Thursday, 3 May 2018

रामेश्वरम: श्रद्धा एवं आस्था का केन्द्र

      शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम तीर्थ का अपना एक अलग एवं विशेष महत्व है। हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थ ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम को श्री रामलिंगेश्वरम के नाम से भी जाना जाता है।

    तमिलनाडु के रामनाथपुरा स्थित ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम का वास्तुशिल्प भी शानदार है। खास यह है कि उत्तर भारत में जो काशी विश्वनाथ मंदिर की मान्यता है, वही मान्यता दक्षिण भारत में ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम की है।
    ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम हिंद महासागर एवं बंगाल की खाड़ी से घिरा एक सुन्दर शंख के आकार का द्वीप है। भगवान श्री राम ने लंका पर चढ़ाई से पहले पत्थरों के शिलाखण्ड का समुद्र पर सेतु का निर्माण किया था। 
     रत्नाकर की संज्ञा रखने वाली बंगाल की खाड़ी इसी स्थान पर हिंद महासागर में मिलती है। ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम एवं श्री राम सेतु अति प्राचीन हैं। रामेश्वरम का गलियारा विश्व का सबसे लम्बा गलियारा माना जाता है। इसके परकोटे की लम्बाई भी कम नहीं है। यह मंदिर करीब 6 हेक्टेयर में फैला हुआ है।
       मंदिर में विशालाक्षी जी के गर्भगृह के निकट 9 शिवलिंग स्थापित हैं। इन सभी शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग की मान्यता है। कहावत है कि यह सभी शिवलिंग रावण द्वारा स्थापित हैं। ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम का वास्तुशिल्प एवं निर्माण कला अति सुन्दर है। मंदिर का प्रवेश द्वार करीब 40 फुट ऊंचा है। मंदिर के अंदर नाना प्रकार के असंख्य खम्भे हैं।
      विशेषता यह कि सभी खम्भे एक प्रकार के प्रतीत होते हैं। बारीकी से अध्ययन करें तो हर खम्भा की नक्काशी एवं बेलबूटे अलग एवं सुन्दर दिखते हैं। कारीगरी का यह विलक्षण आयाम हैं। यहीं रामनाथ की मूर्ति है। इसका परिक्रमा पथ 400 फुट लम्बा है। ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम मंदिर के निर्माण में लाखों टन पत्थरों का उपयोग किया गया है। 
     खास तौर से काले पत्थरों का उपयोग किया गया है। कहावत है कि मंदिर निर्माण के उपयोग में लाये गये पत्थर लंका से लाये गये थे। ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम मंदिर निर्माण का कथानक है कि भगवान श्री राम ने लंका पर चढ़ाई से पहले समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना कर पूजन-अर्चन किया था।
