Monday, 30 April 2018

श्री विश्वनाथ मंदिर : दर्शन से मोक्ष

     शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में श्री विश्वानाथ मंदिर का विशेष महत्व है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थितइस ज्योतिर्लिंग को काशी विश्वनाथ भी कहते हैं। कहावत है कि ज्योतिर्लिंग श्री विश्वनाथ के दर्शन मात्र से जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

   हिन्दुओं में काशी विश्वनाथ के दर्शन को अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है। अर्धचन्द्राकार प्रवाहित गंगा तट पर स्थित ज्योेतिर्लिंग श्री विश्वनाथ मंदिर धर्म एवं अध्यात्म का एक विशिष्ट स्थान है।
    मान्यता है कि गंगा स्नान के उपरांत श्री विश्वनाथ जी के दर्शन मात्र से ही व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में शिवलिंग दर्शन के लिए आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द, गोस्वामी तुलसीदास आदि आये। श्री विश्वनाथ जी की बारात सहित कई यात्राएं वर्ष में निकलती हैं।
   वर्तमान ज्योतिर्लिंग श्री विश्वनाथ मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 में कराया था। तत्पश्चात 1853 में महाराजा रणजीत सिंह ने एक हजार किलो स्वर्ण से शिखर सहित मंदिर का अन्य सुन्दरीकरण कार्य कराया था। विशेषज्ञों की मानें तो प्रलयकाल में भी काशी विश्वनाथ मंदिर का लोप नहीं होता। 
     कहावत है कि प्रलयकाल में भगवान शिव काशी को त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं। यही नहीं, आदि सृष्टि स्थली भी काशी की ही भूमि बतायी जाती है। कहावत है कि इसी स्थान पर भगवान श्री विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने की कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था। यहीं पर अगस्त्य मुनि ने विश्वेश्वर की आराधना की थी।
    काशी को मोक्षदायिनी भी कहा जाता है। कहावत है कि काशी में प्राण त्याग करने से मुक्ति मिल जाती है। भगवान शिव अंतिम समय प्राणी के कान में तारक मंत्र का उपदेश देते हैं। जिससे वह आवागमन के झंझट से मुक्त हो जाता है। चाहे मृत कोई भी क्यों न हो।
    शिव अर्थात विशेश्वर के आनन्द कानन में पांच मुख्य तीर्थ हैं। ज्योतिर्लिंग श्री विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र में यह सभी तीर्थ स्थापित हैं। इन पांच तीर्थ में दशाश्वमेध, लोलार्ककुण्ड, बिन्दुमाधव, केशव एवं मणिकर्णिका हैं। इस युक्ति के कारण ही काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। ज्योतिर्लिंग श्री विश्वनाथ मंदिर का वास्तुशिल्प भी बेहद सुन्दर एवं आकर्षक है।
     मंदिर का शिखर एवं मंदिर का क्षत्र स्वर्ण जड़ित है। मान्यता है कि स्वर्ण जड़ित क्षत्र को देख कर कोई मुराद की जाती है तो निश्चय ही पूर्ण होती है। श्री विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर का शिवलिंग स्थापित है। इसके दक्षिण में तीन अन्य शिवलिंग स्थापित हैं। इनकी नीलकंठेश्वर महादेव के नाम से ख्याति है। 
     ज्योतिर्लिंग श्री विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन का समय निर्धारित है। मंगलाचरण आरती ब्रह्म मुहुर्त में 3 बजे होती है। मंगलाचरण आरती के साथ ही दर्शन प्रारम्भ हो जाते हैं। इसके बाद 11.30 बजे भोलेनाथ को भोग लगाया जाता है। सांय 7 बजे सप्त ऋषि आरती होती है। रात्रि 9 बजे भोग आरती होती है। इसके बाद रात्रि 10.30 बजे शयन आरती होती है।
     ज्योतिर्लिंग श्री विश्वनाथ मंदिर के दर्शन एवं यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध है। निकटतम एयरपोर्ट लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट है। बाबतपुर में स्थित एयरपोर्ट से मंदिर की दूरी करीब 22 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन वाराणसी जंक्शन है। इसके अलावा पर्यटक या श्रद्धालु सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं।
25.310853,83.010678

