Monday, 30 December 2019

सूर्य मंदिर: विलक्षण एवं अद्भुत वास्तुशिल्प

   सूर्य मंदिर रांची का वास्तुशिल्प विलक्षण एवं अद्भुत कहा जाना चाहिए। जी हां, सूर्य मंदिर का सौन्दर्य अतुलनीय है। शायद इसी लिए इस मंदिर को अद्भुत माना जाता है। 

   खास यह कि 18 शानदार पहियों पर विद्यमान मंदिर का वास्तुशिल्प अनूठा है। इस मंदिर को रथ पर विद्यमान किया गया है। जिससे इसकी दर्शनीयता अति सुन्दर हो जाती है। भारत के झारखण्ड की राजधानी रांची में स्थित यह सूर्य मंदिर अपनी विशिष्टता के कारण खास ख्याति रखता है। 

   उल्लेखनीय है कि भारत में सूर्य मंदिरों की एक लम्बी श्रंखला विद्यमान है लेकिन रांची का सूर्य मंदिर काफी कुछ विशिष्ट है। जिससे इसकी विलक्षणता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
   इस मंदिर को 18 पहियों एवं सात घोड़ों के रथ पर विद्यमान किया गया है। दौड़ते घोड़ों के इस रथ को देखना बेहद सुन्दर प्रतीत होता है।

   ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे स्वर्ग से धरातल की ओर रथ दौड़ता चला आ रहा हो। दौड़ते रथ पर सूर्य मंदिर का विद्यमान होना काफी कुछ विलक्षण प्रतीत होता है। इस सूर्य मंदिर को रांची का मुख्य आकर्षण माना जाता है। खास यह है कि रांची का यह सूर्य मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए बेहद प्रसिद्ध है। 

   रांची से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित यह सूर्य मंदिर धार्मिक स्थान होने के साथ ही एक शानदार पर्यटन क्षेत्र भी है। इसे एक सुन्दर पिकनिक स्पॉट भी कहा जा सकता है। मंदिर परिसर में एक विशाल जलाशय भी है। इस जलाशय की अपनी एक विशिष्ट पवित्रता है। 

    मान्यता है कि इस जलाशय में स्नान करने से पापों का नाश होता है। लिहाजा श्रद्धालु इस जलाशय में स्नान करने के उपरांत मंदिर में सूर्य देव के दर्शन करतेे हैं। यहां का मुख्य पर्व छठ पूजा है। छठ पूजा का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है।
   इस अवसर पर श्रद्धालु इस पवित्र जलाशय में डुबकी लगाते हैं। तत्पश्चात सूर्य उपासना एवं दर्शन करते हैं। इसे हिन्दुओं का तीर्थधाम कहा जाना चाहिए। 

   रांची के इस महातीर्थ के साथ ही रांची का देवरी मंंदिर भी खास प्रसिद्ध है। देवरी मंदिर रांची से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित है। देवरी मंदिर मुख्य रूप से मां दुर्गा को समर्पित है। मंदिर अति प्राचीन माना जाता है। खास यह कि मंदिर समृद्ध धार्मिक विरासत के गर्व का अनुभव कराता है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो मंदिर 10वीं से 11वीं शताब्दी के काल का है। मंदिर की दिव्यता-भव्यता श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। मंदिर की वास्तुकला अद्भुत एवं अति सुन्दर है। लिहाजा श्रद्धालुओं का मन मस्तिष्क प्रफुल्लित हो उठता है। बलुआ पत्थरों से संरचित मंदिर का वास्तुशिल्प अनूठा है। 

   मंदिर की दीवारों पर देवी देवताओं का अंकन श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास को रेखांकित करता है। इसे सोलहभुजी मंदिर भी कहा जाता है। कारण यह कि मंदिर में प्रतिष्ठापित माता दुर्गा की भव्य दिव्य प्रतिमा सोलह अस्त्र-शस्त्र धारण किये है। लिहाजा इसे सोलहभुजी मंदिर कहा जाता है। 

   मान्यता है कि प्रतिमा 700 वर्ष प्राचीन है। रांची का टैगोर हिल भी काफी कुछ खास है। रांची में अल्बर्ट एक्का चौक से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित टैगोर हिल वस्तुत: एक आध्यात्मिक क्षेत्र है। समुद्र तल से करीब 300 फुट की ऊंचाई पर स्थित टैगोर हिल रांची का मुख्य आकर्षण है।

   खास यह कि इसे मोहराबादी हिल के नाम से भी जाना एवं पहचाना जाता है। इस हिल पर वस्तुत: एक शानदार परिसर है। मान्यता है कि इस परिसर का ताल्लुक रविन्द्र नाथ टैगोर से है। ऐसा माना जाता है कि इस स्थान पर बैठ कर रविन्द्र नाथ टैगोर पुस्तकें लिखा करते थे। यहां से चौतरफा नैसर्गिक सौन्दर्य के शानदार दर्शन होते थे।

    टैगोर हिल सेे सूर्योदय एवं सूर्यास्त के अद्भुत दर्शन होते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो रविन्द्र नाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिन्द्र नाथ टैगोर इस पर्वत के प्राकृतिक सौन्दर्य पर मुग्ध थे।
   लिहाजा उन्होंने इस पर्वत को अपना शिविर बनाया था। जिसे बाद में टैगोर हिल के नाम से जाना एवं पहचाना जाने लगा। इस पर्वत की यात्रा करने के लिए पर्यटकों को 200 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। इसे एक शानदार पर्यटन माना जाता है।

   सूर्य मंदिर की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट बिरसा मुंडा इण्टरनेशनल एयरपोर्ट रांची है। निकटतम रेलवे स्टेशन रांची जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी सूर्य मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
23.369900,85.325279

