Wednesday, 28 March 2018

मल्लिकार्जुन महादेव:दक्षिण का कैलाश

      शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में मल्लिकार्जुन महादेव का विशेष महत्व है। आंध्र प्रदेश में स्थित मल्लिकार्जुन महादेव की महिमा का उल्लेख-वर्णन धर्मग्रंथों में किया गया है। इसे दक्षिण भारत का कैलाश भी कहा जाता है।

   कृष्णा नदी के तट पर स्थित श्रीशैल पर्वत के शिखर पर विराजमान ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन श्रंखला का द्वितीय ज्योतिर्लिंग माना जाता है। मान्यता है कि श्रीशैल पर्वत पर विराजमान मल्लिकार्जुन का पूजन-अर्चन करने से अश्वमेध यज्ञ का पुण्य-प्रताप हासिल होता है। 
    धर्मग्रंथों की मान्यता है कि श्रीशैल शिखर के दर्शन मात्र से सभी प्रकार की विघ्न-बाधाओं एवं संकटों का निवारण होता है। अत: अनन्त सुखों की प्राप्ति होती है।
     शिवपुराण में ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन महादेव की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस स्थान का महत्व एवं मान्यता शिव परिवार पर आधारित एवं केन्द्रीत है। शिव पार्वती पुत्र कार्तिकेय एवं गणेश की आपसी तकरार का उल्लेख किया जाता है। कार्तिकेय ज्येष्ठ होने के नाते चाहते थे कि उनका विवाह पहले हो लेकिन गणेश चाहते थे कि उनका विवाह पहले होना चाहिए। शिव ने पुत्रों के प्रसंग को सुन कर पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा। 
       शिव का कहना था कि पहले आने वाले का ही पहले विवाह किया जायेगा। कार्तिकेय पृथ्वी की परिकृमा करने निकल पड़े। स्थूलकाय गणेश के सामने समस्या थी लेकिन गणेश बुद्धि एवं ज्ञान के सागर थे। लिहाजा देवाधिदेव महादेव शिव एवं माता पार्वती को एक आसन पर विराजमान होने को कहा। माता-पिता के आसन पर बैठने के पश्चात गणेश ने विधिवत पूजन-अर्चन कर परिक्रमा की।
     इस प्रकार गणेश पृथ्वी की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले फल के अधिकारी हो गये। कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा कर लौटे तो देखा कि गणेश का विवाह विश्वरूप प्रजापति की पुत्रियों सिद्धि एवं बुद्धि के साथ हो चुका था। इतना ही नहीं गणेश को सिद्धि से क्षेम एवं बुद्धि से लाभ नाम के दो पुत्र रत्न प्राप्त हुये। देवर्षि नारद ने कार्तिकेय को सारा वृतांत सुनाया। स्वामी कार्तिकेय कुपित हुये। कुपित कार्तिकेय  माता-पिता का आशीर्वाद लेकर क्रांच पर्वत पर चले गये। 
      देवर्षि नारद ने कार्तिकेय को मनाने का भरपूर प्रयत्न किया लेकिन कार्तिकेय वापस कैलाश लौटने को सहमत नहीं हुये। पुुत्र वियोग से द्रवित पार्वती जी शिव को लेकर क्रांच पर्वत पर पहंुचे लेकिन माता-पिता के क्रांच पर्वत आने की सूचना मिलते ही स्वामी कार्तिकेय तीन योजन अर्थात करीब 36 किलोमीटर दूर चले गये। कार्तिकेय के चले जाने के बाद शिव स्वयं ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर विराजमान हो गये। इसके बाद से ही इस स्थान को ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन महादेव की ख्याति मिली। मल्लिकार्जुन को ज्योतिर्लिंग का जगत भी कहा जाता है।
    मल्लिका देवी: मल्लिका देवी का मंदिर भी ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन महादेव मंदिर के पीछे है। वस्तुत: यह पार्वती देवी का मंदिर है। पार्वती जी के इस स्वरूप को मल्लिका देवी कहते हैं। सभा मण्डपम में नन्दी की विशाल मूर्ति है।
    पातालगंगा: पाताल गंगा ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन महादेव मंदिर से करीब दो मील पूर्व दिशा में हैं। हालांकि पातालगंगा जाने का मार्ग अति दुर्गम है। पातालगंगा के लिए करीब 852 सीढ़ियों की यात्रा करनी पड़ती है। पर्वत के नीचे कृण्णा नदी है। श्रद्धालु या पर्यटक स्नान करने के बाद ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन महादेव के जलाभिषेक के लिए जल यहां से लेते हैं।
     भ्रमराम्बा देवी : भ्रमराम्बा देवी का मंदिर ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन महादेव से पश्चिम दिशा में दो मील की दूरी पर है। यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक है। किवदंती है कि सती की गर्दन अथवा अवशेष यहां भी गिरे थे।
       शिखरेश्वर: शिखरेश्वर एवं हाटकेश्वर मंदिर ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन महादेव मंदिर से करीब छह मील दूर है। इसी क्षेत्र में एकम्मा देवी मंदिर है। यह क्षेत्र घनघोर वन क्षेत्र है।
     ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन महादेव मंदिर की यात्रा के लिए आवागमन के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। कृण्णा जिला स्थित ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन महादेव मंदिर की यात्रा के निकटतम हवाई अड्डा हैदराबाद स्थित राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। निकटतम रेलवे स्टेशन मर्कापुर रोड है। सड़क मार्ग से भी यह यात्रा की जा सकती है।
16.074021,78.868089