Friday, 27 April 2018

केदारनाथ : हिमालय में विराजमान

      शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग केदारनाथ महादेव हिमालय के शिखर पर विराजते हैं। समुद्र तल से करीब 3584 मीटर ऊंचाई पर स्थित ज्योतिर्लिंग केदारनाथ महादेव हिन्दुओं की श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का श्रेष्ठतम केन्द्र है। यहां महादेव हिमालय के केदार पर्वत के शीर्ष शिखर पर प्रतिष्ठापित हैं।

  ज्योतिर्लिंग केदारनाथ महादेव उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग जिला में स्थित है। कत्यूरी शैली में शिलाखण्ड से निर्मित महादेव के इस दिव्य-भव्य मंदिर का निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था।
    इसका जीर्णोद्धार आदि शंकराचार्य ने कराया था लेकिन महादेव का प्राचीन शिवलिंग पूर्ववत विद्यमान है। खास यह कि ज्योतिर्लिंग केदारनाथ महादेव के सानिध्य में निकट ही मंदाकिनी प्रवाहमान हैं। 
     उत्तराखण्ड के प्रतिकूल मौसम के कारण ज्योतिर्लिंग केदारनाथ महादेव के दर्शन अप्रैल से नवम्बर की अवधि में ही संभव हैं। केदारनाथ धाम अक्सर बर्फ के आवरण से आच्छादित दिखता है। बर्फ की सुन्दर चादर परिवेश को आैर भी अधिक सुन्दर बनाती है। हिन्दुओं के चार धाम यात्रा में ज्योतिर्लिंग केदारनाथ महादेव को महत्वपूर्ण माना गया। 
    उत्तराखण्ड में केदारनाथ एवं बद्रीनाथ तीर्थ स्थान हैं। कहावत है कि केदारनाथ के दर्शन बिना बद्रीनाथ के दर्शन पूर्ण नहीं माने जाते। आस्था एवं विश्वास है कि केदारनाथ महादेव के दर्शन मात्र से समस्त पापों का होता है। मुख्य मंदिर छह फुट चौकोर चबूतरा पर आधारित है। मंदिर के मुख्य भाग में सभा मण्डप है। गर्भगृह सहित चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है।
      कहावत है कि हिमालय के केदार श्रंग पर भगवान विष्णु के अवतार नर एवं नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुये। भगवान शिव ने प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदैव इस स्थान पर वास का वरदान प्रदान किया। पाण्डव किवदंती के अनुसार यहां नंदी की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में भी ज्योतिर्लिंग केदारनाथ महादेव पूजे जाते हैं।
     कहावत है कि भगवान शंकर बैल के रूप में यहां अंर्तध्यान हुये थे। बाद में शंकर जी धड़ के रूप में काठमांडू नेपाल में प्रकट हुये थे। ज्योतिर्लिंग केदारनाथ महादेव के पीछे हिस्से में आदि शंकराचार्य का समाधि स्थल है। मंदिर का वास्तुशिल्प सुन्दर एवं अद्भुत है। मंदिर के गर्भगृह में नुकीली चट्टान की पूजा भगवान शिव के सदाशिव स्वरूप के रूप में की जाती है।
     केदारनाथ महादेव के निकट ही गांधी सरोवर एवं वासुकी ताल हैं। मंदिर के निकट ही द्रोपदी सहित पांच पाण्डव की प्रतिमायें हैं। मंदिर के पीछे कई कुण्ड हैं। इन कुण्ड में पूजन-अर्चन एवं तर्पण आदि किया जाता है। 
      ज्योतिर्लिंग केदारनाथ महादेव के दर्शन का समय तय है। दर्शन के लिए सुबह 5 बजे मंदिर के पट खुल जाते हैं। दोपहर 3 बजे से 4 बजे की अवधि में महादेव की विशेष पूजा अर्चना होती है। इसके बाद विश्राम के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है। सायंकाल 7.30 बजे से रात्रि 8.30 बजे तक नियमित आरती होती है। इसके पहले महादेव का भव्य-दिव्य श्रंगार किया जाता है। आरती के पश्चात मंदिर बंद कर दिया जाता है।
      ज्योतिर्लिंग केदारनाथ महादेव की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। केदारनाथ के निकट ही जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट से केदारनाथ महादेव की दूरी 239 किलोमीटर है। रेल मार्ग से भी यात्रा की जा सकती है। रेल से हरिद्वार या ऋषिकेश पहंुच कर सड़क मार्ग से केदारनाथ महादेव की यात्रा कर सकते हैं। इसके अलावा सड़क मार्ग से भी यंात्रा की जा सकती है।
30.735231,79.066895