      रावण का वध करने के बाद भगवान श्री राम को क्षोभ था कि ब्राह्म हत्या का पाप लगेगा। कारण रावण कोई सामान्य राक्षस नहीं था। वह पुलत्स्य ऋषि का नाती था। चारों वेदों का ज्ञाता था। शिव का अनन्य भक्त था।
      लिहाजा ब्राह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए श्री राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापना का निश्चय किया। निश्चय करने के बाद श्री राम ने भक्त हनुमान को आज्ञा दी कि काशी से एक शिवलिंग लेकर आओ। हनुमान पवन सुत थे। 
    हनुमान जी चले गये लेकिन हनुमान जी नियत तिथि तक नहीं लौटे। जानकी जी ने यह देखा कि शिवलिंग स्थापना का नियत समय गुजर रहा है लेकिन हनुमान नहीं लौटे। जानकी जी ने समुद्र किनारे से रेत लेकर मुट्ठी बांध कर शिवलिंग बना दिया। यह देख श्रीराम अति प्रसन्न हुये। नियत समय पर श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना कर दी। यह छोटे आकार का शिवलिंग ही रामनाथ कहलाता है।
    बाद में हनुमान के आने पर छोटे शिवलिंग के निकट ही काले पत्थर का बड़ा शिवलिंग स्थापित किया। मुख्य शिवलिंग को ज्योतिर्लिंग की मान्यता है। श्रद्धालु दोनों ही शिवलिंग की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम मंदिर के निकट कई अन्य तीर्थ एवं सुन्दर स्थान हैं। इनमें खास तौर से गंधमादन पर्वत, सेतु माधव, विल्लीरणि तीर्थ, एकांत राम, कोदण्ड स्वामी मंदिर, सीता कुण्ड, आदि सेतु एवं रामेश्वरम शहर आदि हैं।
     गंधमादन पर्वत: गंधमादन पर्वत ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम से कुछ ही दूर पर स्थित है। यह एक छोटा सा पहाड़ है। कहावत है कि हनुमान जी ने समुद्र को लांघने के लिए इसी पर्वत से छलांग मारी थी। बाद में श्रीराम ने लंका विजय के लिए इसी स्थान पर विशाल सेना संगठित की थी। इस पर्वत पर एक सुुन्दर मंदिर है। इसे पादुका मंदिर कहते हैं।
    सेतु माधव: सेतु माधव शिव मंदिर है। इसमें कई मंदिर हैं। मुख्यत: यह विष्णु मंदिर है।
    बाइस कुण्ड: बाइस कुण्ड रामनाथ मंदिर परिसर का यह एक तीर्थ है। इसके जलकुण्ड की संख्या 24 थी। दो कुण्ड सूख गये। इसलिए अब इसे 22 कुण्ड कहा जाता है। कोटितीर्थ का कुण्ड जल आैषधीय है। शरीर के रोग नष्ट हो जाते हैं। स्नान करने के उपरांत श्रद्धालु उर्जावान महसूस करते हैं।
   आदि सेतु: आदि सेतु रामेश्वरम से सात मील दूर दक्षिण में है। इसे दर्भशयनम भी कहते हैं। इसी स्थान पर श्रीराम ने समुद्र में सेतु बांधने का कार्य किया था। इसी कारण इस स्थान को आदि सेतु के नाम से जाना जाता है।
     ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट मदुरै है। निकटतम रेलवे स्टेशन भी मदुरै में है। इसके अलावा सड़क मार्ग से भी यात्रा की जा सकती है।
9.287625,79.312929