Monday, 26 March 2018

घृष्णेश्वर महादेव: अद्भुत महिमा

        शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में घृष्णेश्वर महादेव की महिमा अद्भुत है। महाराष्ट्र में आैरंगाबाद के दौलताबाद से करीब 11 किलोमीटर दूर स्थित घृष्णेश्वर महादेव का मंदिर खास एवं विशिष्टताओं के कारण विशिष्ट माना जाता है। 

   शहर से दूर महादेव का यह मंदिर सादगी एवं शांति के लिए विशेष तौर से जाना जाता है। बेरुलगांव में स्थित महादेव का यह मंदिर असंख्य दंत कथाओं के लिए भी प्रचलित है।
    इस ज्योतिर्लिंग को घृष्णेश्वर, घुसृणेश्वर एवं घुश्मेश्वर भी कहा जाता है। इस दिव्य-भव्य ज्योतिर्लिंग का निर्माण देवी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। 
  पुराणों में ज्योतिर्लिंग का उल्लेख है। देवगिरिपर्वत के निकट सुधर्मा तपोनिष्ठ ब्रााह्मण प्रवास करता था। ब्राह्मण सुधर्मा एवं उसकी पत्नी सुदेहा शिव आराधक थे। अफसोस, सुधर्मा दम्पत्ति निसंतान थे। ज्योतिष गणना के आधार पर संतान का कोई संयोग नहीं था। सुदेहा ने सुधर्मा को दूसरे विवाह के लिए अनुनय-विनय कर राजी कर लिया। 
    इसके पश्चात सुदेहा ने अपनी बहन घुश्मा से सुधर्मा का विवाह करा दिया। सुधर्मा एवं दोनों पत्नियां भगवान शिव की अन्य भक्त थीं। घुश्मा नित्य एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बना कर पूजन-अर्चन करती थी। कुछ समय बाद घुश्मा ने एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। सुदेहा एवं घुश्मा दोनों ही अति प्रसन्न थीं।
    द्वैषवश सुदेहा ने एक रात युवा पुत्र की हत्या कर दी। सुबह घर में कोहराम मच गया। घुश्मा पार्थिव शिवलिंग का पूजन-अर्चन कर निकट के तालाब में विसर्जित किया करती थी। पुत्र की हत्या से क्षुब्ध घुश्मा पार्थिव शिवलिंग का पूजन-अर्चन के बाद तालाब में विर्सजन कर वापस लौटी तो उसका पुत्र जीवित अवस्था में मिला।
      शिव भक्ति से प्रसन्न शिव ने साक्षात प्रकट होकर घुश्मा से वरदान मांगने को कहा तो घुश्मा ने वरदान मांगा कि लोक कल्याण के लिए इसी स्थान पर सर्वथा के लिए निवास करें। शिव ने इस स्थान को निवास के रूप में स्वीकार कर लिया। इस स्थान को शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग की मान्यता मिली। शिव ज्योतिर्लिंग के स्वरूप में प्रकट होकर निवास करने लगे।
    शिव भक्त घुश्मा के आराध्य होेने के कारण इस ज्योतिर्लिंग को घृष्णेश्वर महादेव की ख्याति मिली। इनका दर्शन लोक-परलोक के लिए अमोघ फलदाई है। ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर महादेव मंदिर का समय-समय पर कई बार जीर्णोद्धार किया गया। पत्थर के 24 खम्भों पर नक्काशी तराश कर सभा मण्डप बनाया गया। खम्भों एवं दर-ओ-दीवार पर देवी-देवताओं की मूर्तियां अंकित हैं। 
   मंदिर का गर्भ गृह भी वृहद आकार प्रकार का है। जिसमें बड़े आकार का शिवलिंग स्थापित है। भव्य नंदी सभा मण्डप में स्थापित हैं। सभा मण्डप की तुलना में गर्भ गृह काफी नीचे है। ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर महादेव मंदिर की खास विशेषता है कि 21 गणेश पीठों में से एक लक्षविनायक यहां प्राण प्रतिष्ठित है।
    मंदिर का शिल्प विन्यास, पुरातत्व एवं वास्तुकला अद्भुत है। मंदिर में अभिषेक एवं महाभिषेक की परम्परा अनवरत चलती रहती है। ज्योतिर्लिंग का पूजन-अर्चन अधोवस्त्र में ही किया जाता है। अधोवस्त्र की बाध्यता पुरुषों पर लागू है। श्रद्धालुओं के प्रवास के लिए घृष्णेश्वर मंदिर ट्रस्ट का यात्री निवास है। ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर महादेव मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं।
    ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर महादेव मंदिर की दूरी आैरंगाबाद से 35 किलोमीटर, मुम्बई से 422 किलोमीटर एवं पुणे से 250 किलोमीटर है। निकटतम रेलवे स्टेशन आैरंगाबाद है। एयरपोर्ट मुम्बई एवं पुणे में हैं। सड़क मार्ग से भी यात्रा कर सकते हैं। यह क्षेत्र सहयाद्री पर्वत श्रंखला के दायरे में आता है।
19.910365,75.361376   