Thursday, 26 April 2018

ओंकारेश्वर महादेव: श्रेष्ठ फलदायी

        शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में ओंकारेश्वर महादेव का विशेष महत्व है। नर्मदा नदी के तट पर स्थित ओंकारेश्वर महादेव का शिवलिंग स्वंभू प्राकृट्य है।

   मध्य प्रदेश के खंडवा जिला स्थित इस ज्योतिर्लिंग की खासियत यह है कि यहां का शिवलिंग नर्मदा नदी की आगोश से स्वत: प्राक्ट्यमान है। ओंकारेश्वर नगरी को हिन्दुओं के सर्वश्रेष्ठ तीर्थ के तौर पर भी जाना पहचाना जाता है। 
   ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर महादेव की ख्याति देश विदेश में है। विशेषज्ञों की मानें तो देवी अहिल्याबाई होल्कर नित्य मृत्तिका के 18 सहस्त्र शिवलिंग तैयार कर पूजन करने के उपरांत नर्मदा नदी में विसर्जित करती थीं। इस पूजा-अर्चना से शिव प्रसन्न हुये। अहिल्याबाई होल्कर ने वरदान मांगा कि इसी स्थान पर विद्यमान हों। तभी से इस नगरी को ओंकार-मांधाता की ख्याति मिली।
     ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता के श्रीमुख से हुआ। वेद पाठ भी इसके उच्चारण के बिना नहीं होता। ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र है। इस क्षेत्र में 68 तीर्थ हैं। मान्यता है कि हिन्दुओं के 33 करोड़ देवता इसी क्षेत्र में प्रवास करते हैं। शास्त्र मान्यता है कि कोई भी तीर्थ कर लें लेकिन यदि ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन नहीं किये तो सभी तीर्थ यात्रा आधी-अधूरी मानी जायेगी।
     शास्त्र मान्यता यह भी है कि यमुना नदी में 15 दिन स्नान तथा गंगा नदी में सात दिन करने से जिस पुण्य-प्रताप एवं फल की प्राप्ति होती है। नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से उक्त पुण्य-प्रताप एवं फल की प्राप्ति होती है। नर्मदा नदी को कोटितीर्थ एवं चक्रतीर्थ भी कहा जाता है। यहीं स्नान कर श्रद्धालु सीढ़ी चढ़ कर ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन करने जाते हैं। महादेव मंदिर तट पर ही कुछ ऊंचाई पर स्थित है।
     ओंकारेश्वर महादेव का शिवलिंग अनगढ़ है। शिवलिंग शिखर की ठीक नीचे स्थित न होकर किनारे पर स्थित है। शिवलिंग के चारों ओर जल भरा रहता है। महादेव के इस मंदिर का प्रवेश द्वार छोटा है। जिससे प्रतीत होता है कि जैसे गुफा में प्रवेश कर रहे हों। निकट ही पार्वती जी के भी दर्शन होते हैं। ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन कर सीढ़ी से चढ़कर उपर जाने पर महाकालेश्वर शिवलिंग के दर्शन होते हैं। यह शिवलिंग शिखर के नीचे स्थित है।
      तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ महादेव का शिवलिंग स्थापित है। यह शिवलिंग भी शिखर के नीचे स्थित है। चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर महादेव का शिवलिंग स्थापित है। पांचवी मंजिल पर ध्वजेश्वर महादेव का शिवलिंग स्थापित है।
    ओंकारेश्वर महादेव तीर्थ क्षेत्र में चौबीस अवतार, माता घाट, सीता वाटिका, धावड़ी कुंड, मार्कण्डेय शिला, मार्कण्डेय संयास आश्रम, अन्नपूर्णाश्रम, विज्ञानशाला, बडे़ हनुमान, खेडापति हनुमान, ओंकार मठ, माता आनन्दमयी आश्रम, ऋणमुक्तेश्वर महादेव, गायत्री माता मंदिर, सिद्धगौरी सोमनाथ, माता वैष्णो देवी, विष्णु मंदिर, ब्राह्मेश्वर मंदिर आदि दर्शनीय हैं।
     ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट इंदौर है। इंदौर एयरपोर्ट से ओंकारेश्वर महादेव की दूरी करीब 75 किलोमीटर है। खंडवा-रतलाम रेल मार्ग से श्रद्धालु ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर महादेव के दर्शन के लिए जा सकते हैं। सड़क मार्ग से दर्शन के लिए यात्रा की जा सकती है।
22.245623,76.151030