Wednesday, 2 May 2018

नागेश्वर महादेव: शिव का वरदान

     शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में नागेश्वर महादेव की महिमा निराली है। कहावत है कि ज्योतिर्लिंग नागेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से श्रद्धालु पाप मुक्त हो जाते हैं।

    गुजरात के द्वारका से करीब 13 मील दूर स्थित ज्योतिर्लिंग नागेश्वर महादेव मंदिर की ख्याति विश्व के असंख्य देशों में है। गुजरात के द्वारका के बाहरी क्षेत्र में स्थित इस ज्योतिर्लिंग का उल्लेख शास्त्र एवं पुराणों में भी है।
   नागेश्वर का आशय नागों के ईश्वर से होता है। विशेषज्ञों की मानें तो यह विष से बचाव का संकेत भी है। रुद्र संहिता में भगवान शिव को दारुकावने नागेशं कहा गया है। इस पवित्र ज्योतिर्लिंग दर्शन की महिमा शास्त्रों में दर्शायी गयी है।
    कहावत है कि इस ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति एवं महात्म्य को श्रद्धापूर्वक सुनने श्रद्धालु पाप मुक्त हो जाता है। नागेश्वर महादेव को शिव के परम पवित्र दिव्य धाम का स्थान हासिल है। कहावत है कि सुप्रिय नामक एक धर्मात्मा एवं सदाचारी वैश्य था।
   इस शिव भक्त वैश्य को एक राक्षस परेशान करता था। राक्षस को शिव पूजा अच्छी नहीं लगती थी। वैश्य शिव पूजा करता था आैर राक्षस उसमें विघ्न डालता था। शिव भक्त वैश्य को राक्षस ने विभिन्न प्रकार से परेशान किया। राक्षस क्रोध में वैश्य को मारने के लिए दौड़ा तो उसी क्षण शिव प्रकट हो गये। शिव ने भक्त वैश्य को पाशुपत अस्त्र प्रदान किया। जिससे वैश्य ने राक्षस का वध कर दिया। 
   वैश्य राक्षस का वध करके शिवधाम को चला गया। भगवान शिव के वरदान से इस स्थान का नाम ज्योतिर्लिंग नागेश्वर पड़ा। मान्यता है कि श्रावण मास में ज्योतिर्लिंग महादेव की पूजा-अर्चना करने से श्रद्धालुओं को सम्पूर्ण भौतिक सुखों एवं आध्यामिक सुखों की प्राप्ति होती है। 
    खास यह है कि नागेश्वर महादेव के ज्योतिर्लिंग के दो अन्य स्थान बताये जाते हैं। यह दो स्थान उत्तराखण्ड में जागेश्वर महादेव एवं आंध्र प्रदेश में नागेश्वर महादेव के नाम से जाने-पहचाने जाते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो गुजरात के द्वारकापुरी में स्थित ज्योतिर्लिंग नागेश्वर महादेव शास्त्र एवं पुराण में मान्य हैं।
     द्वारका से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित ज्योतिर्लिंग नागेश्वर महादेव मंदिर हिन्दुओं का एक सिद्धपीठ है। मंदिर परिसर में भगवान शिव की पद्मासन मुद्रा में विशाल मूर्ति स्थापित है। यह शिव दर्शन यहां का मुख्य आकर्षण है। ज्योतिर्लिंग नागेश्वर महादेव के दर्शन-पूजन के अपने अलग विधि-विधान हैं। गर्भगृह में प्रवेश से पहले श्रद्धालुओं को वस्त्र उतार कर समीप के कक्ष में धोती पहननी होती है। 
    इसके बाद ही श्रद्धालु गर्भगृह में प्रवेश कर सकते हैं। यहां एक आैर विशेषता है। शिवलिंग का जलाभिषेक सिर्फ गंगाजल से ही होता है। खास यह कि जलाभिषेक करने वाले श्रद्धालुओं को मंदिर समिति की ओर से गंगाजल निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है।
    विशेषज्ञों की मानें तो ज्योतिर्लिंग के क्रम में नागेश्वर महादेव का स्थान 10 वें स्थान पर है। गर्भगृह सभामण्डप से कुछ निचले स्थल पर है। शिवलिंग मध्यम बड़े आकार का है। चांदी के आवरण से सुसज्जित शिवलिंग अति आकर्षक प्रतीत होता है।
       ज्योतिर्लिंग-शिवलिंग पर चांदी से बनी नाग की आकृति भी दर्शनीय है। ज्योतिर्लिंग के पीछे माता पार्वती की मूर्ति स्थापित है। सुबह 5 बजे से ज्योतिर्लिंग के दर्शन प्रारम्भ होते हैं। सांयकाल 4 बजे श्रंगार दर्शन होता है। शयन आरती सायंकाल 7 बजे होती है। रात्रि 9 बजे मंदिर बंद कर दिया जाता है।
    ज्योतिर्लिंग नागेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जामनगर है। निकटतम रेलवे स्टेशन वेरावल है। यह रेलवे स्टेशन अहमदाबाद एवं ओखा के बीच स्थित है। सड़क मार्ग से भी ज्योतिर्लिंग नागेश्वर महादेव मंदिर की यात्रा की जा सकती है।
22.254076,68.978372

Tuesday, 1 May 2018

बैद्यनाथ मंदिर: देवत्व का स्थल

     ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ मंदिर की खासियत है कि कभी कोई निराश नहीं लौटता। दर्शनार्थी की सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं। शायद इसी लिए ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ मंदिर को कामना शिवलिंग भी कहते है।

