सदर मंजिल, गौहर महल, पुरातात्विक संग्रहालय आदि इत्यादि बहुत कुछ दर्शनीय है।
   भारत भवन: भारत भवन खास तौर से उत्तर भारत का सर्वाधिक पसंदीदा एवं प्रसिद्ध कला केन्द्र है। इसे अनूठा संस्थान कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। वर्ष 1982 में संरचित भारत भवन अनेक रचनात्मक क्रियाकलापों के प्रदर्शन के लिए है। 
   इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भी भोपाल का एक मुख्य आकर्षण है। करीब 200 एकड़ में फैला यह अनोखा संग्रहालय श्यामला पहाड़ियों के क्षेत्र में स्थित है। इसी प्रकार पुरातात्विक संग्रहालय भी भोपाल का एक अन्य आकर्षण है। बनगंगा रोड पर स्थित यह संग्रहालय मूर्तियों के लिए जाना एवं पहचाना जाता है। 

   शौर्य स्मारक: शौर्य स्मारक शहर के अरेरा पहाड़ी इलाके में स्थित है। करीब 12 एकड़ में फैला शौर्य स्मारक शहीद सैनिकों को समर्पित है। इसमें पाकिस्तान एवं चीन से हुए युद्ध से संबंधित प्रदर्शनियां हैं। 
   मोती मस्जिद: मोती मस्जिद की स्थापत्य कला अति दर्शनीय है। इस मस्जिद को कदसिया बेगम की बेटी सिकंदर जहां बेगम ने 1860 में बनवाया था। इसी प्रकार ताज उल मस्जिद, शौकत महल, सदर मंजिल, गौहर महल आदि इत्यादि स्थापत्य कला की सुन्दर संरचना है।
   लक्ष्मी नारायण मंदिर सहित भोपाल की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट राजा भोज एयरपोर्ट भोपाल है। निकटतम रेलवे स्टेशन भोपाल रेलवे जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी लक्ष्मी नारायण मंदिर भोपाल की यात्रा कर सकते हैं।
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Thursday, 2 January 2020

जयंती शक्तिपीठ: धार्मिक पर्यटन

   जयंती शक्तिपीठ को धार्मिक स्थान के साथ ही बेहतरीन पर्यटन कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। देवी सती का यह स्थान मुख्य रूप से माता दुर्गा को समर्पित है। 

   भारत के मेघालय की जयंतिया हिल्स पर स्थित जयंती शक्तिपीठ श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र है। विशेषज्ञों की मानें तो जयंती शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठ में से एक है। हिन्दू धर्म पुराणों की मानें तो देवी सती के शव के अंग जिन स्थानों पर गिरे, उन स्थानों को शक्तिपीठ माना गया।

   सती के अंग के हिस्से, आभूषण एवं वस्त्र आदि इत्यादि गिरने वाले स्थान ही शक्तिपीठ के रूप में पूजित हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक यह शक्तिपीठ अत्यंत पवित्र महातीर्थ कहलाते हैं। खास यह है कि शक्तिपीठ के रूप में यह महातीर्थ भारतीय उपमहाद्वीप में चहुंओर फैले हुए हैं।

   मान्यता है कि इन शक्तिपीठ की संख्या 51 है। देवी पुराण में भी 51 शक्तिपीठ माने गये हैं। इन 51 शक्तिपीठ में जयंती शक्तिपीठ भी एक है। शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा को समर्पित जयंती शक्तिपीठ मेघालय के शीर्ष धार्मिक स्थलों में से एक है।

    शारदीय एवं चैत्र नवरात्र में जयंती शक्तिपीठ में मां भगवती के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। मान्यता है कि मां भगवती के दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भारत के पूर्वोत्तर का मेघालय वस्तुत: पर्वतीय राज्य है।

   लिहाजा मेघालय अधिसंख्य पहाड़ों पर रचा बसा है। जाहिर सी बात है कि ऐसे में पर्वतीय सौन्दर्य से श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों का मन प्रफुल्लित होगा।
   वस्तुत: मेघालय का यह इलाका जनजातीय बाहुल्य इलाका है। जयंतिया, गारी एवं खासी मेघालय की मुख्य पहाड़ियां हैं। इनमें जयंतिया पहाड़ी बेहद प्रसिद्ध है।

   खास तौर से जयंतिया अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है। इस जयंतिया पहाड़ी के गांव नारतियांग में जयंती शक्तिपीठ स्थित है। नारतियांग खास तौर से जयंती शक्तिपीठ के लिए जाना एवं पहचाना जाता है।

   यह भी कहा जा सकता है कि जयंती शक्तिपीठ जयंतिया हिल्स का मुख्य आकर्षण है तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। जयंतिया पहाड़ी पर स्थित जयंती शक्तिपीठ के चौतरफा एक खास सुरम्यता दिखती है।

 यह शांत सुरम्यता श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों के दिल एवं दिमाग को एक ताजगी एवं प्रफुल्लता प्रदान करती है। मान्यता है कि जयंतिया पहाड़ी के इस स्थान पर सती शव के वाम जंघ का निपात हुआ था। लिहाजा इस स्थान को शक्तिपीठ की मान्यता मिली।

   शिलांग से करीब 53 किलोमीटर दूर स्थित जयंती शक्तिपीठ पवित्र धाम के साथ ही महातीर्थ भी कहा जाता है।

   विशेषज्ञों की मानें तो जयंती शक्तिपीठ में भगवान शिव एवं देवी सती मुख्य रूप से पूजित हैं। खास यह है कि शक्तिपीठ में सती को जयंती एवं भगवान शिव को क्रमदीश्वर महादेव के रूप में पूजित हैं।

   जयंती शक्तिपीठ की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट गुवाहाटी एयरपोर्ट है। गुवाहाटी एयरपोर्ट से जयंती शक्तिपीठ की दूरी करीब 181 किलोमीटर है।

   श्रद्धालु शिलांग एयरपोर्ट से भी जयंती शक्तिपीठ की यात्रा कर सकते हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन गोलपारा टाउन जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी जयंती शक्तिपीठ की यात्रा कर सकते हैं।
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तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...