Wednesday, 25 April 2018

महाकालेश्वर महादेव: मोक्ष का स्थान

    शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में उज्जैन का महाकालेश्वर महादेव मंदिर का अपना एक अलग एवं विशेष महत्व है। मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में क्षिप्रा नदी के तट पर विद्यमान महाकालेश्वर महादेव दर्शन अति कल्याणकारी माना जाता है।

   कहावत है कि ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इंसान को महाकालेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से कालसर्प योग के संताप से मुक्ति मिलती है।
     दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव अत्यंत पुण्यकारी हैं। महाकालेश्वर महादेव मंदिर वास्तुशिल्प का सुन्दर आयाम है। गर्भगृह तक पहुंचने के लिए सीढ़ीदार रास्ता है। इसके ठीक उपर शिवलिंग स्थापित है। करीब 29 मीटर ऊंचाई वाला महाकालेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं की श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र है।
    मंदिर के सन्निकट एक जलरुाोत है। इसे कोटितीर्थ कहा जाता है। कोटितीर्थ को भी महादेव का स्थान माना जाता है। वर्ष 1968 में सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार की साज-सज्जा एवं विस्तार कराया गया था। श्रद्धालुओं की अपार भीड़ को देखते हुये एक आैद्योगिक घराना ने 1980 में सिंहस्थ के पूर्व विशाल सभा मण्डपम का निर्माण कराया था।
     खास यह कि महाकालेश्वर महादेव मंदिर की शिखर स्वर्ण जड़ित हैं। मंदिर के 118 शिखरों पर 16 किलो स्वर्ण आवरण जड़ित है। मान्यता है कि उज्जैन भारत की कालगणना का केन्द्र था। महाकाल उज्जैन के अधिपति आदिदेव माने जाते हैं। उज्जैन को प्राचीनकाल में अवंतिकापुरी भी कहते हैं। तांत्रिक परम्परा में दक्षिणमुखी पूजा का विशेष महत्व है।
      महादेव की दक्षिणमुखी पूजा का महत्व केवल महाकालेश्वर महादेव को ही प्राप्त है। महादेव के इस स्थान में ओंकारेश्वर, महाकाल एवं नागचंदेश्वर विद्यमान हैं। मध्यप्रदेश के उज्जैन में धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व के स्थान महाकालेश्वर महादेव के दर्शन पुण्य-प्रताप के लिए श्रेष्ठतम हैं। साथ ही यह क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से भी बेहतरीन है। महाकालेश्वर महादेव मंदिर के आसपास श्री बड़े गणेश, हरसिद्धि, क्षिप्रा घाट, गोपाल मंदिर, गढ़कालिका देवी, भर्तृहरि गुफा, काल भैरव आदि हैं।
     श्री बड़ा गणेश मंदिर : महाकालेश्वर महादेव के निकट ही श्री बड़ा गणेश मंदिर हरसिद्धि मार्ग पर स्थित है। मंदिर में श्री गणेश जी भव्य-दिव्य कलात्मक प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। मंदिर परिसर में सप्तधातु की पंचमुखी हनुमान की प्रतिमा के साथ साथ नवग्रह मंदिर तथा कृष्ण यशोदा की प्रतिमायें विद्यमान हैं।