    छत्तीसगढ़ के देवघर में स्थित इस ज्योतिर्लिंग को पुराणकालीन माना जाता है। पवित्र तीर्थ होने के कारण श्रद्धालु इसे बैद्यनाथ धाम भी कहते हैं। यह ज्योतिर्लिंग देवघर में स्थित है। देवघर का आशय देवताओं के घर से है। इस स्थान को देवघर की मान्यता है। 
   ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ मंदिर को सिद्धपीठ की मान्यता है। इस शिवलिंग की स्थापना का अति प्राचीन इतिहास है।
   कहावत है कि शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने हिमालय पर घोर तपस्या की थी। शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने अपने सिर काट-काट कर अर्पित करना प्रारम्भ कर दिये। रावण ने नौ सिर काट कर शिव को अर्पित कर दिये। अंतिम सिर काटने से पहले ही शिव प्रकट हो गये। शिव ने रावण के सभी सिर यथावत कर दिये।
     तत्पश्चात शिव ने रावण से वरदान मांगने को कहा। रावण ने शिवलिंग यहां से ले जाकर लंका में स्थापित करने का वर मांगा लेकिन शिव इससे सहमत नहीं थे। अंतोगत्वा, शिव वरदान देने को तैयार हो लेकिन एक शर्त रख दी कि शिवलिंग को सीधे लंका ले जाकर स्थापित करना होगा। रावण शिवलिंग को लेकर लंका रवाना हुआ लेकिन मार्ग में लघुशंका महसूस होने पर रावण ने शिवलिंग एक व्यक्ति सौंप कर भूमि पर न रखने की हिदायत दी। 
   लघुशंका से निवृत्त होकर लौटने पर रावण ने देखा शिवलिंग भूमि पर स्थापित हो चुका है। कोशिशों के बावजूद रावण शिवलिंग को हिला भी न सका। लिहाजा रावण निराश होकर लंका के लिए चला गया। तत्पश्चात, ब्राह्मा एवं विष्णु सहित अन्य देवी-देवताओं ने शिवलिंग की पूजा-अर्चना की। बैद्यनाथ नामक व्यक्ति शिवलिंग की नियमित पूजा-अर्चना करने लगा।
     इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग को बैद्यनाथ की मान्यता मिली। जनश्रुति एवं लोक मान्यता है कि ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ के दर्शन से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। मंदिर के निकट ही एक तालाब है। इसका जल विशेष पवित्र माना जाता है।
     ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ की पवित्र यात्रा श्रावण मास में प्रारम्भ होती है। यात्रा के पूर्व तीर्थयात्री सुल्तानगंज में एकत्र होते हैं। सुल्तानगंज से पात्र में जल लेकर तीर्थयात्री बैद्यनाथ धाम के लिए प्रस्थान करते हैं। तीर्थयात्री बैद्यनाथ धाम एवं वासुकीनाथ का जलाभिषेक करते हैं।
    ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ धाम मंदिर परिसर में शिव-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण आदि देवी-देवताओं की प्रतिमायें स्थापित हैं। कहावत है कि इन सभी मंदिरों में पंचशूल लगे हैं। पंचशूल से ही रावण लंका की सुरक्षा करता था।
     वासुकीनाथ मंदिर : वासुकीनाथ मंदिर में शिवलिंग के दर्शन के बिना ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ की यात्रा आधी-अधूरी ही मानी जाती है। वासुकीनाथ मंदिर वस्तुत: बैद्यनाथ धाम से करीब 42 किलोमीटर दूर है।
     बैजू मंदिर: बैजू मंदिर देवघर में बैद्यनाथ धाम से पश्चिम की ओर हैं। यह तीन मंदिर हैं। इनको बैजू मंदिर कहा जाता है। इन सभी मंदिर में शिवलिंग स्थापित हैं।
      ज्योतिर्लिंग बैद्यनाथ मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट रांची एवं पटना हैं। पटना से बैद्यनाथ धाम की दूरी करीब 280 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन जसीडीह है। बैद्यनाथ धाम की जसीडीह रेलवे स्टेशन से दूरी करीब 10 किलोमीटर है। पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी बैजनाथ धाम की यात्रा कर सकते हैं।
25.528601,73.907786

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...