Sunday, 25 March 2018

त्र्यम्बकेश्वर मंदिर: ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के दर्शन

   शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में त्र्यम्बकेश्वर मंदिर की खास विशिष्टता है क्योंकि यहां मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश तीनों देव विद्यमान हैं।

   महाराष्ट्र के नासिक में स्थित त्र्यम्बकेश्वर मंदिर हिन्दुओं की श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का श्रेष्ठतम स्थान है। त्र्यम्बकेश्वर मंदिर ब्रह्मगिरी पर्वत श्रंखला क्षेत्र में विद्यमान है।
    त्र्यम्बकेश्वर मंदिर ब्रह्मगिरी पर्वत की तलहटी पर स्थित है। यह स्थान गोदावरी नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। त्र्यम्बकेश्वर प्रभु की बड़ी महिमा है। खास यह कि त्र्यम्बकेश्वर मंदिर के अर्घा में ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश प्रतिष्ठापित हैं। इस ज्योतिर्लिंग की यह सबसे बड़ी विशेषता है। कारण शिव के अन्य सभी ज्योतिर्लिंग में सिर्फ भगवान शिव विराजित हैं। 
    गोदावरी नदी के निकट स्थित शिव का यह ज्योतिर्लिंग त्र्यम्बकेश्वर मंदिर काले पत्थरों से सुसज्जित है। स्थापत्य-वास्तुशिल्प अद्भुत है। त्र्यम्बकेश्वर मंदिर का भव्य-दिव्य परिसर सिंधु-आर्य शैली का उत्कृष्ट उत्करण है।
    मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करने पर शिवलिंग का केवल अर्घा ही दिखता है। इस अर्घा में जल होता है। इस अर्घा के अंदर एक-एक इंच के तीन लिंग हैं। इनको ब्राह्मा, विष्णु एवं महेश का स्वरुप माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त में पूजा-अर्चना के समय अर्घा पर चांदी का मुकुट सुशोभित किया जाता है। इस मंदिर क्षेत्र के पंचकोस में विशेषताओं एवं विलक्षणताओं का अद्भुत संयोग भी माना जाता है।
    मान्यता है कि त्र्यम्बकेश्वर मंदिर में कालसर्प योग शांति, त्रिपिंड विधान, नारायण नागबलि की पूजा-अर्चना विधि विधान से की जाती है। श्रद्धालु-भक्त इच्छाओं की पूर्ति होने पर पूजन-अर्चन कराते हैं। प्राचीनकाल में त्र्यम्बकेश्वर मंदिर क्षेत्र त्र्यंम्बक गौतम ऋषि की तपोभूमि थी।