    हरसिद्धि मंदिर : हरसिद्धि मंदिर उज्जैन के प्राचीन एवं महत्वपूर्ण स्थानों में से एक है। चिंतामणि गणेश मंदिर के कुछ ही दूर रुद्र सागर तालाब के निकट यह मंदिर है। सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य हरसिद्धि देवी थीं। सम्राट निरन्तर देवी की पूजा अर्चना करते थे। हरसिद्धि देवी वैष्णव सम्प्रदाय की आराध्य रहीं। शिवपुराण के मुताबिक राजा दक्ष की पुत्री सती की कोहनी यहां गिरी थी।
     क्षिप्रा घाट : क्षिप्रा घाट उज्जैन का एक प्रमुख स्थान है। नदी के दाहिने किनारे पर शहर स्थित है। घाट पर स्नान के लिए सुन्दर सीढ़ियां बनीं हैं। घाटों पर देवी-देवताओं के प्राचीन एवं नवीन मंदिर हैं। क्षिप्रा नदी का गौरव सिंहस्थ में देखते ही बनता है।
     गोपाल मंदिर : गोपाल मंदिर उज्जैन का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर शहर के अतिव्यस्ततम क्षेत्र में स्थित है। मंदिर का निर्माण महाराजा दौलतराव सिंधिया की महारानी बायजा बाई ने 1833 में कराया था। मंदिर में कृष्ण जी की प्रतिमा है। मंदिर का द्वार चांदी का है।
   गढ़कालिका देवी : गढ़कालिका देवी का मंदिर प्राचीन उज्जैन अर्थात अवंतिकापुरी में स्थित है। कवि कालीदास गढ़कालिका देवी के उपासक थे। इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन ने कराया था।
   भर्तृहरि गुफा : भर्तृहरि गुफा वास्तविकता में 11 वीं सदी के एक मंदिर का अवशेष है। प्राचीनकाल का वास्तुशिल्प एवं सुन्दरता विशेष आकर्षित करती है।
    काल भैरव मंदिर : काल भैरव मंदिर प्राचीन उज्जैन नगरी अर्थात अवंतिकापुरी में स्थित है। काल भैरव का यह मंदिर शिव उपासकों के कपालिक सम्प्रदाय से संबंधित है। मंदिर में काल भैरव की भव्य-दिव्य प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का निर्माण प्राचीनकाल में राजा भद्रसेन ने कराया था।
       ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर महादेव की दर्शन यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। उज्जैन का निकटतम एयरपोर्ट इंदौर है। इंदौर एयरपोर्ट से उज्जैन की दूरी करीब 55 किलोमीटर है। श्रद्धालु या पर्यटक भोपाल एयरपोर्ट से भी उज्जैन की यात्रा कर सकते हैं। उज्जैन से भोपाल एयरपोर्ट की दूरी करीब 172  किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन उज्जैन में ही है। सड़क मार्ग से भी उज्जैन की यात्रा की जा सकती है।
23.182718,75.768218

Monday, 16 April 2018

सोमनाथ मंदिर: वैभवशाली इतिहास

   आराध्य भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में सोमनाथ मंदिर का अपना एक अलग एवं खास महत्व है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के बेरावल बंदरगाह स्थित सोमनाथ मंदिर को प्रथम ज्योतिर्लिंग की मान्यता है।

   ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर का वास्तुशिल्प भी खास है। प्रथम ज्योर्तिलिंग की मान्यता रखने वाले सोमनाथ मंदिर की इतिहास अति वैभवशाली रहा है। सोमनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल एवं शीर्ष पर्यटन एरिया है।
     ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर का वास्तुशिल्प अति विशिष्ट है। विशेषज्ञों की मानें तो सोमनाथ मंदिर का वास्तुशिल्प चालुक्य शैली एवं कैलाश महामेरू प्रसाद शैली पर आधारित है।
     इस भव्य-दिव्य मंदिर का सुन्दर वास्तुशिल्प एवं कलात्मकता गुजरात के कारीगरों के कला कौशल को बयां करती है। मंदिर के मुख्य शिखर की ऊंचाई 15 मीटर है। शीर्ष पर करीब 2.20 मीटर लम्बा-चौड़ा झण्डा स्तम्भ है। मंदिर की दक्षिण दिशा में समुद्र किनारे एक अन्य स्तम्भ है। मंदिर के पिछले हिस्से में प्राचीन मंदिर की मान्यता है। यह मंदिर मुख्यता पार्वती जी का मंदिर है। सोमनाथ मंदिर की व्यवस्था एवं संचालन ट्रस्ट के अधीन है।
     ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का अटूट केन्द्र है। यह तीर्थ पितृ श्राद्ध सहित अन्य सभी शुभ एवं मांगलिक कार्यों के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है। सोमनाथ मंदिर क्षेत्र में श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर त्रिवेणी महासंगमन पर स्थित है। यह त्रिवेणी तीन नदियों हिरण नदी, कपिला नदी एवं सरस्वती नदी का विशाल संगमन स्थल है। इस त्रिवेणी में स्नान का भी विशेष महत्व माना जाता है।
     विशेषज्ञों की मानें तो ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। इसका उल्लेख ऋग्वेद भी में है। खास यह कि सोमनाथ मंदिर परिसर में रात 7.30 बजे से 8.30 बजे तक लाइट एण्ड साउण्ड शो संचालित होता है। लाइट एण्ड साउण्ड शो में सोमनाथ मंदिर का इतिहास सुन्दर रंग -ढंग से बयां किया जाता है। लोककथाओं की मानें तो इसी स्थान पर श्रीकृष्ण ने देहदान किया था। इस कारण इस क्षेत्र का महत्व आैर भी अधिक बढ़ जाता है।
     किवदंती है कि सोम अर्थात चन्द्र ने राजा दक्षप्रजापति की 27 कन्याओं से विवाह पर किया था। सोम अपनी सभी पत्नियों से समान प्रेम नहीं करते थे। सोम के इस व्यवहार से क्षुब्ध दक्षप्रजापति ने श्राप दिया था कि कांति क्षीण होगी। लिहाजा सोम ने शिव आराधना की थी। जिस पर भगवान शिव ने इसी स्थान पर आकर श्राप का निवारण किया था। 
   शिव का स्थापन यहां होने से इस स्थान को सोमनाथ मंदिर कहा गया। ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर का कई बार खण्डन एवं पुर्नरुद्धार हुआ। भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने उत्खनन से प्राप्त ब्रह्मशिला पर शिव का ज्योतिर्लिंग स्थापित किया। सौराष्ट्र के राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई 1950 को नये सोमनाथ मंदिर की आधारशिला रखी।
     इसके बाद 11 मई 1951 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने मंदिर में नव ज्योतिर्लिंग स्थापित किया था। नवीन सोमनाथ मंदिर 1962 में पूर्णनिर्मित हो सका। वर्ष 1970 में जामनगर की राजमाता ने अपने पति की स्मृति में दिग्विजय द्वार का निर्माण कराया था। मान्यता है कि ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर के दर्शन करने से कष्ट एवं दुखों से छुटकारा मिलता है। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास के इस केन्द्र में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती रहती है।
        ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर तीर्थ धाम की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट राजकोट, अहमदाबाद एवं बडोदरा हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन वेरावल है। इसके अलावा सड़क मार्ग से भी ज्योतिर्लिंग की यात्रा की जा सकती है।
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तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...