Monday, 2 December 2019

चौसठ योगिनी मंदिर: अतुलनीय स्थापत्य कला

   चौसठ योगिनी मंदिर को स्थापत्य कला का अतुलनीय आयाम कहा जाना चाहिए। जी हां, चौसठ योगिनी मंदिर की स्थापत्य कला अद्भुत एवं विलक्षण है। 

   मंदिर की संरचना बेहद दर्शनीय है। शायद यही कारण है कि यह शानदार मंदिर श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को लुभाता है। भारत के मध्य प्रदेश के शहर जबलपुर स्थित चौसठ योगिनी मंदिर की नक्काशी अति लुभावनी है।
  खास यह है कि चौसठ योगिनी मंदिर मध्य प्रदेश का प्रसिद्ध पर्यटन क्षेत्र है। यह दिव्य-भव्य मंदिर जबलपुर की ऐतिहासिक सम्पन्नता एक शानदार अध्याय है।
   संगमरमर की प्रसिद्ध चट्टानों के मध्य स्थित चौसठ योगिनी मंदिर मुख्य रूप से देवी दुर्गा को समर्पित है। खास यह कि इस मंदिर में देवी दुर्गा की 64 अनुषांगिक प्रतिमाएं प्राण प्रतिष्ठापित हैं। 
   इस मंदिर की विशिष्टता है कि मंदिर के गर्भगृह में मध्य में भगवान शिव की प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। भगवान शिव की प्रतिमा के चारो दिशाओं में देवियों की प्रतिमाएं विद्यमान हैं। 

   भगवान शिव एवं मां पार्वती वैवाहिक वेशभूषा में विराजमान हैं। निकट ही नंदी की दिव्य भव्य प्रतिमा स्थापित है। इस दिव्य भव्य मंदिर का निर्माण कलचुरी राजवंश के शासकों ने वर्ष 1000 के आसपास कराया था।
    दशवीं शताब्दी के इस मंदिर की विशेष ख्याति है। तत्पश्चात त्रिपुरी राजवंश के महाराजा कर्णदेव की महारानी अरुणा देवी ने इसको दिव्य-भव्य स्वरूप प्रदान किया था। मंदिर का निर्माण देवी दुर्गा को समर्पित चौसठ योगिनी मंदिर मध्य प्रदेश सहित देश दुनिया में विशेष ख्याति रखता है।
   जबलपुर का यह दिव्य भव्य मंदिर सुप्रसिद्ध पर्यटन स्थल भेड़ाघाट-धुआंधार के निकट एक शीर्ष पर्वत चोटी पर विद्यमान है। मंदिर एवं मंदिर मार्ग से चौतरफा अति दर्शनीय दृश्य पर्यटकों एवं श्रद्धालुओं को प्रकृति के दर्शन कराता है। यहां से बलखाती नर्मदा नदी के अति सुन्दर दर्शन होते हैं।

    मान्यता है कि यह स्थान ऋषि भृगु की जन्म स्थली है। ऋषि भृगु के प्रताप से प्रभावित होकर कलचुरी साम्राज्य के शासकों ने इस दिव्य-भव्य संरचना को अस्तित्व दिया था। मंदिर की स्थापत्य कला अति सुन्दर एवं दर्शनीय है।
   मंदिर के चौतरफा चहारदीवारी है। यह चहारदीवारी पत्थर से संरचित है। ब्राह्माण्ड की जननी दुर्गा को समर्पित यह मंदिर कलात्मकता का एक सुन्दर प्रतिमान है। पत्थरों की देवी मूर्तियां सौन्दर्य शास्त्र की गाथा को खुद ब खुद बयां करती हैं। 
   विशेषज्ञों की मानें तो इस प्राचीन मंदिर का गुप्त मार्ग गोंड़ रानी दुर्गावती के महल से जाकर मिलता है। मान्यता है कि मंदिर में आज भी 64 योगिनियां पहरा देती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो प्राचीन काल में इस मंदिर को गोलकी मठ के नाम से ख्याति हासिल थी। 

   जबलपुर शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित चौसठ योगिनी मंदिर एक आदर्श पर्यटन क्षेत्र माना जाता है। पर्यटक चौसठ योगिनी मंदिर एवं उसके आसपास भी प्राकृतिक सौन्दर्य एवं आश्चर्यजनक संरचनाओं के दर्शन कर सकते हैं। जबलपुर से कुछ ही दूर पर बैलेंसिंग रॉक है। पर्यटक बैलेेंसिंग रॉक की भी यात्रा कर सकते हैं।

   जबलपुर से करीब 2 किलोमीटर दूर स्थित बैलेंसिंग रॉक अति दर्शनीय प्राचीन क्षेत्र है। दीर्घगोलाकार शिलाखण्ड अति आश्चर्यजनक ढ़ंग से एक विशाल शिलाखण्ड पर स्थित है। इसे गुरुत्वाकर्षण का अद्भुत केेन्द्र माना जाता है। 
  यह संरचना प्राकृतिक है। आश्चर्यजनक किन्तु सत्य दिखने वाला बैलेंसिंग रॉक बेहद दर्शनीय है। शिला की खासियत इसकी विशालता, भार, कठोरता एवं सटीक गुरुत्वाकर्षण है। प्रकृति प्रेेमियों के लिए यह एक सुन्दर स्थान है।

   चौसठ योगिनी मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट डुमना एयरपोर्ट जबलपुर है। डुमना एयरपोर्ट से चौसठ योगिनी मंदिर की दूरी करीब 34.1 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जबलपुर रेलवे जंक्शन है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी चौसठ योगिनी मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
23.132799,79.801697

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...