     गौतम ऋषि ने गोहत्या के पाप से मुक्ति के लिए यहंा कठोर तप किया था। गौतम ऋषि ने शिव से गंगा को यहां अवतरित करने का वरदान मांगा था। फलस्वरूप दक्षिण की गंगा अर्थात गोदावरी नदी का उद्गम इस क्षेत्र में हुआ। गौतम ऋषि के अनुनय-विनय पर भगवान शिव ने यहां विराजमान होना स्वीकार कर लिया था। त्रिनेत्रों वाले शिव के यहां विराजमान होने के कारण इस क्षेत्र को त्र्यंबक कहा गया।
    त्र्यम्बकेश्वर को इस क्षेत्र का राजा-महाराजा कहा एवं माना जाता है। प्रत्येक सोमवार को त्र्यम्बकेश्वर नगर भ्रमण करते हैं। जिससे प्रजा का हाल जान सकें। त्र्यम्बकेश्वर महाराज के पंचमुखी स्वर्ण मुखौटा को पालकी में रख शोभायात्रा निकलती है। फिर कुशावर्त तीर्थ स्थित घाट पर स्नान कर वापस त्र्यम्बकेश्वर मंदिर आते हैं।
     यह पूर्ण आयोजन त्र्यम्बकेश्वर महाराज का राज्याभिषेक माना जाता है। यह यात्रा देखना काफी सुखद एवं बेहद अलौकिक अनुभव होता है। किवदंती है कि गोदावरी निरन्तर विलुप्त होती रहती थीं। लिहाजा गौतम ऋषि ने कुशा से गोदावरी को बंधक किया था। जिससे कुशातीर्थ के कुण्ड में हमेशा पानी लबालब रहता है। इस कुण्ड को कुशातीर्थ के नाम से जाना जाता है। 
    कुंभ स्नान के समय शैव अखाड़ा इसी कुण्ड में शाही स्नान करता है। ब्राह्मगिरी पर्वत पर जाने के लिए सात सौ सीढ़ियों से शीर्ष पर जाना होता है। शिखर पर रामकुण्ड एवं लक्ष्मण कुण्ड के दर्शन होते हैं। शिखर पर ही भगवती गोदावरी नदी के गोमुख से निकलते हुये दर्शन होते हैं। त्र्यम्बकेश्वर मंदिर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के श्रद्धालुओं की भीड़ अनवरत बनी रहती है।
      त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए आवागमन के सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन नासिक है। नासिक एयरपोर्ट से त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी करीब तीस किलोमीटर है। नासिक में एयरपोर्ट भी है। लिहाजा हवाई यात्रा भी कर सकते हैं। सड़क मार्ग से भी त्र्यम्बकेश्वर मंदिर की यात्रा की जा सकती है।
19.932247,73.530674

Friday, 23 March 2018

ज्योतिर्लिंग भीमाशंकर मंदिर: श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का केन्द्र

    शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रंखला में भीमाशंकर मंदिर एक सिद्ध तीर्थस्थल है। श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास का ज्योतिर्लिंग भीमाशंकर मंदिर महाराष्ट्र में पुणे से करीब एक सौ बीस किलोमीटर दूर सहयाद्री पर्वत श्रंखला पर स्थित है।

