Monday, 5 November 2018

हेमकुण्ड साहिब: सिखों का तीर्थ

    हेमकुण्ड को सिख समुदाय का श्रेष्ठतम तीर्थ कहा जाना चाहिए। जी हां, हिमालय की गोद में स्थित हेमकुण्ड की यात्रा किसी तप से कम नहीं। 

   उत्तराखण्ड के चमोली में स्थित हेमकुण्ड वस्तुत: प्राकृतिक सुन्दरता के बीच एक धार्मिक स्थान है। समुद्र तल से करीब 4632 मीटर ऊंचाई पर स्थित हेमकुण्ड की अपनी एक विशिष्ट यशोगाथा है। हेमकुण्ड वस्तुत: संस्कृत शब्दार्थ है। हेम का आशय बर्फ एवं कुण्ड का आशय कटोरा से है।

   बर्फीली झील किनारे स्थित हेमकुण्ड चौतरफा सात पर्वत श्रंखलाओं से घिरा है। इन सात पर्वत शिखर पर निशान साहिब की शोभा दिखती है। हेमकुण्ड की यात्रा गोविन्द घाट से पैदल चढ़ाई से करनी होती है। सुरम्य घाटियों-वादियों के मध्य यह यात्रा बेहद रोमांचक एवं सुखद होती है। 

   हिमालय की गोद में रचा-बसा गुरुद्वारा हेमकुण्ड साहिब सिख समुदाय का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। यहां गुरुद्वारा में हेमकुण्ड साहिब सुशोभित हैं। विशेषज्ञों की मानें तो हेमकुण्ड का उल्लेख गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित दशम ग्रंथ में है। 

   विशेषज्ञों की मानें तो सिख समुदाय के दसवें एवं अंतिम गुरु श्री गोविन्द सिंह ने जीवन में ध्यान साधना की थी। 
   स्थानीय निवासी हेमकुण्ड साहिब को असामान्य, पवित्र, विस्मय एवं श्रद्धा का स्थान मानते हैं। हेमकुण्ड की झील एवं उसके आसपास के क्षेत्र को लोकपाल कहा जाता है। लोकपाल से आशय संरक्षक होता है। 

   झील के किनारे मंदिर भी है। इस मंदिर का निर्माण लक्ष्मण ने कराया था। सिख गुरु गोविन्द सिंह जी ने इस मंदिर में पूजा अर्चना की थी। अब इस स्थान को गुरुद्वारा माना जाने लगा। 
   इस दर्शनीय तीर्थ में चारों ओर बर्फ के ऊंचे पर्वत शिखर दिखते हैं। विशाल झील का जल अति शीतल अर्थात बर्फीला होता है। फिर भी श्रद्धालु स्नान ध्यान कर गुरुद्वारा में मत्था टेकते हैं।

    विशेषज्ञों की मानें तो इस बर्फीली झील में हाथी पर्वत एवं सप्त ऋषि पर्वत श्रंखलाओं से पानी आता है। एक छोटी जलधारा इस सुन्दर झील से प्रवाहमान होती है। इसे हिमगंगा कहते हैं। झील के किनारे लक्ष्मण मंदिर भी स्थित है।

   अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण हेमकुण्ड साहिब के दर्शन सर्दियों में दुलर्भ होते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो सर्दियों में बर्फ जमी रहती है। जिससे यात्रा मुश्किल हो जाती है। सर्दियों के बाद मई में हेमकुण्ड के पट दर्शन के लिए खुलते हैं। हेमकुण्ड की यात्रा साहस एवं धैर्य से करनी होती है।

    कारण कई बार मुश्किलें भी पेश आती हैं। हालांकि यह मुश्किलें रोमांचक एहसास के पीछे छूट जाती हैं। हेमकुण्ड की मुख्य यात्रा गोविन्दघाट से प्रारम्भ होती है। गोविन्दघाट से घांघरिया तक करीब 13 किलोमीटर दुलर्भ चढ़ाई करनी होती है।

   इसके बाद करीब 6 किलोमीटर पर्वतीय खड़ी चढ़ाई करनी होती है। पर्यटक या श्रद्धालु यहां ट्रैकिंग का भरपूर आनन्द ले सकते हैं। 

   हेमकुण्ड की यात्रा बेहद रोमांचक एवं प्रफुल्लित करने वाली होती है। कारण कहीं पर्वत श्रंखला तो कहीं घाटियां-वादियां होती हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्छादित इलाका बेहद दर्शनीय होता है।

  जिससे पर्यटक थकान का एहसास नहीं करते। प्राकृतिक खूबसूरती के इस सफर में सुन्दर झरनों की श्रंखला भी देखने को मिलती है। इसी के निकट ही फूलों की घाटी भी है।

   हेमकुण्ड साहिब की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। गोविन्दघाट से जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून की दूरी करीब 292 किलोमीटर है।
   गोविन्दघाट से हेमकुण्ड की यात्रा पैदल तय करनी होती है। निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। ऋषिकेश से गोविन्दघाट की दूरी करीब 273 किलोमीटर है। पर्यटक सड़क मार्ग से भी हेमकुण्ड साहिब की यात्रा कर सकते हैं।
30.403601,79.330902

Thursday, 1 November 2018

गौमुख: भागीरथी गंगा का उद्गम स्थल

   गौमुख वस्तुत: भागीरथी गंगा का उद्गम स्थल है। मान्यता है कि गौमुख के बर्फीले जल से स्नान करने से समस्त पाप स्वत: धुल जाते हैं। 

   उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी स्थित गौमुख पौराणिक विशेष महत्व है। उत्तरकाशी के इसी स्थान पर भागीरथी गंगा का धरती पर अवतरण हुआ है।
   समुद्र तल से करीब 3892 मीटर ऊंचाई पर स्थित गौमुख भागीरथी गंगा का अवतरण स्थल होने से धार्मिक एवं आध्यात्मिक मान्यता है। गौमुख का जल शीतल होने के बजाय बर्फीला होता है। 

    गंगोत्री मंदिर से करीब 19 किलोमीटर दूर शीर्ष पर विद्यमान गौमुख की यात्रा भी कम रोमांचक नहीं होती। गंगोत्री से गौमुख की यात्रा पैदल या टट्टुओं के जरिये की जा सकती है। विशेषज्ञों की मानें तो गौमुख का क्षेत्र अति व्यापक है। गौमुख क्षेत्र करीब 25 किलोमीटर लम्बा, करीब 4 किलोमीटर चौड़ा एवं करीब 40 मीटर ऊंचा है। 

   गौमुख वस्तुत: एक सुरम्य शानदार ग्लेशियर है। गौमुख ग्लेशियर की एक छोटी सी गुफा से भागीरथी गंगा का धरती पर अवतरण होता है। इस बड़ी बर्फानी नदी का पवित्र जल करीब 5000 मीटर की ऊंचाई से घाटी तक प्रवाहमान होता है। विशेषज्ञों की मानें तो भागीरथी गंगा का मूल पश्चिम ढ़लान संतोपथ समूह की चोटियों से है। 

   गौमुख से करीब 19 किलोमीटर नीचे गंगोत्री धाम मंदिर स्थित है। गंगोत्री धाम मंदिर समुद्र तल से करीब 3042 मीटर की ऊंंचाई पर स्थित है। 
   पौराणिक कथानक की मानें तो रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखण्ड पर बैठ कर भगवान शंकर की प्रसन्नता के लिए प्रचंड तपस्या की थी। इस पवित्र शिलाखण्ड के निकट ही गंगोत्री धाम मंदिर का निर्माण 19 शताब्दी में किया गया है।

    मान्यता है कि इसी स्थान पर देवी भागीरथी ने धरती का स्पर्श किया है। विशेषज्ञों की मानें तो शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न है। यहां दैवीय शक्ति की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। 

    पौराणिक आख्यान की मानें तो इसी स्थान भगवान शंकर ने अपनी जटाओं को फैला कर गंगा के वेग को नियंत्रण में लिया था। गंगा का जल स्तर काफी नीचे होने पर पवित्र शिवलिंग के दर्शन होते हैं। गौमुख एवं गंगोत्री धाम सदियों से हिन्दुओं की आस्था एवं आध्यात्मिक प्रेरणा का स्थल रहा है।
   गौमुख से गंगोत्री धाम का क्षेत्र धर्म एवं आध्यात्म के साथ ही एक सुन्दर एवं शानदार पर्यटन स्थल के तौर पर भी विकसित हुआ है। भोज वृक्ष श्रंखला से घिरा यह इलाका अति सुन्दर प्रतीत होता है। 

   देवदार की वन श्रंखला एवं संतोपथ की चोटियों के बीच यह सुन्दर घाटी सुरम्यता एवं विहंगमता का रोमांच पैदा करती है। गौमुख से बाहर निकल कर केदारगंगा तथा भागीरथी का कोलाहल छोड़ कर गंगा का अस्तित्व ग्रहण करती हैं।
  खास यह कि गौैमुख से गंगोत्री धाम का विहंगम क्षेत्र वनस्पतियों की प्रचुरता से आच्छादित है। वनस्पतियों की विशाल एवं असंख्य प्रजातियां इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुन्दरता में चार चांद लगा देती हैं। वन क्षेत्र भी अति सम्पदावान है। वन्य जीवन का कोलाहल भी दर्शनीय होता है। 

   वन्य जीवन: वन्य जीवन का कोलाहल अति दर्शनीय होता है। यहां लंगूर, लाल बंदर, भूरे भालू, सामान्य लोमड़ी, चीता, बर्फीले चीता, भौकते हिरण, सांभर, कस्तूरी मृग एवं साही आदि बड़ी तादाद में पाये जाते हैं।
  मुखबा गांव: मुखबा गांव का मुख्य आकर्षण मुखीमठ मंदिर है। मुखबा गांव के पुजारी ही गंगोत्री धाम मंदिर की पूजा व्यवस्था संचालित करते हैं। गंगोत्री धाम मंदिर के पट बंद होने पर गंगा देवी को इसी गांव धूमधाम से लाया जाता है। बसंत आने तक यहां गंगा की पूजा होती है। 
   भैंरो घाटी : भैंरो घाटी गंगोत्री धाम से करीब 9 किलोमीटर दूर है। भैंरो घाटी वस्तुत: जध, जाह्नवी गंगा एवं भागीरथी का संगम है। तेज बहाव से गंगा गहरी घाटियों में बहती हैं। भैंरो घाटी से हिमालय का मनोरम दृश्य रोमांचित करता है। भैंरो घाटी से भृगु पर्वत श्रंखला, सुदर्शन, मातृ एवं चीड़वासा चोटियों का शानदार दर्शन होता है। 
   नन्दन तपोवन: नन्दन तपोवन गंगोत्री धाम से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है। तपोवन से शिवालिक चोटियों के भव्य-दिव्य दर्शन होते हैं। गंगोत्री नदी के मुहाने के पार तपोवन है। यह इलाका सुन्दर चारागाह के लिए प्रसिद्ध है।
   गंगोत्री चिरबासा: गंगोत्री चिरबासा एक सुरम्य शानदार स्थल है। चिरबासा से विशाल गौमुख ग्लेशियर का अवलोकन किया जा सकता है। चिरबासा का शाब्दिक अर्थ चिर का पेड़ होता है।
   गंगोत्री भोजबासा: गंगोत्री भोजबासा वस्तुत: भोज वृक्ष की प्रचुरता वाला क्षेत्र है। गंगोत्री से भोजबासा करीब 14 किलोमीटर दूर है। यहां लाल बाबा द्वारा संचालित आश्रम में भोजन की निशुल्क व्यवस्था रहती है। कहावत है कि यहां ब्राह्म कमल के दर्शन होते हैं। ब्राह्म कमल ब्राह्मा जी का आसन है।
    केदारताल: केदारताल गंगोत्री धाम से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित है। पर्वतारोहण का बेहतरीन इलाका है। समुद्र तल से करीब 15000 फुट की ऊंचाई वाला यह इलाका शांत वातावरण के लिए खास तौर से जाना पहचाना जाता है। केदार ग्लेशियर के पिघलते बर्फ से बनी यह झील भागीरथी की सहायक नदी केदार गंगा का उद्गम स्थल है।
   गोमुख की यात्रा के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम एयरपोर्ट जॉली ग्रांट देहरादून है। जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून से गोमुख की दूरी करीब 240 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। ऋषिकेश से गोमुख की दूरी करीब 270 किलोमीटर है। श्रद्धालु या पर्यटक सड़क मार्ग से भी गोमुख की यात्रा कर सकते हैं।
30.997480,78.923400

तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...