    समुद्र तल से करीब 3250 फुट के शीर्ष शिखर पर विद्यमान यह सिद्धस्थान धार्मिक महत्व रखता है। भीमाशंकर महादेव मंदिर का शिवलिंग काफी वृहद आकार-प्रकार का है लिहाजा मोटेश्वर महादेव भी कहा जाता है।
   भीमाशंकर मंदिर के निकट ही भीमा नदी प्रवाहित होती है। भीमा नदी का समागम कृष्णा नदी में होता है। पुराणों में मान्यता है कि सूर्योदय के समय भीमाशंकर महादेव से प्रार्थना करने से मनवांछित इच्छाओं की पूर्ति होती है।
   भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का वर्णन शिवपुराण में भी मिलता है। शिवपुराण में कहा गया है कि कुंभकर्ण का पुत्र भीम राक्षस था। उसका जन्म पिता की मृत्यु के बाद हुआ था। राक्षस भीम को मां से जानकारी मिली कि उसके पिता का वध श्रीराम के हाथों हुआ। 
   राक्षस भीम ने श्रीराम का वध करने का संकल्प लिया। भीम ने संकल्प पूरा करने के लिए कठोर तप किया। ब्रह्मा को प्रसन्न कर भीम ने विजयी भव का आशीर्वाद प्राप्त किया। वरदान पाने के बाद राक्षस निरंकुश हो गया। युद्ध में भीम ने देवगणों को परास्त कर दिया। देवगण ने शिव की आराधना की। शिव ने राक्षस भीम का वध किया। 
     देवगणों ने शिव से आग्रह किया कि शिवलिंग के रूप में इसी स्थान पर विद्यमान हों। शिव ने देवगणों का आग्रह स्वीकार कर लिया। यह शिव स्थान ही शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठापित है। भीमाशंकर मंदिर का वास्तुशिल्प नागरशैली में है। खास यह कि वास्तुशिल्प में प्राचीनता के साथ साथ नई संरचनाओं का भी समिश्रण अवलोकित होता है।
   वास्तुशिल्प की संरचना प्राचीन विश्वकर्मा वास्तुशिल्पियों की कौशल श्रेष्ठता को भी बेहद सुन्दर ढ़ंग से रेखांकित करता है। विशेषज्ञों की मानें तो भीमाशंकर मंदिर का शिखर 18 वीं सदी में नाना फडनवीस ने बनवाया था। इतना ही नहीं मराठा शासक शिवाजी ने इस मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए कई सुविधायें उपलब्ध करायी थीं। 
    भीमाशंकर मंदिर परिसर का एक बड़ा घंटा खास एवं विशेष है। परिसर में दीपमालिका, कुण्ड एवं कई अन्य श्रद्धा, आस्था एवं विश्वास के केन्द्र हैं। ज्योतिर्लिंग भीमाशंकर मंदिर व उसके आसपास विशेष आकर्षण एवं दर्शनीय स्थल हैं।
     इनमें खास तौर से हनुमान झील, गुप्त भीमशंकर, भीमा नदी की उत्पत्ति स्थल, नागफनी, बाम्बे प्वाइंट, साक्षी विनायक आदि इत्यादि आकर्षण हैं। भीमाशंकर मंदिर एक ज्योर्तिलिंग के साथ ही ऊर्जावान क्षेत्र भी है। भीमशंकर लाल वन क्षेत्र है।
    भीमाशंकर वन अभ्यारण भी है। यह एक संरक्षित क्षेत्र भी है। भीमाशंकर मंदिर के निकट ही कमलजा मंदिर है। कमलजा को पार्वती जी का अवतार माना जाता है। महाराष्ट्र के काशीपुर में स्थित भीमाशंकर मंदिर के निकट शिनोली एवं घोड़गांव  हैं। ज्योतिर्लिंग भीमाशंकर मंदिर की यात्रा के लिए सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं।
     निकटतम एयरपोर्ट पुणे इण्टरनेशनल एयरपोर्ट है। पुणे एयरपोर्ट भीमाशंकर मंदिर से करीब 104 किलोमीटर दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन नेरल है। नेरल की दूरी करीब 25 किलोमीटर है। यहां से लोनावाला रेलवे स्टेशन की दूरी करीब 40 किलोमीटर है। भीमाशंकर मंदिर की यात्रा सड़क मार्ग से भी की जा सकती है।
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तारापीठ मंदिर: धार्मिक पर्यटन    शक्ति उपासना स्थल तारापीठ को अद्भुत एवं विलक्षण धार्मिक स्थल कहा जाये तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज...